21वीं सदी का राजस्थान साहित्यिक आंदोलन : साहित्य से विरासत तक डीग दुर्ग की यात्रा रिपोर्टर अनिल जटिया 21वीं सदी का राजस्थान साहित्यिक आंदोलन : साहित्य से विरासत तक डीग दुर्ग की यात्रा रिपोर्टर अनिल जटिया डीग में 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन की श्रृंखला में साहित्यिक संवाद का कार्यक्रम 13 सितंबर 2026 को सम्पन्न हुआ। साहित्य, संस्कृति और समाज को लेकर संवाद के बाद मन में लगा कि जिस धरती पर हम साहित्य की बात करने आए हैं, उसकी ऐतिहासिक विरासत को देखे बिना लौटना ठीक नहीं होगा। वैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों से हमारा यह जुड़ाव आज का नहीं है। वर्ष 2010 से ही साहित्यिक यात्राओं और कार्यक्रमों के साथ राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को देखने-समझने का सिलसिला चलता रहा है। डीग की यह यात्रा उसी निरंतर क्रम की एक और कड़ी थी। कार्यक्रम के बाद हम डीग के दुर्ग-महल परिसर की ओर निकल पड़े। दुर्ग में प्रवेश करते ही इतिहास की एक अलग दुनिया सामने थी। मजबूत दीवारें, प्रवेश द्वार, खाई और भीतर फैला विशाल महल परिसर। आज सब कुछ शांत है, लेकिन इन दीवारों के पीछे सत्ता, संघर्ष और वैभव की एक लंबी कहानी छिपी है। डीग : जाट सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र 18वीं शताब्दी में जाट सत्ता के उभार के साथ डीग का महत्व तेजी से बढ़ा। भारत सरकार के Incredible India के अनुसार महाराजा बदन सिंह ने लगभग 1730 ई. के आसपास डीग को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया। उन्होंने यहां राजकीय परिसर की नींव रखी और उनके पुत्र महाराजा सूरजमल ने आगे इसे मजबूत दुर्गीय सुरक्षा प्रदान की। पुराने सरकारी अभिलेखों में भी बदन सिंह द्वारा डीग को राजधानी बनाने, पुराने महल और दुर्गों के निर्माण तथा बाद में सूरजमल द्वारा जाट शक्ति को विस्तार देने का उल्लेख मिलता है। इस इतिहास को जानते हुए जब मैं दुर्ग की दीवारों के बीच चल रहा था तो लगा कि ये केवल पत्थर नहीं हैं। इन्होंने उस समय को देखा है, जब भरतपुर की जाट सत्ता आकार ले रही थी और डीग उसका महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र था। बाद में भरतपुर राजनीतिक राजधानी के रूप में अधिक महत्वपूर्ण हो गया, लेकिन डीग का महत्व कम नहीं हुआ। यहां का महल परिसर राजपरिवार के लिए महत्वपूर्ण निवास और बाद में ग्रीष्मकालीन प्रवास का केंद्र बना रहा। सूरजमल और डीग का स्थापत्य वैभव डीग के महल परिसर में आगे बढ़ते हुए इतिहास का दूसरा रूप दिखाई देता है—स्थापत्य और सौंदर्य का। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार यहां के प्रमुख भवनों का विकास मुख्यतः महाराजा सूरजमल (1756–63) और महाराजा जवाहर सिंह (1764–68) के काल में हुआ। परिसर में गोपाल भवन, सूरज भवन, किशन भवन, नंद भवन, केशव भवन, हरदेव भवन तथा सावन-भादों के मंडप जैसे प्रमुख भवन हैं। इनके बीच गोपाल सागर और रूप सागर जैसे विशाल जलाशय तथा उद्यान हैं। यहां की खासियत मुझे यही लगी कि महल, पानी और बगीचे अलग-अलग चीजें नहीं लगते। पूरा परिसर एक साथ रचा गया है। भारत सरकार के विवरण में भी डीग के महलों के मुगल चारबाग योजना और राजस्थानी-मुगल स्थापत्य के मेल का उल्लेख है। मैं एक भवन से दूसरे भवन की ओर बढ़ता रहा। कहीं पत्थर की बारीक कारीगरी नजर आती, कहीं मेहराबें, कहीं छतरियां और कहीं पानी का विशाल विस्तार। जलाशय के किनारे कुछ देर रुककर महलों की ओर देखा तो लगा कि उस समय के वास्तुकारों ने केवल सुंदर भवन बनाने के बारे में नहीं सोचा था, बल्कि गर्मी, पानी, हवा, प्रकाश और हरियाली को भी स्थापत्य का हिस्सा बनाया था। वैभव के साथ संघर्ष की कहानी डीग की कहानी केवल महलों और बागों की कहानी नहीं है। इसकी सामरिक स्थिति के कारण यह संघर्षों का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा। 18वीं शताब्दी में डीग पर बाहरी शक्तियों का दबाव बना रहा और बाद के वर्षों में यहां सत्ता-संघर्ष हुए। इसका सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अध्याय 1804 का डीग युद्ध और उसके बाद का घेरा है। उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं का सामना यशवंतराव होल्कर की सेना और भरतपुर के जाट शासकों से जुड़े सैन्य गठजोड़ से हुआ। डीग उस व्यापक राजनीतिक-सैन्य संघर्ष का महत्वपूर्ण क्षेत्र बना। आज जब उन प्राचीरों को शांत वातावरण में देखता हूं तो कल्पना करना कठिन है कि कभी इन्हीं के आसपास युद्ध की हलचल रही होगी। इतिहास की यही खूबी है कि वह किसी स्थान का केवल सुंदर चेहरा नहीं दिखाता, उसके संघर्ष भी सामने रखता है। संगमरमर का हिंडोला महल परिसर में घूमते हुए मेरी नजर संगमरमर के हिंडोले पर पड़ी। मैं उसके सामने कुछ देर बैठा। पहली नजर में वह संगमरमर की एक सुंदर मेहराब जैसा दिखाई देता है। लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार यह वास्तव में झूले का ढांचा है। इसके ऊपरी हिस्से में लगे दो छल्लों से वास्तविक झूला लटकाया जाता था। इसके संगमरमर के आधार पर फारसी भाषा का अभिलेख है, जिसकी तारीख हिजरी 1041 अर्थात 1630–31 ईस्वी है। यह तारीख शाहजहाँ के शासन के चौथे वर्ष से मेल खाती है, इसलिए ASI इसके निर्माण को शाहजहाँ के काल से जोड़ता है। इसे डीग में कैसे लाया गया, इस पर भी एक ही निश्चित कहानी नहीं है। ASI के अनुसार इसे बयाना के निकट फूलबाड़ी पैलेस से हटाकर यहां स्थापित किए जाने की बात कही गई है साथ ही यह संभावना भी दर्ज है कि इसे सूरजमल या जवाहर सिंह दिल्ली से युद्ध की ट्रॉफी के रूप में लाए हों। इसलिए मैंने उस प्रचलित कथा को अंतिम इतिहास मानने के बजाय प्रमाणित विवरण को ही महत्व दिया। उस हिंडोले के सामने बैठा तो मन में एक विचार आया...पत्थर भी स्मृतियां संभालकर रखते हैं। कितने लोग इस स्थान से होकर गुजरे होंगे। कितनी पीढ़ियां बदली होंगी। जिन लोगों ने इसे बनते देखा होगा, वे आज नहीं हैं, लेकिन उनकी कला हमारे सामने मौजूद है। यही तो साहित्य भी करता है। समय बीत जाता है, लोग चले जाते हैं, लेकिन शब्द स्मृतियों को बचाए रखते हैं। साहित्य से विरासत तक डीग के पूरे दुर्ग-महल परिसर में घूमते हुए मेरे लिए साहित्य और विरासत दो अलग विषय नहीं रहे। कार्यक्रम में हम साहित्य और समाज के संबंध की बात कर रहे थे और कुछ समय बाद उसी धरती के इतिहास के बीच खड़े थे। तब लगा कि साहित्य को अपनी मिट्टी से जोड़ना जरूरी है। किसी दुर्ग की दीवार, किसी पुराने महल की मेहराब, किसी जलाशय का किनारा या किसी पत्थर पर अंकित अभिलेख...ये सब अपने आप में एक कहानी हैं। जरूरत केवल इतनी है कि हम उन्हें पढ़ने और समझने की दृष्टि विकसित करें। शायद इसी अनुभव से “साहित्य से विरासत तक” का विचार और मजबूत हुआ। वर्ष 2010 से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों के साथ चल रहा हमारा यह जुड़ाव अब भी जारी है। डीग उसी यात्रा का एक नया पड़ाव है और आगे राजस्थान के दूसरे जिलों की धरती, इतिहास और संस्कृति से भी संवाद करना है। लौटते समय मैंने पीछे मुड़कर एक बार फिर महलों की ओर देखा। मन में लगा कि किसी विरासत को बचाना केवल उसकी इमारत को बचाना नहीं है। उसकी कहानी को जीवित रखना भी उतना ही जरूरी है। और कहानी तभी जीवित रहती है, जब कोई उसे देखे, समझे और आगे सुनाए। डीग से लौटते समय मेरे साथ कुछ तस्वीरें थीं, लेकिन उनसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण कुछ स्मृतियां थीं। सुबह हम साहित्य की बात कर रहे थे और कुछ घंटे बाद इतिहास के बीच खड़े थे। शायद यही 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन की यात्रा का एक अर्थ है "साहित्य से विरासत तक"। अनिल सक्सेना ‘ललकार’ संस्थापक-प्रवर्तक 21वीं सदी का राजस्थान साहित्यिक आंदोलन
21वीं सदी का राजस्थान साहित्यिक आंदोलन : साहित्य से विरासत तक डीग दुर्ग की यात्रा रिपोर्टर अनिल जटिया 21वीं सदी का राजस्थान साहित्यिक आंदोलन : साहित्य से विरासत तक डीग दुर्ग की यात्रा रिपोर्टर अनिल जटिया डीग में 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन की श्रृंखला में साहित्यिक संवाद का कार्यक्रम 13 सितंबर 2026 को सम्पन्न हुआ। साहित्य, संस्कृति और समाज को लेकर संवाद के बाद मन में लगा कि जिस धरती पर हम साहित्य की बात करने आए हैं, उसकी ऐतिहासिक विरासत को देखे बिना लौटना ठीक नहीं होगा। वैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों से हमारा यह जुड़ाव आज का नहीं है। वर्ष 2010 से ही साहित्यिक यात्राओं और कार्यक्रमों के साथ राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को देखने-समझने का सिलसिला चलता रहा है। डीग की यह यात्रा उसी निरंतर क्रम की एक और कड़ी थी। कार्यक्रम के बाद हम डीग के दुर्ग-महल परिसर की ओर निकल पड़े। दुर्ग में प्रवेश करते ही इतिहास की एक अलग दुनिया सामने थी। मजबूत दीवारें, प्रवेश द्वार, खाई और भीतर फैला विशाल महल परिसर। आज सब कुछ शांत है, लेकिन इन दीवारों के पीछे सत्ता, संघर्ष और वैभव की एक लंबी कहानी छिपी है। डीग : जाट सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र 18वीं शताब्दी में जाट सत्ता के उभार के साथ डीग का महत्व तेजी से बढ़ा। भारत सरकार के Incredible India के अनुसार महाराजा बदन सिंह ने लगभग 1730 ई. के आसपास डीग को अपनी राजधानी के रूप में विकसित किया। उन्होंने यहां राजकीय परिसर की नींव रखी और उनके पुत्र महाराजा सूरजमल ने आगे इसे मजबूत दुर्गीय सुरक्षा प्रदान की। पुराने सरकारी अभिलेखों में भी बदन सिंह द्वारा डीग को राजधानी बनाने, पुराने महल और दुर्गों के निर्माण तथा बाद में सूरजमल द्वारा जाट शक्ति को विस्तार देने का उल्लेख मिलता है। इस इतिहास को जानते हुए जब मैं दुर्ग की दीवारों के बीच चल रहा था तो लगा कि ये केवल पत्थर नहीं हैं। इन्होंने उस समय को देखा है, जब भरतपुर की जाट सत्ता आकार ले रही थी और डीग उसका महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र था। बाद में भरतपुर राजनीतिक राजधानी के रूप में अधिक महत्वपूर्ण हो गया, लेकिन डीग का महत्व कम नहीं हुआ। यहां का महल परिसर राजपरिवार के लिए महत्वपूर्ण निवास और बाद में ग्रीष्मकालीन प्रवास का केंद्र बना रहा। सूरजमल और डीग का स्थापत्य वैभव डीग के महल परिसर में आगे बढ़ते हुए इतिहास का दूसरा रूप दिखाई देता है—स्थापत्य और सौंदर्य का। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार यहां के प्रमुख भवनों का विकास मुख्यतः महाराजा सूरजमल (1756–63) और महाराजा जवाहर सिंह (1764–68) के काल में हुआ। परिसर में गोपाल भवन, सूरज भवन, किशन भवन, नंद भवन, केशव भवन, हरदेव भवन तथा सावन-भादों के मंडप जैसे प्रमुख भवन हैं। इनके बीच गोपाल सागर और रूप सागर जैसे विशाल जलाशय तथा उद्यान हैं। यहां की खासियत मुझे यही लगी कि महल, पानी और बगीचे अलग-अलग चीजें नहीं लगते। पूरा परिसर एक साथ रचा गया है। भारत सरकार के विवरण में भी डीग के महलों के मुगल चारबाग योजना और राजस्थानी-मुगल स्थापत्य के मेल का उल्लेख है। मैं एक भवन से दूसरे भवन की ओर बढ़ता रहा। कहीं पत्थर की बारीक कारीगरी नजर आती, कहीं मेहराबें, कहीं छतरियां और कहीं पानी का विशाल विस्तार। जलाशय के किनारे कुछ देर रुककर महलों की ओर देखा तो लगा कि उस समय के वास्तुकारों ने केवल सुंदर भवन बनाने के बारे में नहीं सोचा था, बल्कि गर्मी, पानी, हवा, प्रकाश और हरियाली को भी स्थापत्य का हिस्सा बनाया था। वैभव के साथ संघर्ष की कहानी डीग की कहानी केवल महलों और बागों की कहानी नहीं है। इसकी सामरिक स्थिति के कारण यह संघर्षों का भी महत्वपूर्ण केंद्र रहा। 18वीं शताब्दी में डीग पर बाहरी शक्तियों का दबाव बना रहा और बाद के वर्षों में यहां सत्ता-संघर्ष हुए। इसका सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अध्याय 1804 का डीग युद्ध और उसके बाद का घेरा है। उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं का सामना यशवंतराव होल्कर की सेना और भरतपुर के जाट शासकों से जुड़े सैन्य गठजोड़ से हुआ। डीग उस व्यापक राजनीतिक-सैन्य संघर्ष का महत्वपूर्ण क्षेत्र बना। आज जब उन प्राचीरों को शांत वातावरण में देखता हूं तो कल्पना करना कठिन है कि कभी इन्हीं के आसपास युद्ध की हलचल रही होगी। इतिहास की यही खूबी है कि वह किसी स्थान का केवल सुंदर चेहरा नहीं दिखाता, उसके संघर्ष भी सामने रखता है। संगमरमर का हिंडोला महल परिसर में घूमते हुए मेरी नजर संगमरमर के हिंडोले पर पड़ी। मैं उसके सामने कुछ देर बैठा। पहली नजर में वह संगमरमर की एक सुंदर मेहराब जैसा दिखाई देता है। लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अनुसार यह वास्तव में झूले का ढांचा है। इसके ऊपरी हिस्से में लगे दो छल्लों से वास्तविक झूला लटकाया जाता था। इसके संगमरमर के आधार पर फारसी भाषा का अभिलेख है, जिसकी तारीख हिजरी 1041 अर्थात 1630–31 ईस्वी है। यह तारीख शाहजहाँ के शासन के चौथे वर्ष से मेल खाती है, इसलिए ASI इसके निर्माण को शाहजहाँ के काल से जोड़ता है। इसे डीग में कैसे लाया गया, इस पर भी एक ही निश्चित कहानी नहीं है। ASI के अनुसार इसे बयाना के निकट फूलबाड़ी पैलेस से हटाकर यहां स्थापित किए जाने की बात कही गई है साथ ही यह संभावना भी दर्ज है कि इसे सूरजमल या जवाहर सिंह दिल्ली से युद्ध की ट्रॉफी के रूप में लाए हों। इसलिए मैंने उस प्रचलित कथा को अंतिम इतिहास मानने के बजाय प्रमाणित विवरण को ही महत्व दिया। उस हिंडोले के सामने बैठा तो मन में एक विचार आया...पत्थर भी स्मृतियां संभालकर रखते हैं। कितने लोग इस स्थान से होकर गुजरे होंगे। कितनी पीढ़ियां बदली होंगी। जिन लोगों ने इसे बनते देखा होगा, वे आज नहीं हैं, लेकिन उनकी कला हमारे सामने मौजूद है। यही तो साहित्य भी करता है। समय बीत जाता है, लोग चले जाते हैं, लेकिन शब्द स्मृतियों को बचाए रखते हैं। साहित्य से विरासत तक डीग के पूरे दुर्ग-महल परिसर में घूमते हुए मेरे लिए साहित्य और विरासत दो अलग विषय नहीं रहे। कार्यक्रम में हम साहित्य और समाज के संबंध की बात कर रहे थे और कुछ समय बाद उसी धरती के इतिहास के बीच खड़े थे। तब लगा कि साहित्य को अपनी मिट्टी से जोड़ना जरूरी है। किसी दुर्ग की दीवार, किसी पुराने महल की मेहराब, किसी जलाशय का किनारा या किसी पत्थर पर अंकित अभिलेख...ये सब अपने आप में एक कहानी हैं। जरूरत केवल इतनी है कि हम उन्हें पढ़ने और समझने की दृष्टि विकसित करें। शायद इसी अनुभव से “साहित्य से विरासत तक” का विचार और मजबूत हुआ। वर्ष 2010 से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों के साथ चल रहा हमारा यह जुड़ाव अब भी जारी है। डीग उसी यात्रा का एक नया पड़ाव है और आगे राजस्थान के दूसरे जिलों की धरती, इतिहास और संस्कृति से भी संवाद करना है। लौटते समय मैंने पीछे मुड़कर एक बार फिर महलों की ओर देखा। मन में लगा कि किसी विरासत को बचाना केवल उसकी इमारत को बचाना नहीं है। उसकी कहानी को जीवित रखना भी उतना ही जरूरी है। और कहानी तभी जीवित रहती है, जब कोई उसे देखे, समझे और आगे सुनाए। डीग से लौटते समय मेरे साथ कुछ तस्वीरें थीं, लेकिन उनसे कहीं अधिक महत्वपूर्ण कुछ स्मृतियां थीं। सुबह हम साहित्य की बात कर रहे थे और कुछ घंटे बाद इतिहास के बीच खड़े थे। शायद यही 21वीं सदी के राजस्थान साहित्यिक आंदोलन की यात्रा का एक अर्थ है "साहित्य से विरासत तक"। अनिल सक्सेना ‘ललकार’ संस्थापक-प्रवर्तक 21वीं सदी का राजस्थान साहित्यिक आंदोलन
- आप देख रहे हो शुरू ऐप पर भिवाड़ी में बीएमए की 44वीं वार्षिक आम सभा आयोजित, उद्योगों की समृद्धि और विकास पर मंथन1
- जिला कलक्टर ने ली साप्ताहिक समीक्षा बैठक (रिपोर्टर अनिल जटिया) मौसमी बीमारियों की रोकथाम, संपर्क पोर्टल और बजट घोषणाओं की समीक्षा, अधिकारियों को दिए समयबद्ध कार्य पूर्ण करने के निर्देश जिला कलक्टर ने ली साप्ताहिक समीक्षा बैठक (रिपोर्टर अनिल जटिया) मौसमी बीमारियों की रोकथाम, संपर्क पोर्टल और बजट घोषणाओं की समीक्षा, अधिकारियों को दिए समयबद्ध कार्य पूर्ण करने के निर्देश प्रतापगढ़, 15 सितंबर। जिला कलक्टर शुभम चौधरी की अध्यक्षता में मंगलवार को साप्ताहिक समीक्षा बैठक आयोजित हुई। बैठक में विकसित भारत–जन सेवा अभियान, संपर्क पोर्टल, बजट घोषणाओं सहित विभिन्न विभागीय योजनाओं एवं विकास कार्यों की प्रगति की समीक्षा की गई। जिला कलक्टर ने विभागवार अधिकारियों से कार्यों की जानकारी लेते हुए निर्धारित लक्ष्यों को नियमानुसार और समयबद्ध रूप से पूरा करने के निर्देश दिए। जिला कलक्टर ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि विभागों से संबंधित आवश्यक सूचनाओं को संबंधित पोर्टल पर निर्धारित समयावधि में अपडेट किया जाए। उन्होंने संपर्क पोर्टल पर प्राप्त शिकायतों एवं प्रकरणों का समयबद्ध और संतुष्टिपूर्ण निस्तारण सुनिश्चित करने को कहा। साथ ही बजट घोषणाओं के क्रियान्वयन की नियमित मॉनिटरिंग करते हुए स्वीकृत कार्यों को निर्धारित समय सीमा में प्रभावी ढंग से पूरा करने के निर्देश दिए। मौसमी बीमारियों की रोकथाम पर विशेष फोकस बैठक में जिले में मौसमी बीमारियों की रोकथाम एवं नियंत्रण को लेकर भी विस्तार से चर्चा की गई। जिला कलक्टर ने संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ कार्य करते हुए जिले में साफ-सफाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए। उन्होंने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जीवराज मीणा को फॉगिंग एवं एंटी-लार्वा गतिविधियों को प्रभावी तरीके से संचालित करने तथा संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखने के निर्देश दिए। जिला कलक्टर ने कहा कि मौसमी बीमारियों की रोकथाम के लिए समय रहते आवश्यक कदम उठाए जाएं और विभागीय स्तर पर किसी प्रकार की लापरवाही नहीं हो। 17 सितंबर से शुरू होगा विकसित भारत–जन सेवा अभियान बैठक में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले विकसित भारत–जन सेवा अभियान की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। अभियान के दौरान जिले में सेवा, जनभागीदारी, जनजागरूकता, सामाजिक सरोकार एवं सुशासन से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। जिला कलक्टर ने सभी संबंधित अधिकारियों को अभियान के लिए आवश्यक तैयारियां निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार समय पर पूरी करने तथा अधिकाधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। यह गतिविधियां होंगी आयोजित 17 सितंबर — आशीर्वाद का दीया एवं रक्तदान शिविर 17 सितंबर से 7 अक्टूबर — मेरे सपनों का भारत–चित्रसेवा 17 सितंबर से 17 अक्टूबर — सेवा की कहानी एवं अनकही कहानियां 19 से 25 सितंबर — ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा शिविर 24 सितंबर एवं 11 अक्टूबर — सेवा के रंग, राष्ट्र के संग सांस्कृतिक कार्यक्रम 25 से 27 सितंबर — आंगन मिलन सेवा 2 अक्टूबर — सेवा मेरा योगदान के तहत व्यापक स्वच्छता अभियान 1 से 15 अक्टूबर — सेवा फर्स्ट इनोवेशन चैलेंज 7 अक्टूबर — सेवा ज्योति कलश यात्रा 8 से 16 अक्टूबर — शहरी क्षेत्रों में सेवा शिविर सुशासन सेवा संवाद — नागरिकों एवं प्रशासन के बीच प्रत्यक्ष संवाद जिला कलक्टर ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि अभियान की प्रत्येक गतिविधि का प्रभावी संचालन किया जाए और आमजन को सरकारी योजनाओं एवं सेवाओं से जोड़ने के साथ-साथ जनभागीदारी को भी बढ़ावा दिया जाए। बैठक में अतिरिक्त जिला कलक्टर विजयेश कुमार पंड्या, उप वन संरक्षक सुरेश अग्रवाल, मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैलाश चंद्र बसेर सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे। ब्यूरो चीफ अनिल जटिया3
- *जिला कलक्टर ने ली साप्ताहिक समीक्षा बैठक* *मौसमी बीमारियों, संपर्क पोर्टल, बजट घोषणाओं एवं आगामी अभियानों को लेकर दिए निर्देश* *जिला कलक्टर ने ली साप्ताहिक समीक्षा बैठक* *मौसमी बीमारियों, संपर्क पोर्टल, बजट घोषणाओं एवं आगामी अभियानों को लेकर दिए निर्देश* प्रतापगढ़, 15 सितंबर। जिला कलक्टर शुभम चौधरी की अध्यक्षता में मंगलवार को साप्ताहिक समीक्षा बैठक आयोजित हुई। बैठक में विकसित भारत–जन सेवा अभियान, संपर्क पोर्टल, बजट घोषणाओं सहित विभिन्न विभागीय योजनाओं एवं कार्यों की प्रगति की समीक्षा की गई। जिला कलक्टर ने अधिकारियों से विभागवार प्रगति की जानकारी लेते हुए निर्धारित लक्ष्यों को नियमानुसार समयबद्ध पूर्ण करने के निर्देश दिए। reporter Seema Kumawat मौसमी बीमारियों की रोकथाम पर विशेष फोकस बैठक में मौसमी बीमारियों की रोकथाम एवं नियंत्रण को लेकर भी आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए। जिला कलक्टर ने जिले में साफ-सफाई व्यवस्था पर विशेष ध्यान देने तथा संबंधित विभागों के बीच समन्वय से प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जीवराज मीणा को फॉगिंग एवं एंटी लार्वा गतिविधियों को प्रभावी रूप से संचालित करने तथा इस दिशा में विशेष फोकस रखने के निर्देश दिए। विकसित भारत–जन सेवा अभियान की तैयारियों की समीक्षा बैठक में 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक आयोजित होने वाले विकसित भारत–जन सेवा अभियान की तैयारियों की भी समीक्षा की गई। अभियान के तहत जिले में सेवा, जनभागीदारी, जनजागरूकता, सामाजिक सरोकार एवं सुशासन से जुड़ी विभिन्न गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। जिला कलक्टर ने संबंधित अधिकारियों को अभियान की गतिविधियों का प्रभावी संचालन करते हुए अधिकाधिक जनभागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। यह गतिविधियां होंगी आयोजित 17 सितंबर — आशीर्वाद का दीया एवं रक्तदान शिविर 17 सितंबर से 7 अक्टूबर — मेरे सपनों का भारत–चित्रसेवा 17 सितंबर से 17 अक्टूबर — सेवा की कहानी एवं अनकही कहानियां 19 से 25 सितंबर — ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा शिविर 24 सितंबर एवं 11 अक्टूबर — सेवा के रंग, राष्ट्र के संग सांस्कृतिक कार्यक्रम 25 से 27 सितंबर — आंगन मिलन सेवा 2 अक्टूबर — सेवा मेरा योगदान के तहत व्यापक स्वच्छता अभियान 1 से 15 अक्टूबर — सेवा फर्स्ट इनोवेशन चैलेंज 7 अक्टूबर — सेवा ज्योति कलश यात्रा 8 से 16 अक्टूबर — शहरी क्षेत्रों में सेवा शिविर सुशासन सेवा संवाद — नागरिकों एवं प्रशासन के बीच प्रत्यक्ष संवाद जिला कलक्टर ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आवश्यक तैयारियां समय पर पूर्ण करने के निर्देश दिए। बैठक में अतिरिक्त जिला कलक्टर विजयेश कुमार पंड्या, उप वन संरक्षक सुरेश अग्रवाल, मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैलाश चंद्र बसेर सहित अन्य विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे।3
- अरनोद नगर पालिका में भाजपा का बोर्ड,अरनोद न्यूज़ एक्सप्रेस सें रवि मोरवार की रिपोर्ट1
- भारतीय_जनता_पार्टी_पिछड़ा_मोर्चा_मंडल_शामगढ़ की बैठक प्रथम संगठनात्मक व बूथ इकाई को लेकर संपन्न हुई भारतीय_जनता_पार्टी_पिछड़ा_मोर्चा_मंडल_शामगढ़ की बैठक प्रथम संगठनात्मक व बूथ इकाई को लेकर संपन्न हुई जिसमें भारतीय जनता पार्टी पिछड़ा मोर्चा जिला अध्यक्ष भाई नंदू जी कुमावत मंडल के प्रभारी व जिला महामंत्री राजेंद्र सिंह जी राणा भाषा मंडल अध्यक्ष नीलकमल जी मेहता को भाजपा जिला मन की बात की प्रभारी राहुल जी मुजावदिया पूर्व मंडल अध्यक्ष सतीश जी खुराना भाजपा पिछड़ा मोर्चा जिला मंत्री शेर सिंह जी मोयल भाजपा मंडल महामंत्री अरुण जी कासट का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ संचालन युवा मोर्चा मंडल अध्यक्ष जितेंद्र जी प्रजापति ने किया1
- मंदसौर पुलिस, थाना नईआबादी की सिंथेटिक ड्रग्स के विरुद्ध कार्रवाई आरोपीयो के कब्जे से अवैध मादक पदार्थ एमडी ड्रग व डोडाचूरा जप्त मन्दसौर पुलिस :: प्रेस नोटः: दिनांक:- 15.09.2026 थाना नईआबादी मंदसौर पुलिस की सिंथेटिक ड्रग्स के विरुद्ध कार्रवाई आरोपीयो के कब्जे से अवैध मादक पदार्थ एमडी ड्रग व डोडाचूरा जप्त > कार्य का विवरणः- पुलिस अधीक्षक मंदसौर श्री विनोद कुमार मीना (भा.पु.से.) के निर्देशन, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मंदसौर श्री तेरसिंह बघेल एवं नगर पुलिस अधीक्षक मंदसौर श्री जितेंद्रसिंह भास्कर के कुशल मार्गदर्शन मे थाना प्रभारी नई आबादी उप निरीक्षक कुलदीप सिंह राठौर के नेतृत्व में तस्करो से अवैध मादक पदार्थ एमडी ड्रग व डोडाचुरा जप्त किया गया। ➤ घटना का संक्षिप्त विवरणः- दिनांक 15.09.2026 को थाना नई आबादी पुलिस को प्राप्त विश्वसनीय मुखबिर सूचना के आधार पर कार्यवाही करते हुए आरोपीगणो मोईन पिता इरफान मेवाती निवासी खानपुरा मंदसोर व शेरु पिता युनुस खान निवासी नारायण नगर खानपुरा मंदसोर के कब्जे से अवैध मादक पदार्थ एमडी ड्रग व डोडाचुरा जप्त कर आरोपीगणो के विरुद्ध अपराध क्रमांक 159/26 धारा 8/15,22,29 एनडीपीएस एक्ट का पंजीबद्ध कर विवेचना मे लिया गया। जप्त मश्रुका - 01. 100 ग्राम एमडी (MD) ड्रग 02. 4.7 किलोग्राम डोडाचुरा 03. एक हिरो स्पलेण्डर मोटर सायकल MP14ZA1036 किमती 70000 रुपए 04. एक विवो कंपनी व एक ओप्पो कंपनी का मोबाईल किमती 20000 रुपए अक्लि • जन गिरफ्तार आरोपी - 01. मोईन पिता इरफान मेवाती उम्र 21 साल निवासी खानपुरा मंदसौर 02. शेरु पिता युनुस खान उम्र 21 साल निवासी नारायण नगर खानपुरा मंदसौर फरार आरोपी - 01. मजीद खान पिता ईफ्तीकार खान निवासी काजी चौक, मन्दसोर > पुलिस टीमः- उक्त कार्यवाही में थाना नई आबादी पुलिस टीम का सराहनीय योगदान रहा। मंदसौर पुलिस द्वारा मादक पदार्थों के अवैध कारोबार के विरुद्ध लगातार प्रभावी एवं कठोर कार्रवाई की जा रही है। जिले को नशामुक्त बनाने के उद्देश्य से भविष्य में भी इस प्रकार की कार्रवाई निरंतर जारी रहेगी।1
- राजस्थान के जयपुर नगर निगम चुनाव में AAP की प्रचंड जीत🧹 कुल वार्ड: 150 AAP – 82 BJP – 37 INC – 18 Others – 13 Big Breaking 🚨🔥 राजस्थान के जयपुर नगर निगम चुनाव में AAP की प्रचंड जीत🧹 कुल वार्ड: 150 AAP – 82 BJP – 37 INC – 18 Others – 13 82 सीटों के साथ AAP ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। जयपुर की जनता ने बड़ा जनादेश दिया है।1
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