बाबा राम रहीम का सच क्या है? श्री गुरमीत राम रहीम जी पर लगाए गए मुकदमें की तथ्यात्मक समय सारणी : . (i) सन 2002 में वाजपेयी को दो गुमनाम खत प्राप्त हुए !! खतो के बारे में यह दावा किया गया था कि ये पत्र गुरु राम रहीम की साध्वियों द्वारा लिखे गए थे !! और इन खतो में यह दावा किया गया था कि गुरु श्री राम रहीम जी ने 1999 में इन साध्वियों का बलात्कार किया था !! ( मतलब बलात्कार के 2 से 3 वर्ष बाद गुमनाम खत भेजे गए ) . (ii) घटना के 3 साल बाद भेजे गए इन गुमनाम खतो के आधार पर वाजपेयी ने सी बी आई जांच के आदेश जारी किये !! और बहाना यह था कि - हाई कोर्ट के जज ने वाजपेयी को सी बी आई जांच करवाने के आदेश दिए थे !!! . (iii) सी बी आई के आईपीएस अधिकारी ने कुछ 20 साध्वियों से बेहद गहन ,संदिग्धार्थक, अनेकार्थक एवं घुमावदार प्रश्न किये। इन बयानों को Crpc 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने रिकोर्ड किया गया। और पूछे गए इन अनेकार्थक प्रश्नों के जवाबो को "सबूत" के तौर पर मान लिया गया !!! . (iv) कथित साध्वियां लगातार कह रही थी कि - 'कोई अपराध नहीं हुआ था ', किन्तु उनके बयानों का आशय बलात्कार निकाला गया। उनके द्वारा दिए गए पहले बयानों को सबूत माना गया और बाद के कथ्यों को अस्वीकार कर दिया गया !! . तब सी बी आई वाजपेयी के नियंत्रण में काम कर रही थी। यह अंदाजा लगाने की बात है कि किसने क्या किया होगा और कैसे किया होगा। तो इस मामले में आप अपना अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र है। और 18 साल बाद इस मुकदमे के फैसले में गुरमीत राम रहीम जी को दोषी करार देकर जेल भेज दिया गया !!! . दरअसल पूरा देश एक विशाल सर्कस के मंच में तब्दील हो चुका है। और किसी व्यक्ति को लग सकता है कि - तो इससे क्या फर्क पड़ता है। असल में समस्या यह है कि कई देशो में इस तमाशे की डोज़ काफी कम है। और जिस देश में यह तमाशा कम है वह देश अच्छी व्यवस्थाओ के कारण तेजी से मजबूत होगा और अंततोगत्वा या तो हम पर नियंत्रण हासिल कर लेगा या हमें नष्ट कर देगा। और उस समय यह कॉमेडी हमारी ट्रेजिडी बन जायेगी। . ============ . डेरा सच्चा सौदा प्रकरण ; समस्या एवं समाधान . अध्याय . (1) समस्या यह है कि आबादी के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राम रहीम जी के साथ न्याय नहीं किया गया है। . (2) वजहें, जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट है . (3) तर्क ; जिनसे यह स्थापित किया जाता है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है . (4) डेरा और राजनीति . (5) राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है . (6) उद्देश्य डेरे के इन्फ्रास्त्रक्चर को गिराना था ताकि मिशनरीज का रास्ता साफ़ हो . (7) समाधान . (8) संत और संतत्व की परिभाषा पर मेरा प्रतिभाव . ————— . टिप्पणी : इस जवाब में कुल 8 बिंदु है। 7 बिन्दुओ में मैंने इस प्रकरण से जुडी हुयी विभिन्न सूचनाएं, तथ्य एवं इनके आधार पर मेरा निष्कर्ष रखा है। इस निष्कर्ष या विश्लेषण को आप मेरा दृष्टिकोण भी कह सकते है। यदि मेरा दृष्टिकोण पूर्वाग्रह से ग्रसित है तो मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि मैं पूर्वाग्रह से मुक्त होकर लिखता हूँ। जवाब में एक बिंदु समाधान का भी है, और यह बिंदु महत्वपूर्ण है। पाठको से आग्रह है कि मेरे दृष्टिकोण की तुलना में समाधान वाले हिस्से को ज्यादा भार दें। . ————— . (1) समस्या यह है कि लाखों डेरा समर्थको एवं लाखों स्वतंत्र कार्यकर्ताओ का मानना है कि श्री राम रहीम जी के मामले में अदालत द्वारा दिया गया फैसला संदिग्ध है !! . हो सकता है श्री राम रहीम जी दोषी हो, और ये भी हो सकता है कि वे निर्दोष हो। किन्तु इतना तो तय है कि देश की आबादी का एक वर्ग इस फैसले से संतुष्ट नहीं है। इसी तरह का असंतोष संत श्री आसाराम जी बापू के मामले में भी देखने को मिला था। आसाराम जी के मामले में भी देश की आबादी का एक वर्ग यह मानता था एवं आज भी मानता है उनके साथ न्याय नहीं किया गया। संत रामपाल जी, जयेंद्र सरस्वती जी एवं नित्यानंद जी से जुड़े हुए मामलो में भी देश की एक बड़ी आबादी की यही धारणा थी। . इस तरह यहाँ 2 वर्ग बन जाते है : पहला वर्ग वह है जो यह मानता है कि श्री राम रहीम जी के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ है और वे दोषी है, व उनके दोषी होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा दिया है !! अदालत ने उन्हें किस आधार पर दोषी ठहराया है और क्या सबूत बरामद किये गए है, इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है !! जबकि दुसरे वर्ग का मानना है कि, हो सकता है वे दोषी हो या हो सकता है कि दोषी नहीं भी हो। इस वर्ग को अदालत के फैसले पर विश्वास नहीं है, तथा इस अविश्वास की "पर्याप्त एवं वाजिब" वजहें मौजूद है। . टिप्पणी - इस लेख में उन नागरिको के लिए कुछ नहीं है जो यह मानते है कि 2000 के नोटों में चिप लगी हुयी है, और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि टीवी-अख़बार पर ऐसा बताया गया था, और वे यह भी मानते है कि भारत के जज चाहे पैदाइशी ईमानदार न हो किन्तु नियुक्ति मिलते ही एक प्रकार की जादुई प्रक्रिया द्वारा वे ईमानदार हो जाते है !!! यह लेख सिर्फ उन लोगो के काम का है जो जाया तौर पर न्यायमूर्ति पूजक नहीं है और साथ ही यह भी मानते है कि 2000 के नोटों में ऐसी कोई चिप नहीं है। . ———————- . (2) वजहें , जो पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट है : . एक पोचा तर्क यह है कि इन सभी संतो की भक्ति के कारण इनके भक्त अदालत पर अंगुली उठा रहे है। यह एक गलत तर्क है। आप संतो और उनके भक्तो की बात को जाने दीजिये। सलमान खान का उदाहरण लीजिये। जब उन्हें छोड़ दिया गया था तब भी देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग इस तरह की आवाजे उठा रहा था कि हमारी अदालते भ्रष्ट है। तो यह खुली हुयी बात है कि पेड मीडिया द्वारा की जाने वाली तमाम पॉलीस के बावजूद भारत का एक वर्ग यह मानता है कि हमारी जज भ्रष्ट है !! . क्यों कार्यकर्ताओ के एक वर्ग का मानना है कि हमारी अदालतें भ्रष्ट है ? . क्योंकि ऐसी कोई वजह ही नहीं है जो इस बात का इत्मीनान दिलाए कि भारत की अदालतें भ्रष्ट नहीं है। लेकिन ऐसी ढेर सारी वजहें है जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट न हो ऐसा किसी भी तौर से संभव नहीं है। कुछ वजहें निचे दी गयी है : . 2.1 साक्षात्कार : भारत में जज बनने के लिए साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है। साक्षात्कार में अंक देना जजों के हाथ में होता है। तो भाई भतीजावाद एवं घूस (सेटिंग) के अवसर यहीं से बन जाते है। इस तरह नियुक्ति से ही भ्रष्टाचार शुरू हो जाता है। जज एवं नेता साक्षात्कार की प्रक्रिया को हटाना नहीं चाहते। यदि साक्षात्कार को हटा दिया जाए तो जजों के भ्रष्ट होने की एक वजह समाप्त हो जायेगी। लेकिन फिलहाल साक्षात्कार है , अत: भ्रष्टाचार है। उल्लेखनीय है कि चीन में जजों की नियुक्ति में साक्षात्कार नहीं है। सिर्फ लिखित परीक्षा के माध्यम से ही जजों की नियुक्ति की जाती है। इस वजह से चीन के जज भारतीय जजों की तुलना में कम भ्रष्ट है। समाधान - जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से साक्षात्कार को हटाया जाना चाहिए। . 2.2. पदोन्नति एवं स्थानान्तरण : जजों की नियुक्ति, स्थानांतरण एवं पदोन्नतियां वरिष्ठ जजों के हाथ में होती है। शेषन जज हाई कोर्ट के एवं हाई कोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट के चंगुल में है। यदि हाई कोर्ट का जज भ्रष्ट है तो वह शेषन कोर्ट के सभी जजों पर मनचाहे फैसले करवाने के लिए चाबुक चला सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट के जज भ्र्ष्ट है तो वे पूरी न्यायपालिका को भ्रष्ट बना देते है। और सुप्रीम कोर्ट के जज पूरी तरह से निरंकुश है। . यदि सुप्रीम कोर्ट का जज कुर्सी पर रहते हुए घूस खा रहा है तो उसकी शिकायत कहाँ करेंगे आप ? . दरअसल शेषन कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी एक टोली बना ली है। इनके फैसले में किसी का कोई दखल नहीं। जनता को तो भूल ही जाइए, सरकार तक का दखल नहीं !! जब किसी आदमी को यह पता हो कि उसे पकड़ने वाला कोई नहीं है, न ही कोई उससे सवाल पूछने वाला है, तो उसके भ्रष्ट होने की सम्भावना बढ़ जायेगी। यह निरंकुशता भ्रष्टाचार को जन्म देती है। . उल्लेखनीय है कि जापान में जजों को हर आम चुनाव में नागरिको के अनुमोदन से गुजरना पड़ता है। जब भी चुनाव होते है तो बेलेट पेपर के साथ एक अतिरिक्त प्रश्न रखा जाता है कि क्या आप इस जज को नौकरी से निकालना चाहते है या नहीं। इस तरह से नागरिको के पास विकल्प होता है कि वे भ्रष्ट एवं निकम्मे जज को खारिज कर सके। जज को भय रहता है कि भ्रष्टाचार करने पर जनता मुझे खारिज कर सकती है। इस वजह से उनके भ्रष्टाचार में कमी आती है। इसे रिटेंशन इलेक्शन या रिव्यू कहते है। किन्तु भारत के जज और नेता यह कतई नहीं चाहते कि नागरिको को जजों के काम काज पर टिप्पणी करने का अवसर दिया जाए। . अमेरिका में इससे भी बेहतर प्रणाली है। वहां नागरिक के पास जजों को किसी भी समय नौकरी से निकालने प्रक्रिया है। वहां के जज जानते है कि यदि वे भ्रष्टाचार करेंगे तो यह छिपेगा नहीं और जनता उन्हें नौकरी से निकाल देगी। इस तरह जनता द्वारा नौकरी से निकाले जाने का भय उन्हें कम भ्रष्ट बना देता है, और वे तमीज से पेश आते है। नागरिको द्वारा बहुमत का प्रयोग करके इस तरह नौकरी से निकालने की प्रक्रिया को वोट वापसी कहते है। समाधान - भारत में जजों को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार आम नागरिको को दिया जाना चाहिए। इससे नागरिको का न्यायपालिका में दखल बढेगा और इस अंकुश से भ्रष्टाचार में कमी आएगी। . 2.3. पैसे लेकर सीधे नियुक्तियां : क्या आप जानते है कि, उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए अभ्यर्थी को लिखित परीक्षा से भी नहीं गुजरना होता है !! वरिष्ठ जज कोर्ट में प्रेक्टिस करने वाले किसी भी वकील को सीधे हाई कोर्ट में न्यायधीश के पद पर नियुक्ति दे सकते है !! एक तरह से यह नियम घूसखोरी को कानूनी करने के लिए बनाया गया है, जिसका परोक्ष अर्थ यह है कि – यदि आपके भाई भतीजे वरिष्ठ जज है , यदि आप एक वकील है , और यदि आपके पास घूस देने के लिए मोटी राशि है तो आप सीधे ही हाई कोर्ट के जज बन सकते है !! अनुमान किया जा सकता है कि इस ढंग से जो व्यक्ति जज बनेगा वह कितना भ्रष्ट होगा, और इस तरीके से जो जज किसी को जज बनाएंगे वे कितने ईमानदार होंगे !! समाधान - पसंदगी के आधार पर नियुक्ति देने की प्रक्रिया को ख़त्म किया जाना चाहिए। न्यायधीश जनता के बहुमत से अनुमोदित और यदि वे भ्रष्ट आचरण करते है तो उन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार जिले / राज्य / देश के मतदाताओं के पास हो। . 2.4. मन मर्जी क़ानून बनाने की शक्ति : जब तक संसद दखल कर के इसे पलट न दे तब तक सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट की रुलिंग्स का प्रभाव कानूनों की तरह ही होता है। और, यदि संसद कोई क़ानून बनाती है तो सुप्रीम कोर्ट उसे अवैध भी घोषित कर सकती है। इस तरह कानूनों को वैध / अवैध घोषित करने और क़ानून / संविधान की व्याख्या का अधिकार जजों के पास है। . दूसरे शब्दों में, भारत में अंततोगत्वा जज ही यह तय करते है कि कौनसा क़ानून लागू होगा और कौनसा नहीं होगा। क्या संवैधानिक है और क्या असंवैधानिक है यह तय करने का अधिकार भी जजों के पास है !! और ख़ास बात यह है कि जजों पर नागरिको का कोई नियंत्रण नहीं है। समाधान - कानूनों एवं संविधान की व्याख्या का अधिकार आम नागरिको के पास होना चाहिए। इससे जनता यह निर्धारित कर सकेगी कि कौनसा क़ानून देश हित में है व कौनसा देश विरोधी। . 2.5. मामले को असीमित समय तक लटकाने की शक्ति : धीमी अदालती प्रकिया भ्रष्टाचार को जन्म देती है। जजों के पास किसी मामले को असीमित समय तक लटका कर रखने की शक्ति है। वे घूस खाकर किसी मुकदमें के फैसले को इच्छित समय तक टालते रह सकते है, तथा घूस मिलने पर किसी मामले में अति न्यायिक सक्रियता दिखा सकते है। भारत की अदालतों में 3 करोड़ मुकदमे लटके हुए है। इनमे कई नेता, अभिनेता, अधिकारी, उद्योगपति आदि शामिल है। वे इनके मामलों की सुनवाई धीमी गति से करते है ताकि लम्बे समय तक आरोपी जजों के पंजे में फंसा रहे। चीन के 2 लाख जजों के मुकाबले भारत में सिर्फ 18 हजार जज होने से अदालती प्रक्रिया धीमी है और इस वजह से जजों में भ्रष्टाचार है। समाधान - भारत को जजों की संख्या 20 हजार से बढ़ाकर 2 लाख करने की जरुरत है। . 2.6. अवमानना का क़ानून : जजों को कोई भ्रष्ट कह कर न पुकारे, इसके लिए जजों ने अवमानना का क़ानून बनाया है। यदि आप जज को भ्रष्ट कहेंगे तो जज आपको अदालत की अवमानना के आरोप में जेल पहुंचा देंगे। इस क़ानून के कारण जजों के भ्रष्टाचार की चर्चा नहीं हो पाती और इससे जज निशंक होकर भ्रष्टाचार कर पाते है। एक तरह से जजों ने इस तरह का क़ानून बनाकर पूरे देश को बाध्य कर दिया है कि वे जजों को ईमानदार एवं फ़रिश्ता माने !! और आपको अपने आस पास ऐसे लोग बहुतायत से मिलेंगे जो बिना किसी वजह से जजों को हरिश्चंद्र की औलाद मानकर चलते है। और इसकी उनके पास सिर्फ एक वजह है – उन्होंने यह अख़बार में पढ़ा हुआ होता है कि भारत के जज ईमानदार है !! समाधान - अवमानना के क़ानून को रद्द किया जाना चाहिए। . 2.7. विवेकाधिकार की असीम शक्ति : जजों का विवेकाधिकार भी भष्टाचार को बढ़ावा देता है। कानूनों को कितना भी विस्तृत रूप से लिखा जाये, तब भी कई बिन्दुओ को तय करने के लिए दंडाधिकारी को अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करना होता है। यह विवेकाधिकार भारत के जजों को असीमित शक्ति प्रदान कर देता है। वे घूस खाकर अपने विवेकाधिकार का इस तरह से इस्तेमाल करते है, जिससे घूस देने वाले को लाभ पहुँचाया जा सके। एक मशहूर कथन है कि – क़ानून मोम के टुकड़े की तरह होते है, और इसकी व्याख्या करने वाला इसे मनचाहे सांचे में ढाल सकता है !! समाधान - विवेकाधिकार की शक्ति जजों की जगह नागरिको के ज्यूरी मंडल को दी जानी चाहिए। . तो ऊपर दिए गयी प्रशासनिक वजहें बताती है कि हमारी न्यायपालिका में ऐसी पर्याप्त व्यवस्थाएं है जो यह सिद्ध करती है कि ऐसी कोई वजह मौजूद नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के जज देश के अन्य अधिकारियो एवं नेताओ की तुलना में ज्यादा ईमानदार है। . बल्कि स्थिति इसके उलट है। दरअसल जजों की नियुक्ति-पदोन्नति की प्रणाली, विवेकाधिकार का प्रयोग एवं अवमानना का क़ानून उन्हें ज्यादा भ्रष्ट होने के ज्यादा सहज अवसर प्रदान करता है। और उन्हें नेताओं की तरह कभी जनता के प्रति जवाबदेहिता की प्रक्रिया से नही गुजरना पड़ता !! जीवन में कभी भी नही !! यही वजह है कि हमारी न्यायपालिका में भारी भ्रष्टाचार है। . 2.8. दूसरी तरफ सिर्फ दो वजहें है जिसकी वजह से यह बात स्थापित की जाती है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है : अवमानना के क़ानून का भय : यदि आप जजों पर अंगुली उठाएंगे तो वे आपको अवमानना का दोषी ठहरा कर जेल में डाल देंगे !! इस वजह से भारत के सभी समझदार एवं बड़े आदमी निरंतर यह दोहराते रहते है कि हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है !!! दूसरी बड़ी वजह पेड मिडिया है : धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत में जज सिस्टम को जारी रखना चाहते है, ताकि वे जजों को घूस देकर मनचाहे फैसले निकलवा सके। इस तरह धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक अपने पक्ष में फैसले लेने के लिए जजों के भ्रष्टाचार का लाभ उठाते है। अत: वे जजों की छवि बनाये रखने के लिए पेड मिडिया को भुगतान करते है। पेड मिडिया निरंतर इस तरह की धारणा खड़ी करता है जिससे नागरिको में यह भ्रम फैले कि भारत के माननीय जज बेहद ईमानदार है। . ——————- . (3) डेरा और राजनीति : . यह एक बहुत ही गलत धारणा है कि धर्म में राजनीति का एवं राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। दरअसल धर्म राजनीति से अलग किया ही नही जा सकता। . वजह ? . कोई भी धार्मिक संस्था या धार्मिक गुरु लोगो से जुड़ा होता है तथा उसकी गतिविधियों में धार्मिक जमाव होता है। जहाँ भी लोगो का जमाव होगा वहां दखल करना राजनीति की मजबूरी है। राजनेता ऐसे सभी व्यक्तियों का पीछा करते है जिसके पास लोगो के किसी समूह को प्रभावित करने की क्षमता हो। . धार्मिक संस्थाओ के पास यह क्षमता काफी बढ़ी हुयी होती है। अत: राजनेता चाहते है कि अमुक गुरु या संस्था अपने श्रद्धालुओं को उनके पक्ष में वोट करने के लिए प्रेरित करे। कोई गुरु या संस्था राजनीति से अलग रहना चाहे तो भी राजनेता उनका पीछा करते है। धार्मिक गुरुओ के पास इनसे बचने का कोई विकल्प नहीं है। . और कभी कभी इसका उल्टा भी देखने में आता है। सभी धार्मिक संस्थाओ को अपने विस्तार के लिए सरकार से मधुर सम्बन्ध बनाये रखना जरुरी होता है। इसीलिए वे बढ़त बनाये रखने और स्वयं को सुरक्षित करने के लिए सत्ता के साथ गठजोड़ बनाते है। कुल मिलाकर धार्मिक संस्थाओ / गुरुओ के पास लोगो का जमाव है और ये लोग वोट करते है। राजनीति में प्रत्येक व्यक्ति एक वोट है। तो धर्म में राजनीति स्थायी तत्व है। इससे बचा नहीं जा सकता। . जो लोग इस तरह का ज्ञान बाँटते फिरते है कि धर्म का राजनीती में दखल नहीं होना चाहिए वे भी यह बात अच्छी तरह से जानते है कि पूरी धर्म का राजनीती में दखल अनिवार्य तत्व है, किन्तु वे अपने निहित स्वार्थो के लिए इस तरह के भ्रम फैलाते है। . मौजूदा स्थिति में राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ, कांग्रेस, अकाली और आम आदमी पार्टी में से कोई भी राजनैतिक दल डेरा के समर्थन में नहीं था / है। अकाली स्थानीय राजनीति और धार्मिक वजहों से तथा बीजेपी=संघ राष्ट्रीय राजनीति की वजह से डेरे को गिराना चाहते थे !! अपनी राजनैतिक वजहों के चलते कोंग्रेस एवं आम आदमी पार्टी की रुचि भी डेरे को बचाने में नहीं थी। आरएसएस हिन्दू धर्म के अनुयायियों को अपने नीचे "एक" करने के मिशन पर है। संघ के अनुसार विभिन्न सम्प्रदाय एवं गुरु वगैरह हिन्दुओ को विभाजित कर रहे है, और इसकी वजह से हिन्दुओ को एक करने का उनका मिशन पिछड़ जाता है !! अत: संघ पिछले 90 वर्ष से विभिन्न सम्प्रदायों एवं गुरुओ को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है। गोल्डन टेम्पल पर अपना प्रभाव रखने वाले अकाली भी डेरे को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते है। कोंग्रेस को डेरे ने एक लम्बे समय तक राजनैतिक समर्थन दिया था, किन्तु हाल ही में डेरे के बीजेपी की और चले जाने से कोंग्रेस को भी डेरे के गिर जाने से कोई दिक्कत नहीं है। इसके अलावा मिशनरीज द्वारा समर्थित तर्क शील सोसाइटी जैसे संगठन भी डेरे के खिलाफ है। . बहरहाल, विभिन्न दलों और संगठनो के अपने हित और उनकी राजनीति है, और इसके कई आयाम हो सकते है। . इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां डेरे को गिराना चाहती थी। अत: इस बात से कोई फर्क नहीं आता कि संघ / कोंग्रेस / अकाली आदि क्या चाहते थे। भारत में एफडीआई बढ़ने से मिशनरीज की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि बीजेपी / कोंग्रेस / अकाली / आम आदमी पार्टी आदि कोई भी दल मिशनरीज के खिलाफ नहीं जा सकते। अत: इस प्रकरण में संघ / कोंग्रेस / अकाली एवं आम आदमी पार्टी की भूमिका को ज्यादा गंभीरता से लेने से हम मूल विषय से भटक जायेंगे। . यहाँ हमें इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि परदे के पीछे जो भी सियासत रही हो , लेकिन निष्पादन जज द्वारा ही किया जाता है। . आशय यह कि किसी व्यक्ति को जेल में भेजने की शक्ति सिर्फ जज के पास ही होती है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी इस शक्ति से वंचित है। तो जब किसी व्यक्ति को फंसाना होता है तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक हमेशा जज का ही इस्तेमाल करते है। जब तक जज नहीं चाहेगा तब तक किसी भी व्यक्ति को किसी तरह से जेल में नहीं पहुचायां सकता। और यदि जज किसी व्यक्ति को जेल भेजना चाहता है तो उसे फिर कोई बचा भी नहीं सकेगा। ऊपर उन कारणों को बताया गया है जो इस बात की पुष्टि करते है कि भारत की अदालतें उतनी ही भ्रष्ट है जितने कि अन्य विभाग। . ———————— . (5) राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है : . सन 2002 में वाजपेयी को दो गुमनाम खत प्राप्त हुए ! खतो के बारे में यह दावा किया गया था कि ये पत्र गुरु राम रहीम की साध्वियों द्वारा लिखे गए थे !! और इन खतो में यह भी दावा किया गया था कि गुरु श्री राम रहीम जी ने 1999 में इन साध्वियों का बलात्कार किया था !! ( मतलब बलात्कार के 2 से 3 वर्ष बाद गुमनाम खत भेजे गए ) !!! घटना के 3 साल बाद यानी 2002 में इन गुमनाम खतो के आधार पर वाजपेयी ने CBI जांच के आदेश जारी किये !!! इन पत्रों में यह नहीं लिखा गया था कि ये पत्र किसने भेजे है। अत: CBI के आईपीएस अधिकारीयों ने कुछ 20 साध्वियों से बेहद गहन ,संदिग्धार्थक, अनेकार्थक एवं घुमावदार प्रश्न किये। इन बयानों को Crpc-164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने रिकोर्ड किया गया। और पूछे गए इन अनेकार्थक प्रश्नों के जवाबो को आगे की जांच के लिए सबूत के तौर पर मान लिया गया !!! 2005 तक CBI ने पीड़ीताओ से कई बार पूछताछ की। किन्तु हर बार पीड़ीताओ ने बयान दिया कि हमारे साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ !! CBI का कहना है कि उन्होंने कथित पीड़ीताओ को 2002 में ही खोज निकाला था !! किन्तु सीबीआई ने उनके बयान 2006 में दर्ज किये, और 2006 में ही चालान पेश किया। CBI ने दोनों कथित पीड़ीताओ के बयान 2006 में फिर दर्ज किये, और इनमे यह कहा गया कि बलात्कार किया गया था !! राम रहीम जी के वकील को दोनों पीड़ीताओ के बयानों की कॉपी नहीं दी गयी !! राम रहीम जी के वकील को पीड़ीताओ से क्रोस क्वेशचन करने का मौका नहीं दिया गया !! पीड़ीताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी किन्तु उन्हें बयान बदलने की अनुमति नहीं दी गयी !! . तो तकनिकी रूप से मुकदमे का सार यह है कि – 3 साल बाद प्राप्त हुए गुमनाम पत्रों के आधार पर सीबीआई जांच के आदेश किये गए !! 6 साल बाद सीबीआई ने ख़त लिखने वालो को खोज निकाला और उनके बयान दर्ज किये !! उन्होंने 4 वर्ष तक यह कहा कि कोई बलात्कार नही हुआ था , किन्तु सीबीआई ने इसे नहीं माना !! 2006 में सीबीआई ने दो साध्वियों के बयान दर्ज किये जिनमे कहा गया कि, बलात्कार हुआ था !! वकील को इन पीडिताओ से क्रोस क्वेश्चन करने की अनुमति नहीं दी गयी !! पीडीताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी, किन्तु उन्हें अनुमति नहीं दी गयी !! 11 साल पहले लिए गए इन बयानों के आधार पर जज ने घटना के 18 साल बाद राम रहीम जी को जेल भेज दिया !!! . ध्यान देने वाली बात यह है कि, इस मुकदमे के सम्बन्ध में कोई भी "भौतिक सबूत" बरामद नहीं किये गए। सिर्फ बयानों को आधार पर फैसला दिया गया। जज को यह फैसला करना था कि कौन सच बोल रहा था और कौन झूठ। इस स्थिति में अभियुक्त एवं पीडिताओ का नारको टेस्ट लेकर पता किया जा सकता है कि किसका बयान सच था। किन्तु नारको टेस्ट नहीं लिया गया और जज ने लड़कियों के बयानों को सच मानने का फैसला किया !!! . सुप्रीम कोर्ट की यह रूलिंग कि — लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा और लड़की को अपना बयान बदलने की इजाजत नहीं होगी मुख्य वजह बनी जिसके कारण सरकार के नियन्त्रण में काम करने वाले CBI के आईपीएस अधिकारी एवं जज श्री राम रहीम जी को जेल में पहुंचा सके। सुप्रीम कोर्ट ने यह रूलिंग रसूखदार लोगो को पंजे में लेने के लिए की है, और लगभग सभी हिन्दू संतो को गिराने के लिए इस रूलिंग का इस्तेमाल किया गया है, और आगे भी इसी रूलिंग का इस्तेमाल किया जाएगा। . इस रूलिंग का एक सबसे बड़ा साइड इफेक्ट यह आया कि अवसरवादी काम काजी महिलाओं ने इसका इस्तेमाल सहकर्मी पुरुष साथियों को ब्लेकमेल करने में शुरू किया और ज्यादातर पुरुष मालिको ने महिलाओं से दूरी बनाने के लिए उन्हें नियुक्तियां देना बंद कर दिया !! . पिछले 3 साल में मेरे खुद के सामने ऐसे दर्जन भर वाकये गुजर चुके है जब महिलाओं को नौकरियां गंवानी पड़ी है। और विडम्बना यह है कि उन महिलाओं / लडकियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि इस रूलिंग की वजह से वे नौकरियां गँवा रही है !! . लिंक - Victim's testimony is enough for conviction for rape: court . CBI के अधिकारियों ने ये बयान मजिस्ट्रेट के सामने कथित Crpc की धारा 164 के तहत दर्ज किये थे !! अब यदि बयान देने वाली लड़की अपने बयान को बदलती तो उसे झूठा बयान दर्ज करवाने के मुकदमे का सामना करना पड़ता। इस तरह उन्हें कोर्ट में श्री गुरु राम रहीम जी के खिलाफ फिर वही बयान देने के लिए बाध्य किया गया !! . और फिर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का इस्तेमाल किया गया कि - लड़की के बयान को अंतिम सत्य एवं अकाट्य सबूत माना जाएगा। . और फिर हमारे पास ऐसे शिक्षित एवं जागरूक लोगो का जमघट है जो इस प्रक्रिया को क़ानून का शासन कह के संबोधित कर रहे है !!! . इस सम्बन्ध में डेरा प्रमुख की पैरवी करने वाले वकील का साक्षात्कार निचे दिए लिंक पर देखें। इस साक्षात्कार में कहे गए तथ्यों को आप विश्वसनीय मान सकते है, क्योंकि वकील ने जो भी तथ्य रखे है वे रिकॉर्ड पर है, और गलत बयानी पर जज वकील को जेल भेज सकता है। . और वकील का साफ़ कहना है कि आरोप लगाने वाली लकड़ियों ने क्या बयान दिया है उसकी कॉपी हमें दी ही नहीं गयी !! और भौतिक सबूत इस मामले में थे नहीं !! मतलब आरोप लगाने वाली लड़कियां कौन है वकील को मालूम नहीं है, उन्होंने क्या बयान दिए वो भी वकील को मालूम नहीं है !! और इन्ही बयानों के आधार पर 10 साल की सजा !! . मैं आपसे आग्रह करूँगा कि कृपया यह पूरा साक्षात्कार देखें - Interview with S.K. Garg Narwana, Lawyer, Gurmeet Ram Rahim . और क़ानून के इस मखौल को कवर करने के लिए मिशनरीज ने 24*7 घंटे देश भर में एक अलग तरह तमाशा रचा, जिसमें राम रहीम जी संत नहीं है , वे विलासी है, ऐश्वर्य प्रिय है, उनके पास गुफाएं है, उनके डेरे में स्वीमिंग पूल है, उन्होंने आलिशान महल बना रखा है, उनके पास 2 बाज, 3 उल्लू , 5 तीतर है, उनके पास ढेर सारी जमीन है, वे फिल्मे बनाते है, नाचते-गाते है, क्रिकेट खेलते है, कारोबार करते है , रंग बिरंगे कपड़े पहनते है आदि आदि जैसे बकवास आरोपों को पेड मीडिया द्वारा बार बार इसीलिए दोहराया गया ताकि बलात्कार के मूल मुकदमे पर चर्चा को टाला जा सके !! . पेड मीडिया से फीडिंग लेने वाले ज्ञानी लोगो ने ये सब देखा-पढ़ा और फेसबुक-कोरा-व्हाट्स एप आदि के माध्यम से पूरे देश में फैलाने में भी योगदान दिया !! . यदि इन फर्जी आरोपों पर बहस नहीं चलाई जाती है तो जनता का ध्यान बलात्कार के मुकदमे से जुड़े तथ्यों पर चला जाएगा। और तब जनता को यह मालूम होगा कि सिर्फ बयान को आधार बनाकर ही राम रहीम जी को दोषी ठहरा दिया गया है। . सुप्रीम कोर्ट की एक रूलिंग ने जज को यह तय करने का अधिकार दे दिया था कि वह यदि चाहे तो पीड़िता के बयान को सच मान सकता है !! और जज को इस बात में सुविधा थी कि लड़की के बयान को सच मान लिया जाए !! . इस तथ्य को चर्चा से बाहर करने के लिए मीडिया ने ऊपर दिए गए फर्जी आरोपों की झड़ी बनाकर यह धारणा खड़ी करने की कोशिश की है कि श्री राम रहीम जी एक दुर्जन व्यक्ति है। और सुबह शाम अनाज खाने के बावजूद कई लोग इन आरोपों को दोहरा रहे है। उन्हें इस बात पर सोचने का अवकाश ही नहीं है कि गुफाएं, स्वीमिंग पूल, महल आदि बनाना और फिल्मो में अभिनय करना अपराध की श्रेणी में नहीं आता। . ————————- . (6) उद्देश्य डेरे के इन्फ्रास्त्रक्चर को गिराना था ताकि मिशनरीज का रास्ता साफ़ हो . टिप्पणी : मैं श्री राम रहीम जी का भक्त नहीं हूँ, न ही मैं कभी डेरे पर गया हूँ। और मुझे यह भी पता नहीं है कि अमुक मामले में श्री राम रहीम जी दोषी है या नहीं है। जब मेरे सामने यह मामला आया तो मैंने इसे कानूनी नजरिये से देखा, और कानूनी टर्म के अनुसार कोई भी सामान्य समझ का व्यक्ति यही निष्कर्ष निकालेगा कि यह मुकदमा पहले दिन से ही फर्जी है, और उन्हें जानबूझकर फंसाया गया प्रतीत होता है। . लेकिन पेड मीडिया की अफीम लेने वाले व्यक्ति मुकदमे से जुड़े तथ्यों को टच ही नहीं करते है, वे उन्हें बस इसीलिए जेल में देखना चाहते है कि राम रहीम जी का रहन सहन उनके अनुसार एक संत जैसा नहीं है !! बताइये !!! . जैसे जैसे घटनाक्रम आगे बढ़ता गया उससे यह बात और भी साफ़ होती चली गयी कि मिशनरीज का उद्देश्य डेरे को तोडना है। मिशनरीज ने बड़ी मेहनत करके पंजाब को नशे की गिरफ्त में लिया है, और डेरे द्वारा इस तरह की प्रभावी गतिविधियाँ संचालित की जा रही थी जिससे लोग नशा छोड़ रहे थे !! . इसके अलावा डेरे के ज्यादातर अनुयायियों में ओबीसी शामिल है और इनमें दलित भी है। मिशनरीज के लिए यह वर्ग आसान शिकार है। सहजधारी सिक्खों को गोल्डन टेम्पल की वोटिंग लिस्ट से बाहर कर दिए जाने और दलित सिक्खों के गोल्डन टेम्पल से दूर छिटकने के बावजूद मिशनरीज इन्हें अपनी और खींच नहीं पा रही है, क्योंकि संत श्री राम रहीम एवं रामपाल जी इन्हें आश्रय दे देते है। . यह देखना बेहद दुखद है कि, इन सभी संतो के अनुयायी करोडो रूपये लेकर वकीलों के चक्कर लगा रहे है, ताकि वकील उन्हें जजों से न्याय दिला सके। एक मात्र अपवाद संत श्री रामपाल जी रहे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि देश के 80% से ज्यादा जज भ्रष्ट है !! . इन अनुयायियों को इस बात का भान नहीं है कि हमारे जज / प्रशासनिक अधिकारी / पुलिस अधिकारी / मंत्री एवं कल्कि पुरुष तृतीय मोदी साहेब समेत संघ के सभी मंत्री अमेरिकी धनिकों की फौलादी पकड़ में है। ये सभी नेता अधिकारी एवं सभी मीडिया कर्मी ( पेड अर्नव, पेड सुधीर, पेड रजत एवं पेड रविश समेत ) अमेरिकी धनिकों की कठपुतलियां मात्र है। . गुरमीत जी , श्री आसाराम जी बापू, श्री रामपाल जी आदि संतो ने अपने असाधारण कार्यो से इस बात को सुनिश्चित किया कि गरीब /दलित / ओबीसी आदि मिशनरीज के आश्रय में चले जाने की जगह हिन्दू धर्म में बने रहे। . मैं इसे फिर से दोहराता हूँ - यदि आज गरीब /दलित / ओबीसी आदि हिन्दू धर्म में बने हुए है तो मंदिर प्रमुखों, प्राचीन राजाओ, संघ के नेताओं, बीजेपी नेताओं का इसमें योगदान शून्य है। इसका असली श्रेय सिर्फ इन तथा इन जैसे अन्य संप्रदाय प्रमुखों की नयी खेप को जाता है। और विडम्बना यह है कि आज उदारवादी / पढ़े लिखे / आधुनिक हिन्दू इन संतो को जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है !!! . हिन्दुओ को अपने नीचे एक करने की चाहत रखने वाले संघ=बीजेपी के ज्यादातर कार्यकर्ता भी इससे खुश है। उनका नजरिया है कि, चलो अच्छा हुआ। यदि ये सभी संत हवालात में भेज दिए जाते है तो हम उनके अनुयायियों को आसानी से संघ=बीजेपी में जोड़ लेंगे !! . इन्हें यह अहसास ही नहीं है कि, मिशनरीज की ताकत के सामने इनकी कोई हैसियत नहीं है। यदि संत गुरमीत जी , संत श्री आसाराम जी एवं संत रामपाल जैसे लोग कमजोर हो गए तो दलितों / ओ बी सी / गरीबो की एक बड़ी संख्या मिशनरीज की गोद में जा गिरेगी। ऐसे सभी व्यक्ति जो इन संतो को गलत तरीके से 10-20 साल के लिए जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है दरअसल वे जाने-अनजाने मिशनरीज की मदद कर रहे है। . उन्हें इस बात को समझने की जरूरत है कि ये संत धर्म के नाम पर सिर्फ डायलॉग नहीं मार रहे है, बल्कि स्कूल, अस्पताल, दवाइयाँ, आश्रय आदि भी उपलब्ध करवा रहे है। और मिशनरीज को कथाएँ कहने वाले संतो से ज्यादा परेशानी नहीं होती है, किन्तु वे ऐसे संतो को बाधा के रूप में देखते है जो परोपकारी कार्य कर रहे है !! . ओह माय गॉड फिल्म कान्हा Vs कान्हा नामक नाटक पर लिखी गयी है। परेश रावल ने इसमें मुख्य भूमिका भी निभायी है और वे इसके सह निर्माता भी है। इस नाटक के फायनेंसर संघ=बीजेपी के नेता है, और इस नाटक के कई शो देश भर में संघ के कार्यकर्ताओ के लिए आयोजित किये गए है। स्वाभाविक रूप से संघ के कार्यकर्ता इस नाटक और इस पर बनी फिल्म के प्रशंसक है !! . संघ के कार्यकताओ के बीच एक और स्वामी काफी लोकप्रिय है - स्वामी सच्चिदानंद। उनके लेखन का केंद्रीय सन्देश यही रहता है कि - विभिन्न सम्प्रदाय हिन्दुओ का विभाजन करके उन्हें कमजोर कर रहे है !!! अत: मजबूत होने के लिए हिन्दुओ को एक हो जाना चाहिए !! इसके अलावा वे यह भी स्थापित करते है कि सभी गुरु वगैरह हिन्दू धर्म को कमजोर कर रहे है !!! . यदि आप पंक्तियों एवं शब्दों के बीच छुपे हुए निहितार्थ को पढ़ सकते है तो साफ़ तौर पर समझ सकते है कि वे कहना क्या चाहते है। . ओह माय गॉड फिल्म भी इसी तरह का सन्देश देती है - सभी हिन्दू गुरु फ्रॉड और ढकोसले बाज है !! और इसीलिए सभी हिन्दू गुरुओ को ठिकाने लगा देना चाहिए !!! . लेकिन क्यों ? आखिर ये सभी गुरु / संत फ्रॉड और बुरे क्यों है ? क्या ये लोग कश्मीरी आतंकियों की तरह आतंकी गतिविधियां संचालित कर रहे है ? क्या ये लोग नक्सलियों की तरह पुलिस वालो को मार रहे है ? क्या ये लोग दाऊद की तरह लोगो को लूट रहे है और उनकी हत्याएं कर रहे है ? क्या ये लोग अपने आस पास रहने वाले लोगो को कश्मीरी पंडितो की तरह मारकर भगा देते है ? . नहीं। लेकिन फिर भी सोनिया / मोदी / केजरीवाल जैसे नेताओ और ओह माय गॉड जैसी फिल्मो के प्रशंषको की नजर में ये सभी संत बुरे और फ्रॉड है !!! . संत आसाराम जी बापू, श्री गुरमीत राम रहीम जी जैसे संतो ने कभी भी हिंसा को प्रेरित नहीं किया। इन संतो पर कर चोरी या जमीने हड़पने के मामले लगभग नगण्य है। इन्होने कभी भी समाज में शान्ति भंग करने के कृत्य नहीं किये। बावजूद इसके हमने देखा कि जज / सोनिया / मोदी / केजरीवाल जैसे नेता और इनके अंध भगतो ने इन संतो के व्यस्थागत ढाँचे को गिराने का समर्थन किया !!! . यदि सेना का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों के ऐसे समूह के खिलाफ किया जाता है जो अलगाववादी नहीं है और न ही देश द्रोही है, तो ऐसी हरकतों से नागरिको में सेना के प्रति सम्मान कम होगा। भारतीयो के दिल में सेना की इज्जत इसीलिए है क्योंकि सेना कभी भी आंतिरक मामलो में दखल नहीं देती। सिर्फ अलगाववादियों, विभाजनकारियों एवं देशद्रोही समूहों से ही सख्ती से पेश आती है। लेकिन भ्रष्ट जजों और सरकार ने डेरा समर्थको पर सेना का इस्तेमाल किया !! ( तब राज्य एवं केंद्र दोनों जगह पर आरएसएस = बीजेपी की सरकार थी, और सेना सरकार से ही आदेश लेती है, जजों से नहीं !! ) . पंचकुला में डेरा समर्थको पर पुलिस / पेरा मिलिट्री द्वारा की गयी फायरिंग में जिन 33 लोगो की मृत्यु हुयी ( अंतिम संख्या 45 रही ) उनमे से ज्यादातर की मौत सिर में , छाती में , फेफड़ो में और पीठ में गोली लगने से हुयी !!! कृपया इस बात को नोट करें कि पुलिस / सेना को निहत्थे प्रदर्शन कारियों पर कमर से ऊपर गोली चलाने के आदेश कभी नहीं दिए जाते, लेकिन जानबूझकर उन्हें आदेश दिए गए थे !! इसमें नाबालिग से लेकर वृद्ध एवं महिलाएं सभी शामिल थे !! . How 33 people died in Panchkula: INSAS, SLR bullets in the back, head, chest, neck . यदि आप न्यायिक प्रक्रिया का पालन नहीं करते हुए मीडियाई प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल करके लोगो को ठिकाने लगायेंगे तो इसके नतीजे भयावह हो सकते है। आज या कल , इन संतो के अनुयायी या तो मिशनरीज / इस्लाम की शरण लेंगे या फिर नक्सली बन जाएंगे। किसी निशस्त्र एवं क़ानून का पालन करने वाले समूह का दमन करना आसान है , लेकिन सिर्फ तब तक जब तक कि वे लोग क़ानून का पालन करते रहने के फैसले पर टिके रहे। . हाँ, सिर्फ तब तक जब तक कि वे लोग क़ानून का पालन करते रहने के फैसले पर टिके रहे !! . ——————— . अब यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बिंदु यह आता है कि जब राम रहीम जी पर व्यक्तिगत आरोप थे तो डेरे द्वारा संचालित सामाजिक-परोपकारी गतिविधियों को रोकने के लिए कदम क्यों उठाये गए ? उनके खातो को फ्रिज क्यों किया गया ? उनकी प्रोपर्टी अटेच क्यों की गयी ? . पिछली दफा ऐसा कब हुआ था जब कश्मीरी पत्थरबाजों की प्रॉपर्टी अटैच की गयी थी ? कल्ले में बूता है आपके ? क्या सरकार या कोर्ट ने हरियाणा / गुजरात में जाटों / पटेलों के प्रदर्शन एवं बंद के दौरान भी इनकी प्रॉपर्टी अटैच की थी ? मुझे नहीं लगता !! यह पहली बार है जब ऐसा किया गया। और यदि आप ऐसे प्रदर्शन के दौरान हुए नुक्सान की भरपाई प्रदर्शन कारियो से करना चाहते है तो इसके लिए क़ानून बनाइये। यह फैसला भ्र्ष्ट एवं भाई भतीजा वादी जजों के विवेक पर क्यों छोड़ा जा रहा है ? . अब तक ऐसे कोई सबूत सामने नहीं आये है जिससे इस प्रकार के संकेत मिले कि डेरा समर्थको ने हिंसा शुरू की या उन्होंने पुलिस पर हमला किया था। फिर भी जज का कहना है कि , "डेरे की प्रॉपर्टी को अटैच किया जाए" !!! . वजह यह है कि जब मिशनरीज किसी संत के पीछे जाते है तो उसके पूरे इन्फ्रास्त्रक्चर को इस तरह से तोड़ते है कि इसे पूरी तरह से उजाड़ दिया जाए। . यदि सिर्फ राम रहीम जी को अरेस्ट किया जाएगा तो मिशनरीज का उद्देश्य पूरा नहीं होता। इसके लिए डेरे को उजाड़ना भी जरुरी है। उनके अनुयायियों का मनोबल तोडना भी जरुरी है, और उसके नजदीकी उन तमाम लोगो को भी इस रडार में लिया जाता है जिससे इनके फिर से उठ खड़े होने की सम्भावना न रहे। संत श्री आसाराम जी के साथ भी यही किया गया। और डेरे के साथ भी। मतलब किसी एक व्यक्तिगत आरोप को आधार बनाकर यह हमला सभी आयामों से किया जाता है। . उन पर किसी भी वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं होने के बावजूद जजों एवं सरकार ने जाँच के नाम पर डेरे के खाते सीज किये। यह उस समय का वीडियो है जब राम रहीम जी को सजा हुयी थी. दिए गए वीडियो में व्यक्ति का कहना है कि खाते फ्रिज हो जाने के कारण डेरे द्वारा संचालित हॉस्पिटल स्टाफ को दो महीनो से वेतन नहीं मिला है !! बावजूद इसके वे हजारो मरीजों की चिकित्सा कर रहे है !! इन महाशय के सम्बन्धी को डेंगू हुआ था , जिन्हे यहाँ भर्ती किया गया था। . Sanju Girdhar . जिला कलेक्टर्स के माध्यम से आदेश दिया गया कि डेरे द्वारा संचालित संस्थाए अपनी नकदी प्रशासन को सौंप दे, साथ ही डेरे की सभी संस्थाओ के बैंक खाते भी फ्रिज किये गए !! इसके बाद डेरे को सील किया गया और वहां रह रहे सभी श्रधालुओ को डेरा छोड़कर जाने को कहा गया !! इसके बाद उन्होंने डेरे को टेकओवर करने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को डेरा व आश्रम के बैंक खातों को चलाने के लिए नियुक्त किया। दूसरे शब्दों में, एक व्यक्तिगत मामले को आधार बनाकर आश्रम की सम्पत्ति को फ्रिज किया गया। . और डेरे एवं उसकी संस्थाओ के बैंक खाते आज 2 साल बाद भी फ्रिज है !!! . तब पेड दैनिक भास्कर ने रिपोर्ट किया था कि — गुरमीत श्री राम रहीम जी के जेल जाते ही डेरे के लगभग 800 करोड़ का कारोबार ठप हो गया था !! सिरसा डेरे की 14 कंपनियां, 8 स्कूल-कॉलेज, फाइव स्टार होटल एमएसजी रिजॉर्ट, कशिश रेस्टोरेंट, पुराने डेरे के सामने एसी सुपर मार्केट की 52 दुकानों पर ताले लगे हैं। कई बैंक खाते भी सील कर दिए गए हैं। कारोबार से जुड़े करीब आठ हजार लोग बेरोजगार हो गए हैं और डर के मारे सिरसा छोड़ गए हैं। साथ ही देशभर में 400 के करीब डीलर्स ने एमएसजी स्टोर्स बंद कर दिए हैं। . और पेड दैनिक भास्कर ने इस खबर को इस तरह रिपोर्ट किया था जैसे राम रहीम जी कोई कारोबार नहीं बल्कि प्रतिबंधित वस्तुओ का कारोबार करने वाला कोई रैकेट चला रहे थे !! . इस निकृष्ट स्तर की गलीज़ रिपोर्ट को आप यहाँ पढ़ सकते है - इस स्ट्रेटजी से करोड़ो कमाता था राम रहीम, बनाना चाहता था रामदेव की तरह बिजनेस बाबा . पेड दैनिक जागरण ने डेरा टूटने के अगले हफ्ते 2 सितम्बर को प्रकाशित की थी। ई-पेपर से अब इस खबर को हटा दिया गया है। मतलब डेरा टूटने के साथ ही मिशनरीज अपनी दूकान लेकर वहां पहुँच चुके थे !! खबर की फोटो पोस्ट के साथ सलंग्न है। . —————- . (7) समाधान ? . एक वाजिब प्रश्न यहाँ यह खड़ा होता है कि डेरे के लाखो अनुयायी होने के बावजूद सरकार एवं जज इस हद का अन्याय करने में सफल कैसे हुए, और उन्हें लगभग नगण्य प्रतिरोध का सामना क्यों करना पड़ा ? . मेरे विचार में इसकी निम्न वजहें रही : . श्री राम रहीम जी अपने अनुयायियों को कभी भी महत्त्वपूर्ण राजनैतिक सूचनाएं नहीं दी। उन्होंने अपने श्रधालुओ को इस तथ्य से अवगत नै कराया कि भारत की सबसे बड़ी समस्या जजों का भ्रष्टाचार है, और मिशनरीज जजों के साथ मिलकर भारत में हिन्दू धर्म को उखाड़ने का अभियान चला रहे है। . डेरे ने अपने अनुयायियों को सूचित नहीं किया कि यदि जज एवं सरकार उन्हें जाया तौर पर जेल भेज देते है तो उन्हें सरकार को सीधे रास्ते पर लाने के लिए किस तरह का अभियान चलाना चाहिए। उन्होंने पेड मीडिया के बारे में भी अपने अनुयायियों को सूचित नहीं किया !! इस वजह से वे सरकार के समक्ष अपने मांग को राजनैतिक रूप से स्पष्ट तरीके से रखकर सरकार पर दबाव बनाने में असफल रहे !! . और यह समस्या सिर्फ डेरे के साथ ही नहीं है, बल्कि भारत के सभी संतो, गुरुओ, आश्रमों आदि के साथ यही समस्या है। तो जब भी किसी ताकतवर हिन्दू गुरु / संत को फर्जी मुकदमो में उलझकर गिराया जाता है तो उनके अनुयायियों की स्थिति Headless Chicken की हो जाती है। और राजनैतिक सूचनाओं के अभाव में वे सिर्फ 3 तरह की गतिविधियों का आश्रय लेते है : वे वकीलों के भरोसे बैठे रहते है और इस बात को समझ नहीं पाते कि यदि जज अपनी पर आया हुआ है तो वकील के पल्ले कुछ नहीं होता है। वे नेताओं के यहाँ पर धरने वगेरह देते है, और इस तथ्य से बेखबर रहते है कि नेताओं की हैसियत मिशनरीज के खिलाफ जाने की नहीं है। वे अपने आप को इस मुगालते में रखते है कि उन्हें न्याय मिल जाएगा। और हद तो यह कि वे पेड मीडिया में जाकर लॉबीइंग करते है कि वे उनका मुद्दा सही तरीके से उठाये !! . समाधान ? . मेरे द्वारा सुझाये गए समाधान निम्न है : . 7.1. गुरमीत राम रहीम जी के मुकदमे की सुनवाई के लिए जूरी ट्रायल किया जाए। जूरी के गठन एवं संचालन के लिए निम्नलिखित नियमो का पालन किया जाएगा : जूरी मंडल का रेंडम चयन हरियाणा राज्य की वोटर लिस्ट में से किया जाएगा एवं इनका आयुवर्ग 30-45 वर्ष के बीच होगा। यदि पीएम / सीएम चाहे तो जूरी का चयन राजस्थान या दिल्ली की वोटर लिस्ट में से भी कर सकते है। जूरी का आकार न्यूनतम 500 एवं अधिकतम 1500 सदस्य होगा। सीएम / पीएम इसके बीच की कोई भी संख्या तय कर सकते है। यह जूरी मंडल नियमित रूप से 11 बजे से सायं 4 बजे तक नियमित रूप से मामले की सुनवाई करेगा। जूरी मंडल बहुमत से यह तय कर सकेगा कि क्या गुरमीत जी का लाइ डिक्टेटर टेस्ट लिया जाना चाहिए या नहीं यदि तीन चौथाई जूरी सदस्य नारको टेस्ट की सहमती दे देते है तो राम रहीम जी का नारको टेस्ट लिया जा सकेगा। जूरी मंडल सुनवाई के दौरान यह तय कर सकता है कि बहस के दौरान पेश किये गए कौन कौन से सबूत एवं तथ्य सार्वजनिक किये जाने चाहिए। जूरी सदस्यों को प्रति उपस्थिति 600 रू एवं यात्रा भत्ता आदि मिलेगा। मुकदमे की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के 3 जज निरंतर उपस्थित रहेंगे और पूरा मामला उनकी अध्यक्षता में सुना जाएगा। जूरी का प्रत्येक संदस्य अपना निर्णय बंद लिफ़ाफ़े ( दोषी / निर्दोष ) में लिखकर देगा जजों को देगा और बहुमत बहुमत द्वारा दिए गए निर्णय को स्वीकृत निर्णय माना जाएगा। अंतिम फैसला जज सुनायेंगे और यदि जज चाहे तो जूरी के फैसले में बदलाव कर सकते है, या फैसले को पूरी तरह से पलट सकते है। कोई भी पक्षकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम जूरी में अपील कर सकता है। सुप्रीम जूरी में सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के जजों की उपस्थिति में होगी, और जूरी सदस्यों का चयन पूरे देश की मतदाता सूचियों से किया जायेगा। . जब ये मुकदमा चल रहा था तब हमने इस मामले की ट्रायल जूरी द्वारा कराने की मांग करना शुरू कर दिया था। किन्तु संख्या कम होने के कारण यह मांग खड़ी नहीं हो सकी। कार्यकर्ताओं से मेरा आग्रह है कि यदि इस मामले की सच्चाई सामने लाना चाहते है तो पीएम / सीएम से यह मांग करें कि इस मामले को जूरी मंडल के पास भेजा जाए। पीएम / सीएम चाहे तो सिर्फ इस मुकदमे की सुनवाई के जूरी द्वारा करने के लिए गेजेट में इस आशय का आदेश निकाल सकते है। . मांग करने के लिए आप किसी भी महीने की 5 तारीख को पीएम / सीएम को पोस्टकार्ड भेज सकते है, या ट्विट कर सकते है। . पोस्ट कार्ड में यह लिखे - @pmoindia , कृपया राम रहीम जी के मुकदमें का 500 नागरिको की जूरी द्वारा जूरी ट्रायल किया जाए। #JuryTrialOnRamRahimJi , #JuryCourt . संत श्री आसाराम जी बापू, संत श्री रामपाल जी , श्री श्री रविशंकर महाराज ( पर्यावरण का मामला ) , स्वामी नित्यानंद जी ( शुक्र है कि उनका मुकदमा निपट चुका है।) आदि के मामलों में भी मेरा यही प्रस्ताव है कि इनके मुकदमो का निपटान ज्यूरी द्वारा किया जाए। जब जयललिता ने कांची के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था तब भी मैंने यही प्रस्ताव किया था। . कुल मिलाकर मुझे जजों पर कभी भी भरोसा नहीं रहा। और भरोसा करने का कोई कारण मौजूद भी नहीं है। . 7.2. सरल प्रकृति के सभी मुकदमो की सुनवाई नागरिको की जूरी द्वारा करने की व्यवस्था बनाने के लिए प्रस्तावित जूरी कोर्ट क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए। . प्रस्तावित जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट कृपया जूरी कोर्ट नामक मंच में देखें। . 7.3. सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, लोअर कोर्ट जज, पुलिस प्रमुख आदि पर वोट वापसी प्रक्रियाएं लागू करना। इसके लिए अलग से क़ानून ड्राफ्ट की जरूरत नहीं है। प्रस्तावित जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में आने से उपरोक्त अधिकारी वोट वापसी पासबुक के दायरे में आ जायेंगे। . 7.4. SGPC की तरह हिन्दू धर्म एवं सम्प्रदायों के प्रबन्धन को मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए, ताकि श्रद्धालु मंदिर / मठ / आश्रम प्रमुखों को चुन सके और अनियमितता पाने पर पद से हटा सके। यह क़ानून सबसे महत्त्वपूर्ण है और हिन्दू धर्म एवं सनातन सम्प्रदायों को इतनी शक्ति प्रदान कर देगा कि वे मिशनरीज एवं इस्लाम के बढ़ते प्रभाव का सामना कर सके। इस क़ानून का विस्तृत विवरण आप इस लिंक पर पढ़ सकते है - हिन्दूओं को अपने धर्म के विस्तार के लिए इस समय क्या कदम उठाना चाहिए? . ============= . (8) संत और संतत्व की परिभाषा पर मेरा प्रतिभाव : . भौतिक एवं व्यवहारिक जगत में इस प्रकार की परिभाषाओ पर बहस या विचार करना व्यक्तिगत मामला है। इनकी परिभाषा मान्यता, स्वीकार्यता , धारणा एवं आस्था आदि तत्वों से तय होती है। यदि आप किसी आध्यात्मिक विषय या धर्म के गूढ़ उपदेशो की मीमांसा कर रहे है तो इस तरह की चर्चा का महत्त्व है। किन्तु राजनैतिक एवं व्यवहारिक मामलो में इस मुद्दे को लाकर पटक देना कि संत क्या होता है और उसके लक्ष्ण क्या है, एक खुराफात है। . हम 2019 में रह रहे है। संत की परिभाषा जो भी है वह आदर्शवादी समय की बात है। आज आपको ऐसा कोई ढूँढने से भी नहीं मिलेगा। अत: आदर्शवाद की लपेट में आकर आज के दौर के लोगो को पुराने दौर की कसौटी पर न कसे। चीजो और व्यक्तियों को क़ानून एवं चलन के अनुसार देखें। क्योंकि वैसे शुचितावादी तो आज आप भी नहीं रहे है जैसे आपके पुरखे थे। . श्री राम रहीम जी, आसाराम जी, रामपाल जी या ओशो को कोई संत मानता है या नहीं मानता है यह अमुक व्यक्ति की मान्यता पर निर्भर करता है। और एक ही व्यक्ति के बारे में एक ही समय में आपकी मान्यता के उलट भी कई मान्यताएं चलन में हो सकती है। अत: किसी संत को लक्षित करके इस तरह के ऐलान देना कि अमुक व्यक्ति संत नहीं है क्योंकि वह फलां फलां काम कर रहा है और फलां फलां कार्य नहीं कर रहा है, ठीक बात नहीं है। क्योंकि जिन किन्ही लोगो को आप संत मान रहे है उन्हें कई लोग लट्ठ लेकर ढूंढ रहे है। और जिन्हें आप असंत ठहराने पर तुले हुए है उन्होंने कई लोगो की जिंदगियां बदल दी है। और इसीलिए वे पूजे जा रहे है। . दुसरे शब्दों में, यदि आप इन संतो के अनुयायी नहीं है और आप इन्हें कोई दान नहीं दे रहे है तो कायदे की बात यही है कि उस बिंदु तक सीमित रहे जिस बिंदु पर वे क़ानून का उलंघन कर रहे है। . इन आदर्शो के चकमे में आने की जगह इस बात पर गौर करे कि इन लोगो ने जो दान प्राप्त किया उनमे से कितना हिस्सा गैर उत्पादक कार्यो एवं तडक भड़क में खर्च किया एवं कितनी राशी से उन्होंने स्कूल चलाए , दवाइयाँ बांटी, अस्पताल चलाये , लोगो में धर्म का प्रचार किया, उन्हें नशे से दूर किया, उन्हें आध्यामिक सलाहें दी आदि। आप पायेंगे कि उन्होंने सिर्फ दान से प्राप्त राशि में से सिर्फ 1% का ही गैर उत्पादक कार्यो में उपयोग किया है तथा शेष राशि परोपकार के कार्यो में लगायी। . यदि मंदिरों ने ऐसा किया होता तो ये नए सम्प्रदाय कभी उभरते नहीं थे। मंदिरों ने जो पीड़ा दी उसका मरहम इन्होने उपलब्ध कराया। और आज भी हर लिहाज से ये नए सम्प्रदाय धर्म एवं परोपकार के क्षेत्र में ज्यादातर मंदिरों से बेहतर कार्य कर रहे है। श्रधालुओ ने जब मंदिरों में भ्रष्टाचार देखा तो दान में कमी आने लगी। मंदिरों में परोपकार के कार्य कम होने से एक वैक्यूम बना। इस वैक्यूम को इन लोगो ने पूरा किया। इन्होने मंदिरो की अपेक्षा ज्यादा बेहतर तरीके से परोपकार के कार्य किये और इसी वजह से इन्हें श्रद्धालु मिले और इन्हें मिलने वाले दान में वृद्धि हुयी। . तो यदि आपको विचार करना है तो निम्नलिखित बिन्दुओ पर करे : मंदिरों में भ्रष्टाचार होने की क्या वजह है। क्यों मंदिर परोपकार के कार्यो को तवज्जो नहीं दे रहे है ? क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे मंदिरों के प्रशासन को मजबूत बनाया जा सके ? क्या ऐसा कोई तरीका है जिससे इस प्रकार के परोपकार के कार्य करने वाले डेरा / आश्रम प्रमुखों में मौजूद कतिपय अनियमितताओ को और भी दुरुस्त किया जा सके ? ताकि इन सम्प्रदायो में मौजूद "मामूली खामियों" को बहाना बनाकर इन्हें नष्ट करने के षड्यंत्रों पर लगाम लगाई जा सके। मंदिरों के टूटने और इन नए सम्प्रदायों के उखड़ने का सबसे अधिक लाभ मिशनरीज को होगा। किन कानूनों की सहायता से हम मिशनरीज के बढ़ते प्रभाव को कम कर सकते है और हिन्दू मंदिरों के प्रशासन को मजबूत बना सकते है ? . मेरे विचार में इन सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तावित राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड क़ानून = #HinduBoard को गेजेट में छापकर किया जा सकता है। . ============
बाबा राम रहीम का सच क्या है? श्री गुरमीत राम रहीम जी पर लगाए गए मुकदमें की तथ्यात्मक समय सारणी : . (i) सन 2002 में वाजपेयी को दो गुमनाम खत प्राप्त हुए !! खतो के बारे में यह दावा किया गया था कि ये पत्र गुरु राम रहीम की साध्वियों द्वारा लिखे गए थे !! और इन खतो में यह दावा किया गया था कि गुरु श्री राम रहीम जी ने 1999 में इन साध्वियों का बलात्कार किया था !! ( मतलब बलात्कार के 2 से 3 वर्ष बाद गुमनाम खत भेजे गए ) . (ii) घटना के 3 साल बाद भेजे गए इन गुमनाम खतो के आधार पर वाजपेयी ने सी बी आई जांच के आदेश जारी किये !! और बहाना यह था कि - हाई कोर्ट के जज ने वाजपेयी को सी बी आई जांच करवाने के आदेश दिए थे !!! . (iii) सी बी आई के आईपीएस अधिकारी ने कुछ 20 साध्वियों से बेहद गहन ,संदिग्धार्थक, अनेकार्थक एवं घुमावदार प्रश्न किये। इन बयानों को Crpc 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने रिकोर्ड किया गया। और पूछे गए इन अनेकार्थक प्रश्नों के जवाबो को "सबूत" के तौर पर मान लिया गया !!! . (iv) कथित साध्वियां लगातार कह रही थी कि - 'कोई अपराध नहीं हुआ था ', किन्तु उनके बयानों का आशय बलात्कार निकाला गया। उनके द्वारा दिए गए पहले बयानों को सबूत माना गया और बाद के कथ्यों को अस्वीकार कर दिया गया !! . तब सी बी आई वाजपेयी के नियंत्रण में काम कर रही थी। यह अंदाजा लगाने की बात है कि किसने क्या किया होगा और कैसे किया होगा। तो इस मामले में आप अपना अनुमान लगाने के लिए स्वतंत्र है। और 18 साल बाद इस मुकदमे के फैसले में गुरमीत राम रहीम जी को दोषी करार देकर जेल भेज दिया गया !!! . दरअसल पूरा देश एक विशाल सर्कस के मंच में तब्दील हो चुका है। और किसी व्यक्ति को लग सकता है कि - तो इससे क्या फर्क पड़ता है। असल में समस्या यह है कि कई देशो में इस तमाशे की डोज़ काफी कम है। और जिस देश में यह तमाशा कम है वह देश अच्छी व्यवस्थाओ के कारण तेजी से मजबूत होगा और अंततोगत्वा या तो हम पर नियंत्रण हासिल कर लेगा या हमें नष्ट कर देगा। और उस समय यह कॉमेडी हमारी ट्रेजिडी बन जायेगी। . ============ . डेरा सच्चा सौदा प्रकरण ; समस्या एवं समाधान . अध्याय . (1) समस्या यह है कि आबादी के एक बड़े वर्ग का मानना है कि राम रहीम जी के साथ न्याय नहीं किया गया है। . (2) वजहें, जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट है . (3) तर्क ; जिनसे यह स्थापित किया जाता है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है . (4) डेरा और राजनीति . (5) राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है . (6) उद्देश्य डेरे के इन्फ्रास्त्रक्चर को गिराना था ताकि मिशनरीज का रास्ता साफ़ हो . (7) समाधान . (8) संत और संतत्व की परिभाषा पर मेरा प्रतिभाव . ————— . टिप्पणी : इस जवाब में कुल 8 बिंदु है। 7 बिन्दुओ में मैंने इस प्रकरण से जुडी हुयी विभिन्न सूचनाएं, तथ्य एवं इनके आधार पर मेरा निष्कर्ष रखा है। इस निष्कर्ष या विश्लेषण को आप मेरा दृष्टिकोण भी कह सकते है। यदि मेरा दृष्टिकोण पूर्वाग्रह से ग्रसित है तो मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि मैं पूर्वाग्रह से मुक्त होकर लिखता हूँ। जवाब में एक बिंदु समाधान का भी है, और यह बिंदु महत्वपूर्ण है। पाठको से आग्रह है कि मेरे दृष्टिकोण की तुलना में समाधान वाले हिस्से को ज्यादा भार दें। . ————— . (1) समस्या यह है कि लाखों डेरा समर्थको एवं लाखों स्वतंत्र कार्यकर्ताओ का मानना है कि श्री राम रहीम जी के मामले में अदालत द्वारा दिया गया फैसला संदिग्ध है !! . हो सकता है श्री राम रहीम जी दोषी हो, और ये भी हो सकता है कि वे निर्दोष हो। किन्तु इतना तो तय है कि देश की आबादी का एक वर्ग इस फैसले से संतुष्ट नहीं है। इसी तरह का असंतोष संत श्री आसाराम जी बापू के मामले में भी देखने को मिला था। आसाराम जी के मामले में भी देश की आबादी का एक वर्ग यह मानता था एवं आज भी मानता है उनके साथ न्याय नहीं किया गया। संत रामपाल जी, जयेंद्र सरस्वती जी एवं नित्यानंद जी से जुड़े हुए मामलो में भी देश की एक बड़ी आबादी की यही धारणा थी। . इस तरह यहाँ 2 वर्ग बन जाते है : पहला वर्ग वह है जो यह मानता है कि श्री राम रहीम जी के साथ कोई अन्याय नहीं हुआ है और वे दोषी है, व उनके दोषी होने का सबसे बड़ा सबूत यह है कि अदालत ने उन्हें दोषी ठहरा दिया है !! अदालत ने उन्हें किस आधार पर दोषी ठहराया है और क्या सबूत बरामद किये गए है, इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है !! जबकि दुसरे वर्ग का मानना है कि, हो सकता है वे दोषी हो या हो सकता है कि दोषी नहीं भी हो। इस वर्ग को अदालत के फैसले पर विश्वास नहीं है, तथा इस अविश्वास की "पर्याप्त एवं वाजिब" वजहें मौजूद है। . टिप्पणी - इस लेख में उन नागरिको के लिए कुछ नहीं है जो यह मानते है कि 2000 के नोटों में चिप लगी हुयी है, और इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि टीवी-अख़बार पर ऐसा बताया गया था, और वे यह भी मानते है कि भारत के जज चाहे पैदाइशी ईमानदार न हो किन्तु नियुक्ति मिलते ही एक प्रकार की जादुई प्रक्रिया द्वारा वे ईमानदार हो जाते है !!! यह लेख सिर्फ उन लोगो के काम का है जो जाया तौर पर न्यायमूर्ति पूजक नहीं है और साथ ही यह भी मानते है कि 2000 के नोटों में ऐसी कोई चिप नहीं है। . ———————- . (2) वजहें , जो पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट है : . एक पोचा तर्क यह है कि इन सभी संतो की भक्ति के कारण इनके भक्त अदालत पर अंगुली उठा रहे है। यह एक गलत तर्क है। आप संतो और उनके भक्तो की बात को जाने दीजिये। सलमान खान का उदाहरण लीजिये। जब उन्हें छोड़ दिया गया था तब भी देश की आबादी का एक बड़ा वर्ग इस तरह की आवाजे उठा रहा था कि हमारी अदालते भ्रष्ट है। तो यह खुली हुयी बात है कि पेड मीडिया द्वारा की जाने वाली तमाम पॉलीस के बावजूद भारत का एक वर्ग यह मानता है कि हमारी जज भ्रष्ट है !! . क्यों कार्यकर्ताओ के एक वर्ग का मानना है कि हमारी अदालतें भ्रष्ट है ? . क्योंकि ऐसी कोई वजह ही नहीं है जो इस बात का इत्मीनान दिलाए कि भारत की अदालतें भ्रष्ट नहीं है। लेकिन ऐसी ढेर सारी वजहें है जो इस बात की पुष्टि करती है कि भारत के जज भ्रष्ट न हो ऐसा किसी भी तौर से संभव नहीं है। कुछ वजहें निचे दी गयी है : . 2.1 साक्षात्कार : भारत में जज बनने के लिए साक्षात्कार से गुजरना पड़ता है। साक्षात्कार में अंक देना जजों के हाथ में होता है। तो भाई भतीजावाद एवं घूस (सेटिंग) के अवसर यहीं से बन जाते है। इस तरह नियुक्ति से ही भ्रष्टाचार शुरू हो जाता है। जज एवं नेता साक्षात्कार की प्रक्रिया को हटाना नहीं चाहते। यदि साक्षात्कार को हटा दिया जाए तो जजों के भ्रष्ट होने की एक वजह समाप्त हो जायेगी। लेकिन फिलहाल साक्षात्कार है , अत: भ्रष्टाचार है। उल्लेखनीय है कि चीन में जजों की नियुक्ति में साक्षात्कार नहीं है। सिर्फ लिखित परीक्षा के माध्यम से ही जजों की नियुक्ति की जाती है। इस वजह से चीन के जज भारतीय जजों की तुलना में कम भ्रष्ट है। समाधान - जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से साक्षात्कार को हटाया जाना चाहिए। . 2.2. पदोन्नति एवं स्थानान्तरण : जजों की नियुक्ति, स्थानांतरण एवं पदोन्नतियां वरिष्ठ जजों के हाथ में होती है। शेषन जज हाई कोर्ट के एवं हाई कोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट के चंगुल में है। यदि हाई कोर्ट का जज भ्रष्ट है तो वह शेषन कोर्ट के सभी जजों पर मनचाहे फैसले करवाने के लिए चाबुक चला सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट के जज भ्र्ष्ट है तो वे पूरी न्यायपालिका को भ्रष्ट बना देते है। और सुप्रीम कोर्ट के जज पूरी तरह से निरंकुश है। . यदि सुप्रीम कोर्ट का जज कुर्सी पर रहते हुए घूस खा रहा है तो उसकी शिकायत कहाँ करेंगे आप ? . दरअसल शेषन कोर्ट, हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी एक टोली बना ली है। इनके फैसले में किसी का कोई दखल नहीं। जनता को तो भूल ही जाइए, सरकार तक का दखल नहीं !! जब किसी आदमी को यह पता हो कि उसे पकड़ने वाला कोई नहीं है, न ही कोई उससे सवाल पूछने वाला है, तो उसके भ्रष्ट होने की सम्भावना बढ़ जायेगी। यह निरंकुशता भ्रष्टाचार को जन्म देती है। . उल्लेखनीय है कि जापान में जजों को हर आम चुनाव में नागरिको के अनुमोदन से गुजरना पड़ता है। जब भी चुनाव होते है तो बेलेट पेपर के साथ एक अतिरिक्त प्रश्न रखा जाता है कि क्या आप इस जज को नौकरी से निकालना चाहते है या नहीं। इस तरह से नागरिको के पास विकल्प होता है कि वे भ्रष्ट एवं निकम्मे जज को खारिज कर सके। जज को भय रहता है कि भ्रष्टाचार करने पर जनता मुझे खारिज कर सकती है। इस वजह से उनके भ्रष्टाचार में कमी आती है। इसे रिटेंशन इलेक्शन या रिव्यू कहते है। किन्तु भारत के जज और नेता यह कतई नहीं चाहते कि नागरिको को जजों के काम काज पर टिप्पणी करने का अवसर दिया जाए। . अमेरिका में इससे भी बेहतर प्रणाली है। वहां नागरिक के पास जजों को किसी भी समय नौकरी से निकालने प्रक्रिया है। वहां के जज जानते है कि यदि वे भ्रष्टाचार करेंगे तो यह छिपेगा नहीं और जनता उन्हें नौकरी से निकाल देगी। इस तरह जनता द्वारा नौकरी से निकाले जाने का भय उन्हें कम भ्रष्ट बना देता है, और वे तमीज से पेश आते है। नागरिको द्वारा बहुमत का प्रयोग करके इस तरह नौकरी से निकालने की प्रक्रिया को वोट वापसी कहते है। समाधान - भारत में जजों को चुनने एवं नौकरी से निकालने का अधिकार आम नागरिको को दिया जाना चाहिए। इससे नागरिको का न्यायपालिका में दखल बढेगा और इस अंकुश से भ्रष्टाचार में कमी आएगी। . 2.3. पैसे लेकर सीधे नियुक्तियां : क्या आप जानते है कि, उच्च न्यायालयों में नियुक्ति के लिए अभ्यर्थी को लिखित परीक्षा से भी नहीं गुजरना होता है !! वरिष्ठ जज कोर्ट में प्रेक्टिस करने वाले किसी भी वकील को सीधे हाई कोर्ट में न्यायधीश के पद पर नियुक्ति दे सकते है !! एक तरह से यह नियम घूसखोरी को कानूनी करने के लिए बनाया गया है, जिसका परोक्ष अर्थ यह है कि – यदि आपके भाई भतीजे वरिष्ठ जज है , यदि आप एक वकील है , और यदि आपके पास घूस देने के लिए मोटी राशि है तो आप सीधे ही हाई कोर्ट के जज बन सकते है !! अनुमान किया जा सकता है कि इस ढंग से जो व्यक्ति जज बनेगा वह कितना भ्रष्ट होगा, और इस तरीके से जो जज किसी को जज बनाएंगे वे कितने ईमानदार होंगे !! समाधान - पसंदगी के आधार पर नियुक्ति देने की प्रक्रिया को ख़त्म किया जाना चाहिए। न्यायधीश जनता के बहुमत से अनुमोदित और यदि वे भ्रष्ट आचरण करते है तो उन्हें नौकरी से निकालने का अधिकार जिले / राज्य / देश के मतदाताओं के पास हो। . 2.4. मन मर्जी क़ानून बनाने की शक्ति : जब तक संसद दखल कर के इसे पलट न दे तब तक सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट की रुलिंग्स का प्रभाव कानूनों की तरह ही होता है। और, यदि संसद कोई क़ानून बनाती है तो सुप्रीम कोर्ट उसे अवैध भी घोषित कर सकती है। इस तरह कानूनों को वैध / अवैध घोषित करने और क़ानून / संविधान की व्याख्या का अधिकार जजों के पास है। . दूसरे शब्दों में, भारत में अंततोगत्वा जज ही यह तय करते है कि कौनसा क़ानून लागू होगा और कौनसा नहीं होगा। क्या संवैधानिक है और क्या असंवैधानिक है यह तय करने का अधिकार भी जजों के पास है !! और ख़ास बात यह है कि जजों पर नागरिको का कोई नियंत्रण नहीं है। समाधान - कानूनों एवं संविधान की व्याख्या का अधिकार आम नागरिको के पास होना चाहिए। इससे जनता यह निर्धारित कर सकेगी कि कौनसा क़ानून देश हित में है व कौनसा देश विरोधी। . 2.5. मामले को असीमित समय तक लटकाने की शक्ति : धीमी अदालती प्रकिया भ्रष्टाचार को जन्म देती है। जजों के पास किसी मामले को असीमित समय तक लटका कर रखने की शक्ति है। वे घूस खाकर किसी मुकदमें के फैसले को इच्छित समय तक टालते रह सकते है, तथा घूस मिलने पर किसी मामले में अति न्यायिक सक्रियता दिखा सकते है। भारत की अदालतों में 3 करोड़ मुकदमे लटके हुए है। इनमे कई नेता, अभिनेता, अधिकारी, उद्योगपति आदि शामिल है। वे इनके मामलों की सुनवाई धीमी गति से करते है ताकि लम्बे समय तक आरोपी जजों के पंजे में फंसा रहे। चीन के 2 लाख जजों के मुकाबले भारत में सिर्फ 18 हजार जज होने से अदालती प्रक्रिया धीमी है और इस वजह से जजों में भ्रष्टाचार है। समाधान - भारत को जजों की संख्या 20 हजार से बढ़ाकर 2 लाख करने की जरुरत है। . 2.6. अवमानना का क़ानून : जजों को कोई भ्रष्ट कह कर न पुकारे, इसके लिए जजों ने अवमानना का क़ानून बनाया है। यदि आप जज को भ्रष्ट कहेंगे तो जज आपको अदालत की अवमानना के आरोप में जेल पहुंचा देंगे। इस क़ानून के कारण जजों के भ्रष्टाचार की चर्चा नहीं हो पाती और इससे जज निशंक होकर भ्रष्टाचार कर पाते है। एक तरह से जजों ने इस तरह का क़ानून बनाकर पूरे देश को बाध्य कर दिया है कि वे जजों को ईमानदार एवं फ़रिश्ता माने !! और आपको अपने आस पास ऐसे लोग बहुतायत से मिलेंगे जो बिना किसी वजह से जजों को हरिश्चंद्र की औलाद मानकर चलते है। और इसकी उनके पास सिर्फ एक वजह है – उन्होंने यह अख़बार में पढ़ा हुआ होता है कि भारत के जज ईमानदार है !! समाधान - अवमानना के क़ानून को रद्द किया जाना चाहिए। . 2.7. विवेकाधिकार की असीम शक्ति : जजों का विवेकाधिकार भी भष्टाचार को बढ़ावा देता है। कानूनों को कितना भी विस्तृत रूप से लिखा जाये, तब भी कई बिन्दुओ को तय करने के लिए दंडाधिकारी को अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करना होता है। यह विवेकाधिकार भारत के जजों को असीमित शक्ति प्रदान कर देता है। वे घूस खाकर अपने विवेकाधिकार का इस तरह से इस्तेमाल करते है, जिससे घूस देने वाले को लाभ पहुँचाया जा सके। एक मशहूर कथन है कि – क़ानून मोम के टुकड़े की तरह होते है, और इसकी व्याख्या करने वाला इसे मनचाहे सांचे में ढाल सकता है !! समाधान - विवेकाधिकार की शक्ति जजों की जगह नागरिको के ज्यूरी मंडल को दी जानी चाहिए। . तो ऊपर दिए गयी प्रशासनिक वजहें बताती है कि हमारी न्यायपालिका में ऐसी पर्याप्त व्यवस्थाएं है जो यह सिद्ध करती है कि ऐसी कोई वजह मौजूद नहीं है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत के जज देश के अन्य अधिकारियो एवं नेताओ की तुलना में ज्यादा ईमानदार है। . बल्कि स्थिति इसके उलट है। दरअसल जजों की नियुक्ति-पदोन्नति की प्रणाली, विवेकाधिकार का प्रयोग एवं अवमानना का क़ानून उन्हें ज्यादा भ्रष्ट होने के ज्यादा सहज अवसर प्रदान करता है। और उन्हें नेताओं की तरह कभी जनता के प्रति जवाबदेहिता की प्रक्रिया से नही गुजरना पड़ता !! जीवन में कभी भी नही !! यही वजह है कि हमारी न्यायपालिका में भारी भ्रष्टाचार है। . 2.8. दूसरी तरफ सिर्फ दो वजहें है जिसकी वजह से यह बात स्थापित की जाती है कि भारत के जज बेहद ईमानदार एवं निष्पक्ष है : अवमानना के क़ानून का भय : यदि आप जजों पर अंगुली उठाएंगे तो वे आपको अवमानना का दोषी ठहरा कर जेल में डाल देंगे !! इस वजह से भारत के सभी समझदार एवं बड़े आदमी निरंतर यह दोहराते रहते है कि हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है !!! दूसरी बड़ी वजह पेड मिडिया है : धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक भारत में जज सिस्टम को जारी रखना चाहते है, ताकि वे जजों को घूस देकर मनचाहे फैसले निकलवा सके। इस तरह धनिक वर्ग एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक अपने पक्ष में फैसले लेने के लिए जजों के भ्रष्टाचार का लाभ उठाते है। अत: वे जजों की छवि बनाये रखने के लिए पेड मिडिया को भुगतान करते है। पेड मिडिया निरंतर इस तरह की धारणा खड़ी करता है जिससे नागरिको में यह भ्रम फैले कि भारत के माननीय जज बेहद ईमानदार है। . ——————- . (3) डेरा और राजनीति : . यह एक बहुत ही गलत धारणा है कि धर्म में राजनीति का एवं राजनीति में धर्म का दखल नहीं होना चाहिए। दरअसल धर्म राजनीति से अलग किया ही नही जा सकता। . वजह ? . कोई भी धार्मिक संस्था या धार्मिक गुरु लोगो से जुड़ा होता है तथा उसकी गतिविधियों में धार्मिक जमाव होता है। जहाँ भी लोगो का जमाव होगा वहां दखल करना राजनीति की मजबूरी है। राजनेता ऐसे सभी व्यक्तियों का पीछा करते है जिसके पास लोगो के किसी समूह को प्रभावित करने की क्षमता हो। . धार्मिक संस्थाओ के पास यह क्षमता काफी बढ़ी हुयी होती है। अत: राजनेता चाहते है कि अमुक गुरु या संस्था अपने श्रद्धालुओं को उनके पक्ष में वोट करने के लिए प्रेरित करे। कोई गुरु या संस्था राजनीति से अलग रहना चाहे तो भी राजनेता उनका पीछा करते है। धार्मिक गुरुओ के पास इनसे बचने का कोई विकल्प नहीं है। . और कभी कभी इसका उल्टा भी देखने में आता है। सभी धार्मिक संस्थाओ को अपने विस्तार के लिए सरकार से मधुर सम्बन्ध बनाये रखना जरुरी होता है। इसीलिए वे बढ़त बनाये रखने और स्वयं को सुरक्षित करने के लिए सत्ता के साथ गठजोड़ बनाते है। कुल मिलाकर धार्मिक संस्थाओ / गुरुओ के पास लोगो का जमाव है और ये लोग वोट करते है। राजनीति में प्रत्येक व्यक्ति एक वोट है। तो धर्म में राजनीति स्थायी तत्व है। इससे बचा नहीं जा सकता। . जो लोग इस तरह का ज्ञान बाँटते फिरते है कि धर्म का राजनीती में दखल नहीं होना चाहिए वे भी यह बात अच्छी तरह से जानते है कि पूरी धर्म का राजनीती में दखल अनिवार्य तत्व है, किन्तु वे अपने निहित स्वार्थो के लिए इस तरह के भ्रम फैलाते है। . मौजूदा स्थिति में राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ, कांग्रेस, अकाली और आम आदमी पार्टी में से कोई भी राजनैतिक दल डेरा के समर्थन में नहीं था / है। अकाली स्थानीय राजनीति और धार्मिक वजहों से तथा बीजेपी=संघ राष्ट्रीय राजनीति की वजह से डेरे को गिराना चाहते थे !! अपनी राजनैतिक वजहों के चलते कोंग्रेस एवं आम आदमी पार्टी की रुचि भी डेरे को बचाने में नहीं थी। आरएसएस हिन्दू धर्म के अनुयायियों को अपने नीचे "एक" करने के मिशन पर है। संघ के अनुसार विभिन्न सम्प्रदाय एवं गुरु वगैरह हिन्दुओ को विभाजित कर रहे है, और इसकी वजह से हिन्दुओ को एक करने का उनका मिशन पिछड़ जाता है !! अत: संघ पिछले 90 वर्ष से विभिन्न सम्प्रदायों एवं गुरुओ को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है। गोल्डन टेम्पल पर अपना प्रभाव रखने वाले अकाली भी डेरे को अपने प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते है। कोंग्रेस को डेरे ने एक लम्बे समय तक राजनैतिक समर्थन दिया था, किन्तु हाल ही में डेरे के बीजेपी की और चले जाने से कोंग्रेस को भी डेरे के गिर जाने से कोई दिक्कत नहीं है। इसके अलावा मिशनरीज द्वारा समर्थित तर्क शील सोसाइटी जैसे संगठन भी डेरे के खिलाफ है। . बहरहाल, विभिन्न दलों और संगठनो के अपने हित और उनकी राजनीति है, और इसके कई आयाम हो सकते है। . इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि मिशनरीज एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां डेरे को गिराना चाहती थी। अत: इस बात से कोई फर्क नहीं आता कि संघ / कोंग्रेस / अकाली आदि क्या चाहते थे। भारत में एफडीआई बढ़ने से मिशनरीज की ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि बीजेपी / कोंग्रेस / अकाली / आम आदमी पार्टी आदि कोई भी दल मिशनरीज के खिलाफ नहीं जा सकते। अत: इस प्रकरण में संघ / कोंग्रेस / अकाली एवं आम आदमी पार्टी की भूमिका को ज्यादा गंभीरता से लेने से हम मूल विषय से भटक जायेंगे। . यहाँ हमें इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि परदे के पीछे जो भी सियासत रही हो , लेकिन निष्पादन जज द्वारा ही किया जाता है। . आशय यह कि किसी व्यक्ति को जेल में भेजने की शक्ति सिर्फ जज के पास ही होती है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी इस शक्ति से वंचित है। तो जब किसी व्यक्ति को फंसाना होता है तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के मालिक हमेशा जज का ही इस्तेमाल करते है। जब तक जज नहीं चाहेगा तब तक किसी भी व्यक्ति को किसी तरह से जेल में नहीं पहुचायां सकता। और यदि जज किसी व्यक्ति को जेल भेजना चाहता है तो उसे फिर कोई बचा भी नहीं सकेगा। ऊपर उन कारणों को बताया गया है जो इस बात की पुष्टि करते है कि भारत की अदालतें उतनी ही भ्रष्ट है जितने कि अन्य विभाग। . ———————— . (5) राम रहीम जी के मुकदमे से सम्बंधित कुछ तथ्य जो अदालत के फैसले को संदिग्ध बनाते है : . सन 2002 में वाजपेयी को दो गुमनाम खत प्राप्त हुए ! खतो के बारे में यह दावा किया गया था कि ये पत्र गुरु राम रहीम की साध्वियों द्वारा लिखे गए थे !! और इन खतो में यह भी दावा किया गया था कि गुरु श्री राम रहीम जी ने 1999 में इन साध्वियों का बलात्कार किया था !! ( मतलब बलात्कार के 2 से 3 वर्ष बाद गुमनाम खत भेजे गए ) !!! घटना के 3 साल बाद यानी 2002 में इन गुमनाम खतो के आधार पर वाजपेयी ने CBI जांच के आदेश जारी किये !!! इन पत्रों में यह नहीं लिखा गया था कि ये पत्र किसने भेजे है। अत: CBI के आईपीएस अधिकारीयों ने कुछ 20 साध्वियों से बेहद गहन ,संदिग्धार्थक, अनेकार्थक एवं घुमावदार प्रश्न किये। इन बयानों को Crpc-164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने रिकोर्ड किया गया। और पूछे गए इन अनेकार्थक प्रश्नों के जवाबो को आगे की जांच के लिए सबूत के तौर पर मान लिया गया !!! 2005 तक CBI ने पीड़ीताओ से कई बार पूछताछ की। किन्तु हर बार पीड़ीताओ ने बयान दिया कि हमारे साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ !! CBI का कहना है कि उन्होंने कथित पीड़ीताओ को 2002 में ही खोज निकाला था !! किन्तु सीबीआई ने उनके बयान 2006 में दर्ज किये, और 2006 में ही चालान पेश किया। CBI ने दोनों कथित पीड़ीताओ के बयान 2006 में फिर दर्ज किये, और इनमे यह कहा गया कि बलात्कार किया गया था !! राम रहीम जी के वकील को दोनों पीड़ीताओ के बयानों की कॉपी नहीं दी गयी !! राम रहीम जी के वकील को पीड़ीताओ से क्रोस क्वेशचन करने का मौका नहीं दिया गया !! पीड़ीताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी किन्तु उन्हें बयान बदलने की अनुमति नहीं दी गयी !! . तो तकनिकी रूप से मुकदमे का सार यह है कि – 3 साल बाद प्राप्त हुए गुमनाम पत्रों के आधार पर सीबीआई जांच के आदेश किये गए !! 6 साल बाद सीबीआई ने ख़त लिखने वालो को खोज निकाला और उनके बयान दर्ज किये !! उन्होंने 4 वर्ष तक यह कहा कि कोई बलात्कार नही हुआ था , किन्तु सीबीआई ने इसे नहीं माना !! 2006 में सीबीआई ने दो साध्वियों के बयान दर्ज किये जिनमे कहा गया कि, बलात्कार हुआ था !! वकील को इन पीडिताओ से क्रोस क्वेश्चन करने की अनुमति नहीं दी गयी !! पीडीताओ ने अपने बयान बदलने की अनुमति मांगी, किन्तु उन्हें अनुमति नहीं दी गयी !! 11 साल पहले लिए गए इन बयानों के आधार पर जज ने घटना के 18 साल बाद राम रहीम जी को जेल भेज दिया !!! . ध्यान देने वाली बात यह है कि, इस मुकदमे के सम्बन्ध में कोई भी "भौतिक सबूत" बरामद नहीं किये गए। सिर्फ बयानों को आधार पर फैसला दिया गया। जज को यह फैसला करना था कि कौन सच बोल रहा था और कौन झूठ। इस स्थिति में अभियुक्त एवं पीडिताओ का नारको टेस्ट लेकर पता किया जा सकता है कि किसका बयान सच था। किन्तु नारको टेस्ट नहीं लिया गया और जज ने लड़कियों के बयानों को सच मानने का फैसला किया !!! . सुप्रीम कोर्ट की यह रूलिंग कि — लड़की का बयान हर हाल में सच माना जाएगा और लड़की को अपना बयान बदलने की इजाजत नहीं होगी मुख्य वजह बनी जिसके कारण सरकार के नियन्त्रण में काम करने वाले CBI के आईपीएस अधिकारी एवं जज श्री राम रहीम जी को जेल में पहुंचा सके। सुप्रीम कोर्ट ने यह रूलिंग रसूखदार लोगो को पंजे में लेने के लिए की है, और लगभग सभी हिन्दू संतो को गिराने के लिए इस रूलिंग का इस्तेमाल किया गया है, और आगे भी इसी रूलिंग का इस्तेमाल किया जाएगा। . इस रूलिंग का एक सबसे बड़ा साइड इफेक्ट यह आया कि अवसरवादी काम काजी महिलाओं ने इसका इस्तेमाल सहकर्मी पुरुष साथियों को ब्लेकमेल करने में शुरू किया और ज्यादातर पुरुष मालिको ने महिलाओं से दूरी बनाने के लिए उन्हें नियुक्तियां देना बंद कर दिया !! . पिछले 3 साल में मेरे खुद के सामने ऐसे दर्जन भर वाकये गुजर चुके है जब महिलाओं को नौकरियां गंवानी पड़ी है। और विडम्बना यह है कि उन महिलाओं / लडकियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि इस रूलिंग की वजह से वे नौकरियां गँवा रही है !! . लिंक - Victim's testimony is enough for conviction for rape: court . CBI के अधिकारियों ने ये बयान मजिस्ट्रेट के सामने कथित Crpc की धारा 164 के तहत दर्ज किये थे !! अब यदि बयान देने वाली लड़की अपने बयान को बदलती तो उसे झूठा बयान दर्ज करवाने के मुकदमे का सामना करना पड़ता। इस तरह उन्हें कोर्ट में श्री गुरु राम रहीम जी के खिलाफ फिर वही बयान देने के लिए बाध्य किया गया !! . और फिर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का इस्तेमाल किया गया कि - लड़की के बयान को अंतिम सत्य एवं अकाट्य सबूत माना जाएगा। . और फिर हमारे पास ऐसे शिक्षित एवं जागरूक लोगो का जमघट है जो इस प्रक्रिया को क़ानून का शासन कह के संबोधित कर रहे है !!! . इस सम्बन्ध में डेरा प्रमुख की पैरवी करने वाले वकील का साक्षात्कार निचे दिए लिंक पर देखें। इस साक्षात्कार में कहे गए तथ्यों को आप विश्वसनीय मान सकते है, क्योंकि वकील ने
जो भी तथ्य रखे है वे रिकॉर्ड पर है, और गलत बयानी पर जज वकील को जेल भेज सकता है। . और वकील का साफ़ कहना है कि आरोप लगाने वाली लकड़ियों ने क्या बयान दिया है उसकी कॉपी हमें दी ही नहीं गयी !! और भौतिक सबूत इस मामले में थे नहीं !! मतलब आरोप लगाने वाली लड़कियां कौन है वकील को मालूम नहीं है, उन्होंने क्या बयान दिए वो भी वकील को मालूम नहीं है !! और इन्ही बयानों के आधार पर 10 साल की सजा !! . मैं आपसे आग्रह करूँगा कि कृपया यह पूरा साक्षात्कार देखें - Interview with S.K. Garg Narwana, Lawyer, Gurmeet Ram Rahim . और क़ानून के इस मखौल को कवर करने के लिए मिशनरीज ने 24*7 घंटे देश भर में एक अलग तरह तमाशा रचा, जिसमें राम रहीम जी संत नहीं है , वे विलासी है, ऐश्वर्य प्रिय है, उनके पास गुफाएं है, उनके डेरे में स्वीमिंग पूल है, उन्होंने आलिशान महल बना रखा है, उनके पास 2 बाज, 3 उल्लू , 5 तीतर है, उनके पास ढेर सारी जमीन है, वे फिल्मे बनाते है, नाचते-गाते है, क्रिकेट खेलते है, कारोबार करते है , रंग बिरंगे कपड़े पहनते है आदि आदि जैसे बकवास आरोपों को पेड मीडिया द्वारा बार बार इसीलिए दोहराया गया ताकि बलात्कार के मूल मुकदमे पर चर्चा को टाला जा सके !! . पेड मीडिया से फीडिंग लेने वाले ज्ञानी लोगो ने ये सब देखा-पढ़ा और फेसबुक-कोरा-व्हाट्स एप आदि के माध्यम से पूरे देश में फैलाने में भी योगदान दिया !! . यदि इन फर्जी आरोपों पर बहस नहीं चलाई जाती है तो जनता का ध्यान बलात्कार के मुकदमे से जुड़े तथ्यों पर चला जाएगा। और तब जनता को यह मालूम होगा कि सिर्फ बयान को आधार बनाकर ही राम रहीम जी को दोषी ठहरा दिया गया है। . सुप्रीम कोर्ट की एक रूलिंग ने जज को यह तय करने का अधिकार दे दिया था कि वह यदि चाहे तो पीड़िता के बयान को सच मान सकता है !! और जज को इस बात में सुविधा थी कि लड़की के बयान को सच मान लिया जाए !! . इस तथ्य को चर्चा से बाहर करने के लिए मीडिया ने ऊपर दिए गए फर्जी आरोपों की झड़ी बनाकर यह धारणा खड़ी करने की कोशिश की है कि श्री राम रहीम जी एक दुर्जन व्यक्ति है। और सुबह शाम अनाज खाने के बावजूद कई लोग इन आरोपों को दोहरा रहे है। उन्हें इस बात पर सोचने का अवकाश ही नहीं है कि गुफाएं, स्वीमिंग पूल, महल आदि बनाना और फिल्मो में अभिनय करना अपराध की श्रेणी में नहीं आता। . ————————- . (6) उद्देश्य डेरे के इन्फ्रास्त्रक्चर को गिराना था ताकि मिशनरीज का रास्ता साफ़ हो . टिप्पणी : मैं श्री राम रहीम जी का भक्त नहीं हूँ, न ही मैं कभी डेरे पर गया हूँ। और मुझे यह भी पता नहीं है कि अमुक मामले में श्री राम रहीम जी दोषी है या नहीं है। जब मेरे सामने यह मामला आया तो मैंने इसे कानूनी नजरिये से देखा, और कानूनी टर्म के अनुसार कोई भी सामान्य समझ का व्यक्ति यही निष्कर्ष निकालेगा कि यह मुकदमा पहले दिन से ही फर्जी है, और उन्हें जानबूझकर फंसाया गया प्रतीत होता है। . लेकिन पेड मीडिया की अफीम लेने वाले व्यक्ति मुकदमे से जुड़े तथ्यों को टच ही नहीं करते है, वे उन्हें बस इसीलिए जेल में देखना चाहते है कि राम रहीम जी का रहन सहन उनके अनुसार एक संत जैसा नहीं है !! बताइये !!! . जैसे जैसे घटनाक्रम आगे बढ़ता गया उससे यह बात और भी साफ़ होती चली गयी कि मिशनरीज का उद्देश्य डेरे को तोडना है। मिशनरीज ने बड़ी मेहनत करके पंजाब को नशे की गिरफ्त में लिया है, और डेरे द्वारा इस तरह की प्रभावी गतिविधियाँ संचालित की जा रही थी जिससे लोग नशा छोड़ रहे थे !! . इसके अलावा डेरे के ज्यादातर अनुयायियों में ओबीसी शामिल है और इनमें दलित भी है। मिशनरीज के लिए यह वर्ग आसान शिकार है। सहजधारी सिक्खों को गोल्डन टेम्पल की वोटिंग लिस्ट से बाहर कर दिए जाने और दलित सिक्खों के गोल्डन टेम्पल से दूर छिटकने के बावजूद मिशनरीज इन्हें अपनी और खींच नहीं पा रही है, क्योंकि संत श्री राम रहीम एवं रामपाल जी इन्हें आश्रय दे देते है। . यह देखना बेहद दुखद है कि, इन सभी संतो के अनुयायी करोडो रूपये लेकर वकीलों के चक्कर लगा रहे है, ताकि वकील उन्हें जजों से न्याय दिला सके। एक मात्र अपवाद संत श्री रामपाल जी रहे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि देश के 80% से ज्यादा जज भ्रष्ट है !! . इन अनुयायियों को इस बात का भान नहीं है कि हमारे जज / प्रशासनिक अधिकारी / पुलिस अधिकारी / मंत्री एवं कल्कि पुरुष तृतीय मोदी साहेब समेत संघ के सभी मंत्री अमेरिकी धनिकों की फौलादी पकड़ में है। ये सभी नेता अधिकारी एवं सभी मीडिया कर्मी ( पेड अर्नव, पेड सुधीर, पेड रजत एवं पेड रविश समेत ) अमेरिकी धनिकों की कठपुतलियां मात्र है। . गुरमीत जी , श्री आसाराम जी बापू, श्री रामपाल जी आदि संतो ने अपने असाधारण कार्यो से इस बात को सुनिश्चित किया कि गरीब /दलित / ओबीसी आदि मिशनरीज के आश्रय में चले जाने की जगह हिन्दू धर्म में बने रहे। . मैं इसे फिर से दोहराता हूँ - यदि आज गरीब /दलित / ओबीसी आदि हिन्दू धर्म में बने हुए है तो मंदिर प्रमुखों, प्राचीन राजाओ, संघ के नेताओं, बीजेपी नेताओं का इसमें योगदान शून्य है। इसका असली श्रेय सिर्फ इन तथा इन जैसे अन्य संप्रदाय प्रमुखों की नयी खेप को जाता है। और विडम्बना यह है कि आज उदारवादी / पढ़े लिखे / आधुनिक हिन्दू इन संतो को जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है !!! . हिन्दुओ को अपने नीचे एक करने की चाहत रखने वाले संघ=बीजेपी के ज्यादातर कार्यकर्ता भी इससे खुश है। उनका नजरिया है कि, चलो अच्छा हुआ। यदि ये सभी संत हवालात में भेज दिए जाते है तो हम उनके अनुयायियों को आसानी से संघ=बीजेपी में जोड़ लेंगे !! . इन्हें यह अहसास ही नहीं है कि, मिशनरीज की ताकत के सामने इनकी कोई हैसियत नहीं है। यदि संत गुरमीत जी , संत श्री आसाराम जी एवं संत रामपाल जैसे लोग कमजोर हो गए तो दलितों / ओ बी सी / गरीबो की एक बड़ी संख्या मिशनरीज की गोद में जा गिरेगी। ऐसे सभी व्यक्ति जो इन संतो को गलत तरीके से 10-20 साल के लिए जेल में भेज दिए जाने का जश्न मना रहे है दरअसल वे जाने-अनजाने मिशनरीज की मदद कर रहे है। . उन्हें इस बात को समझने की जरूरत है कि ये संत धर्म के नाम पर सिर्फ डायलॉग नहीं मार रहे है, बल्कि स्कूल, अस्पताल, दवाइयाँ, आश्रय आदि भी उपलब्ध करवा रहे है। और मिशनरीज को कथाएँ कहने वाले संतो से ज्यादा परेशानी नहीं होती है, किन्तु वे ऐसे संतो को बाधा के रूप में देखते है जो परोपकारी कार्य कर रहे है !! . ओह माय गॉड फिल्म कान्हा Vs कान्हा नामक नाटक पर लिखी गयी है। परेश रावल ने इसमें मुख्य भूमिका भी निभायी है और वे इसके सह निर्माता भी है। इस नाटक के फायनेंसर संघ=बीजेपी के नेता है, और इस नाटक के कई शो देश भर में संघ के कार्यकर्ताओ के लिए आयोजित किये गए है। स्वाभाविक रूप से संघ के कार्यकर्ता इस नाटक और इस पर बनी फिल्म के प्रशंसक है !! . संघ के कार्यकताओ के बीच एक और स्वामी काफी लोकप्रिय है - स्वामी सच्चिदानंद। उनके लेखन का केंद्रीय सन्देश यही रहता है कि - विभिन्न सम्प्रदाय हिन्दुओ का विभाजन करके उन्हें कमजोर कर रहे है !!! अत: मजबूत होने के लिए हिन्दुओ को एक हो जाना चाहिए !! इसके अलावा वे यह भी स्थापित करते है कि सभी गुरु वगैरह हिन्दू धर्म को कमजोर कर रहे है !!! . यदि आप पंक्तियों एवं शब्दों के बीच छुपे हुए निहितार्थ को पढ़ सकते है तो साफ़ तौर पर समझ सकते है कि वे कहना क्या चाहते है। . ओह माय गॉड फिल्म भी इसी तरह का सन्देश देती है - सभी हिन्दू गुरु फ्रॉड और ढकोसले बाज है !! और इसीलिए सभी हिन्दू गुरुओ को ठिकाने लगा देना चाहिए !!! . लेकिन क्यों ? आखिर ये सभी गुरु / संत फ्रॉड और बुरे क्यों है ? क्या ये लोग कश्मीरी आतंकियों की तरह आतंकी गतिविधियां संचालित कर रहे है ? क्या ये लोग नक्सलियों की तरह पुलिस वालो को मार रहे है ? क्या ये लोग दाऊद की तरह लोगो को लूट रहे है और उनकी हत्याएं कर रहे है ? क्या ये लोग अपने आस पास रहने वाले लोगो को कश्मीरी पंडितो की तरह मारकर भगा देते है ? . नहीं। लेकिन फिर भी सोनिया / मोदी / केजरीवाल जैसे नेताओ और ओह माय गॉड जैसी फिल्मो के प्रशंषको की नजर में ये सभी संत बुरे और फ्रॉड है !!! . संत आसाराम जी बापू, श्री गुरमीत राम रहीम जी जैसे संतो ने कभी भी हिंसा को प्रेरित नहीं किया। इन संतो पर कर चोरी या जमीने हड़पने के मामले लगभग नगण्य है। इन्होने कभी भी समाज में शान्ति भंग करने के कृत्य नहीं किये। बावजूद इसके हमने देखा कि जज / सोनिया / मोदी / केजरीवाल जैसे नेता और इनके अंध भगतो ने इन संतो के व्यस्थागत ढाँचे को गिराने का समर्थन किया !!! . यदि सेना का इस्तेमाल प्रदर्शनकारियों के ऐसे समूह के खिलाफ किया जाता है जो अलगाववादी नहीं है और न ही देश द्रोही है, तो ऐसी हरकतों से नागरिको में सेना के प्रति सम्मान कम होगा। भारतीयो के दिल में सेना की इज्जत इसीलिए है क्योंकि सेना कभी भी आंतिरक मामलो में दखल नहीं देती। सिर्फ अलगाववादियों, विभाजनकारियों एवं देशद्रोही समूहों से ही सख्ती से पेश आती है। लेकिन भ्रष्ट जजों और सरकार ने डेरा समर्थको पर सेना का इस्तेमाल किया !! ( तब राज्य एवं केंद्र दोनों जगह पर आरएसएस = बीजेपी की सरकार थी, और सेना सरकार से ही आदेश लेती है, जजों से नहीं !! ) . पंचकुला में डेरा समर्थको पर पुलिस / पेरा मिलिट्री द्वारा की गयी फायरिंग में जिन 33 लोगो की मृत्यु हुयी ( अंतिम संख्या 45 रही ) उनमे से ज्यादातर की मौत सिर में , छाती में , फेफड़ो में और पीठ में गोली लगने से हुयी !!! कृपया इस बात को नोट करें कि पुलिस / सेना को निहत्थे प्रदर्शन कारियों पर कमर से ऊपर गोली चलाने के आदेश कभी नहीं दिए जाते, लेकिन जानबूझकर उन्हें आदेश दिए गए थे !! इसमें नाबालिग से लेकर वृद्ध एवं महिलाएं सभी शामिल थे !! . How 33 people died in Panchkula: INSAS, SLR bullets in the back, head, chest, neck . यदि आप न्यायिक प्रक्रिया का पालन नहीं करते हुए मीडियाई प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल करके लोगो को ठिकाने लगायेंगे तो इसके नतीजे भयावह हो सकते है। आज या कल , इन संतो के अनुयायी या तो मिशनरीज / इस्लाम की शरण लेंगे या फिर नक्सली बन जाएंगे। किसी निशस्त्र एवं क़ानून का पालन करने वाले समूह का दमन करना आसान है , लेकिन सिर्फ तब तक जब तक कि वे लोग क़ानून का पालन करते रहने के फैसले पर टिके रहे। . हाँ, सिर्फ तब तक जब तक कि वे लोग क़ानून का पालन करते रहने के फैसले पर टिके रहे !! . ——————— . अब यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बिंदु यह आता है कि जब राम रहीम जी पर व्यक्तिगत आरोप थे तो डेरे द्वारा संचालित सामाजिक-परोपकारी गतिविधियों को रोकने के लिए कदम क्यों उठाये गए ? उनके खातो को फ्रिज क्यों किया गया ? उनकी प्रोपर्टी अटेच क्यों की गयी ? . पिछली दफा ऐसा कब हुआ था जब कश्मीरी पत्थरबाजों की प्रॉपर्टी अटैच की गयी थी ? कल्ले में बूता है आपके ? क्या सरकार या कोर्ट ने हरियाणा / गुजरात में जाटों / पटेलों के प्रदर्शन एवं बंद के दौरान भी इनकी प्रॉपर्टी अटैच की थी ? मुझे नहीं लगता !! यह पहली बार है जब ऐसा किया गया। और यदि आप ऐसे प्रदर्शन के दौरान हुए नुक्सान की भरपाई प्रदर्शन कारियो से करना चाहते है तो इसके लिए क़ानून बनाइये। यह फैसला भ्र्ष्ट एवं भाई भतीजा वादी जजों के विवेक पर क्यों छोड़ा जा रहा है ? . अब तक ऐसे कोई सबूत सामने नहीं आये है जिससे इस प्रकार के संकेत मिले कि डेरा समर्थको ने हिंसा शुरू की या उन्होंने पुलिस पर हमला किया था। फिर भी जज का कहना है कि , "डेरे की प्रॉपर्टी को अटैच किया जाए" !!! . वजह यह है कि जब मिशनरीज किसी संत के पीछे जाते है तो उसके पूरे इन्फ्रास्त्रक्चर को इस तरह से तोड़ते है कि इसे पूरी तरह से उजाड़ दिया जाए। . यदि सिर्फ राम रहीम जी को अरेस्ट किया जाएगा तो मिशनरीज का उद्देश्य पूरा नहीं होता। इसके लिए डेरे को उजाड़ना भी जरुरी है। उनके अनुयायियों का मनोबल तोडना भी जरुरी है, और उसके नजदीकी उन तमाम लोगो को भी इस रडार में लिया जाता है जिससे इनके फिर से उठ खड़े होने की सम्भावना न रहे। संत श्री आसाराम जी के साथ भी यही किया गया। और डेरे के साथ भी। मतलब किसी एक व्यक्तिगत आरोप को आधार बनाकर यह हमला सभी आयामों से किया जाता है। . उन पर किसी भी वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं होने के बावजूद जजों एवं सरकार ने जाँच के नाम पर डेरे के खाते सीज किये। यह उस समय का वीडियो है जब राम रहीम जी को सजा हुयी थी. दिए गए वीडियो में व्यक्ति का कहना है कि खाते फ्रिज हो जाने के कारण डेरे द्वारा संचालित हॉस्पिटल स्टाफ को दो महीनो से वेतन नहीं मिला है !! बावजूद इसके वे हजारो मरीजों की चिकित्सा कर रहे है !! इन महाशय के सम्बन्धी को डेंगू हुआ था , जिन्हे यहाँ भर्ती किया गया था। . Sanju Girdhar . जिला कलेक्टर्स के माध्यम से आदेश दिया गया कि डेरे द्वारा संचालित संस्थाए अपनी नकदी प्रशासन को सौंप दे, साथ ही डेरे की सभी संस्थाओ के बैंक खाते भी फ्रिज किये गए !! इसके बाद डेरे को सील किया गया और वहां रह रहे सभी श्रधालुओ को डेरा छोड़कर जाने को कहा गया !! इसके बाद उन्होंने डेरे को टेकओवर करने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को डेरा व आश्रम के बैंक खातों को चलाने के लिए नियुक्त किया। दूसरे शब्दों में, एक व्यक्तिगत मामले को आधार बनाकर आश्रम की सम्पत्ति को फ्रिज किया गया। . और डेरे एवं उसकी संस्थाओ के बैंक खाते आज 2 साल बाद भी फ्रिज है !!! . तब पेड दैनिक भास्कर ने रिपोर्ट किया था कि — गुरमीत श्री राम रहीम जी के जेल जाते ही डेरे के लगभग 800 करोड़ का कारोबार ठप हो गया था !! सिरसा डेरे की 14 कंपनियां, 8 स्कूल-कॉलेज, फाइव स्टार होटल एमएसजी रिजॉर्ट, कशिश रेस्टोरेंट, पुराने डेरे के सामने एसी सुपर मार्केट की 52 दुकानों पर ताले लगे हैं। कई बैंक खाते भी सील कर दिए गए हैं। कारोबार से जुड़े करीब आठ हजार लोग बेरोजगार हो गए हैं और डर के मारे सिरसा छोड़ गए हैं। साथ ही देशभर में 400 के करीब डीलर्स ने एमएसजी स्टोर्स बंद कर दिए हैं। . और पेड दैनिक भास्कर ने इस खबर को इस तरह रिपोर्ट किया था जैसे राम रहीम जी कोई कारोबार नहीं बल्कि प्रतिबंधित वस्तुओ का कारोबार करने वाला कोई रैकेट चला रहे थे !! . इस निकृष्ट स्तर की गलीज़ रिपोर्ट को आप यहाँ पढ़ सकते है - इस स्ट्रेटजी से करोड़ो कमाता था राम रहीम, बनाना चाहता था रामदेव की तरह बिजनेस बाबा . पेड दैनिक जागरण ने डेरा टूटने के अगले हफ्ते 2 सितम्बर को प्रकाशित की थी। ई-पेपर से अब इस खबर को हटा दिया गया है। मतलब डेरा टूटने के साथ ही मिशनरीज अपनी दूकान लेकर वहां पहुँच चुके थे !! खबर की फोटो पोस्ट के साथ सलंग्न है। . —————- . (7) समाधान ? . एक वाजिब प्रश्न यहाँ यह खड़ा होता है कि डेरे के लाखो अनुयायी होने के बावजूद सरकार एवं जज इस हद का अन्याय करने में सफल कैसे हुए, और उन्हें लगभग नगण्य प्रतिरोध का सामना क्यों करना पड़ा ? . मेरे विचार में इसकी निम्न वजहें रही : . श्री राम रहीम जी अपने अनुयायियों को कभी भी महत्त्वपूर्ण राजनैतिक सूचनाएं नहीं दी। उन्होंने अपने श्रधालुओ को इस तथ्य से अवगत नै कराया कि भारत की सबसे बड़ी समस्या जजों का भ्रष्टाचार है, और मिशनरीज जजों के साथ मिलकर भारत में हिन्दू धर्म को उखाड़ने का अभियान चला रहे है। . डेरे ने अपने अनुयायियों को सूचित नहीं किया कि यदि जज एवं सरकार उन्हें जाया तौर पर जेल भेज देते है तो उन्हें सरकार को सीधे रास्ते पर लाने के लिए किस तरह का अभियान चलाना चाहिए। उन्होंने पेड मीडिया के बारे में भी अपने अनुयायियों को सूचित नहीं किया !! इस वजह से वे सरकार के समक्ष अपने मांग को राजनैतिक रूप से स्पष्ट तरीके से रखकर सरकार पर दबाव बनाने में असफल रहे !! . और यह समस्या सिर्फ डेरे के साथ ही नहीं है, बल्कि भारत के सभी संतो, गुरुओ, आश्रमों आदि के साथ यही समस्या है। तो जब भी किसी ताकतवर हिन्दू गुरु / संत को फर्जी मुकदमो में उलझकर गिराया जाता है तो उनके अनुयायियों की स्थिति Headless Chicken की हो जाती है। और राजनैतिक सूचनाओं के अभाव में वे सिर्फ 3 तरह की गतिविधियों का आश्रय लेते है : वे वकीलों के भरोसे बैठे रहते है और इस बात को समझ नहीं पाते कि यदि जज अपनी पर आया हुआ है तो वकील के पल्ले कुछ नहीं होता है। वे नेताओं के यहाँ पर धरने वगेरह देते है, और इस तथ्य से बेखबर रहते है कि नेताओं की हैसियत मिशनरीज के खिलाफ जाने की नहीं है। वे अपने आप को इस मुगालते में रखते है कि उन्हें न्याय मिल जाएगा। और हद तो यह कि वे पेड मीडिया में जाकर लॉबीइंग करते है कि वे उनका मुद्दा सही तरीके से उठाये !! . समाधान ? . मेरे द्वारा सुझाये गए समाधान निम्न है : . 7.1. गुरमीत राम रहीम जी के मुकदमे की सुनवाई के लिए जूरी ट्रायल किया जाए। जूरी के गठन एवं संचालन के लिए निम्नलिखित नियमो का पालन किया जाएगा : जूरी मंडल का रेंडम चयन हरियाणा राज्य की वोटर लिस्ट में से किया जाएगा एवं इनका आयुवर्ग 30-45 वर्ष के बीच होगा। यदि पीएम / सीएम चाहे तो जूरी का चयन राजस्थान या दिल्ली की वोटर लिस्ट में से भी कर सकते है। जूरी का आकार न्यूनतम 500 एवं अधिकतम 1500 सदस्य होगा। सीएम / पीएम इसके बीच की कोई भी संख्या तय कर सकते है। यह जूरी मंडल नियमित रूप से 11 बजे से सायं 4 बजे तक नियमित रूप से मामले की सुनवाई करेगा। जूरी मंडल बहुमत से यह तय कर सकेगा कि क्या गुरमीत जी का लाइ डिक्टेटर टेस्ट लिया जाना चाहिए या नहीं यदि तीन चौथाई जूरी सदस्य नारको टेस्ट की सहमती दे देते है तो राम रहीम जी का नारको टेस्ट लिया जा सकेगा। जूरी मंडल सुनवाई के दौरान यह तय कर सकता है कि बहस के दौरान पेश किये गए कौन कौन से सबूत एवं तथ्य सार्वजनिक किये जाने चाहिए। जूरी सदस्यों को प्रति उपस्थिति 600 रू एवं यात्रा भत्ता आदि मिलेगा। मुकदमे की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के 3 जज निरंतर उपस्थित रहेंगे और पूरा मामला उनकी अध्यक्षता में सुना जाएगा। जूरी का प्रत्येक संदस्य अपना निर्णय बंद लिफ़ाफ़े ( दोषी / निर्दोष ) में लिखकर देगा जजों को देगा और बहुमत बहुमत द्वारा दिए गए निर्णय को स्वीकृत निर्णय माना जाएगा। अंतिम फैसला जज सुनायेंगे और यदि जज चाहे तो जूरी के फैसले में बदलाव कर सकते है, या फैसले को पूरी तरह से पलट सकते है। कोई भी पक्षकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम जूरी में अपील कर सकता है। सुप्रीम जूरी में सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के जजों की उपस्थिति में होगी, और जूरी सदस्यों का चयन पूरे देश की मतदाता सूचियों से किया जायेगा। . जब ये मुकदमा चल रहा था तब हमने इस मामले की ट्रायल जूरी द्वारा कराने की मांग करना शुरू कर दिया था। किन्तु संख्या कम होने के कारण यह मांग खड़ी नहीं हो सकी। कार्यकर्ताओं से मेरा आग्रह है कि यदि इस मामले की सच्चाई सामने लाना चाहते है तो पीएम / सीएम से यह मांग करें कि इस मामले को जूरी मंडल के पास भेजा जाए। पीएम / सीएम चाहे तो सिर्फ इस मुकदमे की सुनवाई के जूरी द्वारा करने के लिए गेजेट में इस आशय का आदेश निकाल सकते है। . मांग करने के लिए आप किसी भी महीने की 5 तारीख को पीएम / सीएम को पोस्टकार्ड भेज सकते है, या ट्विट कर सकते है। . पोस्ट कार्ड में यह लिखे - @pmoindia , कृपया राम रहीम जी के मुकदमें का 500 नागरिको की जूरी द्वारा जूरी ट्रायल किया जाए। #JuryTrialOnRamRahimJi , #JuryCourt . संत श्री आसाराम जी बापू, संत श्री रामपाल जी , श्री श्री रविशंकर महाराज ( पर्यावरण का मामला ) , स्वामी नित्यानंद जी ( शुक्र है कि उनका मुकदमा निपट चुका है।) आदि के मामलों में भी मेरा यही प्रस्ताव है कि इनके मुकदमो का निपटान ज्यूरी द्वारा किया जाए। जब जयललिता ने कांची के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती जी को गिरफ्तार करने का आदेश दिया था तब भी मैंने यही प्रस्ताव किया था। . कुल मिलाकर मुझे जजों पर कभी भी भरोसा नहीं रहा। और भरोसा करने का कोई कारण मौजूद भी नहीं है। . 7.2. सरल प्रकृति के सभी मुकदमो की सुनवाई नागरिको की जूरी द्वारा करने की व्यवस्था बनाने के लिए प्रस्तावित जूरी कोर्ट क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए। . प्रस्तावित जूरी कोर्ट का ड्राफ्ट कृपया जूरी कोर्ट नामक मंच में देखें। . 7.3. सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, लोअर कोर्ट जज, पुलिस प्रमुख आदि पर वोट वापसी प्रक्रियाएं लागू करना। इसके लिए अलग से क़ानून ड्राफ्ट की जरूरत नहीं है। प्रस्तावित जूरी कोर्ट क़ानून गेजेट में आने से उपरोक्त अधिकारी वोट वापसी पासबुक के दायरे में आ जायेंगे। . 7.4. SGPC की तरह हिन्दू धर्म एवं सम्प्रदायों के प्रबन्धन को मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड क़ानून को गेजेट में प्रकाशित किया जाए, ताकि श्रद्धालु मंदिर / मठ / आश्रम प्रमुखों को चुन सके और अनियमितता पाने पर पद से हटा सके। यह क़ानून सबसे महत्त्वपूर्ण है और हिन्दू धर्म एवं सनातन सम्प्रदायों को इतनी शक्ति प्रदान कर देगा कि वे मिशनरीज एवं इस्लाम के बढ़ते प्रभाव का सामना कर सके। इस क़ानून का विस्तृत विवरण आप इस लिंक पर पढ़ सकते है - हिन्दूओं को अपने धर्म के विस्तार के लिए इस समय क्या कदम उठाना चाहिए? . ============= . (8) संत और संतत्व की परिभाषा पर मेरा प्रतिभाव : . भौतिक एवं व्यवहारिक जगत में इस प्रकार की परिभाषाओ पर बहस या विचार करना व्यक्तिगत मामला है। इनकी परिभाषा मान्यता, स्वीकार्यता , धारणा एवं आस्था आदि तत्वों से तय होती है। यदि आप किसी आध्यात्मिक विषय या धर्म के गूढ़ उपदेशो की मीमांसा कर रहे है तो इस तरह की चर्चा का महत्त्व है। किन्तु राजनैतिक एवं व्यवहारिक मामलो में इस मुद्दे को लाकर पटक देना कि संत क्या होता है और उसके लक्ष्ण क्या है, एक खुराफात है। . हम 2019 में रह रहे है। संत की परिभाषा जो भी है वह आदर्शवादी समय की बात है। आज आपको ऐसा कोई ढूँढने से भी नहीं मिलेगा। अत: आदर्शवाद की लपेट में आकर आज के दौर के लोगो को पुराने दौर की कसौटी पर न कसे। चीजो और व्यक्तियों को क़ानून एवं चलन के अनुसार देखें। क्योंकि वैसे शुचितावादी तो आज आप भी नहीं रहे है जैसे आपके पुरखे थे। . श्री राम रहीम जी, आसाराम जी, रामपाल जी या ओशो को कोई संत मानता है या नहीं मानता है यह अमुक व्यक्ति की मान्यता पर निर्भर करता है। और एक ही व्यक्ति के बारे में एक ही समय में आपकी मान्यता के उलट भी कई मान्यताएं चलन में हो सकती है। अत: किसी संत को लक्षित करके इस तरह के ऐलान देना कि अमुक व्यक्ति संत नहीं है क्योंकि वह फलां फलां काम कर रहा है और फलां फलां कार्य नहीं कर रहा है, ठीक बात नहीं है। क्योंकि जिन किन्ही लोगो को आप संत मान रहे है उन्हें कई लोग लट्ठ लेकर ढूंढ रहे है। और जिन्हें आप असंत ठहराने पर तुले हुए है उन्होंने कई लोगो की जिंदगियां बदल दी है। और इसीलिए वे पूजे जा रहे है। . दुसरे शब्दों में, यदि आप इन संतो के अनुयायी नहीं है और आप इन्हें कोई दान नहीं दे रहे है तो कायदे की बात यही है कि उस बिंदु तक सीमित रहे जिस बिंदु पर वे क़ानून का उलंघन कर रहे है। . इन आदर्शो के चकमे में आने की जगह इस बात पर गौर करे कि इन लोगो ने जो दान प्राप्त किया उनमे से कितना हिस्सा गैर उत्पादक कार्यो एवं तडक भड़क में खर्च किया एवं कितनी राशी से उन्होंने स्कूल चलाए , दवाइयाँ बांटी, अस्पताल चलाये , लोगो में धर्म का प्रचार किया, उन्हें नशे से दूर किया, उन्हें आध्यामिक सलाहें दी आदि। आप पायेंगे कि उन्होंने सिर्फ दान से प्राप्त राशि में से सिर्फ 1% का ही गैर उत्पादक कार्यो में उपयोग किया है तथा शेष राशि परोपकार के कार्यो में लगायी। . यदि मंदिरों ने ऐसा किया होता तो ये नए सम्प्रदाय कभी उभरते नहीं थे। मंदिरों ने जो पीड़ा दी उसका मरहम इन्होने उपलब्ध कराया। और आज भी हर लिहाज से ये नए सम्प्रदाय धर्म एवं परोपकार के क्षेत्र में ज्यादातर मंदिरों से बेहतर कार्य कर रहे है। श्रधालुओ ने जब मंदिरों में भ्रष्टाचार देखा तो दान में कमी आने लगी। मंदिरों में परोपकार के कार्य कम होने से एक वैक्यूम बना। इस वैक्यूम को इन लोगो ने पूरा किया। इन्होने मंदिरो की अपेक्षा ज्यादा बेहतर तरीके से परोपकार के कार्य किये और इसी वजह से इन्हें श्रद्धालु मिले और इन्हें मिलने वाले दान में वृद्धि हुयी। . तो यदि आपको विचार करना है तो निम्नलिखित बिन्दुओ पर करे : मंदिरों में भ्रष्टाचार होने की क्या वजह है। क्यों मंदिर परोपकार के कार्यो को तवज्जो नहीं दे रहे है ? क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे मंदिरों के प्रशासन को मजबूत बनाया जा सके ? क्या ऐसा कोई तरीका है जिससे इस प्रकार के परोपकार के कार्य करने वाले डेरा / आश्रम प्रमुखों में मौजूद कतिपय अनियमितताओ को और भी दुरुस्त किया जा सके ? ताकि इन सम्प्रदायो में मौजूद "मामूली खामियों" को बहाना बनाकर इन्हें नष्ट करने के षड्यंत्रों पर लगाम लगाई जा सके। मंदिरों के टूटने और इन नए सम्प्रदायों के उखड़ने का सबसे अधिक लाभ मिशनरीज को होगा। किन कानूनों की सहायता से हम मिशनरीज के बढ़ते प्रभाव को कम कर सकते है और हिन्दू मंदिरों के प्रशासन को मजबूत बना सकते है ? . मेरे विचार में इन सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तावित राष्ट्रीय हिन्दू बोर्ड क़ानून = #HinduBoard को गेजेट में छापकर किया जा सकता है। . ============
- Post by अनार जीत दास पेंटर4
- कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा कैमुरांचल सांगठनिक कमेटी दिनांक -31 मार्च 2026 ----------------------- प्रेस विज्ञप्ति कैमूर के पठारीय वन क्षेत्र में रह रहे आदिवासियों एवं अन्य वन निवासियों के परंपरागत एवं नैसर्गिक जीवन में आरएसएस बीजेपी सरकार तथा उसके वन विभाग के बढ़ते हस्तक्षेप एवं कुल 58 आदिवासी बहुल गांव के उजाड़ कर बाघ अभ्यारण बनाने के विरुद्ध कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा एवं ऑल इंडिया ट्राइबल फोरम ने संयुक्त रूप से 14 सूत्रीय मांगों को लेकर आज दिनांक 31 मार्च 2026 को जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी के सासाराम कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन एवं आंदोलन किया। कैमूर वन क्षेत्र से भारी संख्या में आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों ने हाथों में बैनर झंडा तख्ती कुल्हाड़ी एवं तीर धनुष लिए हुए दिन के 12:00 बजे रेलवे मैदान सासाराम से एक विशाल प्रदर्शन निकाला जो पुरानी जीटी रोड होते हुए जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी के कार्यालय के सामने जाकर सभा में तब्दील हो गया जिसकी अध्यक्षता एवं संचालन मोर्चा के अध्यक्ष धनंजय उरांव ने किया। इस मौके पर आदिवासी समुदाय के सांस्कृतिक कर्मियों ने अपने पारंपरिक वाद्य यंत्र की थाप पर लोक नृत्य किया और लोकगीत गाए। जल जंगल जमीन पर अधिकार हमारा है, कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा ने ललकारा है के नारों से वातावरण गूंज उठा। सभा को संबोधित करते हुए मोर्चा के अध्यक्ष धनंजय उरांव ने कहा कि ब्रिटिश शासन काल में वन संपदा के लूट के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाया गया वन विभाग आज भी हम आदिवासियों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव करता है आज हम अपने ही जंगल में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं कैमूर वन क्षेत्र में कभी कोई बाघों का नामोनिशान नहीं था फिर भी 58 गांव को उजाड़ कर सरकार बाघ अभ्यारण बना रही है। इसके विरोध में आज हम डीएफओ साहब के कार्यालय पर आए हैं। इस मौके पर सभा को संबंधित करने वाले मुख्य वक्ताओं में मोर्चा के पूर्व संयोजक सुरेंद्र सिंह, सूरज उरांव, सुनील चेरो, पलटन चेरो, अनीता चेरो, कौशल्या चेरो, संजीव खरवार, बीरेंद्र उरांव, कमलेश उरांव डोमा खरवार, आर्लेस चेरो, कामेश्वर उरांव, शिवराज उरांव, मोती उरांव, चंपा चेरो आदि मुख्य थे। इस मौके पर निम्न मैंगो का ज्ञापन सोपा गया :----- 1 कैमूर बाग अभ्यारण परियोजना रद्द करो 2 कैमूर पठारिय वन क्षेत्र को संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल करो। 3 वन अधिकार कानून 2006 को मूल रूप से लागू करो। 4 ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना कैमूर वन क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण एवं विशेष योजनाओं के अमल पर रोक लगाओ। 5 कैमूर वन क्षेत्र में मौजूद बिहार सरकार भूमि को वन विभाग के अतिक्रमण से मुक्त कराओ। कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा एवं ऑल इंडिया ट्राइबल फ़ोरम के नेताओं ने वन प्रमंडल पदाधिकारी डीएफओ रोहतास को चेताया कि यदि हमारी मांगों को अनसुना किया गया तो हम अपने आंदोलन को और अधिक तीव्र करेंगे तथा वन विभाग के कामकाज को ठप कर देंगे। भवदीय धनंजय उरांव अध्यक्ष कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा4
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- #Stepping_Stone_Academy में #Result_Day पर छात्रों को मिला #निःशुल्क_किताब और #एडमिशन एक thumbnail क्रिएट करें1
- अफवाहों के बीच पेट्रोल पंपों पर उमड़ी भारी भीड़, प्रशासन ने किया पैनिक न होने का आग्रह!1
- Post by वकील वकीलसाह1
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- बिहार के दरभंगा में इन दिनों पेट्रोल और डीजल को लेकर भारी अफरा-तफरी का माहौल है। शहर के लगभग सभी पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। आलम यह है कि लोग अपनी गाड़ियों की टंकियां फुल कराने के साथ-साथ बोतलों और गैलनों में भी तेल भरने की जुगाड़ में लगे हैं।1