हर्रैया पुलिस की 'अंधी' जांच: पेट दर्द का बहाना या रसूखदारों के आगे घुटने टेकता कानून? अजीत मिश्रा (खोजी) बस्ती का 'रक्तचरित्र': खादी की आड़ में रसूख का नंगा नाच, क्या कत्ल के दाग धो पाएगी सत्ता की नजदीकी? ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश) सत्ता की हनक और मौत का 'सौदा': भोलूनाथ की रूह तड़प रही, रसूखदार 'कातिल' को बचा रहे! हर्रैया पुलिस की 'अंधी' जांच: पेट दर्द का बहाना या रसूखदारों के आगे घुटने टेकता कानून? जहर, जुल्म और 'जुगाड़': क्या रवि गुप्ता की ऊंची पहुंच के आगे बौना हो गया है इंसाफ? खाकी पर 'खास' का दबाव: एफआईआर दर्ज करने में आखिर क्यों फूल रही पुलिस की सांसें? मर्यादा का कत्ल और पैसों की खनक: हराम की कमाई से दूसरों की गृहस्थी उजाड़ने वालों का कब होगा हिसाब? चीखता परिवार, सुबकती मासूम: अवैध संबंधों की वेदी पर चढ़ा एक बेगुनाह, चुप क्यों है बस्ती? दामन बचाओ 'साहब'! कातिल को 'मदद' देना बंद करो, वरना इतिहास आपको माफ नहीं करेगा। बस्ती। उत्तर प्रदेश में जहाँ एक ओर 'जीरो टॉलरेंस' का डंका पीटा जा रहा है, वहीं बस्ती मंडल के हर्रैया क्षेत्र से आई एक चीख ने सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा दिया है। यह चीख उस परिवार की है जिसका चिराग 'अवैध संबंधों' और 'धनबल' की बलि चढ़ गया। मामला केवल भोलूनाथ गोस्वामी की मौत का नहीं है, बल्कि मामला उस 'सिस्टम' का है जो एक कथित हत्यारे को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है। सत्ता के 'माननीयों' से सीधे सवाल: अपराधी आपका लाडला क्यों? बस्ती की सड़कों पर आज एक ही चर्चा आम है—"हरिशजी और विवेकानंदजी, आखिर कब तक?" मृतक के परिजनों ने खुलेआम पूर्व सांसद और भाजपा जिलाध्यक्ष का नाम लेकर जो गुहार लगाई है, वह किसी ज्वालामुखी के फटने से कम नहीं है। सवाल यह है कि क्या भाजपा जैसे राष्ट्रवादी दल की छवि अब 'गांजा तस्करों' और 'बहुरूपियों' के सहारे चमकाई जाएगी? जनता पूछ रही है कि मनोनीत सभासद रवि गुप्ता पर लगे 'कथित हत्या' के संगीन आरोपों के बावजूद, आखिर कौन सा 'अदृश्य हाथ' उसे पुलिस की कड़े शिकंजे से बचा रहा है? क्या सत्ता की कुर्सी इतनी कमजोर हो गई है कि वह एक पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के बजाय आरोपी की ढाल बन गई है? याद रहे, इतिहास गवाह है कि अपराधी को दिया गया संरक्षण अक्सर संरक्षक की राजनीतिक लंका दहन का कारण बनता है। मदद या बदनामी का सौदा? अखबारों की सुर्खियों और दीवारों पर चस्पा पोस्टरों में मुस्कुराता 'रवि गुप्ता' का चेहरा आज कई गंभीर सवालों के घेरे में है। मृतक के भाई पप्पू गोस्वामी और उनकी भाभी ने सीधा और तीखा हमला बोलते हुए पूर्व सांसद और भाजपा जिलाध्यक्ष से अपील की है कि—"इस कथित हत्यारे की मदद बंद करें।" सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा जैसे अनुशासित दल के सिपाही कहलाने वाले लोग एक ऐसे व्यक्ति के पीछे खड़े होंगे, जिस पर एक हसते-खेलते परिवार को तबाह करने और 'अवैध संबंधों' की खातिर एक जान लेने का संगीन आरोप है? आरोप कड़ा है—अगर इन रसूखदारों ने आरोपी को अभयदान दिया, तो 'बदनामी के छींटे' उन पर भी पड़ेंगे जिनके दामन अब तक साफ रहे हैं। हर्रैया पुलिस की भूमिका पर 'संदेह' का साया घटनाक्रम में पुलिस की कार्यप्रणाली सबसे बड़े संशय के घेरे में है। परिजनों का आरोप है कि भोलूनाथ को जहर देकर और पीटकर मारा गया, जबकि थ्योरी 'पेट दर्द की दवा' वाली गढ़ी जा रही है। क्या उत्तर प्रदेश की हाईटेक पुलिस इतनी मासूम है कि उसे हत्या और आकस्मिक मौत का अंतर नहीं दिख रहा? या फिर आरोपी के पीछे खड़े 'बाबू साहब' और 'आकाओं' के फोन कॉल्स ने पुलिस की कलम की स्याही सुखा दी है? "क्या पेट दर्द की गोली खाने से किसी की जान चली जाती है? अगर ऐसा है तो करोड़ों लोग दवा क्यों खा रहे हैं?" – यह सवाल मृतक के भाई का है, जो सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है। हर्रैया पुलिस: न्याय की रक्षक या रसूख की बंधक? इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका किसी 'कठपुतली' जैसी नजर आ रही है। जब परिजन चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि भोलूनाथ को जहर देकर और पीट-पीटकर मारा गया है, तो पुलिस 'पेट दर्द' की कहानी पर पर्दा क्यों डाल रही है? क्या खाकी वर्दी अब रसूखदारों के बंगलों पर गिरवी रख दी गई है? "न्याय की उम्मीद में बैठा भाई और सुबकती बूढ़ी माँ यह पूछ रही है कि क्या उनके बेटे का खून इतना सस्ता है कि उसे चंद 'दवा की गोलियों' का बहाना बनाकर फाइल में दफन कर दिया जाए?" मर्यादा का चीरहरण और पैसों की खनक लेख के केंद्र में जो 'अवैध संबंधों' की घिनौनी हकीकत है, वह समाज के लिए चेतावनी है। आरोप है कि रवि गुप्ता जैसे लोग, जिनके पास 'हराम की कमाई' का अंबार है, वे अपनी हवस और रसूख के दम पर दूसरों के सुखी संसार को उजाड़ने में माहिर हैं। मृतक की पत्नी 'रुचि' पर उठते सवाल समाज की उस कड़वी सच्चाई को बयां करते हैं, जहाँ नैतिकता को चंद रुपयों के बिस्तर पर नीलाम कर दिया गया। चार साल की मासूम बच्ची, जिसे अब तक पिता के साये की जरूरत थी, आज उस गंदी राजनीति और धोखे का शिकार हुई है जिसका सूत्रधार 'सत्ता का करीबी' होने का दंभ भरता है। चेतावनी: अब चुप रहना भी अपराध है! अगर आज बस्ती का प्रबुद्ध वर्ग और शासन-प्रशासन इस अन्याय पर मौन रहा, तो यह मान लिया जाएगा कि यहाँ 'कलम' और 'कानून' दोनों ने रसूखदारों के आगे घुटने टेक दिए हैं। 'मदद' के नाम पर जो 'बदनामी का खेल' खेला जा रहा है, वह जल्द ही जन-आक्रोश का रूप लेगा।बस्ती की जनता देख रही है कि क्या 'हरिशजी' और 'विवेकानंदजी' पार्टी की छवि बचाने के लिए अपराधी से दूरी बनाएंगे, या फिर 'सत्ता के संरक्षण' की पुरानी रवायत कायम रहेगी? अगर इस मामले में निष्पक्ष FIR दर्ज नहीं हुई और रसूखदारों ने अपनी 'मदद' वापस नहीं ली, तो यह मान लिया जाएगा कि यहाँ न्याय नहीं, बल्कि 'जुगाड़' और 'पैसा' बोलता है। सावधान रहें! क्योंकि आज किसी और का घर जला है, कल रसूख की यह आग आपके दरवाजे तक भी पहुँच सकती है। साहब! एफआईआर दर्ज करने में हो रही देरी यह चीख-चीख कर कह रही है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। बस्ती मंडल के रसूखदारों के लिए सीधा संदेश: "दामन पर लगे खून के छींटे गंगा स्नान से नहीं धुलते, और जनता की अदालत में जब हिसाब होता है, तो बड़े-बड़े सिंहासन डोल जाते हैं।" ब्यूरो रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश (बस्ती)
हर्रैया पुलिस की 'अंधी' जांच: पेट दर्द का बहाना या रसूखदारों के आगे घुटने टेकता कानून? अजीत मिश्रा (खोजी) बस्ती का 'रक्तचरित्र': खादी की आड़ में रसूख का नंगा नाच, क्या कत्ल के दाग धो पाएगी सत्ता की नजदीकी? ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश) सत्ता की हनक और मौत का 'सौदा': भोलूनाथ की रूह तड़प रही, रसूखदार 'कातिल' को बचा रहे! हर्रैया पुलिस की 'अंधी' जांच: पेट दर्द का बहाना या रसूखदारों के आगे घुटने टेकता कानून? जहर, जुल्म और 'जुगाड़': क्या रवि गुप्ता की ऊंची पहुंच के आगे बौना हो गया है इंसाफ? खाकी पर 'खास' का दबाव: एफआईआर दर्ज करने में आखिर क्यों फूल रही पुलिस की सांसें? मर्यादा का कत्ल और पैसों की खनक: हराम की कमाई से दूसरों की गृहस्थी उजाड़ने वालों का कब होगा हिसाब? चीखता परिवार, सुबकती मासूम: अवैध संबंधों की वेदी पर चढ़ा एक बेगुनाह, चुप क्यों है बस्ती? दामन बचाओ 'साहब'! कातिल को 'मदद' देना बंद करो, वरना इतिहास आपको माफ नहीं करेगा। बस्ती। उत्तर प्रदेश में जहाँ एक ओर 'जीरो टॉलरेंस' का डंका पीटा जा रहा है, वहीं बस्ती मंडल के हर्रैया क्षेत्र से आई एक चीख ने सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा दिया है। यह चीख उस परिवार की है जिसका चिराग 'अवैध संबंधों' और 'धनबल' की बलि चढ़ गया। मामला केवल भोलूनाथ गोस्वामी की मौत का नहीं है, बल्कि मामला उस 'सिस्टम' का है जो एक कथित हत्यारे को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है। सत्ता के 'माननीयों' से सीधे सवाल: अपराधी आपका लाडला क्यों? बस्ती की सड़कों पर आज एक ही चर्चा आम है—"हरिशजी और विवेकानंदजी, आखिर कब तक?" मृतक के परिजनों ने खुलेआम पूर्व सांसद और भाजपा जिलाध्यक्ष का नाम लेकर जो गुहार लगाई है, वह किसी ज्वालामुखी के फटने से कम नहीं है। सवाल यह है कि क्या भाजपा जैसे राष्ट्रवादी दल की छवि अब 'गांजा तस्करों' और 'बहुरूपियों' के सहारे चमकाई जाएगी? जनता पूछ रही है कि मनोनीत सभासद रवि गुप्ता पर लगे 'कथित हत्या' के संगीन आरोपों के बावजूद, आखिर कौन सा 'अदृश्य हाथ' उसे पुलिस की कड़े शिकंजे से बचा रहा है? क्या सत्ता की कुर्सी इतनी कमजोर हो गई है कि वह एक पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के बजाय आरोपी की ढाल बन गई है? याद रहे, इतिहास गवाह है कि अपराधी को दिया गया संरक्षण अक्सर संरक्षक की राजनीतिक लंका दहन का कारण बनता है। मदद या बदनामी का सौदा? अखबारों की सुर्खियों और दीवारों पर चस्पा पोस्टरों में मुस्कुराता 'रवि गुप्ता' का चेहरा आज कई गंभीर सवालों के घेरे में है। मृतक के भाई पप्पू गोस्वामी और उनकी भाभी ने सीधा और तीखा हमला बोलते हुए पूर्व सांसद और भाजपा जिलाध्यक्ष से अपील की है कि—"इस कथित हत्यारे की मदद बंद करें।" सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा जैसे अनुशासित दल के सिपाही कहलाने वाले लोग एक ऐसे व्यक्ति के पीछे खड़े होंगे, जिस पर एक हसते-खेलते परिवार को तबाह करने और 'अवैध संबंधों' की खातिर एक जान लेने का संगीन आरोप है? आरोप कड़ा है—अगर इन रसूखदारों ने आरोपी को अभयदान दिया, तो 'बदनामी के छींटे' उन पर भी पड़ेंगे जिनके दामन अब तक साफ रहे हैं। हर्रैया पुलिस की भूमिका पर 'संदेह' का साया घटनाक्रम में पुलिस की कार्यप्रणाली सबसे बड़े संशय के घेरे में है। परिजनों का आरोप है कि भोलूनाथ को जहर देकर और पीटकर मारा गया, जबकि थ्योरी 'पेट दर्द की दवा' वाली गढ़ी जा रही है। क्या उत्तर प्रदेश की हाईटेक पुलिस इतनी मासूम है कि उसे हत्या और आकस्मिक मौत का अंतर नहीं दिख रहा? या फिर आरोपी के पीछे खड़े 'बाबू साहब' और 'आकाओं' के फोन कॉल्स ने पुलिस की कलम की स्याही सुखा दी है? "क्या पेट दर्द की गोली खाने से किसी की जान चली जाती है? अगर ऐसा है तो करोड़ों लोग दवा क्यों खा रहे हैं?" – यह सवाल मृतक के भाई का है, जो सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है। हर्रैया पुलिस: न्याय की रक्षक या रसूख की बंधक? इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका किसी 'कठपुतली' जैसी नजर आ रही है। जब परिजन चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि भोलूनाथ को जहर देकर और पीट-पीटकर मारा गया है, तो पुलिस 'पेट दर्द' की कहानी पर पर्दा क्यों डाल रही है? क्या खाकी वर्दी अब रसूखदारों के बंगलों पर गिरवी रख दी गई है? "न्याय की उम्मीद में बैठा भाई और सुबकती बूढ़ी माँ यह पूछ रही है कि क्या उनके बेटे का खून इतना सस्ता है कि उसे चंद 'दवा की गोलियों' का बहाना बनाकर फाइल में दफन कर दिया जाए?" मर्यादा का चीरहरण और पैसों की खनक लेख के केंद्र में जो 'अवैध संबंधों' की घिनौनी हकीकत है, वह समाज के लिए चेतावनी है। आरोप है कि रवि गुप्ता जैसे लोग, जिनके पास 'हराम की कमाई' का अंबार है, वे अपनी हवस और रसूख के दम पर दूसरों के सुखी संसार को उजाड़ने में माहिर हैं। मृतक की पत्नी 'रुचि' पर उठते सवाल समाज की उस कड़वी सच्चाई को बयां करते हैं, जहाँ नैतिकता को चंद रुपयों के बिस्तर पर नीलाम कर दिया गया। चार साल की मासूम बच्ची, जिसे अब तक पिता के साये की जरूरत थी, आज उस गंदी राजनीति और धोखे का शिकार हुई है जिसका सूत्रधार 'सत्ता का करीबी' होने का दंभ भरता है। चेतावनी: अब चुप रहना भी अपराध है! अगर आज बस्ती का प्रबुद्ध वर्ग और शासन-प्रशासन इस अन्याय पर मौन रहा, तो यह मान लिया जाएगा कि यहाँ 'कलम' और 'कानून' दोनों ने रसूखदारों के आगे घुटने टेक दिए हैं। 'मदद' के नाम पर जो 'बदनामी का खेल' खेला जा रहा है, वह जल्द ही जन-आक्रोश का रूप लेगा।बस्ती की जनता देख रही है कि क्या 'हरिशजी' और 'विवेकानंदजी' पार्टी की छवि बचाने के लिए अपराधी से दूरी बनाएंगे, या फिर 'सत्ता के संरक्षण' की पुरानी रवायत कायम रहेगी? अगर इस मामले में निष्पक्ष FIR दर्ज नहीं हुई और रसूखदारों ने अपनी 'मदद' वापस नहीं ली, तो यह मान लिया जाएगा कि यहाँ न्याय नहीं, बल्कि 'जुगाड़' और 'पैसा' बोलता है। सावधान रहें! क्योंकि आज किसी और का घर जला है, कल रसूख की यह आग आपके दरवाजे तक भी पहुँच सकती है। साहब! एफआईआर दर्ज करने में हो रही देरी यह चीख-चीख कर कह रही है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है। बस्ती मंडल के रसूखदारों के लिए सीधा संदेश: "दामन पर लगे खून के छींटे गंगा स्नान से नहीं धुलते, और जनता की अदालत में जब हिसाब होता है, तो बड़े-बड़े सिंहासन डोल जाते हैं।" ब्यूरो रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश (बस्ती)
- अजीत मिश्रा (खोजी) साहब की चाय पर सक्रिय, पर 'जहरीले' पनीर पर मौन: क्या फूड विभाग का ईमान बिक चुका है? ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश) "रामा स्वीट हाउस की दबंगई: 'जो उखाड़ना है उखाड़ लो', आखिर किसका संरक्षण है मिलावटखोरों को?" "साहब की गाड़ी आती है, हिस्सा लेती है और निकल जाती है... बस्ती में फूड विभाग बना 'वसूली विभाग'!" "नकली पनीर की मंडी बना चिलमा बाजार: मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत के बाद क्या जागेगा कुंभकर्णी प्रशासन?" "बस्ती: अखिलेश यादव को चाय पिलाने वाले की जांच, लेकिन नकली सामान बेचने वालों को खुली छूट क्यों?" "रामा स्वीट हाउस की तीन दुकानों पर मिलावट का खेल, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने से मचा हड़कंप।" बस्ती। उत्तर प्रदेश का खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग (FSDA) इन दिनों अपनी कार्यशैली को लेकर कम और अपनी 'खास' सक्रियता को लेकर ज्यादा चर्चा में है। ताज़ा मामला विभाग के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। एक तरफ विभाग उस शख्स की जांच करने में पूरी ताकत झोंक देता है जिसने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को चाय पिलाई थी, वहीं दूसरी तरफ बस्ती जिले के चिलमा बाजार में खुलेआम बिक रहा 'सफेद जहर' यानी नकली पनीर विभाग को दिखाई नहीं दे रहा। दुबौलिया: 'कमीशन' के खेल में दांव पर जनता की जान दुबौलिया थाना क्षेत्र के चिलमा बाजार से लगातार नकली पनीर और मिलावटी सामान की बिक्री की खबरें आ रही हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि फूड विभाग की गाड़ी जब इलाके में आती है, तो हड़कंप मचने के बजाय एक 'सेट खेल' शुरू होता है। गाड़ी देखते ही दुकानें कुछ देर के लिए बंद होती हैं, कथित तौर पर 'हिस्सा' पहुँचता है और फिर गाड़ी रफूचक्कर हो जाती है। इसके बाद मिलावट का काला कारोबार फिर से सरपट दौड़ने लगता है। "फूड विभाग को मिलता रहे अपना हिस्सा, भाड़ में जाए जनता" — यह जुमला आज चिलमा बाजार के हर आम आदमी की जुबान पर है। रामा स्वीट हाउस: बेखौफ मिलावटखोरी और गुंडागर्दी चिलमा बाजार स्थित रामा स्वीट हाउस और इसकी संचालित तीनों शाखाएं इस समय शिकायतों के केंद्र में हैं। दबंगई का आलम: एक माह पहले जब एक जागरूक ग्राहक ने खराब सामान की शिकायत की, तो दुकानदार ने सुधार करने के बजाय धमकी दी— "जाओ जांच करा लो, जो उखाड़ना हो उखाड़ लेना।" * सोशल मीडिया पर वायरल: कल फिर एक ग्राहक को नकली पनीर थमा दिया गया। पीड़ित ने जब इसका विरोध किया और वीडियो सोशल मीडिया पर डाला, तो वह वायरल हो गया। दुकानदार की इस बेखौफी से साफ है कि उसे विभाग के 'आशीर्वाद' पर पूरा भरोसा है। पोर्टल पर पहुंची शिकायत, क्या जागेगा प्रशासन? थक-हारकर पीड़ित ग्राहक ने अब मुख्यमंत्री पोर्टल पर नकली पनीर और मिलावटी सामान की लिखित शिकायत दर्ज कराई है। अब सवाल यह उठता है कि: क्या विभाग केवल राजनीतिक रसूख वाले मामलों में ही अपनी फुर्ती दिखाएगा? क्या चिलमा बाजार के बच्चों और आम जनता की जान की कीमत विभाग के 'हिस्से' से कम है? क्या रामा स्वीट हाउस जैसे संस्थानों पर नकेल कसी जाएगी या फिर 'हिस्सा' बढ़ाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा? निष्कर्ष: जनता अब तमाशा देख रही है। अगर मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत के बाद भी चिलमा बाजार में नकली पनीर की बिक्री बंद नहीं हुई और रामा स्वीट हाउस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि बस्ती का फूड विभाग मिलावटखोरों का संरक्षक बन चुका है।1
- Post by हरिशंकर पांडेय1
- 🚨 ब्रेकिंग न्यूज़ 🚨 कोतवाली खलीलाबाद के टेमा चौराहे के पास बोलेरो में लगी भीषण आग, एक युवक गंभीर रूप से झुलसा टेमा चौराहे के पास उस समय हड़कंप मच गया जब एक डीसीएम से टक्कर के बाद चलती बोलेरो गाड़ी में अचानक भीषण आग लग गई। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार गाड़ी में सवार सभी लोग खलीलाबाद से बस्ती एक शादी समारोह से वापस आ रहे थे । सूत्र के अनुसार सभी बुलेरो सवार खलीलाबाद के बताए जा रहे हैं। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई। स्थानीय लोगों की मदद से किसी तरह घायलों को बाहर निकाला गया। सभी घायलों को तत्काल एंबुलेंस की सहायता से बस्ती सदर अस्पताल भेजा गया। बताया जा रहा है कि घायलों में एक युवक मनोज की हालत बेहद गंभीर है। वह आग की चपेट में आने से बुरी तरह झुलस गया, उसके शरीर का आधा हिस्सा आग से प्रभावित हुआ है। सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड की टीम मौके पर पहुंची और कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पा लिया गया। फिलहाल घटना के कारणों का स्पष्ट पता नहीं चल पाया है, लेकिन प्रारंभिक आशंका शॉर्ट सर्किट या तकनीकी खराबी की जताई जा रही है।2
- संतकबीरनगर। पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना ने पुलिस लाइन स्थित जीर्णोद्धारित पुलिस कैंटीन का फीता काटकर उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने कैंटीन का निरीक्षण कर वहां उपलब्ध सुविधाओं एवं वस्तुओं की गुणवत्ता का जायजा लिया। उद्घाटन के बाद पुलिस अधीक्षक ने कहा कि पुलिस बल की कार्यक्षमता उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर करती है। ड्यूटी की व्यस्तता के बीच कर्मियों को आवश्यक सुविधाएं सहजता से उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि यह कैंटीन पुलिस कर्मियों और उनके परिवारों के लिए उपयोगी साबित होगी। उन्होंने बताया कि कैंटीन का मुख्य उद्देश्य पुलिस कर्मियों एवं उनके परिजनों को रियायती दरों पर उच्च गुणवत्ता की दैनिक उपयोग की वस्तुएं एवं खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना है। जीर्णोद्धार के बाद कैंटीन को आधुनिक रूप दिया गया है। इसमें सामानों के बेहतर रख-रखाव के लिए रैक, बैठने की समुचित व्यवस्था तथा डिजिटल भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। पुलिस अधीक्षक ने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि कैंटीन में उपलब्ध वस्तुओं की गुणवत्ता और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जाए, ताकि कर्मियों को बेहतर सेवाएं मिल सकें। #SantKabirNagar #PoliceNews #UPPolice #SandeepKumarMeena #PoliceCanteen #Inauguration #PublicService #PoliceWelfare #DigitalIndia #GoodGovernance #NewsUpdate #hindinewsupdate #liveuponenews2
- *थाना मेंहदावल अन्तर्गत सोनवरसा रोडवेज बस स्टैंड के पास दो पक्षों के मध्य मारपीट की घटना घटित होने व पुलिस द्वारा कृत कार्यवाही के सम्बन्ध में क्षेत्राधिकारी मेंहदावल द्वारा दी गयी जानकारी1
- पुलिस अधीक्षक संतकबीरनगर संदीप कुमार मीना द्वारा पुलिस लाइन संतकबीरनगर के परिसर में स्थित जीर्णोद्धार कराए गए पुलिस कैंटीन का फीता काटकर उद्घाटन किया गया तथा कैंटीन का निरीक्षण किया और वहां उपलब्ध सुविधाओं एवं गुणवत्ता का जायजा लिया । उद्घाटन के उपरांत पुलिस अधीक्षक ने कहा कि पुलिस बल की कार्यक्षमता उनके मानसिक और शारीरिक कल्याण पर निर्भर करती है। ड्यूटी की व्यस्तता के बीच पुलिस कर्मियों को बुनियादी सुविधाएं आसानी से मिल सकें, इसके लिए पुलिस प्रशासन सदैव प्रयासरत है । यह कैंटीन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । उद्देश्य पुलिस कर्मियों और उनके परिवारों के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए, उन्हें रियायती दरों पर उच्च गुणवत्ता वाली दैनिक उपयोगी वस्तुएं और खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना । सुविधाएं जीर्णोद्धार के पश्चात कैंटीन को आधुनिक स्वरूप दिया गया है। इसमें सामानों के रख-रखाव के लिए बेहतर रैक, बैठने की समुचित व्यवस्था और डिजिटल भुगतान की सुविधा सुनिश्चित की गई है । गुणवत्ता पर जोर उद्घाटन के दौरान पुलिस अधीक्षक ने संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया कि कैंटीन में सामानों की शुद्धता और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाए ।4
- Post by Vipin Rai Journalist1
- अजीत मिश्रा (खोजी) ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल (उत्तर प्रदेश) शांति इंडियन गैस की गुंडागर्दी: हर्रैया में गैस की कालाबाजारी चरम पर, आपूर्ति विभाग ने साधी रहस्यमयी चुप्पी "महाभ्रष्टाचार! हर्रैया में गैस सिलेंडरों की लूट: जेब गर्म कर सो रहे जिम्मेदार, मायूस होकर घर लौट रही जनता।" "गैस माफिया और अधिकारियों का नापाक गठजोड़: शांति गैस एजेंसी बनी कालाबाजारी का अड्डा!" "बस्ती में 'हवा' हुई योगी सरकार की सख्ती: आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा शांति गैस की कालाबाजारी का साम्राज्य?" बस्ती। जनपद के हर्रैया स्थित 'शांति इंडियन गैस' एजेंसी इन दिनों उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि गैस सिलेंडरों की खुलेआम कालाबाजारी के लिए चर्चा में है। शासन के कड़े निर्देशों के बावजूद, हर्रैया शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक गैस की रीफिलिंग और ऊंचे दामों पर बिक्री का काला खेल धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे खेल से अनजान बने हुए हैं, जिससे उपभोक्ताओं में भारी आक्रोश व्याप्त है। सुविधा शुल्क के प्रभाव में मूकदर्शक बने अधिकारी? क्षेत्र में चर्चा है कि आपूर्ति कार्यालय की इस चुप्पी के पीछे 'जेब गर्म' होने का बड़ा खेल है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो आम जनता न्याय की उम्मीद किससे करे? अधिकारियों के बड़े-बड़े दावे धरातल पर पूरी तरह फेल साबित हो रहे हैं। आरोप है कि "विटामिन-एम" (रिश्वत) की खुराक ने विभाग की आंखों पर पट्टी बांध दी है, यही कारण है कि एजेंसी संचालक के हौसले बुलंद हैं और वह नियमों को ताक पर रखकर व्यापार कर रहा है। रात भर लाइन में जनता, सुबह मिलता है 'गैस खत्म' का बोर्ड एजेंसी पर बदइंतजामी का आलम यह है कि आम जनता रात 8:00 बजे से ही लाइन लगाकर सुबह होने का इंतजार करती है। भीषण गर्मी और रातों की नींद खराब करने के बाद जब सुबह 7:00 बजे बारी आती है, तो संचालक की ओर से 'गैस खत्म' होने का फरमान सुना दिया जाता है। खाली सिलेंडर लेकर मायूस होकर घर लौटते उपभोक्ताओं के चेहरे प्रशासन की नाकामी की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। सवालों के घेरे में आपूर्ति विभाग कालाबाजारी के इस सिंडिकेट से आम जनमानस त्रस्त है। आखिर क्या कारण है कि शिकायतों के बाद भी शांति इंडियन गैस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती? क्या विभाग किसी बड़ी अनहोनी या जन-आंदोलन का इंतजार कर रहा है? अब देखना यह होगा कि खबर प्रकाशित होने के बाद क्या जिलाधिकारी और विभागीय उच्चाधिकारी इस कालाबाजारी पर लगाम कसते हैं, या फिर रसूखदार संचालक और भ्रष्ट अधिकारियों की साठगांठ यूं ही जनता का हक मारती रहेगी।1