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बुद्धसेन चौरसिया
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- "वो अपने बच्चों को गले लगाना चाहता था, उन्हें चूमना चाहता था... लेकिन उसे मिला तो सिर्फ अपमान, आरोप और बेबसी। रीवा के घोघर मोहल्ले के रहने वाले चंदन पाल अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन पीछे छोड़ गए हैं एक ऐसा सुलगता हुआ सवाल, जो हमारे समाज के 'मजबूत' होने के दावे पर तमाचा है।" अपनी मौत से ठीक पहले चंदन ने एक वीडियो बनाया। उस वीडियो में एक पति की रुलाई नहीं, बल्कि एक टूटे हुए इंसान की आखिरी चीख थी। चंदन अपनी पत्नी और ससुराल वालों की प्रताड़ना से इस कदर टूट चुके थे कि उन्होंने अपनी जीवनलीला समाप्त करने जैसा खौफनाक कदम उठा लिया। उन्होंने आत्महत्या के लिए उसी जगह को चुना, जहाँ उनका ससुराल था—रायपुर कर्चुलियान।" चंदन का आरोप था कि उनकी पत्नी के गलत आचरण और ससुराल पक्ष के दबाव ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। जहाँ भी वो किराए का कमरा लेते, विवाद उनके पीछे पहुँच जाता। जब एक पति ने अपनी गृहस्थी बचाने के लिए विरोध किया, तो उसे ही प्रताड़ित किया गया। सबसे बड़ा दर्द? उसे उसके अपने मासूम बच्चों से मिलने तक नहीं दिया गया।" यह कहानी सिर्फ चंदन पाल की नहीं है। यह उन अनगिनत पुरुषों की है जो 'लोग क्या कहेंगे' और 'कानूनी जटिलताओं' के डर से घुट-घुट कर जीते हैं। हमारे समाज में अक्सर माना जाता है कि पुरुष रो नहीं सकता, पुरुष पीड़ित नहीं हो सकता। लेकिन चंदन की आँखों के आँसू बताते हैं कि मानसिक शोषण किसी का भी जेंडर नहीं देखता।" चंदन ने अपने आखिरी संदेश में मांग की है कि उसकी मौत के जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई हो। चंदन तो चले गए, पर पीछे छोड़ गए वो मासूम बच्चे जिनकी चीखें शायद ताउम्र इस समाज को कचोटती रहेंगी। सवाल ये है कि आखिर कब तक रिश्तों की आड़ में यह मानसिक कत्ल होता रहेगा? क्या हमारा कानून और समाज पुरुषों के खिलाफ हो रही इस प्रताड़ना को गंभीरता से लेगा?"1