मध्यप्रदेश में एक अनोखा "विशेष प्रोटोकॉल एक्ट" लागू है, जो न संसद ने बनाया है, न विधानसभा ने पारित किया है, और न ही राजपत्र में प्रकाशित हुआ है। इस व्यंग्यात्मक लेख के अनुसार, यह एक्ट व्यवहार में पूरी दृढ़ता से पालन किया जाता है, जिसके तहत मुख्यमंत्री को जनता का सेवक माना जाता है, पर सड़क पर आते ही जनता उनकी 'प्रजा' बन जाती है। यह व्यवस्था प्रदेश को "अजब है सबसे गजब है" का तमगा देने का एक प्रमुख कारण बन गई है। मुख्यमंत्री के काफिले की सूचना मिलते ही पुलिस महकमा युद्धस्तर पर सक्रिय हो जाता है। सड़कें खाली कराई जाती हैं, चौराहे बंद कर दिए जाते हैं, और आम आदमी को किनारे खड़ा कर दिया जाता है। यह सब कुछ इस तरह होता है मानो कोई राष्ट्रीय आपदा आ गई हो, जबकि असलियत यह होती है कि मुख्यमंत्री को सिर्फ एक कार्यक्रम में पहुँचना होता है। इस दौरान सड़क पर खड़े लोगों के चेहरे देखने लायक होते हैं, क्योंकि उनकी दफ्तर, अस्पताल, परीक्षा या काम पर पहुँचने की मंजिल से ज़्यादा महत्वपूर्ण मुख्यमंत्री का रास्ता हो जाता है। यह दृश्य लोकतंत्र का वह 'सुंदर' पहलू दिखाता है जहाँ जनता अपनी ही सड़क पर खड़ी होकर अपने ही सेवक के गुजरने का इंतजार करती है, जो राजा-महाराजाओं के समय की याद दिलाता है; फर्क सिर्फ इतना है कि तब हाथी-रथ होते थे, अब फॉर्च्यूनर-इनोवा चलती हैं, और तब सैनिक भाले लेकर चलते थे, अब पायलट वाहन और एस्कॉर्ट गाड़ियाँ चलती हैं। कभी-कभी तो यह किसी मुगल बादशाह के शाही जुलूस जैसा प्रतीत होता है। यह व्यवस्था उस चुनावी वादे के ठीक उलट है, जहाँ नेता जनता को लोकतंत्र में 'मालिक' बताते हैं, पर चुनाव जीतने के बाद लगता है कि किसी फाइल में गलती से शब्द बदल गया है और "मालिक" की जगह "रुकावट" लिख दिया गया है। जब कोई आम आदमी पुलिस से रास्ता खुलने का सवाल पूछता है, तो उसे ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे उसने देश की सुरक्षा से जुड़ा कोई गोपनीय प्रश्न पूछ लिया हो, और "मुख्यमंत्री जी निकल रहे हैं" का उत्तर सभी सवालों को खत्म कर देता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री जनता से मिलने जा रहे होते हैं, लेकिन जनता को मिलने से पहले ही रोक दिया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर मरीजों का इलाज करने जाए और रास्ते में ही सभी मरीजों को घंटों खड़ा कर दे। लेख में कहा गया है कि मध्यप्रदेश में ट्रैफिक के दो तरह के नियम दिखते हैं: एक आम जनता के लिए, जहाँ लालबत्ती तोड़ने, हेलमेट न पहनने या गलत पार्किंग पर चालान होता है; और दूसरा वीआईपी काफिलों के लिए, जहाँ हजारों लोगों को रोककर सड़क खाली कराना "प्रोटोकॉल" कहलाता है। इस व्यवस्था में जनता का समय सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं होता और अमूल्य नहीं माना जाता; मुख्यमंत्री के पाँच मिनट जहाँ 'अमूल्य' होते हैं, वहीं जनता के पचास मिनट 'सामान्य' समझे जाते हैं। जाम में फंसे व्यक्ति को हुए नुकसान, छूटी हुई ट्रेन, नौकरी के इंटरव्यू या मरीज की बिगड़ी हालत की कोई परवाह नहीं की जाती, क्योंकि यहाँ समय की कीमत पद के हिसाब से तय होती है, जिसे किसी विशेष प्रशासनिक प्रशिक्षण में पढ़ाया जाता होगा। यह 'प्रोटोकॉल' अक्सर सुरक्षा से ज़्यादा प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है, जबकि दुनिया के कई देशों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सिग्नल पर रुकते और सामान्य ट्रैफिक में निकलते भी दिख जाते हैं, जहाँ सुरक्षा और जनता की सुविधा दोनों का संतुलन बना रहता है। मध्यप्रदेश में यह व्यवस्था कभी-कभी ऐसी लगती है मानो मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि पृथ्वी पर उतर रहे किसी दुर्लभ ग्रह के सम्राट हों, जो उसी जनता के वोट से मिली कुर्सी की ताकत दिखाते हैं, जिसने उन्हें चुना है। अब समय बदल रहा है, मोबाइल कैमरों के साथ जनता सवाल पूछ रही है, और ये सवाल मुख्यमंत्री की सुरक्षा पर नहीं, बल्कि सुरक्षा के नाम पर जनता को दी जा रही असुविधा और लोकतंत्र में जनता के समय के महत्व पर हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि मध्यप्रदेश में यह कौन-सा अदृश्य "प्रोटोकॉल एक्ट" लागू है, जो सड़क पर खड़ी जनता को यह एहसास कराता है कि सत्ता खुद को जनता से ऊपर समझती है, जबकि संविधान में जनता ही सर्वोपरि है। यह दिखाता है कि "लोकतंत्र फाइलों में है, सड़क पर अभी भी शाही सवारी निकल रही है।"
मध्यप्रदेश में एक अनोखा "विशेष प्रोटोकॉल एक्ट" लागू है, जो न संसद ने बनाया है, न विधानसभा ने पारित किया है, और न ही राजपत्र में प्रकाशित हुआ है। इस व्यंग्यात्मक लेख के अनुसार, यह एक्ट व्यवहार में पूरी दृढ़ता से पालन किया जाता है, जिसके तहत मुख्यमंत्री को जनता का सेवक माना जाता है, पर सड़क पर आते ही जनता उनकी 'प्रजा' बन जाती है। यह व्यवस्था प्रदेश को "अजब है सबसे गजब है" का तमगा देने का एक प्रमुख कारण बन गई है। मुख्यमंत्री के काफिले की सूचना मिलते ही पुलिस महकमा युद्धस्तर पर सक्रिय हो जाता है। सड़कें खाली कराई जाती हैं, चौराहे बंद कर दिए जाते हैं, और आम आदमी को किनारे खड़ा कर दिया जाता है। यह सब कुछ इस तरह होता है मानो कोई राष्ट्रीय आपदा आ गई हो, जबकि असलियत यह होती है कि मुख्यमंत्री को सिर्फ एक कार्यक्रम में पहुँचना होता है। इस दौरान सड़क पर खड़े लोगों के चेहरे देखने लायक होते हैं, क्योंकि उनकी दफ्तर, अस्पताल, परीक्षा या काम पर पहुँचने की मंजिल से ज़्यादा महत्वपूर्ण मुख्यमंत्री का रास्ता हो जाता है। यह दृश्य लोकतंत्र का वह 'सुंदर' पहलू दिखाता है जहाँ जनता अपनी ही सड़क पर खड़ी होकर अपने ही सेवक के गुजरने का इंतजार करती है, जो राजा-महाराजाओं के समय की याद दिलाता है; फर्क सिर्फ इतना है कि तब हाथी-रथ होते थे, अब फॉर्च्यूनर-इनोवा चलती हैं, और तब सैनिक भाले लेकर चलते थे, अब पायलट वाहन और एस्कॉर्ट गाड़ियाँ चलती हैं। कभी-कभी तो यह किसी मुगल बादशाह के शाही जुलूस जैसा प्रतीत होता है। यह व्यवस्था उस चुनावी वादे के ठीक उलट है, जहाँ नेता जनता को लोकतंत्र में 'मालिक' बताते हैं, पर चुनाव जीतने के बाद लगता है कि किसी फाइल में गलती से शब्द बदल गया है और "मालिक" की जगह "रुकावट" लिख दिया गया है। जब कोई आम आदमी पुलिस से रास्ता खुलने का सवाल पूछता है, तो उसे ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे उसने देश की सुरक्षा से जुड़ा कोई गोपनीय प्रश्न पूछ लिया हो, और "मुख्यमंत्री जी निकल रहे हैं" का उत्तर सभी सवालों को खत्म कर देता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री जनता से मिलने जा रहे होते हैं, लेकिन जनता को मिलने से पहले ही रोक दिया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर मरीजों का इलाज करने जाए और रास्ते में ही सभी मरीजों को घंटों खड़ा कर दे। लेख में कहा गया है कि मध्यप्रदेश में ट्रैफिक के दो तरह के नियम दिखते हैं: एक आम जनता के लिए, जहाँ लालबत्ती तोड़ने, हेलमेट न पहनने या गलत पार्किंग पर चालान होता है; और दूसरा वीआईपी काफिलों के लिए, जहाँ हजारों लोगों को रोककर सड़क खाली कराना "प्रोटोकॉल" कहलाता है। इस व्यवस्था में जनता का समय सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं होता और अमूल्य नहीं माना जाता; मुख्यमंत्री के पाँच मिनट जहाँ 'अमूल्य' होते हैं, वहीं जनता के पचास मिनट 'सामान्य' समझे जाते हैं। जाम में फंसे व्यक्ति को हुए नुकसान, छूटी हुई ट्रेन, नौकरी के इंटरव्यू या मरीज की बिगड़ी हालत की कोई परवाह नहीं की जाती, क्योंकि यहाँ समय की कीमत पद के हिसाब से तय होती है, जिसे किसी विशेष प्रशासनिक प्रशिक्षण में पढ़ाया जाता होगा। यह 'प्रोटोकॉल' अक्सर सुरक्षा से ज़्यादा प्रतिष्ठा का विषय बन जाता है, जबकि दुनिया के कई देशों में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सिग्नल पर रुकते और सामान्य ट्रैफिक में निकलते भी दिख जाते हैं, जहाँ सुरक्षा और जनता की सुविधा दोनों का संतुलन बना रहता है। मध्यप्रदेश में यह व्यवस्था कभी-कभी ऐसी लगती है मानो मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि पृथ्वी पर उतर रहे किसी दुर्लभ ग्रह के सम्राट हों, जो उसी जनता के वोट से मिली कुर्सी की ताकत दिखाते हैं, जिसने उन्हें चुना है। अब समय बदल रहा है, मोबाइल कैमरों के साथ जनता सवाल पूछ रही है, और ये सवाल मुख्यमंत्री की सुरक्षा पर नहीं, बल्कि सुरक्षा के नाम पर जनता को दी जा रही असुविधा और लोकतंत्र में जनता के समय के महत्व पर हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि मध्यप्रदेश में यह कौन-सा अदृश्य "प्रोटोकॉल एक्ट" लागू है, जो सड़क पर खड़ी जनता को यह एहसास कराता है कि सत्ता खुद को जनता से ऊपर समझती है, जबकि संविधान में जनता ही सर्वोपरि है। यह दिखाता है कि "लोकतंत्र फाइलों में है, सड़क पर अभी भी शाही सवारी निकल रही है।"
- उत्तर प्रदेश के बरेली से एक झकझोर कर रख देने वाला दृश्य सामने आया है, जहां एक लाचार बुजुर्ग को अपनी बीमार पत्नी को इलाज न मिलने पर हाथ ठेले पर लादकर जिला अस्पताल पहुंचाना पड़ा। यह घटना सरकारी वादों की पोल खोलती है और इसे हमारे स्वास्थ्य तंत्र का आईना बताया गया है। इस तस्वीर के अनुसार, जहां सरकारी विज्ञापनों में स्वास्थ्य सेवाएँ दौड़ती दिखती हैं, वहीं ज़मीन पर एम्बुलेंस केवल कागज़ों में ही सायरन बजाती हैं। इमरजेंसी वार्ड, जिसे जीवन की अंतिम उम्मीद बताया गया है, वहां घंटों तक कोई देखने वाला नहीं था। बुजुर्ग की काँपती आवाज़ में जब यह आशंका झलकी कि "अगर यहाँ रही तो मर जाएगी", तब यह सिर्फ एक मरीज का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा हो गया। करोड़ों के बजट, बैठकों और दावों के बावजूद, अगर एक बुजुर्ग को अपनी पत्नी के लिए ठेले को ही एम्बुलेंस बनाना पड़े, तो यह स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत और व्यवस्था की गहरी विफलता को दर्शाता है।1
- हरियाणा राज्य महिला आयोग की चेयरपर्सन रेणु भाटिया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह इस्तीफा कुरुक्षेत्र के एलएनजेपी अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ के साथ हुए एक विवाद और इसके कारण बढ़ते विरोध के बाद दिया गया है। जानकारी के अनुसार, रेणु भाटिया ने अपना त्यागपत्र मुख्यमंत्री को भेज दिया है और उसे स्वीकार करने का अनुरोध किया है।1
- बुरहानपुर जिले के लालबाग थाना क्षेत्र के सिंधिबस्ती इलाके से बड़ी संख्या में महिला और पुरुष आज जनसुनवाई में अपनी शिकायत लेकर कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे। वे एक स्थानीय युवक द्वारा बार-बार की जा रही झूठी शिकायतों की जाँच की मांग कर रहे थे। शिकायतकर्ता सोनम तुलसवानी ने बताया कि इसी क्षेत्र का युवक पवन आसवानी उनके पति नीतू तुलसवानी के खिलाफ लगातार झूठी शिकायतें दर्ज कराता रहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पवन आसवानी के खिलाफ पहले से ही कई मामले दर्ज हैं, और उसकी इन हरकतों के कारण पूरे क्षेत्र के महिला-पुरुष भयभीत हैं। क्षेत्र की महिलाओं ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से इस मामले में न्याय दिलाने की गुहार लगाई है और संबंधित दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है।4
- आज भोपाल के संत हिरदाराम नगर स्थित 3 EME सेंटर (आर्मी क्षेत्र) में 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान का विधिवत शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर महापौर मालती राय ने अभियान के अंतर्गत 5 हजार पौधे रोपड़ की शुरुआत करते हुए स्वयं एक पौधा लगाया। इस महत्वपूर्ण आयोजन में क्षेत्रीय पार्षद श्रीमती कुसुम चतुर्वेदी और आर्मी के अधिकारी गण भी उपस्थित रहे। महापौर मालती राय ने बताया कि यह अभियान मां के सम्मान और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से शुरू किया गया है।1
- अफगानिस्तान क्रिकेट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले शापूर ज़ादरान का इंतक़ाल हो गया है। लंबे समय से एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे शापूर ज़ादरान ने मंगलवार को अंतिम सांस ली। अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने सोशल मीडिया के माध्यम से उनके निधन की जानकारी साझा की है।1
- भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश प्रवक्ता अजय सिंह यादव ने दिग्विजय सिंह द्वारा लगाए गए बैनरों को लेकर उन पर तीखा तंज कसा है। यादव ने आरोप लगाया कि दिग्विजय सिंह ने ‘रामद्रोही’ राहुल गांधी की तस्वीर भगवानों के साथ लगाकर सनातन धर्म का अपमान किया है। अजय सिंह यादव ने राहुल गांधी को ‘रामद्रोही’ बताते हुए कहा कि वे सदैव सनातन धर्म के अपमान में सबसे आगे रहते हैं। प्रवक्ता के अनुसार, राहुल गांधी ने भगवान राम के मंदिर में दर्शन तक नहीं किए और मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के आमंत्रण को चिट्ठी लिखकर ठुकरा दिया था। यादव ने स्पष्ट रूप से कहा कि दिग्विजय सिंह ने आराध्य देव, आस्था और विश्वास के केंद्र भगवान भोलेनाथ और भगवान श्री राम के साथ राहुल गांधी जैसे ‘रामद्रोही’ की तस्वीर लगाकर सनातन धर्म का अपमान किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि दिग्विजय सिंह कोई भी ‘प्रपंच’ करें, सनातन का यह अपमान न तो आम जनता बर्दाश्त करेगी और न ही उन्हें भगवान माफ करेंगे।1
- कुरुक्षेत्र के LNJP अस्पताल में उस वक्त हड़कंप मच गया जब महिला आयोग की चेयरपर्सन रेणु भाटिया अस्पताल पहुंचीं। यह मामला एक डॉक्टर पर ओपीडी में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित गलत हरकत करने के आरोप से जुड़ा है। इस घटना को लेकर रेणु भाटिया ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए सवाल उठाया कि "बच्ची को डॉक्टर के पास अकेले कैसे छोड़ दिया गया?" मामले की गंभीरता को देखते हुए, नर्स और स्टाफ सहित कई लोगों को निलंबित कर दिया गया है। साथ ही, अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।1
- भोपाल में महज आधे घंटे से एक घंटे की बारिश ने नगर निगम के दावों की पोल खोल दी है, जहाँ शहर का डीआईजी बंगला चौराहा बार-बार पूरी तरह जलमग्न हो रहा है। इस स्थिति के कारण लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सड़क पर पानी भर जाने से वाहनों की रफ्तार थम गई, जिससे चौराहे पर लंबा ट्रैफिक जाम लग गया। ऑफिस और घर लौट रहे लोगों का सफर बुरी तरह प्रभावित हुआ, और दोपहिया वाहन चालकों को सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कई वाहन पानी में धीरे-धीरे निकलते नजर आए, वहीं जलभराव के कारण दुर्घटना का खतरा भी काफी बढ़ गया है। स्थानीय लोगों ने बारिश से पहले नालों की सफाई के नगर निगम के दावों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने प्रशासन से डीआईजी बंगला चौराहे पर स्थायी जल निकासी व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की है।1