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राजस्थान के अजमेर में NEET परीक्षा के दौरान एक संवेदनशील मामला सामने आया है। यहाँ एक परीक्षा केंद्र पर बुर्का पहनकर पहुँची एक छात्रा को कथित तौर पर सुरक्षा जाँच के नाम पर प्रवेश से रोका गया, जिसके बाद विवाद खड़ा हो गया। छात्रा कुलसुम बानो का कहना है कि वह पहले भी इसी पहनावे में परीक्षा दे चुकी है, लेकिन इस बार उससे दुपट्टा और बुर्का हटाने को कहा गया। इस पर उसने आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि उसकी धार्मिक पहचान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, छात्रा ने कहा कि उसके लिए NEET पेपर से ज़्यादा उसकी पहचान और बुर्का मायने रखता है। न्यूज़18 की रिपोर्ट के अनुसार, इस विवाद के बाद छात्रा ने परीक्षा देने से इनकार कर दिया और अपना पेपर छोड़ दिया। घटना के बाद परीक्षा केंद्र के बाहर कुछ देर तक हंगामे की स्थिति भी बनी रही। फिलहाल, इस मामले को लेकर बहस तेज हो गई है।

1 hr ago
user_Md Mursaleen
Md Mursaleen
दिघलबैंक, किशनगंज, बिहार•
1 hr ago
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राजस्थान के अजमेर में NEET परीक्षा के दौरान एक संवेदनशील मामला सामने आया है। यहाँ एक परीक्षा केंद्र पर बुर्का पहनकर पहुँची एक छात्रा को कथित तौर पर सुरक्षा जाँच के नाम पर प्रवेश से रोका गया, जिसके बाद विवाद खड़ा हो गया। छात्रा कुलसुम बानो का कहना है कि वह पहले भी इसी पहनावे में परीक्षा दे चुकी है, लेकिन इस बार उससे दुपट्टा और बुर्का हटाने को कहा गया। इस पर उसने आपत्ति जताई और आरोप लगाया कि उसकी धार्मिक पहचान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, छात्रा ने कहा कि उसके लिए NEET पेपर से ज़्यादा उसकी पहचान और बुर्का मायने रखता है। न्यूज़18 की रिपोर्ट के अनुसार, इस विवाद के बाद छात्रा ने परीक्षा देने से इनकार कर दिया और अपना पेपर छोड़ दिया। घटना के बाद परीक्षा केंद्र के बाहर कुछ देर तक हंगामे की स्थिति भी बनी रही। फिलहाल, इस मामले को लेकर बहस तेज हो गई है।

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  • RealNewsRN द्वारा प्रकाशित खबर का प्रभाव मात्र 48 घंटों के भीतर देखने को मिला है। इस खबर के बाद फुलवरिया ब्रिज का एप्रोच मार्ग पूरी तरह से दुरुस्त कर दिया गया, जिससे क्षेत्र के लोगों को बड़ी राहत मिली है।
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    RealNewsRN द्वारा प्रकाशित खबर का प्रभाव मात्र 48 घंटों के भीतर देखने को मिला है। इस खबर के बाद फुलवरिया ब्रिज का एप्रोच मार्ग पूरी तरह से दुरुस्त कर दिया गया, जिससे क्षेत्र के लोगों को बड़ी राहत मिली है।
    user_Manzar AlamRN
    Manzar AlamRN
    तेरहागछ, किशनगंज, बिहार•
    19 hrs ago
  • किशनगंज जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड अंतर्गत चिल्हनियां पंचायत के वार्ड संख्या-9 स्थित मुस्लिम टोला गांव दशकों बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। यहां गांव तक जाने वाली कच्ची सड़क की हालत बेहद खराब है, जो बरसात के मौसम में पूरी तरह जलमग्न हो जाती है, जिससे ग्रामीणों का आवागमन ठप पड़ जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष समस्या उठाने के बावजूद अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है, जिसके चलते गांव एक टापू में तब्दील हो जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, मुस्लिम टोला गांव पूर्वी एवं दक्षिणी दिशा में गोरिया नदी तथा पश्चिमी दिशा में रेतुआ नदी से घिरा हुआ है, जिसके कारण बरसात में यह चारों ओर से पानी से घिर जाता है। मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए लोगों को पानी और कीचड़ भरे रास्तों से गुजरना पड़ता है, जिससे बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और मरीजों को अत्यधिक परेशानी होती है। पिछले साल, सड़क की बदहाल स्थिति और जलजमाव के कारण गांव के निवासी हकमो उद्दीन को समय पर वाहन नहीं मिल सका। ग्रामीणों ने चारपाई के सहारे करीब डेढ़ किलोमीटर पानी और कीचड़ भरे रास्ते से उन्हें मुख्य सड़क तक पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, टेढ़ागाछ ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने गांव में सड़क और पुल की आवश्यकता को और भी गंभीर रूप से उजागर कर दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि खराब सड़क और आवागमन की समस्या गांव के सामाजिक जीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रही है, जिससे लोग शादी-ब्याह और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों के लिए इस गांव में आने से कतराते हैं, और कई परिवारों को बच्चों के विवाह संबंध स्थापित करने में कठिनाई हो रही है। ग्रामीणों, जिनमें बादल आलम, इस्लामुद्दीन, नईम अख्तर, राहिल आलम, असलम आलम, हकीमुद्दीन, शिवकुमार मंडल, शंकर मंडल, अनवर आलम, नईम आलम, दिलशाद आलम, अबू नसर, अरशद आलम, नासिर आलम, शाहनवाज आलम, साहिल आलम, तबरेज आलम, फिरोज आलम, मुख्तार आलम, राशिद आलम और मजेबुल आलम शामिल हैं, ने कई बार सांसद, विधायक और जिला प्रशासन को आवेदन देकर समस्या के समाधान की मांग की है, लेकिन उनकी मांगों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है। ग्रामीणों ने जिला पदाधिकारी से तत्काल पक्की सड़क और गोरिया नदी पर आरसीसी पुल के निर्माण की मांग की है। उनका मानना है कि सड़क और पुल बनने से न केवल आवागमन सुगम होगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक विकास के नए अवसर भी खुलेंगे। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया गया, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे। उन्हें उम्मीद है कि जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि उनकी वर्षों पुरानी पीड़ा को समझते हुए जल्द ही ठोस कदम उठाएंगे, ताकि मुस्लिम टोला के लोग भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकें।
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    किशनगंज जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड अंतर्गत चिल्हनियां पंचायत के वार्ड संख्या-9 स्थित मुस्लिम टोला गांव दशकों बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। यहां गांव तक जाने वाली कच्ची सड़क की हालत बेहद खराब है, जो बरसात के मौसम में पूरी तरह जलमग्न हो जाती है, जिससे ग्रामीणों का आवागमन ठप पड़ जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष समस्या उठाने के बावजूद अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है, जिसके चलते गांव एक टापू में तब्दील हो जाता है।

ग्रामीणों के अनुसार, मुस्लिम टोला गांव पूर्वी एवं दक्षिणी दिशा में गोरिया नदी तथा पश्चिमी दिशा में रेतुआ नदी से घिरा हुआ है, जिसके कारण बरसात में यह चारों ओर से पानी से घिर जाता है। मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए लोगों को पानी और कीचड़ भरे रास्तों से गुजरना पड़ता है, जिससे बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और मरीजों को अत्यधिक परेशानी होती है। पिछले साल, सड़क की बदहाल स्थिति और जलजमाव के कारण गांव के निवासी हकमो उद्दीन को समय पर वाहन नहीं मिल सका। ग्रामीणों ने चारपाई के सहारे करीब डेढ़ किलोमीटर पानी और कीचड़ भरे रास्ते से उन्हें मुख्य सड़क तक पहुँचाने की कोशिश की, लेकिन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, टेढ़ागाछ ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने गांव में सड़क और पुल की आवश्यकता को और भी गंभीर रूप से उजागर कर दिया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि खराब सड़क और आवागमन की समस्या गांव के सामाजिक जीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल रही है, जिससे लोग शादी-ब्याह और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों के लिए इस गांव में आने से कतराते हैं, और कई परिवारों को बच्चों के विवाह संबंध स्थापित करने में कठिनाई हो रही है। ग्रामीणों, जिनमें बादल आलम, इस्लामुद्दीन, नईम अख्तर, राहिल आलम, असलम आलम, हकीमुद्दीन, शिवकुमार मंडल, शंकर मंडल, अनवर आलम, नईम आलम, दिलशाद आलम, अबू नसर, अरशद आलम, नासिर आलम, शाहनवाज आलम, साहिल आलम, तबरेज आलम, फिरोज आलम, मुख्तार आलम, राशिद आलम और मजेबुल आलम शामिल हैं, ने कई बार सांसद, विधायक और जिला प्रशासन को आवेदन देकर समस्या के समाधान की मांग की है, लेकिन उनकी मांगों पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है।

ग्रामीणों ने जिला पदाधिकारी से तत्काल पक्की सड़क और गोरिया नदी पर आरसीसी पुल के निर्माण की मांग की है। उनका मानना है कि सड़क और पुल बनने से न केवल आवागमन सुगम होगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक विकास के नए अवसर भी खुलेंगे। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया गया, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे। उन्हें उम्मीद है कि जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि उनकी वर्षों पुरानी पीड़ा को समझते हुए जल्द ही ठोस कदम उठाएंगे, ताकि मुस्लिम टोला के लोग भी विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकें।
    user_Vijay Kumar  press repoter
    Vijay Kumar press repoter
    तेरहागछ, किशनगंज, बिहार•
    20 hrs ago
  • देश के विभिन्न हिस्सों में मस्जिदों, मदरसों और इस्लामी पहचान के प्रतीकों को निशाना बनाए जाने तथा धार्मिक संस्थानों पर तरह-तरह के दबाव डाले जाने के मौजूदा माहौल में, कुछ मदरसों, उलेमा और दीनदार संस्थाओं का योग के नाम पर सबसे आगे खड़ा दिखाई देना 'अत्यंत दुःखद और चिंताजनक' बताया गया है। आफ़ताब अज़हर सिद्दीकी नामक लेखक ने इस व्यवहार को धार्मिक पहचान और आस्था के सिद्धांतों से समझौता माना है। लेखक के अनुसार, भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता है; ठीक उसी तरह जैसे कोई मुसलमान गैर-मुस्लिम को नमाज़ पढ़ने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, वैसे ही किसी मुसलमान को भी योग या ऐसे किसी कार्य में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिसमें अपने धार्मिक और आस्थागत पहलू मौजूद हों। ऐसे में, यदि कोई अपनी इच्छा से योग में भाग लेता है तो वह भिन्न है, लेकिन यह सवाल उठाया गया है कि आखिर कुछ धार्मिक संस्थानों के ज़िम्मेदारों को ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गई कि वे योग के विभिन्न आसनों में अपनी तस्वीरें खिंचवाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करें। यह कार्रवाई सरकारी कृपा प्राप्त करने, भय की मनोवृत्ति का परिणाम या फिर कुछ अस्थायी लाभों के लिए धार्मिक गरिमा को दाँव पर लगाने का प्रयास हो सकती है। यह और भी दुःखद है कि वही लोग, जो मस्जिद में रुकू और सज्दे को अल्लाह की बंदगी का प्रतीक बताते हैं, वे योग की उन गतिविधियों में भाग लेते दिखाई देते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में गैर-इस्लामी धार्मिक अवधारणाएँ मौजूद हैं। यह स्थिति आम मुसलमानों के भीतर गहरी बेचैनी पैदा करती है और सांस्कृतिक तथा वैचारिक कमज़ोरी की एक खतरनाक नींव रखती है। उलेमा, इमामों और मदरसों के ज़िम्मेदारों को स्मरण कराया गया है कि वे उम्मत की अमानत के संरक्षक हैं और उनका प्रत्येक कदम जनता के लिए एक आदर्श बनता है। चेतावनी दी गई है कि यदि धार्मिक नेतृत्व ही सांस्कृतिक और वैचारिक समझौते का मार्ग अपनाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों के ईमान, पहचान और इस्लामी आत्मसम्मान को गंभीर क्षति पहुँच सकती है। किशनगंज, बिहार से आफ़ताब अज़हर सिद्दीकी ने मांग की है कि समुदाय के ज़िम्मेदार और निर्णयकारी लोग इस मुद्दे का गंभीरता से मूल्यांकन करें तथा धार्मिक संस्थानों को उनकी मूल जिम्मेदारियों की ओर पुनः केंद्रित करें। अन्यथा, इस तरह की लापरवाही भविष्य में ऐसे परिणाम उत्पन्न कर सकती है जिनकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
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    देश के विभिन्न हिस्सों में मस्जिदों, मदरसों और इस्लामी पहचान के प्रतीकों को निशाना बनाए जाने तथा धार्मिक संस्थानों पर तरह-तरह के दबाव डाले जाने के मौजूदा माहौल में, कुछ मदरसों, उलेमा और दीनदार संस्थाओं का योग के नाम पर सबसे आगे खड़ा दिखाई देना 'अत्यंत दुःखद और चिंताजनक' बताया गया है। आफ़ताब अज़हर सिद्दीकी नामक लेखक ने इस व्यवहार को धार्मिक पहचान और आस्था के सिद्धांतों से समझौता माना है।

लेखक के अनुसार, भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता है; ठीक उसी तरह जैसे कोई मुसलमान गैर-मुस्लिम को नमाज़ पढ़ने के लिए बाध्य नहीं कर सकता, वैसे ही किसी मुसलमान को भी योग या ऐसे किसी कार्य में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिसमें अपने धार्मिक और आस्थागत पहलू मौजूद हों। ऐसे में, यदि कोई अपनी इच्छा से योग में भाग लेता है तो वह भिन्न है, लेकिन यह सवाल उठाया गया है कि आखिर कुछ धार्मिक संस्थानों के ज़िम्मेदारों को ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गई कि वे योग के विभिन्न आसनों में अपनी तस्वीरें खिंचवाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करें। यह कार्रवाई सरकारी कृपा प्राप्त करने, भय की मनोवृत्ति का परिणाम या फिर कुछ अस्थायी लाभों के लिए धार्मिक गरिमा को दाँव पर लगाने का प्रयास हो सकती है।

यह और भी दुःखद है कि वही लोग, जो मस्जिद में रुकू और सज्दे को अल्लाह की बंदगी का प्रतीक बताते हैं, वे योग की उन गतिविधियों में भाग लेते दिखाई देते हैं जिनकी पृष्ठभूमि में गैर-इस्लामी धार्मिक अवधारणाएँ मौजूद हैं। यह स्थिति आम मुसलमानों के भीतर गहरी बेचैनी पैदा करती है और सांस्कृतिक तथा वैचारिक कमज़ोरी की एक खतरनाक नींव रखती है। उलेमा, इमामों और मदरसों के ज़िम्मेदारों को स्मरण कराया गया है कि वे उम्मत की अमानत के संरक्षक हैं और उनका प्रत्येक कदम जनता के लिए एक आदर्श बनता है। चेतावनी दी गई है कि यदि धार्मिक नेतृत्व ही सांस्कृतिक और वैचारिक समझौते का मार्ग अपनाएगा, तो आने वाली पीढ़ियों के ईमान, पहचान और इस्लामी आत्मसम्मान को गंभीर क्षति पहुँच सकती है।

किशनगंज, बिहार से आफ़ताब अज़हर सिद्दीकी ने मांग की है कि समुदाय के ज़िम्मेदार और निर्णयकारी लोग इस मुद्दे का गंभीरता से मूल्यांकन करें तथा धार्मिक संस्थानों को उनकी मूल जिम्मेदारियों की ओर पुनः केंद्रित करें। अन्यथा, इस तरह की लापरवाही भविष्य में ऐसे परिणाम उत्पन्न कर सकती है जिनकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
    user_Zafar Rabbani
    Zafar Rabbani
    पोठिया, किशनगंज, बिहार•
    49 min ago
  • अररिया जिले के जोकी विधायक मुरशिद आलम ने टेढ़ागाछ प्रखंड क्षेत्र के अंतर्गत गमहरिया में स्थित एक महिला मदरसा का दौरा किया।
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    अररिया जिले के जोकी विधायक मुरशिद आलम ने टेढ़ागाछ प्रखंड क्षेत्र के अंतर्गत गमहरिया में स्थित एक महिला मदरसा का दौरा किया।
    user_Poin bihar
    Poin bihar
    News Anchor Kishanganj, Bihar•
    18 hrs ago
  • पुलिसकर्मियों ने भरत तिवारी के आत्मसमर्पण करने के बाद उन पर पाँच-पाँच गोलियाँ दाग दीं। इस कार्रवाई पर तीखे सवाल उठाते हुए पूछा जा रहा है कि आखिर यह कहाँ का न्याय है।
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    पुलिसकर्मियों ने भरत तिवारी के आत्मसमर्पण करने के बाद उन पर पाँच-पाँच गोलियाँ दाग दीं। इस कार्रवाई पर तीखे सवाल उठाते हुए पूछा जा रहा है कि आखिर यह कहाँ का न्याय है।
    user_Kalam Khan media
    Kalam Khan media
    Electronic Store Kursakanta, Araria•
    1 hr ago
  • बिहार में मौजूदा 'विकास' की स्थिति को लेकर गहरा असंतोष और निराशा व्यक्त की गई है, जहाँ इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि वर्तमान हालात प्राचीन मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यताओं की तुलना में भी बदतर हैं। पोस्ट में बिहार की दयनीय और खराब स्थिति पर अत्यधिक दुख और चिंता जाहिर की गई है।
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    बिहार में मौजूदा 'विकास' की स्थिति को लेकर गहरा असंतोष और निराशा व्यक्त की गई है, जहाँ इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि वर्तमान हालात प्राचीन मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यताओं की तुलना में भी बदतर हैं। पोस्ट में बिहार की दयनीय और खराब स्थिति पर अत्यधिक दुख और चिंता जाहिर की गई है।
    user_Luck ashish
    Luck ashish
    Araria, Bihar•
    2 hrs ago
  • #moharram #sahebganj #jharni #facbook #trending #viral Mdtanjil Khan Md Tanjil #moharram #sahebganj #jharni #facbook #trending #viral Mdtanjil Khan Md Tanjil
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    #moharram #sahebganj #jharni #facbook #trending #viral Mdtanjil Khan Md Tanjil
#moharram #sahebganj #jharni #facbook #trending #viral Mdtanjil Khan Md Tanjil
    user_Md Tanjil
    Md Tanjil
    Video Creator कुरसाकट्टा, अररिया, बिहार•
    2 hrs ago
  • भरत तिवारी की पत्नी ने एक नेता जी से सीधे तौर पर सवाल किया है, जिसमें उन्होंने पूछा कि क्या भरत तिवारी कोई गुंडा थे, जिसके चलते उनका एनकाउंटर किया गया। इस सवाल के माध्यम से उन्होंने भरत तिवारी के एनकाउंटर पर गहरा संदेह और रोष व्यक्त किया।
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    भरत तिवारी की पत्नी ने एक नेता जी से सीधे तौर पर सवाल किया है, जिसमें उन्होंने पूछा कि क्या भरत तिवारी कोई गुंडा थे, जिसके चलते उनका एनकाउंटर किया गया। इस सवाल के माध्यम से उन्होंने भरत तिवारी के एनकाउंटर पर गहरा संदेह और रोष व्यक्त किया।
    user_Niraj Kumar
    Niraj Kumar
    News Anchor Araria, Bihar•
    3 hrs ago
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