जनपद की शिक्षक व्यवस्था की विफलता का शिकार या समाधान का आधार कानपुर देहात। शिक्षा की दुनिया को बाहर से देखने पर अक्सर ऐसा लगता है कि यह नीतियों, योजनाओं, लक्ष्यों, बैठकों और समीक्षाओं से संचालित होने वाली एक सुव्यवस्थित व्यवस्था है लेकिन भीतर जाकर देखिए तो एक विचित्र विडंबना दिखाई देती है। निर्णय वहाँ बनते हैं जहाँ बच्चों की आवाज सुनाई नहीं देती और उनके परिणाम वहाँ भुगते जाते हैं जहाँ बच्चे प्रतिदिन मौजूद होते हैं। शिक्षा व्यवस्था में सबसे ऊपर बैठा व्यक्ति अक्सर आँकड़े देखता है, लक्ष्य देखता है, प्रेजेंटेशन देखता है और उपलब्धियों का प्रतिशत देखता है। उसके सामने विद्यालय एक संख्या होता है, शिक्षक एक संसाधन होता है और विद्यार्थी एक डेटा बिंदु लेकिन सबसे नीचे खड़ा शिक्षक किसी प्रतिशत, पोर्टल या पावरपॉइंट के बीच नहीं रहता। वह उन बच्चों के बीच रहता है जिनकी आँखों में जिज्ञासा है, जिनके घरों में समस्याएँ हैं जिनकी सीखने की गति अलग-अलग है और जिनके भविष्य की जिम्मेदारी अंततः उसी के कंधों पर आकर टिक जाती है। विडंबना यह है कि शिक्षा की लगभग हर समस्या का अंतिम उत्तरदायी वही व्यक्ति बना दिया जाता है जिसके पास सबसे कम अधिकार होते हैं। पाठ्यक्रम किसने बनाया, नीति किसने बनाई, संसाधनों का वितरण किसने किया, लक्ष्य किसने तय किए, समय-सीमाएँ किसने निर्धारित कीं इन प्रश्नों पर चर्चा कम होती है लेकिन यदि सीखने का स्तर अपेक्षित नहीं मिला, यदि कोई अभियान सफल नहीं हुआ यदि कोई आँकड़ा कम निकला तो सबसे पहले उँगली उसी शिक्षक की ओर उठती है जो प्रतिदिन बच्चों के बीच उपस्थित था। इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षार्थी भी कहीं न कहीं सबसे बड़ा नुकसान उठाता है क्योंकि जब शिक्षक का समय शिक्षण से अधिक रिपोर्टिंग में, बच्चों से अधिक पोर्टलों में, नवाचार से अधिक अनुपालन में और चिंतन से अधिक स्पष्टीकरणों में व्यतीत होने लगे तब शिक्षा का केंद्र धीरे-धीरे बच्चे से हटकर व्यवस्था बन जाती है। शिक्षक पढ़ाने से पहले यह सोचने लगता है कि आज कौन-सी सूचना भेजनी है, कौन-सी समीक्षा देनी है और कौन से लक्ष्य की पूर्ति दिखानी है परिणामस्वरूप शिक्षार्थी वह ध्यान और ऊर्जा नहीं पा पाता जो वास्तव में उसका अधिकार है। शिक्षा के सबसे कठिन संघर्ष इसलिए गलत और सही के बीच नहीं होते। वे अधिकार और विवशता के बीच होते हैं। आदेश देने वाला आश्वस्त होता है क्योंकि उसके पास अधिकार है। आदेश निभाने वाला आशंकित होता है क्योंकि उसके पास केवल उत्तरदायित्व है। ऊपर बैठे व्यक्ति के लिए लक्ष्य एक संख्या है, नीचे खड़े शिक्षक के लिए वही लक्ष्य एक अतिरिक्त बोझ, अतिरिक्त समय और अतिरिक्त दबाव बन जाता है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि उपलब्धि का श्रेय ऊपर की ओर यात्रा करता है और असफलता का कारण नीचे की ओर। यदि परिणाम अच्छे आएँ तो नीति सफल कहलाती है, नेतृत्व सफल कहलाता है, योजना सफल कहलाती है लेकिन यदि परिणाम अपेक्षित न हों तो दोष शिक्षक की प्रतिबद्धता, शिक्षक की क्षमता और शिक्षक की कार्यशैली में खोजा जाता है। जैसे पूरी व्यवस्था की सफलता सामूहिक हो और उसकी असफलता व्यक्तिगत। शिक्षा की गुणवत्ता केवल जवाबदेही से नहीं सुधरती बल्कि अधिकार और उत्तरदायित्व के संतुलन से सुधरती है। जिस व्यक्ति से सबसे अधिक अपेक्षा की जाती है उसे सबसे अधिक विश्वास, सबसे अधिक स्वायत्तता और सबसे अधिक सहयोग भी मिलना चाहिए। यदि शिक्षक को केवल आदेशों का पालन करने वाला कर्मचारी बना दिया जाएगा तो वह बच्चों के लिए वह सृजनात्मक, प्रेरणादायी और मानवीय भूमिका कैसे निभा पाएगा जिसकी अपेक्षा समाज उससे करता है। अंततः किसी भी शिक्षा व्यवस्था की असली परीक्षा उसकी नीतियों, पोर्टलों और प्रस्तुतियों से नहीं होती। उसकी परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने शिक्षक के साथ कैसा व्यवहार करती है और अपने शिक्षार्थी को कितना केंद्र में रखती है। जिस दिन व्यवस्था यह समझ लेगी कि शिक्षक समस्या नहीं, समाधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है उसी दिन शिक्षा के अनेक संघर्ष स्वतः हल होने लगेंगे।
जनपद की शिक्षक व्यवस्था की विफलता का शिकार या समाधान का आधार कानपुर देहात। शिक्षा की दुनिया को बाहर से देखने पर अक्सर ऐसा लगता है कि यह नीतियों, योजनाओं, लक्ष्यों, बैठकों और समीक्षाओं से संचालित होने वाली एक सुव्यवस्थित व्यवस्था है लेकिन भीतर जाकर देखिए तो एक विचित्र विडंबना दिखाई देती है। निर्णय वहाँ बनते हैं जहाँ बच्चों की आवाज सुनाई नहीं देती और उनके परिणाम वहाँ भुगते जाते हैं जहाँ बच्चे प्रतिदिन मौजूद होते हैं। शिक्षा व्यवस्था में सबसे ऊपर बैठा व्यक्ति अक्सर आँकड़े देखता है, लक्ष्य देखता है, प्रेजेंटेशन देखता है और उपलब्धियों का प्रतिशत देखता है। उसके सामने विद्यालय एक संख्या होता है, शिक्षक एक संसाधन होता है और विद्यार्थी एक डेटा बिंदु लेकिन सबसे नीचे खड़ा शिक्षक किसी प्रतिशत, पोर्टल या पावरपॉइंट के बीच नहीं रहता। वह उन बच्चों के बीच रहता है जिनकी आँखों में जिज्ञासा है, जिनके घरों में समस्याएँ हैं जिनकी सीखने की गति अलग-अलग है और जिनके भविष्य की जिम्मेदारी अंततः उसी के कंधों पर आकर टिक जाती है। विडंबना यह है कि शिक्षा की लगभग हर समस्या का अंतिम उत्तरदायी वही व्यक्ति बना दिया जाता है जिसके पास सबसे कम अधिकार होते हैं। पाठ्यक्रम किसने बनाया, नीति किसने बनाई, संसाधनों का वितरण किसने किया, लक्ष्य किसने तय किए, समय-सीमाएँ किसने निर्धारित कीं इन प्रश्नों पर चर्चा कम होती है लेकिन यदि सीखने का स्तर अपेक्षित नहीं मिला, यदि कोई अभियान सफल नहीं हुआ यदि कोई आँकड़ा कम निकला तो सबसे पहले उँगली उसी शिक्षक की ओर उठती है जो प्रतिदिन बच्चों के बीच उपस्थित था। इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षार्थी भी कहीं न कहीं सबसे बड़ा नुकसान उठाता है क्योंकि जब शिक्षक का समय शिक्षण से अधिक रिपोर्टिंग में, बच्चों से अधिक पोर्टलों में, नवाचार से अधिक अनुपालन में और चिंतन से अधिक स्पष्टीकरणों में व्यतीत होने लगे तब शिक्षा का केंद्र धीरे-धीरे बच्चे से हटकर व्यवस्था बन जाती है। शिक्षक पढ़ाने से पहले यह सोचने लगता है कि आज कौन-सी सूचना भेजनी है, कौन-सी समीक्षा देनी है और कौन से लक्ष्य की पूर्ति दिखानी है परिणामस्वरूप शिक्षार्थी वह ध्यान और ऊर्जा नहीं पा पाता जो वास्तव में उसका अधिकार है। शिक्षा के सबसे कठिन संघर्ष इसलिए गलत और सही के बीच नहीं होते। वे अधिकार और विवशता के बीच होते हैं। आदेश देने वाला आश्वस्त होता है क्योंकि उसके पास अधिकार है। आदेश निभाने वाला आशंकित होता है क्योंकि उसके पास केवल उत्तरदायित्व है। ऊपर बैठे व्यक्ति के लिए लक्ष्य एक संख्या है, नीचे खड़े शिक्षक के लिए वही लक्ष्य एक अतिरिक्त बोझ, अतिरिक्त समय और अतिरिक्त दबाव बन जाता है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि उपलब्धि का श्रेय ऊपर की ओर यात्रा करता है और असफलता का कारण नीचे की ओर। यदि परिणाम अच्छे आएँ तो नीति सफल कहलाती है, नेतृत्व सफल कहलाता है, योजना सफल कहलाती है लेकिन यदि परिणाम अपेक्षित न हों तो दोष शिक्षक की प्रतिबद्धता, शिक्षक की क्षमता और शिक्षक की कार्यशैली में खोजा जाता है। जैसे पूरी व्यवस्था की सफलता सामूहिक हो और उसकी असफलता व्यक्तिगत। शिक्षा की गुणवत्ता केवल जवाबदेही से नहीं सुधरती बल्कि अधिकार और उत्तरदायित्व के संतुलन से सुधरती है। जिस व्यक्ति से सबसे अधिक अपेक्षा की जाती है उसे सबसे अधिक विश्वास, सबसे अधिक स्वायत्तता और सबसे अधिक सहयोग भी मिलना चाहिए। यदि शिक्षक को केवल आदेशों का पालन करने वाला कर्मचारी बना दिया जाएगा तो वह बच्चों के लिए वह सृजनात्मक, प्रेरणादायी और मानवीय भूमिका कैसे निभा पाएगा जिसकी अपेक्षा समाज उससे करता है। अंततः किसी भी शिक्षा व्यवस्था की असली परीक्षा उसकी नीतियों, पोर्टलों और प्रस्तुतियों से नहीं होती। उसकी परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने शिक्षक के साथ कैसा व्यवहार करती है और अपने शिक्षार्थी को कितना केंद्र में रखती है। जिस दिन व्यवस्था यह समझ लेगी कि शिक्षक समस्या नहीं, समाधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है उसी दिन शिक्षा के अनेक संघर्ष स्वतः हल होने लगेंगे।
- Jaloun डीपीआरओ ने सचिवों संग की अभद्रता, मामले से गुस्साए धरने l डीपीआरओ ने सचिवों संग की अभद्रता, मामले से गुस्साए धरने पर बैठे, ज्ञापन देने पहुंचे थे ग्राम पंचायत अधिकारी संघ के पदाधिकारी, डीपीआरओ पर ज्ञापन फेंकने व अभद्रता के आरोप, मामले से गुस्साए सचिव व पदाधिकारी, कार्यालय के बाहर शुरू किया धरना, पूर्व में भी विवादों में रहे हैं डीपीआरओ राम अयोध्या प्रसाद, कलक्ट्रेट परिसर स्थित डीपीआरओ कार्यालय का मामला।1
- राजमिस्त्री ठेकेदार पर दबंगों का हमला, मारपीट में फोड़ा सिर—मौके से फरार हुए आरोपी! उरई में दबंगई का मामला उरई कोतवाली क्षेत्र के कोंच रोड स्थित विधि महाविद्यालय के पास राजमिस्त्री ठेकेदार के साथ दबंगों द्वारा मारपीट किए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि दबंगों ने ठेकेदार के साथ मारपीट की और उसके सिर में चोट पहुंचाई, जिससे वह घायल हो गया। घटना के बाद आरोपी मौके से फरार हो गए। घटना के बाद पीड़ित ने उरई कोतवाली पुलिस को तहरीर सौंपकर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। पुलिस मामले की जांच में जुटी है। घटना के पीछे क्या वजह रही और मारपीट में कौन-कौन लोग शामिल थे, यह जांच के बाद स्पष्ट होगा। सवाल यह है कि आखिर खुलेआम मारपीट करने वाले दबंगों पर पुलिस कब शिकंजा कसेगी? #BreakingNews #Jalaun #Urai #UraiNews #JalaunNews #CrimeNews #UPNews #UttarPradesh #UraiKotwali #Police #Crime #BreakingJalaun #JalaunPolice #मारपीट #दबंगई #उरई #जालौन #क्राइम #पुलिस #कानूनव्यवस्था #कोंचरोड #विधिमहाविद्यालय #राजमिस्त्री #ठेकेदार #घटना #तहरीर #कार्रवाई #दबंग #ViralNews #LatestNews1
- जालौन जालौन में डीपीआरओ पर सचिवों के साथ अभद्रता का आरोप, मामले से गुस्साए सचिव डीपीआरओ कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे, ज्ञापन देने पहुंचे थे ग्राम पंचायत अधिकारी संघ के पदाधिकारी, जालौन में डीपीआरओ पर सचिवों के साथ अभद्रता का आरोप, मामले से गुस्साए सचिव डीपीआरओ कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे, ज्ञापन देने पहुंचे थे ग्राम पंचायत अधिकारी संघ के पदाधिकारी, डीपीआरओ पर ज्ञापन फेंकने व अभद्रता करने का आरोप, मामले से गुस्साए सचिव व पदाधिकारी, कार्यालय के बाहर शुरू किया धरना, पूर्व में भी विवादों में रहे हैं डीपीआरओ राम अयोध्या प्रसाद, जालौन के उरई कलक्ट्रेट परिसर स्थित डीपीआरओ कार्यालय का मामला4
- डकोर गांव में पेयजल संकट गहराया, ग्रामीणों ने विकासखंड गेट पर किया प्रदर्शन डकोर (जालौन)।भीषण गर्मी और उमस के बीच ग्राम डकोर में पेयजल संकट ने ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा दी है। करीब एक महीने से गांव में पानी की सप्लाई ठप होने का आरोप लगाते हुए ग्रामीणों ने विकासखंड कार्यालय के गेट के सामने प्रदर्शन कर अपनी गहरी नाराजगी जताई। ग्रामीणों का कहना है कि पानी जैसी मूलभूत जरूरत के लिए उन्हें दूर-दराज से पानी ढोकर लाना पड़ रहा है, जबकि जिम्मेदार विभाग समस्या के समाधान को लेकर गंभीर नजर नहीं आ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक, नादयी के पास तालाब के बगल में स्थित पानी की टंकी से पूरे गांव में जलापूर्ति की जाती थी। लंबे समय से सप्लाई बंद होने के कारण घरों में पानी नहीं पहुंच पा रहा है। हालात यह हैं कि ग्रामीणों के साथ पशुपालकों को भी पानी के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। ग्रामीणों को मजबूरी में दूर से पानी लाकर अपनी घरेलू जरूरतें पूरी करनी पड़ रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में मौजूद पुरानी पानी की टंकी से पहले घर-घर नियमित जलापूर्ति होती थी। यदि पुरानी व्यवस्था को दोबारा चालू कर दिया जाए तो काफी हद तक समस्या का समाधान हो सकता है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि जल संस्थान की ओर से समस्या का स्थायी समाधान कराने के लिए अपेक्षित पहल नहीं की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘नमामि गंगे’ योजना के तहत कभी-कभार पानी आने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। जब तक नियमित रूप से घर-घर पानी नहीं पहुंचेगा, तब तक योजना का वास्तविक लाभ नहीं मिल पाएगा। प्रदर्शन में शामिल राजेंद्र सिंह, बृजेश यादव, ब्रजकिशोर मास्टर, हरिराम वसोर, हल्के सहित दर्जनों ग्रामीणों ने जिलाधिकारी जालौन से मामले में तत्काल हस्तक्षेप कर पेयजल व्यवस्था बहाल कराने की मांग की है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द जलापूर्ति बहाल नहीं हुई तो उच्च अधिकारियों के समक्ष दोबारा आवाज उठाई जाएगी। बड़ा सवाल: जब गांव में पुरानी टंकी से पहले घर-घर पानी पहुंचता था, तो आखिर उसे दोबारा चालू कराने में क्या अड़चन है? क्या जिम्मेदार विभाग ग्रामीणों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए अब ठोस कदम उठाएगा?1
- माती कोर्ट ने महिला को छत से गिरा देने और इलाज के दौरान मौत होने के मामले में अभियुक्त को सात वर्ष कारावास की सजा सुनाई और ₹10,000 के अर्थदंड से किया दंडित महिला को छत से गिरा देने और इलाज के दौरान मौत होने के मामले में माती कोर्ट में माननीय न्यायालय एडीजे 4 ने अभियुक्त लवकेश पुत्र राकेश निवासी ग्राम चाँदापुर थाना भोगनीपुर जनपद कानपुर देहात को दोषी करार दिया और अभियुक्त को 7 वर्ष कारावास की सजा सुनाई और ₹10,000 अर्थदंड से दंडित किया।1
- जालौन राजमिस्त्री ठेकेदार संग दबंगों ने की मारपीट, मारपीट के ठेकेदार का फोड़ा सिर राजमिस्त्री ठेकेदार संग दबंगों ने की मारपीट, मारपीट के ठेकेदार का फोड़ा सिर, मारपीट कर मौके से फरार हुए दबंग, पीड़ित ने पुलिस को सौंपी मामले की तहरीर, उरई कोतवाली के कोंच रोड विधि महाविद्यालय के पास का मामला।2
- Jalaun Accident : 5 घायल, 3 रेफर! कोतवाली क्षेत्र में 2 अलग-अलग हादसे!! जालौन जिले के जालौन कोतवाली क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर हुईं सड़क दुर्घटनाओं में पांच लोग घायल हो गए। दुर्घटनाओं के बाद मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया। स्थानीय लोगों और राहगीरों ने तत्काल राहत कार्य शुरू करते हुए एम्बुलेंस सेवा को सूचना दी। सूचना मिलते ही एम्बुलेंस मौके पर पहुंची और सभी घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) जालौन में भर्ती कराया गया। अस्पताल में चिकित्सकों ने सभी घायलों का प्राथमिक उपचार किया। जांच के दौरान तीन घायलों की हालत गंभीर पाए जाने पर उन्हें बेहतर उपचार के लिए उच्च संस्थान रेफर कर दिया गया, जबकि अन्य दो घायलों का उपचार सीएचसी में जारी रहा। घटनाओं की सूचना मिलने पर पुलिस भी मौके पर पहुंची और दुर्घटनाओं के संबंध में जानकारी जुटाई। पुलिस ने आवश्यक विधिक कार्रवाई शुरू कर दी है। वहीं चिकित्सकों ने गंभीर रूप से घायल मरीजों को समय रहते उच्च चिकित्सा केंद्र भेजा, ताकि उन्हें बेहतर इलाज उपलब्ध कराया जा सके। पुलिस ने वाहन चालकों से अपील की है कि वे यातायात नियमों का पालन करें, निर्धारित गति सीमा में वाहन चलाएं तथा सावधानी बरतें, जिससे सड़क दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके। वाइट - वरिष्ठ चिकित्सक डॉ योगेश आर्य यूट्यूब चैनल के लिए स्क्रिप्ट तैयार कर दो किसी प्रकार की स्ट्राइक ना आए और थंबनेल हेजटैग भी बना दो वायरल मिलियन व्यू आए1