वृक्षारोपण से आगे 'वृक्ष संरक्षण' तक: पृथ्वी दिवस तभी सार्थक जब पौधे बनें पेड़________________________ राघवेन्द्र त्रिपाठी संवाददाता विधान केसरी संत कबीर नगर संत कबीर नगर| 22 अप्रैल 2026, हर साल 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस प्रकृति को हरा-भरा बनाने के संकल्प के साथ मनाया जाता है। विगत वर्षों में सरकार द्वारा देश को हरा-भरा बनाने के लिए तमाम वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाए गए हैं। अभियान चलाकर करोड़ों पौधे रोपे गए। लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितने पौधे आज पेड़ बन पाए? वर्तमान में सरकारी कार्यक्रमों के तहत लगाए गए पेड़-पौधों की स्थिति का कोई ठोस आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। सूत्रों और जमीनी हकीकत से यह देखने को मिला है कि पौधे तो बड़े पैमाने पर लगाए जाते हैं, पर उचित देखभाल और संरक्षण के अभाव में कुछ ही दिनों में सूख जाते हैं। इसके बाद मौके पर बचता है केवल ईंटों से बना वह घेरा, जो कभी एक पौधे की उम्मीद का प्रतीक था। पृथ्वी दिवस मनाने का वास्तविक लाभ तभी है जब मनुष्य पेड़-पौधों का ख्याल रखे। भारत को हरा-भरा बनाने की सरकारी मुहिम को धरातल पर उतारने के लिए आम जन समुदाय को आगे आना होगा। पेड़-पौधे हमारे ऑक्सीजन के भंडार हैं। फिर भी इन्हें बेतहाशा काटा जा रहा है। अपनी जरूरतों के लिए पहाड़ों तक को अंधाधुंध तरीके से काटा जा रहा है, जो प्राकृतिक संतुलन के लिहाज से बिल्कुल गलत है। प्रकृति ने मनुष्य को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए बनाया था। लेकिन विडंबना यह है कि मनुष्य ही उसका सबसे बड़ा शोषक बन बैठा है। इसी कारण पृथ्वी दिवस मनाने का लाभ आम समुदाय तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। एक दिन सेमिनार, भाषण और संकल्प लेने से धरती हरी नहीं होगी। ऐसे में हम सभी भारतवासियों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हमारे आस-पास जो भी पेड़-पौधे और प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं, उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व समझें। सरकार पौधा लगा सकती है, लेकिन उसे पेड़ समुदाय ही बना सकता है। वृक्षारोपण के बाद उस पौधे की तीन साल तक देखभाल की जिम्मेदारी तय हो। हर लगाए गए पौधे की जियो-टैगिंग हो और हर 6 महीने पर उसकी स्थिति का सार्वजनिक ऑडिट हो। मोहल्ला समिति, स्कूल और कॉलेजों को पौधों के संरक्षण से सीधे जोड़ा जाए। बिना वैकल्पिक रोपण के पेड़ों की कटाई पर रोक लगे और इसका कड़ाई से पालन हो। पृथ्वी दिवस तभी सार्थक होगा जब हर नागरिक यह समझे कि ईंट का घेरा नहीं, हरा-भरा पेड़ ही असली विरासत है। यदि आज हम चूक गए तो आने वाली पीढ़ियों को ऑक्सीजन भी सिलेंडर में खरीदनी पड़ेगी।
वृक्षारोपण से आगे 'वृक्ष संरक्षण' तक: पृथ्वी दिवस तभी सार्थक जब पौधे बनें पेड़________________________ राघवेन्द्र त्रिपाठी संवाददाता विधान केसरी संत कबीर नगर संत कबीर नगर| 22 अप्रैल 2026, हर साल 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस प्रकृति को हरा-भरा बनाने के संकल्प के साथ मनाया जाता है। विगत वर्षों में सरकार द्वारा देश को हरा-भरा बनाने के लिए तमाम वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाए गए हैं। अभियान चलाकर करोड़ों पौधे रोपे गए। लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितने पौधे आज पेड़ बन पाए? वर्तमान में सरकारी कार्यक्रमों के तहत लगाए गए पेड़-पौधों की स्थिति का कोई ठोस आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। सूत्रों और जमीनी हकीकत से यह देखने को मिला है कि पौधे तो बड़े पैमाने पर लगाए जाते हैं, पर उचित देखभाल और संरक्षण के अभाव में कुछ ही दिनों में सूख जाते हैं। इसके बाद मौके पर बचता है केवल ईंटों से बना वह घेरा, जो कभी एक पौधे की उम्मीद का प्रतीक था। पृथ्वी दिवस मनाने का वास्तविक लाभ तभी है जब मनुष्य पेड़-पौधों का ख्याल रखे। भारत को हरा-भरा बनाने की सरकारी मुहिम को धरातल पर उतारने के लिए आम जन समुदाय को आगे आना होगा। पेड़-पौधे हमारे ऑक्सीजन के भंडार हैं। फिर भी इन्हें बेतहाशा काटा जा रहा है। अपनी जरूरतों के लिए पहाड़ों तक को अंधाधुंध तरीके से काटा जा रहा है, जो प्राकृतिक संतुलन के लिहाज से बिल्कुल गलत है। प्रकृति ने मनुष्य को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए बनाया था। लेकिन विडंबना यह है कि मनुष्य ही उसका सबसे बड़ा शोषक बन बैठा है। इसी कारण पृथ्वी दिवस मनाने का लाभ आम समुदाय तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है। एक दिन सेमिनार, भाषण और संकल्प लेने से धरती हरी नहीं होगी। ऐसे में हम सभी भारतवासियों की यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि हमारे आस-पास जो भी पेड़-पौधे और प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं, उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व समझें। सरकार पौधा लगा सकती है, लेकिन उसे पेड़ समुदाय ही बना सकता है। वृक्षारोपण के बाद उस पौधे की तीन साल तक देखभाल की जिम्मेदारी तय हो। हर लगाए गए पौधे की जियो-टैगिंग हो और हर 6 महीने पर उसकी स्थिति का सार्वजनिक ऑडिट हो। मोहल्ला समिति, स्कूल और कॉलेजों को पौधों के संरक्षण से सीधे जोड़ा जाए। बिना वैकल्पिक रोपण के पेड़ों की कटाई पर रोक लगे और इसका कड़ाई से पालन हो। पृथ्वी दिवस तभी सार्थक होगा जब हर नागरिक यह समझे कि ईंट का घेरा नहीं, हरा-भरा पेड़ ही असली विरासत है। यदि आज हम चूक गए तो आने वाली पीढ़ियों को ऑक्सीजन भी सिलेंडर में खरीदनी पड़ेगी।
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