तेज आवाज़ बनी खतरा! 55 डेसिबल से ऊपर दिन में और 45 से ज्यादा रात में शोर से पक्षियों का जीवन संकट में श्रीगंगानगर। शहर में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण अब सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पक्षियों के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। सत्यम नगर स्थित ‘गौरैया हाउस’ की संचालिका सोना सिंगारटिया ने प्रेस वार्ता में खुलासा किया कि तय मानकों से ज्यादा शोर पक्षियों के लिए बेहद हानिकारक साबित हो रहा है। उन्होंने बताया कि ध्वनि प्रदूषण नियम 2000 के अनुसार दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल तक की आवाज़ ही सामान्य मानी जाती है। इससे अधिक शोर इंसानों के साथ-साथ पक्षियों को भी असहज कर देता है, लेकिन जागरूकता की कमी के चलते लोग इन नियमों को नजरअंदाज कर रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि सत्यम नगर में करीब 12 परिवार ऐसे हैं जो जानबूझकर तेज म्यूजिक बजाते हैं और पटाखे फोड़ते हैं, ताकि आसपास रह रहे पक्षी वहां से पलायन कर जाएं। इस तरह की गतिविधियों से न सिर्फ पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, बल्कि गौरैया जैसे छोटे पक्षियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ रहा है। सोना सिंगारटिया ने बताया कि शहरीकरण और पक्के मकानों के बढ़ते चलन के कारण पहले ही गौरैया पक्षी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है, और अब शोर प्रदूषण ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से सख्त कदम उठाने की मांग करते हुए कहा कि लोगों में जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि सरकार की ओर से गौरैया संरक्षण के प्रयास जारी हैं और हाल ही में वन विभाग द्वारा श्रीगंगानगर जिले के लिए वन्यजीव प्रतिपालक की नियुक्ति भी की गई है, जिससे उम्मीद है कि पक्षियों के संरक्षण को नई दिशा मिलेगी। संदेश साफ है - अगर अब भी शोर पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में ही गौरैया को देख पाएंगी।
तेज आवाज़ बनी खतरा! 55 डेसिबल से ऊपर दिन में और 45 से ज्यादा रात में शोर से पक्षियों का जीवन संकट में श्रीगंगानगर। शहर में बढ़ता ध्वनि प्रदूषण अब सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि पक्षियों के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। सत्यम नगर स्थित ‘गौरैया हाउस’ की संचालिका सोना सिंगारटिया ने प्रेस वार्ता में खुलासा किया कि तय मानकों से ज्यादा शोर पक्षियों के लिए बेहद हानिकारक साबित हो रहा है। उन्होंने बताया कि ध्वनि
प्रदूषण नियम 2000 के अनुसार दिन में 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल तक की आवाज़ ही सामान्य मानी जाती है। इससे अधिक शोर इंसानों के साथ-साथ पक्षियों को भी असहज कर देता है, लेकिन जागरूकता की कमी के चलते लोग इन नियमों को नजरअंदाज कर रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि सत्यम नगर में करीब 12 परिवार ऐसे हैं जो जानबूझकर तेज म्यूजिक बजाते हैं और पटाखे फोड़ते हैं, ताकि आसपास रह रहे पक्षी
वहां से पलायन कर जाएं। इस तरह की गतिविधियों से न सिर्फ पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, बल्कि गौरैया जैसे छोटे पक्षियों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ रहा है। सोना सिंगारटिया ने बताया कि शहरीकरण और पक्के मकानों के बढ़ते चलन के कारण पहले ही गौरैया पक्षी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है, और अब शोर प्रदूषण ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से सख्त कदम उठाने की मांग करते हुए कहा
कि लोगों में जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि सरकार की ओर से गौरैया संरक्षण के प्रयास जारी हैं और हाल ही में वन विभाग द्वारा श्रीगंगानगर जिले के लिए वन्यजीव प्रतिपालक की नियुक्ति भी की गई है, जिससे उम्मीद है कि पक्षियों के संरक्षण को नई दिशा मिलेगी। संदेश साफ है - अगर अब भी शोर पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में ही गौरैया को देख पाएंगी।
- बाबा दिवाली नाथ जी द्वारा मुकाबला श्रीगंगानगर जिले के अंदर 41 दिवसीय 11 दूनी तपस्याकर रहे हैं1
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