"जब कलम विज्ञापन खरीदने और बेचने का जरिया बन जाए, तो वह पत्रकारिता नहीं, विशुद्ध व्यापार है।" अजीत मिश्रा (खोजी) विशेष लेख: कलम के सौदागरों के बीच सिसकती पत्रकारिता - क्या बस्ती के 'हरैया' में भी बिक गया पत्रकारों का ज़मीर? ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश "कलम की धार कुंद, 'जी हुज़ूरी' बुलंद: क्या हरैया के पत्रकारों ने अपना ज़मीर गिरवी रख दिया है?" "विज्ञापन के 'गिद्ध' और खबरों के 'कातिल': हरैया में सिसकती पत्रकारिता की मरण-गाथा।" "अब अखबार में खबरें नहीं, 'मैनेजमेंट' छपता है: हरैया के पत्रकारों की नई दुकान का उद्घाटन!" "चौकी इंचार्ज की जेब में कलम और नेताओं के जूतों में पत्रकार: बस्ती मंडल की नई तस्वीर!" "खबरों का 'महाकाल' टी सेंटर: जहाँ चाय की चुस्की के साथ दबा दिए जाते हैं बड़े-बड़े कांड।" "पत्रकारिता के नाम पर 'वसूली' का नया ब्रांड: हरैया के वीरों को हमारा सलाम!" "शर्म मगर इन्हें नहीं आती: जब जनता पीटे तो समझना कि पत्रकार अब 'दलाल' बन चुका है।" बस्ती। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज अपनी ही बुनियाद पर खड़ा होने से कतरा रहा है। उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में पत्रकारिता की जो तस्वीर उभर रही है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि शर्मसार करने वाली भी है। हाल ही में 'कुदरहा' के पत्रकारों की कार्यशैली पर उठे सवालों की गूँज अभी थमी भी नहीं थी कि अब 'हैरैया' क्षेत्र के पत्रकारों की चुप्पी ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या हैरैया के पत्रकारों का भी ज़मीर मर चुका है? जनता का भरोसा टूटा, जश्न मनाती है भीड़ आज स्थिति यह है कि जब किसी पत्रकार के साथ अभद्रता होती है या उसकी पिटाई होती है, तो समाज सहानुभूति दिखाने के बजाय मन ही मन खुशी मनाता है। लोग कहते हैं— "अच्छा हुआ, यह इसी लायक था।" यह विडंबना मीडिया जगत के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। जब जनता पत्रकार, पुलिस और भ्रष्ट नेताओं में फर्क करना बंद कर दे, तो समझ लीजिए कि कलम की धार को स्वार्थ की जंग लग चुकी है। कुदरहा से हरैया तक: खामोशी का सौदा? मुद्दों से भटका ध्यान: गैस सिलेंडर और चाय की चुस्की हरैया के पत्रकारों को न तो 100 बेड वाले सीएचसी (CHCH) अस्पताल में हो रही लूटपाट दिखाई देती है और न ही आम जनता को सताती घरेलू गैस की समस्या। सवाल उठता है कि क्या इन पत्रकारों की प्राथमिकता अब केवल विज्ञापन बटोरना और नेताओं की जीहुजूरी करना रह गई है? "जब कलम विज्ञापन खरीदने और बेचने का जरिया बन जाए, तो वह पत्रकारिता नहीं, विशुद्ध व्यापार है।" उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में पत्रकारिता की पवित्रता पर काले बादल मँडरा रहे हैं। हाल ही में कुदरहा के पत्रकारों की कार्यशैली पर उठे सवालों ने अभी जनता के गुस्से को शांत भी नहीं होने दिया था कि अब 'हैरैया' क्षेत्र से आ रही खबरें पत्रकारिता के ताबूत में आखिरी कील ठोकती नजर आ रही हैं। सवाल सीधा है और बेहद तीखा है— क्या कुदरहा की तर्ज पर हैरैया के पत्रकारों का भी 'ज़मीर' मर चुका है? १. जनता की अदालत में 'चौथा स्तंभ' अपराधी की तरह खड़ा है कहना गलत नहीं होगा कि आज जनता नेताओं और अधिकारियों से ज्यादा पत्रकारों के चरित्र की समीक्षा कर रही है। जब से मोबाइल हाथ में आने से हर व्यक्ति पत्रकार बन बैठा है, तब से असली और नकली का फर्क मिट गया है। लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जो लोग खुद को 'महारथी' कहते हैं, उनकी कलई खुल चुकी है। आज जब किसी पत्रकार के साथ मारपीट होती है, तो समाज उसे 'लोकतंत्र पर हमला' नहीं मानता, बल्कि लोग तालियाँ बजाकर कहते हैं— "अच्छा हुआ, बहुत लूट मचा रखी थी।" यह समाज की नफरत नहीं, बल्कि मीडिया के प्रति उपजे उस आक्रोश का नतीजा है जहाँ पत्रकारों ने जनहित को छोड़कर 'जेब-हित' को प्राथमिकता दी है। २. 'कुदरहा' का वायरल सच और 'हरैया' की रहस्यमयी चुप्पी कुदरहा में एक चौकी इंचार्ज के निलंबन की खबर को जिस तरह तीन दिनों तक दबाकर रखा गया, उसने स्पष्ट कर दिया कि वहाँ की मीडिया 'मैनेज' हो चुकी थी। लेकिन हैरैया की कहानी तो और भी शर्मनाक है। आशनाई और हत्या पर मौन: हरैया क्षेत्र में एक युवक की हत्या का आरोप सीधे तौर पर रवि गुप्त और मृतक की पत्नी पर लगता है। मृतक का भाई न्याय की गुहार लगाते हुए तहरीर देता है, लेकिन क्षेत्र के 'शूरवीर' पत्रकारों की कलम को लकवा मार जाता है। दलाली का नया केंद्र: चर्चा है कि 'महाकाल टी सेंटर' जैसे ठिकाने अब खबरों के नहीं, बल्कि सौदेबाजी के केंद्र बन गए हैं। सवाल उठता है कि क्या एक चाय की दुकान इतनी ताकतवर हो गई है कि वह हैरैया के धुरंधर पत्रकारों का मुँह बंद कर सके? ३. मुद्दों की मौत: अस्पताल की लूट और गैस की कालाबाजारी हरैया के पत्रकारों को यह नहीं दिखता कि 100 बेड वाले सीएचसी (CHCH) अस्पताल में गरीब जनता को किस तरह लूटा जा रहा है। उन्हें घरेलू गैस की किल्लत और उसके पीछे चल रहा काला धंधा नजर नहीं आता। क्यों? क्योंकि इन मुद्दों को उठाने से 'लिफाफा' नहीं मिलता। "जब पत्रकार की प्राथमिकता 'जनता की आवाज' बनने के बजाय 'नेताओं की जीहुजूरी' करना हो जाए, तो समझ लीजिए कि कलम अब चाटुकारिता का औजार बन चुकी है।" ४. विज्ञापन का काला खेल: खबर नहीं, अब धंधा है आज का पत्रकार खबर नहीं खोजता, वह ऐसे शिकार खोजता है जिससे विज्ञापन वसूला जा सके। अखबार के कार्यालय खुलने का क्या फायदा, जब वहाँ बैठने वाले लोग पत्रकार के चोले में 'वसूली भाई' बन चुके हों? विज्ञापन को अधिकार तक सीमित रखने के बजाय इसे 'कारोबार' बना दिया गया है। जब पत्रकार खुद विज्ञापन खरीदेगा और बेचेगा, तो वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने की हिम्मत खो देगा। ५. आत्ममंथन का समय: क्या अभी भी कुछ बाकी है? यह लेख हरैया के उन चुनिंदा पत्रकारों के लिए नहीं है जो आज भी जेल जाने का जोखिम उठाकर सच लिखते हैं। बल्कि यह प्रहार उन 'कलम के सौदागरों' पर है जिन्होंने चंद रुपयों, लीटी-चोखा और शराब की बोतलों के लिए अपनी आत्मा बेच दी है। अतीत का गौरव बनाम वर्तमान की कालिख एक समय था जब हरैया क्षेत्र के पत्रकारों की धमक से भ्रष्ट अधिकारी और नशे के तस्कर कांपते थे। आज वही हैरैया अपनी पहचान खो रहा है। कुछ मुट्ठी भर पत्रकार अब भी ईमानदारी की जंग लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज 'महासभा' और 'लिफाफा संस्कृति' के शोर में दबती जा रही है। सुधरने का आखिरी मौका अगर आज भी मीडिया जगत ने अपनी छवि को सुधारने पर जोर नहीं दिया, तो वह दिन दूर नहीं जब 'अखबार बेचने वाले' और 'सब्जी बेचने वाले' में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। विज्ञापन को अधिकार तक सीमित रखें, उसे अपना व्यापार न बनाएं। हैरैया और कुदरहा के पत्रकारों को यह समझना होगा कि उनकी कलम किसी की जागीर नहीं, बल्कि जनता की अमानत है। हरैया और कुदरहा के पत्रकारों को यह समझना होगा कि जनता सब देख रही है। अगर आज आपने अपनी साख नहीं बचाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ आपको पत्रकार नहीं, बल्कि 'खबरों का दलाल' कहकर पुकारेंगी। सुधार की गुंजाइश अभी भी है, बशर्ते आपकी कलम नेताओं की चौखट पर सजदा करना छोड़ दे। सम्पादकीय टिप्पणी: बस्ती मंडल की पत्रकारिता को फिर से जीवित करने के लिए इन 'दीमकों' को पहचानना और समाज से बहिष्कृत करना अनिवार्य हो गया है। कलम की धार को फिर से तेज कीजिए, वरना इतिहास आपको माफ नहीं करेगा। सावधान! अगर ज़मीर मर गया है, तो याद रखिए, इतिहास की स्याही बहुत क्रूर होती है।
"जब कलम विज्ञापन खरीदने और बेचने का जरिया बन जाए, तो वह पत्रकारिता नहीं, विशुद्ध व्यापार है।" अजीत मिश्रा (खोजी) विशेष लेख: कलम के सौदागरों के बीच सिसकती पत्रकारिता - क्या बस्ती के 'हरैया' में भी बिक गया पत्रकारों का ज़मीर? ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश "कलम की धार कुंद, 'जी हुज़ूरी' बुलंद: क्या हरैया के पत्रकारों ने अपना ज़मीर गिरवी रख दिया है?" "विज्ञापन के 'गिद्ध' और खबरों के 'कातिल': हरैया में सिसकती पत्रकारिता की मरण-गाथा।" "अब अखबार में खबरें नहीं, 'मैनेजमेंट' छपता है: हरैया के पत्रकारों की नई दुकान का उद्घाटन!" "चौकी इंचार्ज की जेब में कलम और नेताओं के जूतों में पत्रकार: बस्ती मंडल की नई तस्वीर!" "खबरों का 'महाकाल' टी सेंटर: जहाँ चाय की चुस्की के साथ दबा दिए जाते हैं बड़े-बड़े कांड।" "पत्रकारिता के नाम पर 'वसूली' का नया ब्रांड: हरैया के वीरों को हमारा सलाम!" "शर्म मगर इन्हें नहीं आती: जब जनता पीटे तो समझना कि पत्रकार अब 'दलाल' बन चुका है।" बस्ती। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज अपनी ही बुनियाद पर खड़ा होने से कतरा रहा है। उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में पत्रकारिता की जो तस्वीर उभर रही है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि शर्मसार करने वाली भी है। हाल ही में 'कुदरहा' के पत्रकारों की कार्यशैली पर उठे सवालों की गूँज अभी थमी भी नहीं थी कि अब 'हैरैया' क्षेत्र के पत्रकारों की चुप्पी ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या हैरैया के पत्रकारों का भी ज़मीर मर चुका है? जनता का भरोसा टूटा, जश्न मनाती है भीड़ आज स्थिति यह है कि जब किसी पत्रकार के साथ अभद्रता होती है या उसकी पिटाई होती है, तो समाज सहानुभूति दिखाने के बजाय मन ही मन खुशी मनाता है। लोग कहते हैं— "अच्छा हुआ, यह इसी लायक था।" यह विडंबना मीडिया जगत के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है। जब जनता पत्रकार, पुलिस और भ्रष्ट नेताओं में फर्क करना बंद कर दे, तो समझ लीजिए कि कलम की धार को स्वार्थ की जंग लग चुकी है। कुदरहा से हरैया तक: खामोशी का सौदा? मुद्दों से भटका ध्यान: गैस सिलेंडर और चाय की चुस्की हरैया के पत्रकारों को न तो 100 बेड वाले सीएचसी (CHCH) अस्पताल में हो रही लूटपाट दिखाई देती है और न ही आम जनता को सताती घरेलू गैस की समस्या। सवाल उठता है कि क्या इन पत्रकारों की प्राथमिकता अब केवल विज्ञापन बटोरना और नेताओं की जीहुजूरी करना रह गई है? "जब कलम विज्ञापन खरीदने और बेचने का जरिया बन जाए, तो वह पत्रकारिता नहीं, विशुद्ध व्यापार है।" उत्तर प्रदेश के बस्ती मंडल में पत्रकारिता की पवित्रता पर काले बादल मँडरा रहे हैं। हाल ही में कुदरहा के पत्रकारों की कार्यशैली पर उठे सवालों ने अभी जनता के गुस्से को शांत भी नहीं होने दिया था कि अब 'हैरैया' क्षेत्र से आ रही खबरें पत्रकारिता के ताबूत में आखिरी कील ठोकती नजर आ रही हैं। सवाल सीधा है और बेहद तीखा है— क्या कुदरहा की तर्ज पर हैरैया के पत्रकारों का भी 'ज़मीर' मर चुका है? १. जनता की अदालत में 'चौथा स्तंभ' अपराधी की तरह खड़ा है कहना गलत नहीं होगा कि आज जनता नेताओं और अधिकारियों से ज्यादा पत्रकारों के चरित्र की समीक्षा कर रही है। जब से मोबाइल हाथ में आने से हर व्यक्ति पत्रकार बन बैठा है, तब से असली और नकली का फर्क मिट गया है। लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जो लोग खुद को 'महारथी' कहते हैं, उनकी कलई खुल चुकी है। आज जब किसी पत्रकार के साथ मारपीट होती है, तो समाज उसे 'लोकतंत्र पर हमला' नहीं मानता, बल्कि लोग तालियाँ बजाकर कहते हैं— "अच्छा हुआ, बहुत लूट मचा रखी थी।" यह समाज की नफरत नहीं, बल्कि मीडिया के प्रति उपजे उस आक्रोश का नतीजा है जहाँ पत्रकारों ने जनहित को छोड़कर 'जेब-हित' को प्राथमिकता दी है। २. 'कुदरहा' का वायरल सच और 'हरैया' की रहस्यमयी चुप्पी कुदरहा में एक चौकी इंचार्ज के निलंबन की खबर को जिस तरह तीन दिनों तक दबाकर रखा गया, उसने स्पष्ट कर दिया कि वहाँ की मीडिया 'मैनेज' हो चुकी थी। लेकिन हैरैया की कहानी तो और भी शर्मनाक है। आशनाई और हत्या पर मौन: हरैया क्षेत्र में एक युवक की हत्या का आरोप सीधे तौर पर रवि गुप्त और मृतक की पत्नी पर लगता है। मृतक का भाई न्याय की गुहार लगाते हुए तहरीर देता है, लेकिन क्षेत्र के 'शूरवीर' पत्रकारों की कलम को लकवा मार जाता है। दलाली का नया केंद्र: चर्चा है कि 'महाकाल टी सेंटर' जैसे ठिकाने अब खबरों के नहीं, बल्कि सौदेबाजी के केंद्र बन गए हैं। सवाल उठता है कि क्या एक चाय की दुकान इतनी ताकतवर हो गई है कि वह हैरैया के धुरंधर पत्रकारों का मुँह बंद कर सके? ३. मुद्दों की मौत: अस्पताल की लूट और गैस की कालाबाजारी हरैया के पत्रकारों को यह नहीं दिखता कि 100 बेड वाले सीएचसी (CHCH) अस्पताल में गरीब जनता को किस तरह लूटा जा रहा है। उन्हें घरेलू गैस की किल्लत और उसके पीछे चल रहा काला धंधा नजर नहीं आता। क्यों? क्योंकि इन मुद्दों को उठाने से 'लिफाफा' नहीं मिलता। "जब पत्रकार की प्राथमिकता 'जनता की आवाज' बनने के बजाय 'नेताओं की जीहुजूरी' करना हो जाए, तो समझ लीजिए कि कलम अब चाटुकारिता का औजार बन चुकी है।" ४. विज्ञापन का काला खेल: खबर नहीं, अब धंधा है आज का पत्रकार खबर नहीं खोजता, वह ऐसे शिकार खोजता है जिससे विज्ञापन वसूला जा सके। अखबार के कार्यालय खुलने का क्या फायदा, जब वहाँ बैठने वाले लोग पत्रकार के चोले में 'वसूली भाई' बन चुके हों? विज्ञापन को अधिकार तक सीमित रखने के बजाय इसे 'कारोबार' बना दिया गया है। जब पत्रकार खुद विज्ञापन खरीदेगा और बेचेगा, तो वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने की हिम्मत खो देगा। ५. आत्ममंथन का समय: क्या अभी भी कुछ बाकी है? यह लेख हरैया के उन चुनिंदा पत्रकारों के लिए नहीं है जो आज भी जेल जाने का जोखिम उठाकर सच लिखते हैं। बल्कि यह प्रहार उन 'कलम के सौदागरों' पर है जिन्होंने चंद रुपयों, लीटी-चोखा और शराब की बोतलों के लिए अपनी आत्मा बेच दी है। अतीत का गौरव बनाम वर्तमान की कालिख एक समय था जब हरैया क्षेत्र के पत्रकारों की धमक से भ्रष्ट अधिकारी और नशे के तस्कर कांपते थे। आज वही हैरैया अपनी पहचान खो रहा है। कुछ मुट्ठी भर पत्रकार अब भी ईमानदारी की जंग लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज 'महासभा' और 'लिफाफा संस्कृति' के शोर में दबती जा रही है। सुधरने का आखिरी मौका अगर आज भी मीडिया जगत ने अपनी छवि को सुधारने पर जोर नहीं दिया, तो वह दिन दूर नहीं जब 'अखबार बेचने वाले' और 'सब्जी बेचने वाले' में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। विज्ञापन को अधिकार तक सीमित रखें, उसे अपना व्यापार न बनाएं। हैरैया और कुदरहा के पत्रकारों को यह समझना होगा कि उनकी कलम किसी की जागीर नहीं, बल्कि जनता की अमानत है। हरैया और कुदरहा के पत्रकारों को यह समझना होगा कि जनता सब देख रही है। अगर आज आपने अपनी साख नहीं बचाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ आपको पत्रकार नहीं, बल्कि 'खबरों का दलाल' कहकर पुकारेंगी। सुधार की गुंजाइश अभी भी है, बशर्ते आपकी कलम नेताओं की चौखट पर सजदा करना छोड़ दे। सम्पादकीय टिप्पणी: बस्ती मंडल की पत्रकारिता को फिर से जीवित करने के लिए इन 'दीमकों' को पहचानना और समाज से बहिष्कृत करना अनिवार्य हो गया है। कलम की धार को फिर से तेज कीजिए, वरना इतिहास आपको माफ नहीं करेगा। सावधान! अगर ज़मीर मर गया है, तो याद रखिए, इतिहास की स्याही बहुत क्रूर होती है।
- अजीत मिश्रा (खोजी) साहब की चाय पर सक्रिय, पर 'जहरीले' पनीर पर मौन: क्या फूड विभाग का ईमान बिक चुका है? ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश) "रामा स्वीट हाउस की दबंगई: 'जो उखाड़ना है उखाड़ लो', आखिर किसका संरक्षण है मिलावटखोरों को?" "साहब की गाड़ी आती है, हिस्सा लेती है और निकल जाती है... बस्ती में फूड विभाग बना 'वसूली विभाग'!" "नकली पनीर की मंडी बना चिलमा बाजार: मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत के बाद क्या जागेगा कुंभकर्णी प्रशासन?" "बस्ती: अखिलेश यादव को चाय पिलाने वाले की जांच, लेकिन नकली सामान बेचने वालों को खुली छूट क्यों?" "रामा स्वीट हाउस की तीन दुकानों पर मिलावट का खेल, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने से मचा हड़कंप।" बस्ती। उत्तर प्रदेश का खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग (FSDA) इन दिनों अपनी कार्यशैली को लेकर कम और अपनी 'खास' सक्रियता को लेकर ज्यादा चर्चा में है। ताज़ा मामला विभाग के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। एक तरफ विभाग उस शख्स की जांच करने में पूरी ताकत झोंक देता है जिसने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को चाय पिलाई थी, वहीं दूसरी तरफ बस्ती जिले के चिलमा बाजार में खुलेआम बिक रहा 'सफेद जहर' यानी नकली पनीर विभाग को दिखाई नहीं दे रहा। दुबौलिया: 'कमीशन' के खेल में दांव पर जनता की जान दुबौलिया थाना क्षेत्र के चिलमा बाजार से लगातार नकली पनीर और मिलावटी सामान की बिक्री की खबरें आ रही हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि फूड विभाग की गाड़ी जब इलाके में आती है, तो हड़कंप मचने के बजाय एक 'सेट खेल' शुरू होता है। गाड़ी देखते ही दुकानें कुछ देर के लिए बंद होती हैं, कथित तौर पर 'हिस्सा' पहुँचता है और फिर गाड़ी रफूचक्कर हो जाती है। इसके बाद मिलावट का काला कारोबार फिर से सरपट दौड़ने लगता है। "फूड विभाग को मिलता रहे अपना हिस्सा, भाड़ में जाए जनता" — यह जुमला आज चिलमा बाजार के हर आम आदमी की जुबान पर है। रामा स्वीट हाउस: बेखौफ मिलावटखोरी और गुंडागर्दी चिलमा बाजार स्थित रामा स्वीट हाउस और इसकी संचालित तीनों शाखाएं इस समय शिकायतों के केंद्र में हैं। दबंगई का आलम: एक माह पहले जब एक जागरूक ग्राहक ने खराब सामान की शिकायत की, तो दुकानदार ने सुधार करने के बजाय धमकी दी— "जाओ जांच करा लो, जो उखाड़ना हो उखाड़ लेना।" * सोशल मीडिया पर वायरल: कल फिर एक ग्राहक को नकली पनीर थमा दिया गया। पीड़ित ने जब इसका विरोध किया और वीडियो सोशल मीडिया पर डाला, तो वह वायरल हो गया। दुकानदार की इस बेखौफी से साफ है कि उसे विभाग के 'आशीर्वाद' पर पूरा भरोसा है। पोर्टल पर पहुंची शिकायत, क्या जागेगा प्रशासन? थक-हारकर पीड़ित ग्राहक ने अब मुख्यमंत्री पोर्टल पर नकली पनीर और मिलावटी सामान की लिखित शिकायत दर्ज कराई है। अब सवाल यह उठता है कि: क्या विभाग केवल राजनीतिक रसूख वाले मामलों में ही अपनी फुर्ती दिखाएगा? क्या चिलमा बाजार के बच्चों और आम जनता की जान की कीमत विभाग के 'हिस्से' से कम है? क्या रामा स्वीट हाउस जैसे संस्थानों पर नकेल कसी जाएगी या फिर 'हिस्सा' बढ़ाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा? निष्कर्ष: जनता अब तमाशा देख रही है। अगर मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत के बाद भी चिलमा बाजार में नकली पनीर की बिक्री बंद नहीं हुई और रामा स्वीट हाउस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि बस्ती का फूड विभाग मिलावटखोरों का संरक्षक बन चुका है।1
- Post by हरिशंकर पांडेय1
- 🚨 ब्रेकिंग न्यूज़ 🚨 कोतवाली खलीलाबाद के टेमा चौराहे के पास बोलेरो में लगी भीषण आग, एक युवक गंभीर रूप से झुलसा टेमा चौराहे के पास उस समय हड़कंप मच गया जब एक डीसीएम से टक्कर के बाद चलती बोलेरो गाड़ी में अचानक भीषण आग लग गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार गाड़ी में सवार सभी लोग खलीलाबाद से बस्ती एक शादी समारोह से वापस आ रहे थे । सूत्र के अनुसार सभी बुलेरो सवार खलीलाबाद के बताए जा रहे हैं। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों की मदद से किसी तरह घायलों को बाहर निकाला गया। सभी घायलों को तत्काल एंबुलेंस की सहायता से बस्ती सदर अस्पताल भेजा गया। बताया जा रहा है कि घायलों में एक युवक मनोज की हालत बेहद गंभीर है। वह आग की चपेट में आने से बुरी तरह झुलस गया, उसके शरीर का आधा हिस्सा आग से प्रभावित हुआ है। सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड की टीम मौके पर पहुंची और कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पा लिया गया। फिलहाल घटना के कारणों का स्पष्ट पता नहीं चल पाया है, लेकिन प्रारंभिक आशंका शॉर्ट सर्किट या तकनीकी खराबी की जताई जा रही है।2
- संतकबीरनगर। पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना ने पुलिस लाइन स्थित जीर्णोद्धारित पुलिस कैंटीन का फीता काटकर उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कैंटीन का निरीक्षण कर वहां उपलब्ध सुविधाओं एवं वस्तुओं की गुणवत्ता का जायजा लिया। उद्घाटन के बाद पुलिस अधीक्षक ने कहा कि पुलिस बल की कार्यक्षमता उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। ड्यूटी की व्यस्तता के बीच कर्मियों को आवश्यक सुविधाएं सहजता से उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि यह कैंटीन पुलिस कर्मियों और उनके परिवारों के लिए उपयोगी साबित होगी। उन्होंने बताया कि कैंटीन का मुख्य उद्देश्य पुलिस कर्मियों एवं उनके परिजनों को रियायती दरों पर उच्च गुणवत्ता की दैनिक उपयोग की वस्तुएं एवं खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना है। जीर्णोद्धार के बाद कैंटीन को आधुनिक रूप दिया गया है। इसमें सामानों के बेहतर रख-रखाव के लिए रैक, बैठने की समुचित व्यवस्था तथा डिजिटल भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। पुलिस अधीक्षक ने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि कैंटीन में उपलब्ध वस्तुओं की गुणवत्ता और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि कर्मियों को बेहतर सेवाएं मिल सकें। #SantKabirNagar #PoliceNews #UPPolice #SandeepKumarMeena #PoliceCanteen #Inauguration #PublicService #PoliceWelfare #DigitalIndia #GoodGovernance #NewsUpdate #hindinewsupdate #liveuponenews2
- *थाना मेंहदावल अन्तर्गत सोनवरसा रोडवेज बस स्टैंड के पास दो पक्षों के मध्य मारपीट की घटना घटित होने व पुलिस द्वारा कृत कार्यवाही के सम्बन्ध में क्षेत्राधिकारी मेंहदावल द्वारा दी गयी जानकारी1
- पुलिस अधीक्षक संतकबीरनगर संदीप कुमार मीना द्वारा पुलिस लाइन संतकबीरनगर के परिसर में स्थित जीर्णोद्धार कराए गए पुलिस कैंटीन का फीता काटकर उद्घाटन किया गया तथा कैंटीन का निरीक्षण किया और वहां उपलब्ध सुविधाओं एवं गुणवत्ता का जायजा लिया । उद्घाटन के उपरांत पुलिस अधीक्षक ने कहा कि पुलिस बल की कार्यक्षमता उनके मानसिक और शारीरिक कल्याण पर निर्भर करती है। ड्यूटी की व्यस्तता के बीच पुलिस कर्मियों को बुनियादी सुविधाएं आसानी से मिल सकें, इसके लिए पुलिस प्रशासन सदैव प्रयासरत है । यह कैंटीन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । उद्देश्य पुलिस कर्मियों और उनके परिवारों के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए, उन्हें रियायती दरों पर उच्च गुणवत्ता वाली दैनिक उपयोगी वस्तुएं और खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना । सुविधाएं जीर्णोद्धार के पश्चात कैंटीन को आधुनिक स्वरूप दिया गया है। इसमें सामानों के रख-रखाव के लिए बेहतर रैक, बैठने की समुचित व्यवस्था और डिजिटल भुगतान की सुविधा सुनिश्चित की गई है । गुणवत्ता पर जोर उद्घाटन के दौरान पुलिस अधीक्षक ने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि कैंटीन में सामानों की शुद्धता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाए ।4
- Post by Vipin Rai Journalist1
- अजीत मिश्रा (खोजी) ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश) शांति इंडियन गैस की गुंडागर्दी: हर्रैया में गैस की कालाबाजारी चरम पर, आपूर्ति विभाग ने साधी रहस्यमयी चुप्पी "महाभ्रष्टाचार! हर्रैया में गैस सिलेंडरों की लूट: जेब गर्म कर सो रहे जिम्मेदार, मायूस होकर घर लौट रही जनता।" "गैस माफिया और अधिकारियों का नापाक गठजोड़: शांति गैस एजेंसी बनी कालाबाजारी का अड्डा!" "बस्ती में 'हवा' हुई योगी सरकार की सख्ती: आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा शांति गैस की कालाबाजारी का साम्राज्य?" बस्ती। जनपद के हर्रैया स्थित 'शांति इंडियन गैस' एजेंसी इन दिनों उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि गैस सिलेंडरों की खुलेआम कालाबाजारी के लिए चर्चा में है। शासन के कड़े निर्देशों के बावजूद, हर्रैया शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक गैस की रीफिलिंग और ऊंचे दामों पर बिक्री का काला खेल धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे खेल से अनजान बने हुए हैं, जिससे उपभोक्ताओं में भारी आक्रोश व्याप्त है। सुविधा शुल्क के प्रभाव में मूकदर्शक बने अधिकारी? क्षेत्र में चर्चा है कि आपूर्ति कार्यालय की इस चुप्पी के पीछे 'जेब गर्म' होने का बड़ा खेल है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? अधिकारियों के बड़े-बड़े दावे धरातल पर पूरी तरह फेल साबित हो रहे हैं। आरोप है कि "विटामिन-एम" (रिश्वत) की खुराक ने विभाग की आंखों पर पट्टी बांध दी है, यही कारण है कि एजेंसी संचालक के हौसले बुलंद हैं और वह नियमों को ताक पर रखकर व्यापार कर रहा है। रात भर लाइन में जनता, सुबह मिलता है 'गैस खत्म' का बोर्ड एजेंसी पर बदइंतजामी का आलम यह है कि आम जनता रात 8:00 बजे से ही लाइन लगाकर सुबह होने का इंतजार करती है। भीषण गर्मी और रातों की नींद खराब करने के बाद जब सुबह 7:00 बजे बारी आती है, तो संचालक की ओर से 'गैस खत्म' होने का फरमान सुना दिया जाता है। खाली सिलेंडर लेकर मायूस होकर घर लौटते उपभोक्ताओं के चेहरे प्रशासन की नाकामी की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। सवालों के घेरे में आपूर्ति विभाग कालाबाजारी के इस सिंडिकेट से आम जनमानस त्रस्त है। आखिर क्या कारण है कि शिकायतों के बाद भी शांति इंडियन गैस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती? क्या विभाग किसी बड़ी अनहोनी या जन-आंदोलन का इंतजार कर रहा है? अब देखना यह होगा कि खबर प्रकाशित होने के बाद क्या जिलाधिकारी और विभागीय उच्चाधिकारी इस कालाबाजारी पर लगाम कसते हैं, या फिर रसूखदार संचालक और भ्रष्ट अधिकारियों की साठगांठ यूं ही जनता का हक मारती रहेगी।1