अवश्य अध्ययन करें श्रीपरशुराम प्रातःस्मरणम् एवं अन्य स्तुतियां हिन्दी अर्थ सहित 01..🌷श्रीपरशुराम प्रातःस्मरणम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷 2...🌷🌷परशुरामध्यानम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷🌷 03.🌷श्रीपरशुरामतन्त्रं मेरुतन्त्रान्तर्गतम् 🌷🌷 (हिन्दी अर्थ सहित) 04..🌷 परशुरामस्तुति हिन्दी अर्थ सहित 🌷 05..🌷🌷परशुरामाष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् 🌷 ( हिन्दी अर्थ सहित ) **************************************** 01..🌷श्रीपरशुराम प्रातःस्मरणम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷 🍁 प्रातःस्मरामि भृगुनाथमुखारविन्दं प्रातर्नमामि भृगुनाथपदारविन्दम् । प्रातर्जपामि वचसा भृगुनाथनामं प्रातर्भजामि भृगुनाथमनाथबन्धुम् ॥ १॥ अर्थ: मैं प्रातःकाल में भगवान परशुराम (भृगुनाथ) के कमल के समान मुख का स्मरण करता हूँ। उनके चरणकमलों को नमस्कार करता हूँ। उनके पवित्र नाम का जप करता हूँ और उन अनाथों के सहायक प्रभु का भजन करता हूँ। 🍁 श्रीरामभार्गवपदं मनसा भजामि श्रीरामभार्गवपदं वचसा स्मरामि । श्रीरामभार्गवपदं हि सदा नमामि श्रीरामभार्गवपदं शरणं प्रपद्ये ॥ २॥ अर्थ: मैं मन से श्री भार्गवराम (परशुराम) के चरणों का भजन करता हूँ। वाणी से उनका स्मरण करता हूँ। सदा उन्हें नमस्कार करता हूँ और उनके चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ। 🍁 श्रीभार्गवं ब्रह्मसमानरूपं जितेन्द्रियं वेदविदां वरिष्ठम् । श्रीरेणुकायाः जठरात्प्रसूतं नमामि मूर्ध्ना जमदग्निपुत्रम् ॥ ३॥ अर्थ: मैं उन भगवान भार्गव (परशुराम) को प्रणाम करता हूँ जो ब्रह्मा के समान तेजस्वी हैं, इन्द्रियों को जीतने वाले हैं, और वेदज्ञों में श्रेष्ठ हैं। जो माता रेणुका के गर्भ से उत्पन्न हुए और ऋषि जमदग्नि के पुत्र हैं। 🍁 नमः परशुरामाय जामदग्न्याय ते नमः । ब्रह्मदेवाय देवाय रेणुकासूनवे नमः ॥ ४॥ अर्थ: परशुराम जी को नमस्कार है, जो जमदग्नि के पुत्र हैं। जो ब्रह्मस्वरूप देव हैं और माता रेणुका के पुत्र हैं—उन्हें बारंबार नमस्कार। 🍁 दुःखदारिद्र्यहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । परशुरामं महावीरं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ ५॥ अर्थ: मैं बार-बार उस महावीर परशुराम को प्रणाम करता हूँ, जो दुःख और दरिद्रता का नाश करने वाले हैं और सभी प्रकार की संपत्तियों के दाता हैं। 🍁(फलश्रुति) श्लोकपञ्चकमिदं स्तोत्रं प्रातःकाले तु यः पठेत् । सर्वदुःखविनिर्मुक्तो सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ६॥ अर्थ: जो मनुष्य इस पाँच श्लोकों वाले स्तोत्र का प्रातःकाल में पाठ करता है, वह सभी दुःखों से मुक्त होकर हर जगह विजय प्राप्त करता है। इति बद्रीप्रसादमहर्षिकृतं प्रातःस्मरणं सम्पूर्णम् ॥ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 2...🌷🌷परशुरामध्यानम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷🌷 परशुरामजी की उपासना सात्त्विक, राजस और तामस रूप में की जाती है तब छिन्नमस्ता के यन्त्र में ही उनकी पूजा होती है और परशुराम गायत्री का जप किया जाता है । यथा- ब्रह्मक्षेत्राय विद्महे, क्षत्रियान्ताय धीमहि । तन्नो रामः प्रचोदयात् । यह परशुराम गायत्री अद्भुत है । राज्य एवं वैभव प्रदान करने वाली है । इसके ऋषि भारद्वाज, छन्द गायत्री, देवता श्री परशुराम हैं । इनका सात्त्विक ध्यान इस प्रकार है- 🍁 सात्त्विकं श्वेतवर्णं च भस्मोद्धूलितविग्रहम् । अग्निहोत्रस्थलासीनं नानामुनिगणावृतम् । कम्बलासनमारूढं स्वर्णतारकुशाङ्गुलिम् । श्वेतवस्त्रद्वयोपेतं जुह्वन्तं राममाश्रये ॥ अर्थ मैं उन भगवान परशुराम का आश्रय ग्रहण करता हूँ— जो सात्त्विक स्वरूप वाले, श्वेत (सफेद) वर्ण के हैं, जिनका शरीर भस्म (विभूति) से अभिषिक्त (लिप्त) है। जो अग्निहोत्र के स्थान में विराजमान हैं, और जिनके चारों ओर अनेक मुनियों का समूह उपस्थित है। जो कम्बल के आसन पर बैठे हुए हैं, और जिनकी उँगलियों में स्वर्णमय कुश (यज्ञोपयोगी पवित्र घास) धारण है। जो श्वेत वस्त्रों से अलंकृत हैं, और अग्नि में आहुति (हवन) देते हुए स्थित हैं— ऐसे परम तपस्वी भगवान परशुराम का मैं ध्यान करता हूँ। इति रुद्रयामले तन्त्रे परशुरामध्यानं सम्पूर्णम् । 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 03.🌷श्रीपरशुरामतन्त्रं मेरुतन्त्रान्तर्गतम् 🌷🌷 (हिन्दी अर्थ सहित) । अथ मेरुतन्त्रोक्तं श्रीपरशुरामतन्त्रम् । 🍁 अथातः सम्प्रवक्ष्यामि राममन्त्रं समाहृतम् । आकल्पमेक एवायं जामदग्न्यो महाबलः ॥ १॥ अर्थ: अब मैं भगवान परशुराम के इस संकलित (समाहित) मंत्र का वर्णन करता हूँ। यह जामदग्नि पुत्र महाबली परशुराम एक ही रूप में कल्प-कल्प तक स्थित रहते हैं। श्लोक (अगला भाग) दुष्टक्षत्रतमोध्वंसी रेणुकोद्भूतभास्करः । अर्थ: वे दुष्ट क्षत्रियों के अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाले हैं, और माता रेणुका से उत्पन्न सूर्य के समान तेजस्वी हैं। 🍁मन्त्र (परशुराम गायत्री) ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि । तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥ अर्थ: हम उस परशुराम को जानते हैं जो ब्रह्म और क्षत्र (दोनों शक्तियों) के अधिपति हैं, जो क्षत्रियों के अंत (अधर्म का नाश) करने वाले हैं— वे भगवान राम (परशुराम) हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। भारद्वाजमुनिप्रोक्तो गायत्रं छन्द ईरितम् ॥ २॥ अर्थ: इस मंत्र के ऋषि भारद्वाज मुनि हैं और इसका छन्द गायत्री है। 🍁 श्रीमान्परशुरामोऽस्य देवता भक्तवत्सलः । अष्टेषु त्र्यक्षिवेदार्णैर्मनोः प्रोक्तं षडङ्गकम् ॥ ३॥ अर्थ: इस मंत्र के देवता भक्तवत्सल भगवान परशुराम हैं। इसके षडङ्ग (छः अंग) वेदों और मन्त्रों के अक्षरों के अनुसार बताए गए हैं। 🍁 नेत्रयोः कर्णयोर्नासाद्वये चाधरयुग्मके । स्तनयोर्भुजयोः पार्श्वद्वयेंऽघ्र्योर्विन्यसेत्पदम् ॥ ४॥ अर्थ: मंत्र के अक्षरों का न्यास (स्थापन) नेत्रों, कानों, नासिका, अधरों, स्तनों, भुजाओं, पार्श्वों और पैरों में करना चाहिए। 🍁 आधारे हृदये मूर्ध्नि क्रमात्पादान्प्रविन्यसेत् । के दृशि श्रोत्रनासायां कपोले हनुवक्रयोः ॥ ५॥ अर्थ: मूलाधार, हृदय और मस्तक में क्रम से मंत्र का विन्यास करें। फिर नेत्र, कान, नाक, गाल और ठोड़ी आदि अंगों में भी स्थापित करें। 🍁 कण्ठांसबाहुहस्तेषु पार्श्वहृत्पृष्ठकोदरे । नाभिकट्योर्गुदे लिङ्गे ऊर्वोर्वा जानुजङ्घयोः ॥ ६॥ अर्थ: कण्ठ, कंधे, भुजाएँ, हाथ, पार्श्व, हृदय, पीठ, उदर, नाभि, कटि, गुदा, लिंग, जांघ, घुटने और पिंडलियों में भी मंत्र का न्यास करें। 🍁(समापन न्यास निर्देश) पादे च विन्यसेद्वर्णान्ततो ध्यायेत्त्रिधा तनुम् । अर्थ: अंत में पैरों में भी मंत्र का विन्यास करके, भगवान परशुराम के तीनों (सात्त्विक, राजस, तामस) रूपों का ध्यान करें। ( सात्त्विक ध्यान) सात्त्विके श्वेतवर्णं च भस्मोद्धूलितविग्रहम् ॥ ७॥ अर्थ: सात्त्विक रूप में भगवान परशुराम श्वेत वर्ण के हैं और उनके शरीर पर भस्म लगी है। 🍁 (विस्तृत सात्त्विक ध्यान) किरीटिनं कुण्डलिनं वरं स्वक्षवराभयान् । करैर्दधानं तरलं विप्रं क्षत्रवधोद्यतम् । पीताम्बरधरं कामरूपं बालानिरीक्षितम् ॥ ८॥ अर्थ: वे मुकुट और कुण्डल धारण किए हुए हैं, हाथों में वरदान और अभय देने की मुद्रा रखते हैं, ब्राह्मण स्वरूप होते हुए भी अधर्मी क्षत्रियों के विनाश के लिए तत्पर हैं। पीताम्बर धारण किए हुए, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, और भक्तों पर स्नेहपूर्वक दृष्टि रखने वाले हैं। 🍁 तामस ध्यान ध्यायेच्च तामसं क्षत्रं रुधिराक्तपरश्वधम् । आरक्तनेत्रकर्णस्थब्रह्मसूत्रं यमप्रभम् ॥ ९॥ अर्थ: तामस रूप में परशुराम को ध्यान करें— जो रक्त से सने हुए परशु (फरसा) धारण किए हैं, जिनकी आँखें लाल हैं, और जो यमराज के समान भयंकर प्रतीत होते हैं। 🍁 राजस ध्यान धनुष्टङ्कारनिर्घोषसन्त्रस्तभुवनत्रयम् । चतुर्बाहुं मुसलिनं राजसं क्रुद्धमेव च ॥ १०॥ अर्थ: राजस रूप में भगवान परशुराम धनुष की टंकार से तीनों लोकों को भयभीत करने वाले हैं, चार भुजाओं वाले, हाथ में गदा (मुसल) धारण किए हुए, और क्रोधयुक्त (उग्र) स्वरूप वाले हैं। 🍁विनियोगः अस्य श्रीपरशुराममन्त्रस्य भरद्वाज ऋषिः । भक्तवत्सल श्रीपरशुरामो देवता । गायत्री छन्दः । श्रीपरशुरामप्रीत्यर्थं अभीष्ठसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ॥ करन्यासः ब्रह्मक्षत्राय विद्महे अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । तन्नो अनामिकाभ्यां नमः । क्षत्रियान्ताय तर्जनीभ्यां नमः । रामः कनिष्ठिकाभ्यां नमः । धीमहि मध्यमाभ्यां नमः । प्रचोदयात् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ हृदयादि न्यासः ब्रह्मक्षत्राय विद्महे हृदयाय नमः । तन्नो कवचाय हुम् । क्षत्रियान्ताय शिरसे स्वाहा । रामः नेत्रत्रयाय वौषट् । धीमहि शिखायै वषट् । प्रचोदयात् अस्त्राय फट् ॥ मन्त्र पदन्यासः ब्रह्मक्षत्राय विद्महे नेत्रयोः । तन्नो अधरयुग्मके । क्षत्रियान्ताय कर्णयोः । रामः स्तनयोः भुजयोः । धीमहि नासाद्वये । प्रचोदयात् पार्श्वयुग्मके अङ्घ्र्योः ॥ मन्त्र वर्णन्यासः ब्रं नमः मूलाधारे । ह्मं नमः हृदये । क्षं नमः मूर्ध्नि । त्रां नमः नेत्रत्रय्यओः । नेत्रत्रयेषु यं नमः कर्णयोः । विद् नमः नासायां । मं नमः कपोले । हें नमः हनौ । क्षं नमः वक्त्रे । त्रिं नमः कण्ठे । यां नमः बाह्वोः । न्तां नमः हस्तयोः । यं नमः पार्श्वे । धीं नमः हृदये । मं नमः पृष्ठे । हिं नमः उदरे । तं नमः नाभौ । न्नों नमः करयोः । रां नमः गुदे । मः नमः लिङ्गे । प्रं नमः ऊर्वोः । चों नमः जान्वोः । दं नमः जङ्घयोः । यात् नमः पादयोः ॥ 🍁 वैष्णवे तु यजेत्पीठे देवाग्राच्च चतुर्दले । जमदग्निं च कालं च रेणुकां काममर्चयेत् ॥ ११॥ अर्थ: वैष्णव पीठ (आसन/यंत्र) में, जो देवताओं में श्रेष्ठ है और चार दलों (पंखुड़ियों) वाला है, उसमें क्रम से जमदग्नि, काल, रेणुका और काम (कामदेव/इच्छाशक्ति) की पूजा करनी चाहिए। 🍁 तद्दलेषु षडङ्गानि तद्बाह्येऽष्टदले यजेत् । दिक्षु वेदान् विदिक्पत्रेषूपवेदांस्ततो यजेत् ॥ १२॥ अर्थ: उन चार दलों में षडङ्ग (मंत्र के छह अंग) का पूजन करें। उसके बाहर स्थित आठ दलों में पूजन करें। फिर आठों दिशाओं में चारों वेदों की, और विदिशाओं (कोणों) में उपवेदों की पूजा करनी चाहिए। 🍁 ततश्चाष्टदले पूज्या विबुद्धाश्चावतारकाः । ब्रह्मास्त्रं वैष्णवास्त्रं च रौद्रं वायव्यमेव च ॥ १३॥ अर्थ: फिर उसी अष्टदल में विद्वान (देव) और अवतारों का पूजन करें। साथ ही ब्रह्मास्त्र, वैष्णवास्त्र, रौद्रास्त्र और वायव्यास्त्र की पूजा करें। 🍁 आग्नेयं चैव नागास्त्रं मोहनं स्तम्भनं तथा । ऐन्द्रपालिकमस्त्रं च महापाशुपतं तथा ॥ १४॥ अर्थ: इसके बाद आग्नेयास्त्र, नागास्त्र, मोहन और स्तम्भन शक्तियाँ, तथा ऐन्द्रास्त्र (इन्द्र का अस्त्र) और महापाशुपतास्त्र का पूजन करें। 🍁 पूजयेद्दशपत्रेषु द्वादशारे ततोऽर्चयेत् । कश्यपं च भरद्वाजं विश्वामित्रं च गौतमम् ॥ १५॥ अर्थ: फिर दस दलों (दशपत्र) में पूजन करें और उसके बाद द्वादशार (१२ खण्ड) में— कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र और गौतम ऋषि की पूजा करें। 🍁 वशिष्ठं नारदं चात्रिं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । याज्ञवल्क्यं भार्गवं च षोडशारे ततो यजेत् ॥ १६॥ अर्थ: इसके बाद वशिष्ठ, नारद, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, याज्ञवल्क्य और भृगु (भार्गव) इन ऋषियों का पूजन षोडशार (१६ खण्ड) में करना चाहिए। 🍁 संहिताश्च पुराणानि मीमांसा न्यायमेव च । साङ्ख्यं पातञ्जलं शिल्पं वेदाङ्गानि च षट् क्रमात् ॥ १७॥ अर्थ: फिर संहिताएँ (वेद), पुराण, मीमांसा, न्याय, सांख्य, योग (पतंजलि) और शिल्पशास्त्र, साथ ही छः वेदांगों का क्रम से पूजन करें। 🍁 सर्वाण्युपपुराणानि चेतिहासपुराणकम् । स्मृतीस्तु भूपुराग्रे च दिगीशानायुधानि च ॥ १८॥ अर्थ: इसके बाद सभी उपपुराण, इतिहास (रामायण, महाभारत आदि) और स्मृतियों का पूजन करें। अंत में भूपुर (यंत्र की बाहरी सीमा) में दिक्पालों (दिशाओं के देवताओं) और उनके आयुधों (शस्त्रों) का पूजन करना चाहिए। 🍁🍁यन्त्र ध्यानम् 🍁🍁 बिन्दुमध्ये श्रीपरशुरामपूजनम् ॥ श्रीपरशुरामं ध्यायामि, आवाहयामि । परशुरामाय नमः । आवाहनं समर्पयामि । पाद्यं समर्पयामि । अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मधुपर्कं समर्पयामि । स्नानं समर्पयामि । वस्त्रालङ्कारान् समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । गन्धान् धारयामि । नानापरिमलपत्रं पुष्पं समर्पयामि । धूपमाघ्रापयामि । दीपं दर्शयामि । नैवेद्यं समर्पयामि । पानीयं उत्तरापोषण, हस्तप्रक्षालनं, पादप्रक्षालनं, आचमनीयं, ताम्बूलं समर्पयामि । कर्पूरनीराजनं दर्शयामि । मन्त्रपुष्पं समर्पयामि । प्रदक्षिणानमस्कारान् समर्पयामि । अनया पूजया श्रीपरशुरामः सुप्रसन्नो वरदो भवतु ॥ चतुर्दले ध्यानमन्त्राः । ॐ जामदग्न्याय नमः । ॐ कालाय नमः । ॐ रेणुकायै नमः । ॐ कामाय नमः ॥ षड्दले ध्यानमन्त्राः । ॐ हृदयाय नमः । ॐ शिरसे स्वाहा । ॐ शिखायै वषट् । ॐ कवचाय हुं । ॐ नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ अस्त्राय फट् ॥ अष्टदले बाह्यदिशायां वेदपूजन एवं ध्यानम् । ऋग्वेदाय नमः । यजुर्वेदाय नमः । सामवेदाय नमः । अथर्ववेदाय नमः । आयुर्वेदाय नमः । गान्धर्ववेदाय नमः । धनुर्वेदाय नमः । स्थापत्यवेदाय नमः ॥ अष्टदले विष्णु अवतारपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ मत्स्याय नमः । ॐ कच्छपाय नमः । ॐ वराहाय नमः । ॐ नृसिंहाय नमः । ॐ वामनाय नमः । ॐ रामाय नमः । ॐ कृष्णाय नमः । ॐ बुद्धाय नमः ॥ दशदले अस्त्रपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ ब्रह्मास्त्राय नमः । ॐ वैष्णवास्त्राय नमः । ॐ रुद्रास्त्राय नमः । ॐ वायव्यास्त्राय नमः । ॐ आग्नेयास्त्राय नमः । ॐ नागास्त्राय नमः । ॐ मोहनास्त्राय नमः । ॐ स्तम्भनास्त्राय नमः । ॐ ऐन्द्रास्त्राय नमः । ॐ महापाशुपतास्त्राय नमः ॥ द्वादशदले ऋषिपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ कश्यपाय नमः । ॐ भरद्वाजाय नमः । ॐ विश्वामित्राय नमः । ॐ गौतमाय नमः । ॐ वशिष्ठाय नमः । ॐ नारदाय नमः । ॐ अत्रये नमः । ॐ पुलस्त्याय नमः । ॐ पुलहाय नमः । ॐ क्रतवे नमः । ॐ याज्ञवल्क्याय नमः । ॐ भार्गवाय नमः ॥ षोडशदले शास्त्रपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ संहितायै नमः । ॐ पुराणाय नमः । ॐ मीमांसायै नमः । ॐ न्यायाय नमः । ॐ साध्याय नमः । ॐ पातञ्जलाय नमः । ॐ शिल्पाय नमः । ॐ शिक्षायै नमः । ॐ कल्पाय नमः । ॐ व्याकरणाय नमः । ॐ छन्दसे नमः । ॐ निरुक्ताय नमः । ॐ ज्योतिषाय नमः । ॐ उपपुराणाय नमः । ॐ इतिहासाय नमः । ॐ स्मृतये नमः ॥ भूपुरेषु दशदिग्पालादिपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ शं कुबेराय नमः । ॐ मं यमाय नमः । ॐ लं इन्द्राय नमः । ॐ वं वरुणाय नमः । ॐ हं ईशानाय नमः । ॐ रं अग्नये नमः । ॐ यं वायवे नमः । ॐ क्षं राक्षसाय नमः । ॐ ह्रीं ब्रह्मणे नमः । ॐ क्लीं विष्णवे नमः । अष्टदिशापूजनं एवं ध्यानम् पूर्वदिशायां ॐ इन्द्राय नमः । दक्षिणपूर्वदिशायां ॐ अग्नये नमः । दक्षिणदिशायां ॐ यमाय नमः । दक्षिणपश्चिमदिशायां ॐ निरृतये नमः । पश्चिमदिशायां ॐ वरुणाय नमः । उत्तरपश्चिम दिशायां ॐ वायवे नमः । उत्तरदिशायां ॐ कुबेराय नमः । उत्तरपूर्वदिशायां ॐ ईशानाय नमः । ईशानपूर्वदिशायां ॐ ब्रह्मणे नमः । नैरृत्यपश्चिमदिशायां ॐ अनन्ताय नमः ॥ दशदिक्पाल आयुधपूजनं एवं मन्त्राः । ॐ वज्राय नमः । ॐ शक्तये नमः । ॐ दण्डाय नमः । ॐ खड्गाय नमः । ॐ पाशाय नमः । ॐ अङ्कुशाय नमः । ॐ गदायै नमः । ॐ त्रिशूलाय नमः । ॐ पद्माय नमः । ॐ चक्राय नमः ॥ 🍁 वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं सिताद्यघृतपायसैः । हुनेद्ब्राह्मणभोज्यान्तं कृत्वा सिद्धो भवेन्मनुः ॥ १९॥ अर्थ: इस मन्त्र का एक लाख (वर्णलक्ष) जप करना चाहिए। फिर घी और खीर (पायस) आदि से हवन करें और अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। ऐसा करने से साधक मन्त्र में सिद्ध हो जाता है। 🍁 ब्रह्मकर्मरतो नित्यं गायत्रीजपतत्परः । स एव जायते सिद्धो नान्यविप्रः कदाचन ॥ २०॥ अर्थ: जो व्यक्ति नित्य ब्राह्मण कर्म में लगा रहता है और गायत्री जप में तत्पर है, वही इस मन्त्र में सिद्ध होता है, अन्य कोई नहीं। 🍁 गायत्र्याः प्रथमं पादं पूर्वकृत्वा जपेन्मनुम् । लक्षं प्राग्वद्धुनेद्रामं सात्त्विकं तत्र चिन्तयेत् ॥ २१॥ अर्थ: गायत्री मन्त्र के प्रथम पाद को जोड़कर इस मन्त्र का जप करें। एक लाख जप कर, पहले बताए अनुसार हवन करें और भगवान परशुराम के सात्त्विक स्वरूप का ध्यान करें। 🍁 सन्तानार्थं विवाहार्थं कृष्यर्थं वर्षणाय च । विषयार्थं धनार्थञ्च वाक्सिद्ध्यर्थमुदाहृतम् ॥ २२॥ अर्थ: यह साधना संतान प्राप्ति, विवाह, कृषि (उत्पादन), वर्षा के लिए, और भोग, धन तथा वाणी की सिद्धि के लिए कही गई है। 🍁 सहस्रमयुतं लक्षं प्रयुतं कोटिमेव च । साध्यकृच्छ्रेऽतिकृच्छ्रे च दैवसाध्ये त्वसाध्यके ॥ २३॥ अर्थ: कार्य की कठिनता के अनुसार जप की संख्या— हजार, दस हजार, लाख, दस लाख, या करोड़ तक रखी जा सकती है। विशेष कठिन (कृच्छ्र) या असाध्य कार्यों में अधिक जप करना चाहिए। 🍁 कार्या जपस्य सङ्ख्येयं क्रमाज्ज्ञेया दशांशतः । होमः सर्वत्र विज्ञेयः प्रत्यवायनिराकृतौ ॥ २४॥ अर्थ: जप की संख्या के अनुसार दशांश (१/१० भाग) हवन करना चाहिए। यह हवन सभी दोषों और विघ्नों को दूर करने के लिए आवश्यक है। 🍁 तावदेव जपेद्विद्वान्गायत्रीजपतत्परः । मनागपि न कर्तव्यो ब्रह्मद्वेषः कदाचन ॥ २५॥ अर्थ: विद्वान साधक को उतना ही जप करना चाहिए और गायत्री जप में लगे रहना चाहिए। कभी भी ब्रह्म (वेद, ब्राह्मण, धर्म) से द्वेष नहीं करना चाहिए। 🍁 गायत्र्या मध्यचरणयुक्तं मन्त्रं जपेद्धुनेत् । तिलौदनाज्यं रामं तु राजसं तत्र भावयेत् ॥ २६॥ अर्थ: गायत्री मन्त्र के मध्य पाद को जोड़कर जप और हवन करें। तिल, चावल और घी से हवन करें और भगवान परशुराम के राजस रूप का ध्यान करें। 🍁 देशग्रामपुरादीनां बालानां च गवामपि । रक्षणं स्यान्महामारी शीतला शान्तये तथा ॥ २७॥ अर्थ: इस (राजस) साधना से देश, गाँव, नगर, बालक और गौओं की रक्षा होती है, और महामारी तथा रोगों (जैसे शीतला) का शमन होता है। 🍁 गायत्र्यन्तिमपादेन युक्तं मन्त्रं जपेद्ध्रुवम् । होमः सर्षपतैलाक्तैस्तामसं चिन्तयेद्विभुम् ॥ २८॥ अर्थ: गायत्री मन्त्र के अंतिम पाद को जोड़कर जप करें। सरसों के तेल से युक्त हवन करें और भगवान परशुराम के तामस (उग्र) स्वरूप का ध्यान करें। 🍁 सर्वशत्रुविनाशः स्याद्रोगादीनां तथा क्षयः । एवं कुर्याद्यमुद्दिश्य तस्य नाशो भवेद्ध्रुवम् ॥ २९॥ अर्थ: इस प्रकार (तामस आदि साधना) करने से सभी शत्रुओं का नाश होता है और रोग आदि भी समाप्त हो जाते हैं। जिस उद्देश्य से यह किया जाए, उसका नाश निश्चित होता है। 🍁 वैशाखे शुक्लपक्षे च तृतीयायां तु वार्षिकी । भवेदस्य महापूजा तां भक्तः प्रयतश्चरेत् ॥ ३०॥ अर्थ: वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया (अक्षय तृतीया) को इसकी वार्षिक महापूजा होती है। भक्त को उस दिन विशेष श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए। 🍁 रामभक्तं द्विजं नत्वा सङ्ग्रामे याति चेन्नृपः । अवश्यं स रिपूञ्जित्वा कुशली स्वगृहं व्रजेत् ॥ ३१॥ अर्थ: जो राजा युद्ध में जाने से पहले परशुराम भक्त ब्राह्मण को प्रणाम करता है, वह निश्चित ही शत्रुओं को जीतकर कुशलता से लौटता है। 🍁 रामभक्तेन यो दत्तः पुस्तके लिखितो मनुः । स तु सिद्धिप्रदो ज्ञेयो नास्ति तस्य पुरस्क्रिया ॥ ३२॥ अर्थ: जो मन्त्र किसी परशुराम भक्त द्वारा लिखकर दिया गया हो, वह स्वतः ही सिद्धिदायक होता है—उसे अलग से सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं। 🍁 यत्किञ्चित्पुस्तकारूढं रामभक्तमुखोद्गतम् । यन्त्रं मन्त्रोऽथवा विद्या तत्सिद्धं नास्ति संशयः ॥ ३३॥ अर्थ: जो भी मन्त्र, यंत्र या विद्या परशुराम भक्त के मुख से निकलकर ग्रंथ में लिखी गई हो—वह निःसंदेह सिद्ध होती है। 🍁 ज्ञात्वा षोडशसंस्कारैः संस्कृतं चार्यवंशजम् । कुलद्वयविशुद्धं तु राममन्त्राधिकारिणम् ॥ ३४॥ अर्थ: जो व्यक्ति सोलह संस्कारों से संस्कारित, श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न, और दोनों कुलों से शुद्ध है—वही परशुराम मन्त्र का अधिकारी है। 🍁 फिरङ्गा यवनाश्चीनाः खुरासानाश्च म्लेच्छजाः । रामभक्तं प्रदृष्ट्वैव त्रस्यन्ति प्रणमन्ति च ॥ ३५॥ अर्थ: फिरंगी, यवन, चीन और अन्य म्लेच्छ लोग भी परशुराम भक्त को देखकर भयभीत होते हैं और प्रणाम करते हैं। 🍁 कृत्वा तु वालुकामूर्तिं श्रीरामस्यार्चयेद्वने । शान्तं शत्रुमदं कुर्यात्कुसुमानि च वै हुनेत् ॥ ३६॥ अर्थ: वन में बालू (रेत) की भगवान परशुराम की मूर्ति बनाकर पूजा करें, और पुष्पों से हवन करें—इससे शत्रु का अहंकार शांत हो जाता है। 🍁 राज्ञोऽमुकस्य कटकं जुहोमीति तथा वदेत् । सप्ताहार्वाक् तस्य सैन्यं नष्टं तावन्मितं भवेत् ॥ ३७॥ अर्थ: हवन करते समय “मैं अमुक राजा की सेना का नाश करता हूँ” ऐसा संकल्प बोले, तो सात दिनों के भीतर उसकी सेना नष्ट हो जाती है। 🍁 महेन्द्राग्रे च काश्यां च यो जपेन्निर्जने वने । वर्षादर्वाक् तस्य रामः प्रत्यक्षो जायते ध्रुवम् ॥ ३८॥ अर्थ: जो व्यक्ति महेन्द्र पर्वत, काशी या एकांत वन में जप करता है, उसे एक वर्ष के भीतर भगवान परशुराम के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। 🍁 सोमवारे काशिकायां गयायां पितृपक्षके । पुष्यार्के पौर्णमास्यां च प्रयागे तु मृगे रवौ ॥ ३९॥ गोदावर्यां सिंहगेऽर्के गङ्गाद्वारे घटस्थिते । सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे रामो गच्छति सर्वदा ॥ ४०॥ अर्थ: सोमवार को काशी, पितृपक्ष में गया, पुष्य नक्षत्र, पूर्णिमा, प्रयाग, गोदावरी, गंगाद्वार (हरिद्वार), और सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र— इन स्थानों और कालों में भगवान परशुराम विशेष रूप से उपस्थित रहते हैं। 🍁 आद्यो रामो जामदग्न्यः क्षत्रियाणां कुलान्तकः । परश्वधधरो दाता मातृहा मातृजीवकः ॥ ४१॥ अर्थ: प्रथम राम (परशुराम) जामदग्नि पुत्र हैं, जो क्षत्रियों के कुल का अंत करने वाले हैं, फरसा धारण करने वाले, दानी, माता का वध करने वाले और पुनः उन्हें जीवित करने वाले हैं। 🍁 समुद्रतीरनिलयो महेशपाठिताखिलः । गोत्राणकृद्गोप्रदाता विप्रक्षत्रियकर्मकृत् ॥ ४२॥ अर्थ: जो समुद्र तट पर निवास करते हैं, जिन्होंने महादेव से सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया, जो गोत्रों की स्थापना करने वाले, गौदान करने वाले और ब्राह्मण-क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले हैं। 🍁 द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । नापमृत्युं न दारिद्र्यं न च वंशक्षयो भवेत् ॥ ४३॥ अर्थ: जो मनुष्य इन बारह नामों का तीनों संध्या में पाठ करता है, उसे न अकाल मृत्यु, न दरिद्रता, और न ही वंश का नाश होता है। 🍁 श्रीमत्परशुरामस्य गायत्र्येषा महाद्भुता । राज्यकृत् कलिभूपानां सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ ४४॥ अर्थ: यह भगवान परशुराम की अद्भुत गायत्री है, जो कलियुग में राजाओं को राज्य प्रदान करने वाली है, और सभी तंत्रों में गुप्त रखी गई है। ॥ इति श्रीमेरुतन्त्रे परशुरामतन्त्रं सम्पूर्णम् ॥ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 04..🌷 परशुरामस्तुति हिन्दी अर्थ सहित 🌷 श्री गणेशाय नमः । 🍁 कुलाचला यस्य महीं द्विजेभ्यः प्रयच्छतः सोमदृषत्त्वमापुः । बभूवुरुत्सर्गजलं समुद्राः स रैणुकेयः श्रियमातनीतु ॥ १॥ अर्थ: जिन भगवान परशुराम ने पृथ्वी को ब्राह्मणों को दान कर दिया, उस समय कुलाचल (पर्वत) मानो चन्द्रमा के समान शीतल हो गए, और समुद्र उनके दान के जल (उत्सर्ग) से परिपूर्ण हो गए। वे माता रेणुका के पुत्र (रैणुकेय) भगवान परशुराम हमें समृद्धि प्रदान करें। 🍁 नाशिष्यः किमभूद्भवः किपभवन्नापुत्रिणी रेणुका नाभूद्विश्वमकार्मुकं किमिति यः प्रीणातु रामत्रपा । विप्राणां प्रतिमन्दिरं मणिगणोन्मिश्राणि दण्डाहतेर्नांब्धीनो स मया यमोऽर्पि महिषेणाम्भांसि नोद्वाहितः ॥ २॥ अर्थ: क्या ऐसा कोई शिष्य था जो उनसे शिक्षा न पाया हो? क्या माता रेणुका कभी पुत्रहीन रहीं? क्या संसार उनके पराक्रम (धनुष) से अछूता रहा?—ऐसे लज्जाशील (विनम्र) राम हमें प्रसन्न करें। जिन्होंने ब्राह्मणों के लिए घर-घर में रत्नों से युक्त भवन बनाए, और अपने दण्ड (पराक्रम) से समुद्रों तक को प्रभावित किया— ऐसे महान परशुराम हमारी रक्षा करें। 🍁 पायाद्वो यमदग्निवंशतिलको वीरव्रतालङ्कृतो रामो नाम मुनीश्वरो नृपवधे भास्वत्कुठारायुधः । येनाशेषहताहिताङ्गरुधिरैः सन्तर्पिताः पूर्वजा भक्त्या चाश्वमखे समुद्रवसना भूर्हन्तकारीकृता ॥ ३॥ अर्थ: यमदग्नि वंश के तिलक, वीर व्रत से सुशोभित, मुनियों में श्रेष्ठ, और हाथ में तेजस्वी फरसा (कुठार) धारण करने वाले भगवान परशुराम आपकी रक्षा करें। जिन्होंने दुष्ट राजाओं का संहार कर उनके रक्त से अपने पितरों को तृप्त किया, और अश्वमेध यज्ञ के द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी को समुद्र सहित दान कर दिया। 🍁 द्वारे कल्पतरुं गृहे सुरगवीं चिन्तामणीनङ्गदे पीयूषं सरसीषु विप्रवदने विद्याश्चतस्रो दश । एव कर्तुमयं तपस्यति भृगोर्वंशावतंसो मुनिः पायाद्वोऽखिलराजकक्षयकरो भूदेवभूषामणिः ॥ ४॥ अर्थ: जिनके प्रभाव से द्वार पर कल्पवृक्ष, घर में कामधेनु, हाथों में चिन्तामणि, सरोवरों में अमृत, और ब्राह्मणों के मुख में चारों वेद तथा अनेक विद्याएँ स्थापित हो जाती हैं— ऐसे भृगुवंश के आभूषण मुनि परशुराम तप करते हैं, जो समस्त दुष्ट राजाओं का नाश करने वाले और ब्राह्मणों के भूषण हैं— वे आपकी रक्षा करें। ॥ इति परशुराममस्तुतिः ॥ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 05..🌷🌷परशुरामाष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् 🌷🌷 हिन्दी अर्थ सहित श्री गणेशाय नमः । 🍁 यमाहुर्वासुदेवांशं हैहयानां कुलान्तकम् । त्रिःसप्तकृत्वो य इमां चक्रे निःक्षत्रियां महीम् ॥ १॥ अर्थ: जिन्हें वासुदेव (भगवान विष्णु) का अंश कहा जाता है, जिन्होंने हैहय वंश का नाश किया, और इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया—उन परशुराम को प्रणाम। 🍁 दुष्टं क्षत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत् । तस्य नामानि पुण्यानि वच्मि ते पुरुषर्षभ ॥ २॥ अर्थ: उन्होंने दुष्ट और अधर्मी क्षत्रियों के रूप में पृथ्वी के भार को दूर किया। हे श्रेष्ठ पुरुष! अब मैं उनके पवित्र नामों का वर्णन करता हूँ। 🍁 भूभारहरणार्थाय मायामानुषविग्रहः । जनार्दनांशसम्भूतः स्थित्युत्पत्त्यप्ययेश्वरः ॥ ३॥ अर्थ: पृथ्वी का भार हटाने के लिए जिन्होंने मानव रूप धारण किया, जो भगवान विष्णु (जनार्दन) के अंश से उत्पन्न हैं, और सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के स्वामी हैं। 🍁 भार्गवो जामदग्न्यश्च पित्राज्ञापरिपालकः । मातृप्राणप्रदो धीमान् क्षत्रियान्तकरः प्रभुः ॥ ४॥ अर्थ: वे भृगुवंशी, जमदग्नि के पुत्र, पिता की आज्ञा का पालन करने वाले, माता को पुनः जीवन देने वाले, बुद्धिमान और क्षत्रियों का अंत करने वाले प्रभु हैं। 🍁 रामः परशुहस्तश्च कार्तवीर्यमदापहः । रेणुकादुःखशोकघ्नो विशोकः शोकनाशनः ॥ ५॥ अर्थ: वे राम हैं, हाथ में फरसा धारण करने वाले, कार्तवीर्य अर्जुन के अहंकार को नष्ट करने वाले, माता रेणुका के दुःख का नाश करने वाले, स्वयं शोक रहित और सबका शोक हरने वाले हैं। 🍁 नवीननीरदश्यामो रक्तोत्पलविलोचनः । घोरो दण्डधरो धीरो ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रियः ॥ ६॥ अर्थ: वे नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण वाले, लाल कमल के समान नेत्रों वाले हैं। भयंकर, दण्ड धारण करने वाले, धीर, ब्राह्मणों के हितैषी और प्रिय हैं। 🍁 तपोधनो महेन्द्रादौ न्यस्तदण्डः प्रशान्तधीः । उपगीयमानचरितः सिद्धगन्धर्वचारणैः ॥ ७॥ अर्थ: वे तप के धनी हैं, महेन्द्र पर्वत आदि पर निवास करते हैं, जिन्होंने क्रोध का त्याग कर शान्त चित्त धारण किया है, और जिनके चरित्र का गान सिद्ध, गंधर्व और चारण करते हैं। 🍁 जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखशोकभयातिगः । इत्यष्टाविंशतिर्नाम्नामुक्ता स्तोत्रात्मिका शुभा ॥ ८॥ अर्थ: वे जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग, दुःख, शोक और भय से परे हैं। इस प्रकार ये अट्ठाईस (२८) नामों का शुभ स्तोत्र कहा गया। 🍁 अनया प्रीयतां देवो जामदग्न्यो महेश्वरः । नेदं स्तोत्रमशान्ताय नादान्तायातपस्विने ॥ ९॥ अर्थ: इस स्तोत्र से भगवान जमदग्नि पुत्र परशुराम प्रसन्न हों। यह स्तोत्र अशांत, असंयमी और तपहीन व्यक्ति को नहीं देना चाहिए। 🍁 नावेदविदुषे वाच्यमशिष्याय खलाय च । नासूयकायानृजवे न चानिर्दिष्टकारिणे ॥ १०॥ अर्थ: इसे वेद न जानने वाले, शिष्य न होने वाले, दुष्ट, ईर्ष्यालु, कपटी और अनुशासनहीन व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। 🍁 इदं प्रियाय पुत्राय शिष्यायानुगताय च । रहस्यधर्मो वक्तव्यो नान्यस्मै तु कदाचन ॥ ११॥ अर्थ: यह स्तोत्र केवल प्रिय, योग्य पुत्र, शिष्य या आज्ञाकारी व्यक्ति को ही बताना चाहिए। यह एक गुप्त धर्म है, जिसे किसी अन्य को नहीं बताना चाहिए। ॥ इति परशुराम अष्टाविंशति नाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 भागवताचार्य पंडित पवन कृष्ण शास्त्री
अवश्य अध्ययन करें श्रीपरशुराम प्रातःस्मरणम् एवं अन्य स्तुतियां हिन्दी अर्थ सहित 01..🌷श्रीपरशुराम प्रातःस्मरणम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷 2...🌷🌷परशुरामध्यानम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷🌷 03.🌷श्रीपरशुरामतन्त्रं मेरुतन्त्रान्तर्गतम् 🌷🌷 (हिन्दी अर्थ सहित) 04..🌷 परशुरामस्तुति हिन्दी अर्थ सहित 🌷 05..🌷🌷परशुरामाष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् 🌷 ( हिन्दी अर्थ सहित ) **************************************** 01..🌷श्रीपरशुराम प्रातःस्मरणम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷 🍁 प्रातःस्मरामि भृगुनाथमुखारविन्दं प्रातर्नमामि भृगुनाथपदारविन्दम् । प्रातर्जपामि वचसा भृगुनाथनामं प्रातर्भजामि भृगुनाथमनाथबन्धुम् ॥ १॥ अर्थ: मैं प्रातःकाल में भगवान परशुराम (भृगुनाथ) के कमल के समान मुख का स्मरण करता हूँ। उनके चरणकमलों को नमस्कार करता हूँ। उनके पवित्र नाम का जप करता हूँ और उन अनाथों के सहायक प्रभु का भजन करता हूँ। 🍁 श्रीरामभार्गवपदं मनसा भजामि श्रीरामभार्गवपदं वचसा स्मरामि । श्रीरामभार्गवपदं हि सदा नमामि श्रीरामभार्गवपदं शरणं प्रपद्ये ॥ २॥ अर्थ: मैं मन से श्री भार्गवराम (परशुराम) के चरणों का भजन करता हूँ। वाणी से उनका स्मरण करता हूँ। सदा उन्हें नमस्कार करता हूँ और उनके चरणों की शरण ग्रहण करता हूँ। 🍁 श्रीभार्गवं ब्रह्मसमानरूपं जितेन्द्रियं वेदविदां वरिष्ठम् । श्रीरेणुकायाः जठरात्प्रसूतं नमामि मूर्ध्ना जमदग्निपुत्रम् ॥ ३॥ अर्थ: मैं उन भगवान भार्गव (परशुराम) को प्रणाम करता हूँ जो ब्रह्मा के समान तेजस्वी हैं, इन्द्रियों को जीतने वाले हैं, और वेदज्ञों में श्रेष्ठ हैं। जो माता रेणुका के गर्भ से उत्पन्न हुए और ऋषि जमदग्नि के पुत्र हैं। 🍁 नमः परशुरामाय जामदग्न्याय ते नमः । ब्रह्मदेवाय देवाय रेणुकासूनवे नमः ॥ ४॥ अर्थ: परशुराम जी को नमस्कार है, जो जमदग्नि के पुत्र हैं। जो ब्रह्मस्वरूप देव हैं और माता रेणुका के पुत्र हैं—उन्हें बारंबार नमस्कार। 🍁 दुःखदारिद्र्यहर्तारं दातारं सर्वसम्पदाम् । परशुरामं महावीरं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥ ५॥ अर्थ: मैं बार-बार उस महावीर परशुराम को प्रणाम करता हूँ, जो दुःख और दरिद्रता का नाश करने वाले हैं और सभी प्रकार की संपत्तियों के दाता हैं। 🍁(फलश्रुति) श्लोकपञ्चकमिदं स्तोत्रं प्रातःकाले तु यः पठेत् । सर्वदुःखविनिर्मुक्तो सर्वत्र विजयी भवेत् ॥ ६॥ अर्थ: जो मनुष्य इस पाँच श्लोकों वाले स्तोत्र का प्रातःकाल में पाठ करता है, वह सभी दुःखों से मुक्त होकर हर जगह विजय प्राप्त करता है। इति बद्रीप्रसादमहर्षिकृतं प्रातःस्मरणं सम्पूर्णम् ॥ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 2...🌷🌷परशुरामध्यानम् हिन्दी अर्थ सहित 🌷🌷 परशुरामजी की उपासना सात्त्विक, राजस और तामस रूप में की जाती है तब छिन्नमस्ता के यन्त्र में ही उनकी पूजा होती है और परशुराम गायत्री का जप किया जाता है । यथा- ब्रह्मक्षेत्राय विद्महे, क्षत्रियान्ताय धीमहि । तन्नो रामः प्रचोदयात् । यह परशुराम गायत्री अद्भुत है । राज्य एवं वैभव प्रदान करने वाली है । इसके ऋषि भारद्वाज, छन्द गायत्री, देवता श्री परशुराम हैं । इनका सात्त्विक ध्यान इस प्रकार है- 🍁 सात्त्विकं श्वेतवर्णं च भस्मोद्धूलितविग्रहम् । अग्निहोत्रस्थलासीनं नानामुनिगणावृतम् । कम्बलासनमारूढं स्वर्णतारकुशाङ्गुलिम् । श्वेतवस्त्रद्वयोपेतं जुह्वन्तं राममाश्रये ॥ अर्थ मैं उन भगवान परशुराम का आश्रय ग्रहण करता हूँ— जो सात्त्विक स्वरूप वाले, श्वेत (सफेद) वर्ण के हैं, जिनका शरीर भस्म (विभूति) से अभिषिक्त (लिप्त) है। जो अग्निहोत्र के स्थान में विराजमान हैं, और जिनके चारों ओर अनेक मुनियों का समूह उपस्थित है। जो कम्बल के आसन पर बैठे हुए हैं, और जिनकी उँगलियों में स्वर्णमय कुश (यज्ञोपयोगी पवित्र घास) धारण है। जो श्वेत वस्त्रों से अलंकृत हैं, और अग्नि में आहुति (हवन) देते हुए स्थित हैं— ऐसे परम तपस्वी भगवान परशुराम का मैं ध्यान करता हूँ। इति रुद्रयामले तन्त्रे परशुरामध्यानं सम्पूर्णम् । 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 03.🌷श्रीपरशुरामतन्त्रं मेरुतन्त्रान्तर्गतम् 🌷🌷 (हिन्दी अर्थ सहित) । अथ मेरुतन्त्रोक्तं श्रीपरशुरामतन्त्रम् । 🍁 अथातः सम्प्रवक्ष्यामि राममन्त्रं समाहृतम् । आकल्पमेक एवायं जामदग्न्यो महाबलः ॥ १॥ अर्थ: अब मैं भगवान परशुराम के इस संकलित (समाहित) मंत्र का वर्णन करता हूँ। यह जामदग्नि पुत्र महाबली परशुराम एक ही रूप में कल्प-कल्प तक स्थित रहते हैं। श्लोक (अगला भाग) दुष्टक्षत्रतमोध्वंसी रेणुकोद्भूतभास्करः । अर्थ: वे दुष्ट क्षत्रियों के अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाले हैं, और माता रेणुका से उत्पन्न सूर्य के समान तेजस्वी हैं। 🍁मन्त्र (परशुराम गायत्री) ब्रह्मक्षत्राय विद्महे क्षत्रियान्ताय धीमहि । तन्नो रामः प्रचोदयात् ॥ अर्थ: हम उस परशुराम को जानते हैं जो ब्रह्म और क्षत्र (दोनों शक्तियों) के अधिपति हैं, जो क्षत्रियों के अंत (अधर्म का नाश) करने वाले हैं— वे भगवान राम (परशुराम) हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। भारद्वाजमुनिप्रोक्तो गायत्रं छन्द ईरितम् ॥ २॥ अर्थ: इस मंत्र के ऋषि भारद्वाज मुनि हैं और इसका छन्द गायत्री है। 🍁 श्रीमान्परशुरामोऽस्य देवता भक्तवत्सलः । अष्टेषु त्र्यक्षिवेदार्णैर्मनोः प्रोक्तं षडङ्गकम् ॥ ३॥ अर्थ: इस मंत्र के देवता भक्तवत्सल भगवान परशुराम हैं। इसके षडङ्ग (छः अंग) वेदों और मन्त्रों के अक्षरों के अनुसार बताए गए हैं। 🍁 नेत्रयोः कर्णयोर्नासाद्वये चाधरयुग्मके । स्तनयोर्भुजयोः पार्श्वद्वयेंऽघ्र्योर्विन्यसेत्पदम् ॥ ४॥ अर्थ: मंत्र के अक्षरों का न्यास (स्थापन) नेत्रों, कानों, नासिका, अधरों, स्तनों, भुजाओं, पार्श्वों और पैरों में करना चाहिए। 🍁 आधारे हृदये मूर्ध्नि क्रमात्पादान्प्रविन्यसेत् । के दृशि श्रोत्रनासायां कपोले हनुवक्रयोः ॥ ५॥ अर्थ: मूलाधार, हृदय और मस्तक में क्रम से मंत्र का विन्यास करें। फिर नेत्र, कान, नाक, गाल और ठोड़ी आदि अंगों में भी स्थापित करें। 🍁 कण्ठांसबाहुहस्तेषु पार्श्वहृत्पृष्ठकोदरे । नाभिकट्योर्गुदे लिङ्गे ऊर्वोर्वा जानुजङ्घयोः ॥ ६॥ अर्थ: कण्ठ, कंधे, भुजाएँ, हाथ, पार्श्व, हृदय, पीठ, उदर, नाभि, कटि, गुदा, लिंग, जांघ, घुटने और पिंडलियों में भी मंत्र का न्यास करें। 🍁(समापन न्यास निर्देश) पादे च विन्यसेद्वर्णान्ततो ध्यायेत्त्रिधा तनुम् । अर्थ: अंत में पैरों में भी मंत्र का विन्यास करके, भगवान परशुराम के तीनों (सात्त्विक, राजस, तामस) रूपों का ध्यान करें। ( सात्त्विक ध्यान) सात्त्विके श्वेतवर्णं च भस्मोद्धूलितविग्रहम् ॥ ७॥ अर्थ: सात्त्विक रूप में भगवान परशुराम श्वेत वर्ण के हैं और उनके शरीर पर भस्म लगी है। 🍁 (विस्तृत सात्त्विक ध्यान) किरीटिनं कुण्डलिनं वरं स्वक्षवराभयान् । करैर्दधानं तरलं विप्रं क्षत्रवधोद्यतम् । पीताम्बरधरं कामरूपं बालानिरीक्षितम् ॥ ८॥ अर्थ: वे मुकुट और कुण्डल धारण किए हुए हैं, हाथों में वरदान और अभय देने की मुद्रा रखते हैं, ब्राह्मण स्वरूप होते हुए भी अधर्मी क्षत्रियों के विनाश के लिए तत्पर हैं। पीताम्बर धारण किए हुए, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, और भक्तों पर स्नेहपूर्वक दृष्टि रखने वाले हैं। 🍁 तामस ध्यान ध्यायेच्च तामसं क्षत्रं रुधिराक्तपरश्वधम् । आरक्तनेत्रकर्णस्थब्रह्मसूत्रं यमप्रभम् ॥ ९॥ अर्थ: तामस रूप में परशुराम को ध्यान करें— जो रक्त से सने हुए परशु (फरसा) धारण किए हैं, जिनकी आँखें लाल हैं, और जो यमराज के समान भयंकर प्रतीत होते हैं। 🍁 राजस ध्यान धनुष्टङ्कारनिर्घोषसन्त्रस्तभुवनत्रयम् । चतुर्बाहुं मुसलिनं राजसं क्रुद्धमेव च ॥ १०॥ अर्थ: राजस रूप में भगवान परशुराम धनुष की टंकार से तीनों लोकों को भयभीत करने वाले हैं, चार भुजाओं वाले, हाथ में गदा (मुसल) धारण किए हुए, और क्रोधयुक्त (उग्र) स्वरूप वाले हैं। 🍁विनियोगः अस्य श्रीपरशुराममन्त्रस्य भरद्वाज ऋषिः । भक्तवत्सल श्रीपरशुरामो देवता । गायत्री छन्दः । श्रीपरशुरामप्रीत्यर्थं अभीष्ठसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः ॥ करन्यासः ब्रह्मक्षत्राय विद्महे अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । तन्नो अनामिकाभ्यां नमः । क्षत्रियान्ताय तर्जनीभ्यां नमः । रामः कनिष्ठिकाभ्यां नमः । धीमहि मध्यमाभ्यां नमः । प्रचोदयात् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ हृदयादि न्यासः ब्रह्मक्षत्राय विद्महे हृदयाय नमः । तन्नो कवचाय हुम् । क्षत्रियान्ताय शिरसे स्वाहा । रामः नेत्रत्रयाय वौषट् । धीमहि शिखायै वषट् । प्रचोदयात् अस्त्राय फट् ॥ मन्त्र पदन्यासः ब्रह्मक्षत्राय विद्महे नेत्रयोः । तन्नो अधरयुग्मके । क्षत्रियान्ताय कर्णयोः । रामः स्तनयोः भुजयोः । धीमहि नासाद्वये । प्रचोदयात् पार्श्वयुग्मके अङ्घ्र्योः ॥ मन्त्र वर्णन्यासः ब्रं नमः मूलाधारे । ह्मं नमः हृदये । क्षं नमः मूर्ध्नि । त्रां नमः नेत्रत्रय्यओः । नेत्रत्रयेषु यं नमः कर्णयोः । विद् नमः नासायां । मं नमः कपोले । हें नमः हनौ । क्षं नमः वक्त्रे । त्रिं नमः कण्ठे । यां नमः बाह्वोः । न्तां नमः हस्तयोः । यं नमः पार्श्वे । धीं नमः हृदये । मं नमः पृष्ठे । हिं नमः उदरे । तं नमः नाभौ । न्नों नमः करयोः । रां नमः गुदे । मः नमः लिङ्गे । प्रं नमः ऊर्वोः । चों नमः जान्वोः । दं नमः जङ्घयोः । यात् नमः पादयोः ॥ 🍁 वैष्णवे तु यजेत्पीठे देवाग्राच्च चतुर्दले । जमदग्निं च कालं च रेणुकां काममर्चयेत् ॥ ११॥ अर्थ: वैष्णव पीठ (आसन/यंत्र) में, जो देवताओं में श्रेष्ठ है और चार दलों (पंखुड़ियों) वाला है, उसमें क्रम से जमदग्नि, काल, रेणुका और काम (कामदेव/इच्छाशक्ति) की पूजा करनी चाहिए। 🍁 तद्दलेषु षडङ्गानि तद्बाह्येऽष्टदले यजेत् । दिक्षु वेदान् विदिक्पत्रेषूपवेदांस्ततो यजेत् ॥ १२॥ अर्थ: उन चार दलों में षडङ्ग (मंत्र के छह अंग) का पूजन करें। उसके बाहर स्थित आठ दलों में पूजन करें। फिर आठों दिशाओं में चारों वेदों की, और विदिशाओं (कोणों) में उपवेदों की पूजा करनी चाहिए। 🍁 ततश्चाष्टदले पूज्या विबुद्धाश्चावतारकाः । ब्रह्मास्त्रं वैष्णवास्त्रं च रौद्रं वायव्यमेव च ॥ १३॥ अर्थ: फिर उसी अष्टदल में विद्वान (देव) और अवतारों का पूजन करें। साथ ही ब्रह्मास्त्र, वैष्णवास्त्र, रौद्रास्त्र और वायव्यास्त्र की पूजा करें। 🍁 आग्नेयं चैव नागास्त्रं मोहनं स्तम्भनं तथा । ऐन्द्रपालिकमस्त्रं च महापाशुपतं तथा ॥ १४॥ अर्थ: इसके बाद आग्नेयास्त्र, नागास्त्र, मोहन और स्तम्भन शक्तियाँ, तथा ऐन्द्रास्त्र (इन्द्र का अस्त्र) और महापाशुपतास्त्र का पूजन करें। 🍁 पूजयेद्दशपत्रेषु द्वादशारे ततोऽर्चयेत् । कश्यपं च भरद्वाजं विश्वामित्रं च गौतमम् ॥ १५॥ अर्थ: फिर दस दलों (दशपत्र) में पूजन करें और उसके बाद द्वादशार (१२ खण्ड) में— कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र और गौतम ऋषि की पूजा करें। 🍁 वशिष्ठं नारदं चात्रिं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम् । याज्ञवल्क्यं भार्गवं च षोडशारे ततो यजेत् ॥ १६॥ अर्थ: इसके बाद वशिष्ठ, नारद, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, याज्ञवल्क्य और भृगु (भार्गव) इन ऋषियों का पूजन षोडशार (१६ खण्ड) में करना चाहिए। 🍁 संहिताश्च पुराणानि मीमांसा न्यायमेव च । साङ्ख्यं पातञ्जलं शिल्पं वेदाङ्गानि च षट् क्रमात् ॥ १७॥ अर्थ: फिर संहिताएँ (वेद), पुराण, मीमांसा, न्याय, सांख्य, योग (पतंजलि) और शिल्पशास्त्र, साथ ही छः वेदांगों का क्रम से पूजन करें। 🍁 सर्वाण्युपपुराणानि चेतिहासपुराणकम् । स्मृतीस्तु भूपुराग्रे च दिगीशानायुधानि च ॥ १८॥ अर्थ: इसके बाद सभी उपपुराण, इतिहास (रामायण, महाभारत आदि) और स्मृतियों का पूजन करें। अंत में भूपुर (यंत्र की बाहरी सीमा) में दिक्पालों (दिशाओं के देवताओं) और उनके आयुधों (शस्त्रों) का पूजन करना चाहिए। 🍁🍁यन्त्र ध्यानम् 🍁🍁 बिन्दुमध्ये श्रीपरशुरामपूजनम् ॥ श्रीपरशुरामं ध्यायामि, आवाहयामि । परशुरामाय नमः । आवाहनं समर्पयामि । पाद्यं समर्पयामि । अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मधुपर्कं समर्पयामि । स्नानं समर्पयामि । वस्त्रालङ्कारान् समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । गन्धान् धारयामि । नानापरिमलपत्रं पुष्पं समर्पयामि । धूपमाघ्रापयामि । दीपं दर्शयामि । नैवेद्यं समर्पयामि । पानीयं उत्तरापोषण, हस्तप्रक्षालनं, पादप्रक्षालनं, आचमनीयं, ताम्बूलं समर्पयामि । कर्पूरनीराजनं दर्शयामि । मन्त्रपुष्पं समर्पयामि । प्रदक्षिणानमस्कारान् समर्पयामि । अनया पूजया श्रीपरशुरामः सुप्रसन्नो वरदो भवतु ॥ चतुर्दले ध्यानमन्त्राः । ॐ जामदग्न्याय नमः । ॐ कालाय नमः । ॐ रेणुकायै नमः । ॐ कामाय नमः ॥ षड्दले ध्यानमन्त्राः । ॐ हृदयाय नमः । ॐ शिरसे स्वाहा । ॐ शिखायै वषट् । ॐ कवचाय हुं । ॐ नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ अस्त्राय फट् ॥ अष्टदले बाह्यदिशायां वेदपूजन एवं ध्यानम् । ऋग्वेदाय नमः । यजुर्वेदाय नमः । सामवेदाय नमः । अथर्ववेदाय नमः । आयुर्वेदाय नमः । गान्धर्ववेदाय नमः । धनुर्वेदाय नमः । स्थापत्यवेदाय नमः ॥ अष्टदले विष्णु अवतारपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ मत्स्याय नमः । ॐ कच्छपाय नमः । ॐ वराहाय नमः । ॐ नृसिंहाय नमः । ॐ वामनाय नमः । ॐ रामाय नमः । ॐ कृष्णाय नमः । ॐ बुद्धाय नमः ॥ दशदले अस्त्रपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ ब्रह्मास्त्राय नमः । ॐ वैष्णवास्त्राय नमः । ॐ रुद्रास्त्राय नमः । ॐ वायव्यास्त्राय नमः । ॐ आग्नेयास्त्राय नमः । ॐ नागास्त्राय नमः । ॐ मोहनास्त्राय नमः । ॐ स्तम्भनास्त्राय नमः । ॐ ऐन्द्रास्त्राय नमः । ॐ महापाशुपतास्त्राय नमः ॥ द्वादशदले ऋषिपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ कश्यपाय नमः । ॐ भरद्वाजाय नमः । ॐ विश्वामित्राय नमः । ॐ गौतमाय नमः । ॐ वशिष्ठाय नमः । ॐ नारदाय नमः । ॐ अत्रये नमः । ॐ पुलस्त्याय नमः । ॐ पुलहाय नमः । ॐ क्रतवे नमः । ॐ याज्ञवल्क्याय नमः । ॐ भार्गवाय नमः ॥ षोडशदले शास्त्रपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ संहितायै नमः । ॐ पुराणाय नमः । ॐ मीमांसायै नमः । ॐ न्यायाय नमः । ॐ साध्याय नमः । ॐ पातञ्जलाय नमः । ॐ शिल्पाय नमः । ॐ शिक्षायै नमः । ॐ कल्पाय नमः । ॐ व्याकरणाय नमः । ॐ छन्दसे नमः । ॐ निरुक्ताय नमः । ॐ ज्योतिषाय नमः । ॐ उपपुराणाय नमः । ॐ इतिहासाय नमः । ॐ स्मृतये नमः ॥ भूपुरेषु दशदिग्पालादिपूजनं एवं ध्यानम् । ॐ शं कुबेराय नमः । ॐ मं यमाय नमः । ॐ लं इन्द्राय नमः । ॐ वं वरुणाय नमः । ॐ हं ईशानाय नमः । ॐ रं अग्नये नमः । ॐ यं वायवे नमः । ॐ क्षं राक्षसाय नमः । ॐ ह्रीं ब्रह्मणे नमः । ॐ क्लीं विष्णवे नमः । अष्टदिशापूजनं एवं ध्यानम् पूर्वदिशायां ॐ इन्द्राय नमः । दक्षिणपूर्वदिशायां ॐ अग्नये नमः । दक्षिणदिशायां ॐ यमाय नमः । दक्षिणपश्चिमदिशायां ॐ निरृतये नमः । पश्चिमदिशायां ॐ वरुणाय नमः । उत्तरपश्चिम दिशायां ॐ वायवे नमः । उत्तरदिशायां ॐ कुबेराय नमः । उत्तरपूर्वदिशायां ॐ ईशानाय नमः । ईशानपूर्वदिशायां ॐ ब्रह्मणे नमः । नैरृत्यपश्चिमदिशायां ॐ अनन्ताय नमः ॥ दशदिक्पाल आयुधपूजनं एवं मन्त्राः । ॐ वज्राय नमः । ॐ शक्तये नमः । ॐ दण्डाय नमः । ॐ खड्गाय नमः । ॐ पाशाय नमः । ॐ अङ्कुशाय नमः । ॐ गदायै नमः । ॐ त्रिशूलाय नमः । ॐ पद्माय नमः । ॐ चक्राय नमः ॥ 🍁 वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं सिताद्यघृतपायसैः । हुनेद्ब्राह्मणभोज्यान्तं कृत्वा सिद्धो भवेन्मनुः ॥ १९॥ अर्थ: इस मन्त्र का एक लाख (वर्णलक्ष) जप करना चाहिए। फिर घी और खीर (पायस) आदि से हवन करें और अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। ऐसा करने से साधक मन्त्र में सिद्ध हो जाता है। 🍁 ब्रह्मकर्मरतो नित्यं गायत्रीजपतत्परः । स एव जायते सिद्धो नान्यविप्रः कदाचन ॥ २०॥ अर्थ: जो व्यक्ति नित्य ब्राह्मण कर्म में लगा रहता है और गायत्री जप में तत्पर है, वही इस मन्त्र में सिद्ध होता है, अन्य कोई नहीं। 🍁 गायत्र्याः प्रथमं पादं पूर्वकृत्वा जपेन्मनुम् । लक्षं प्राग्वद्धुनेद्रामं सात्त्विकं तत्र चिन्तयेत् ॥ २१॥ अर्थ: गायत्री मन्त्र के प्रथम पाद को जोड़कर इस मन्त्र का जप करें। एक लाख जप कर, पहले बताए अनुसार हवन करें और भगवान परशुराम के सात्त्विक स्वरूप का ध्यान करें। 🍁 सन्तानार्थं विवाहार्थं कृष्यर्थं वर्षणाय च । विषयार्थं धनार्थञ्च वाक्सिद्ध्यर्थमुदाहृतम् ॥ २२॥ अर्थ: यह साधना संतान प्राप्ति, विवाह, कृषि (उत्पादन), वर्षा के लिए, और भोग, धन तथा वाणी की सिद्धि के लिए कही गई है। 🍁 सहस्रमयुतं लक्षं प्रयुतं कोटिमेव च । साध्यकृच्छ्रेऽतिकृच्छ्रे च दैवसाध्ये त्वसाध्यके ॥ २३॥ अर्थ: कार्य की कठिनता के अनुसार जप की संख्या— हजार, दस हजार, लाख, दस लाख, या करोड़ तक रखी जा सकती है। विशेष कठिन (कृच्छ्र) या असाध्य कार्यों में अधिक जप करना चाहिए। 🍁 कार्या जपस्य सङ्ख्येयं क्रमाज्ज्ञेया दशांशतः । होमः सर्वत्र विज्ञेयः प्रत्यवायनिराकृतौ ॥ २४॥ अर्थ: जप की संख्या के अनुसार दशांश (१/१० भाग) हवन करना चाहिए। यह हवन सभी दोषों और विघ्नों को दूर करने के लिए आवश्यक है। 🍁 तावदेव जपेद्विद्वान्गायत्रीजपतत्परः । मनागपि न कर्तव्यो ब्रह्मद्वेषः कदाचन ॥ २५॥ अर्थ: विद्वान साधक को उतना ही जप करना चाहिए और गायत्री जप में लगे रहना चाहिए। कभी भी ब्रह्म (वेद, ब्राह्मण, धर्म) से द्वेष नहीं करना चाहिए। 🍁 गायत्र्या मध्यचरणयुक्तं मन्त्रं जपेद्धुनेत् । तिलौदनाज्यं रामं तु राजसं तत्र भावयेत् ॥ २६॥ अर्थ: गायत्री मन्त्र के मध्य पाद को जोड़कर जप और हवन करें। तिल, चावल और घी से हवन करें और भगवान परशुराम के राजस रूप का ध्यान करें। 🍁 देशग्रामपुरादीनां बालानां च गवामपि । रक्षणं स्यान्महामारी शीतला शान्तये तथा ॥ २७॥ अर्थ: इस (राजस) साधना से देश, गाँव, नगर, बालक और गौओं की रक्षा होती है, और महामारी तथा रोगों (जैसे शीतला) का शमन होता है। 🍁 गायत्र्यन्तिमपादेन युक्तं मन्त्रं जपेद्ध्रुवम् । होमः सर्षपतैलाक्तैस्तामसं चिन्तयेद्विभुम् ॥ २८॥ अर्थ: गायत्री मन्त्र के अंतिम पाद को जोड़कर जप करें। सरसों के तेल से युक्त हवन करें और भगवान परशुराम के तामस (उग्र) स्वरूप का ध्यान करें। 🍁 सर्वशत्रुविनाशः स्याद्रोगादीनां तथा क्षयः । एवं कुर्याद्यमुद्दिश्य तस्य नाशो भवेद्ध्रुवम् ॥ २९॥ अर्थ: इस प्रकार (तामस आदि साधना) करने से सभी शत्रुओं का नाश होता है और रोग आदि भी समाप्त हो जाते हैं। जिस उद्देश्य से यह किया जाए, उसका नाश निश्चित होता है। 🍁 वैशाखे शुक्लपक्षे च तृतीयायां तु वार्षिकी । भवेदस्य महापूजा तां भक्तः प्रयतश्चरेत् ॥ ३०॥ अर्थ: वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया (अक्षय तृतीया) को इसकी वार्षिक महापूजा होती है। भक्त को उस दिन विशेष श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए। 🍁 रामभक्तं द्विजं नत्वा सङ्ग्रामे याति चेन्नृपः । अवश्यं स रिपूञ्जित्वा कुशली स्वगृहं व्रजेत् ॥ ३१॥ अर्थ: जो राजा युद्ध में जाने से पहले परशुराम भक्त ब्राह्मण को प्रणाम करता है, वह निश्चित ही शत्रुओं को जीतकर कुशलता से लौटता है। 🍁 रामभक्तेन यो दत्तः पुस्तके लिखितो मनुः । स तु सिद्धिप्रदो ज्ञेयो नास्ति तस्य पुरस्क्रिया ॥ ३२॥ अर्थ: जो मन्त्र किसी परशुराम भक्त द्वारा लिखकर दिया गया हो, वह स्वतः ही सिद्धिदायक होता है—उसे अलग से सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं। 🍁 यत्किञ्चित्पुस्तकारूढं रामभक्तमुखोद्गतम् । यन्त्रं मन्त्रोऽथवा विद्या तत्सिद्धं नास्ति संशयः ॥ ३३॥ अर्थ: जो भी मन्त्र, यंत्र या विद्या परशुराम भक्त के मुख से निकलकर ग्रंथ में लिखी गई हो—वह निःसंदेह सिद्ध होती है। 🍁 ज्ञात्वा षोडशसंस्कारैः संस्कृतं चार्यवंशजम् । कुलद्वयविशुद्धं तु राममन्त्राधिकारिणम् ॥ ३४॥ अर्थ: जो व्यक्ति सोलह संस्कारों से संस्कारित, श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न, और दोनों कुलों से शुद्ध है—वही परशुराम मन्त्र का अधिकारी है। 🍁 फिरङ्गा यवनाश्चीनाः खुरासानाश्च म्लेच्छजाः । रामभक्तं प्रदृष्ट्वैव त्रस्यन्ति प्रणमन्ति च ॥ ३५॥ अर्थ: फिरंगी, यवन, चीन और अन्य म्लेच्छ लोग भी परशुराम भक्त को देखकर भयभीत होते हैं और प्रणाम करते हैं। 🍁 कृत्वा तु वालुकामूर्तिं श्रीरामस्यार्चयेद्वने । शान्तं शत्रुमदं कुर्यात्कुसुमानि च वै हुनेत् ॥ ३६॥ अर्थ: वन में बालू (रेत) की भगवान परशुराम की मूर्ति बनाकर पूजा करें, और पुष्पों से हवन करें—इससे शत्रु का अहंकार शांत हो जाता है। 🍁 राज्ञोऽमुकस्य कटकं जुहोमीति तथा वदेत् । सप्ताहार्वाक् तस्य सैन्यं नष्टं तावन्मितं भवेत् ॥ ३७॥ अर्थ: हवन करते समय “मैं अमुक राजा की सेना का नाश करता हूँ” ऐसा संकल्प बोले, तो सात दिनों के भीतर उसकी सेना नष्ट हो जाती है। 🍁 महेन्द्राग्रे च काश्यां च यो जपेन्निर्जने वने । वर्षादर्वाक् तस्य रामः प्रत्यक्षो जायते ध्रुवम् ॥ ३८॥ अर्थ: जो व्यक्ति महेन्द्र पर्वत, काशी या एकांत वन में जप करता है, उसे एक वर्ष के भीतर भगवान परशुराम के प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। 🍁 सोमवारे काशिकायां गयायां पितृपक्षके । पुष्यार्के पौर्णमास्यां च प्रयागे तु मृगे रवौ ॥ ३९॥ गोदावर्यां सिंहगेऽर्के गङ्गाद्वारे घटस्थिते । सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे रामो गच्छति सर्वदा ॥ ४०॥ अर्थ: सोमवार को काशी, पितृपक्ष में गया, पुष्य नक्षत्र, पूर्णिमा, प्रयाग, गोदावरी, गंगाद्वार (हरिद्वार), और सूर्यग्रहण में कुरुक्षेत्र— इन स्थानों और कालों में भगवान परशुराम विशेष रूप से उपस्थित रहते हैं। 🍁 आद्यो रामो जामदग्न्यः क्षत्रियाणां कुलान्तकः । परश्वधधरो दाता मातृहा मातृजीवकः ॥ ४१॥ अर्थ: प्रथम राम (परशुराम) जामदग्नि पुत्र हैं, जो क्षत्रियों के कुल का अंत करने वाले हैं, फरसा धारण करने वाले, दानी, माता का वध करने वाले और पुनः उन्हें जीवित करने वाले हैं। 🍁 समुद्रतीरनिलयो महेशपाठिताखिलः । गोत्राणकृद्गोप्रदाता विप्रक्षत्रियकर्मकृत् ॥ ४२॥ अर्थ: जो समुद्र तट पर निवास करते हैं, जिन्होंने महादेव से सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया, जो गोत्रों की स्थापना करने वाले, गौदान करने वाले और ब्राह्मण-क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले हैं। 🍁 द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । नापमृत्युं न दारिद्र्यं न च वंशक्षयो भवेत् ॥ ४३॥ अर्थ: जो मनुष्य इन बारह नामों का तीनों संध्या में पाठ करता है, उसे न अकाल मृत्यु, न दरिद्रता, और न ही वंश का नाश होता है। 🍁 श्रीमत्परशुरामस्य गायत्र्येषा महाद्भुता । राज्यकृत् कलिभूपानां सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ ४४॥ अर्थ: यह भगवान परशुराम की अद्भुत गायत्री है, जो कलियुग में राजाओं को राज्य प्रदान करने वाली है, और सभी तंत्रों में गुप्त रखी गई है। ॥ इति श्रीमेरुतन्त्रे परशुरामतन्त्रं सम्पूर्णम् ॥ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 04..🌷 परशुरामस्तुति हिन्दी अर्थ सहित 🌷 श्री गणेशाय नमः । 🍁 कुलाचला यस्य महीं द्विजेभ्यः प्रयच्छतः सोमदृषत्त्वमापुः । बभूवुरुत्सर्गजलं समुद्राः स रैणुकेयः श्रियमातनीतु ॥ १॥ अर्थ: जिन भगवान परशुराम ने पृथ्वी को ब्राह्मणों को दान कर दिया, उस समय कुलाचल (पर्वत) मानो चन्द्रमा के समान शीतल हो गए, और समुद्र उनके दान के जल (उत्सर्ग) से परिपूर्ण हो गए। वे माता रेणुका के पुत्र (रैणुकेय) भगवान परशुराम हमें समृद्धि प्रदान करें। 🍁 नाशिष्यः किमभूद्भवः किपभवन्नापुत्रिणी रेणुका नाभूद्विश्वमकार्मुकं किमिति यः प्रीणातु रामत्रपा । विप्राणां प्रतिमन्दिरं मणिगणोन्मिश्राणि दण्डाहतेर्नांब्धीनो स मया यमोऽर्पि महिषेणाम्भांसि नोद्वाहितः ॥ २॥ अर्थ: क्या ऐसा कोई शिष्य था जो उनसे शिक्षा न पाया हो? क्या माता रेणुका कभी पुत्रहीन रहीं? क्या संसार उनके पराक्रम (धनुष) से अछूता रहा?—ऐसे लज्जाशील (विनम्र) राम हमें प्रसन्न करें। जिन्होंने ब्राह्मणों के लिए घर-घर में रत्नों से युक्त भवन बनाए, और अपने दण्ड (पराक्रम) से समुद्रों तक को प्रभावित किया— ऐसे महान परशुराम हमारी रक्षा करें। 🍁 पायाद्वो यमदग्निवंशतिलको वीरव्रतालङ्कृतो रामो नाम मुनीश्वरो नृपवधे भास्वत्कुठारायुधः । येनाशेषहताहिताङ्गरुधिरैः सन्तर्पिताः पूर्वजा भक्त्या चाश्वमखे समुद्रवसना भूर्हन्तकारीकृता ॥ ३॥ अर्थ: यमदग्नि वंश के तिलक, वीर व्रत से सुशोभित, मुनियों में श्रेष्ठ, और हाथ में तेजस्वी फरसा (कुठार) धारण करने वाले भगवान परशुराम आपकी रक्षा करें। जिन्होंने दुष्ट राजाओं का संहार कर उनके रक्त से अपने पितरों को तृप्त किया, और अश्वमेध यज्ञ के द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी को समुद्र सहित दान कर दिया। 🍁 द्वारे कल्पतरुं गृहे सुरगवीं चिन्तामणीनङ्गदे पीयूषं सरसीषु विप्रवदने विद्याश्चतस्रो दश । एव कर्तुमयं तपस्यति भृगोर्वंशावतंसो मुनिः पायाद्वोऽखिलराजकक्षयकरो भूदेवभूषामणिः ॥ ४॥ अर्थ: जिनके प्रभाव से द्वार पर कल्पवृक्ष, घर में कामधेनु, हाथों में चिन्तामणि, सरोवरों में अमृत, और ब्राह्मणों के मुख में चारों वेद तथा अनेक विद्याएँ स्थापित हो जाती हैं— ऐसे भृगुवंश के आभूषण मुनि परशुराम तप करते हैं, जो समस्त दुष्ट राजाओं का नाश करने वाले और ब्राह्मणों के भूषण हैं— वे आपकी रक्षा करें। ॥ इति परशुराममस्तुतिः ॥ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 05..🌷🌷परशुरामाष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् 🌷🌷 हिन्दी अर्थ सहित श्री गणेशाय नमः । 🍁 यमाहुर्वासुदेवांशं हैहयानां कुलान्तकम् । त्रिःसप्तकृत्वो य इमां चक्रे निःक्षत्रियां महीम् ॥ १॥ अर्थ: जिन्हें वासुदेव (भगवान विष्णु) का अंश कहा जाता है, जिन्होंने हैहय वंश का नाश किया, और इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से रहित कर दिया—उन परशुराम को प्रणाम। 🍁 दुष्टं क्षत्रं भुवो भारमब्रह्मण्यमनीनशत् । तस्य नामानि पुण्यानि वच्मि ते पुरुषर्षभ ॥ २॥ अर्थ: उन्होंने दुष्ट और अधर्मी क्षत्रियों के रूप में पृथ्वी के भार को दूर किया। हे श्रेष्ठ पुरुष! अब मैं उनके पवित्र नामों का वर्णन करता हूँ। 🍁 भूभारहरणार्थाय मायामानुषविग्रहः । जनार्दनांशसम्भूतः स्थित्युत्पत्त्यप्ययेश्वरः ॥ ३॥ अर्थ: पृथ्वी का भार हटाने के लिए जिन्होंने मानव रूप धारण किया, जो भगवान विष्णु (जनार्दन) के अंश से उत्पन्न हैं, और सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के स्वामी हैं। 🍁 भार्गवो जामदग्न्यश्च पित्राज्ञापरिपालकः । मातृप्राणप्रदो धीमान् क्षत्रियान्तकरः प्रभुः ॥ ४॥ अर्थ: वे भृगुवंशी, जमदग्नि के पुत्र, पिता की आज्ञा का पालन करने वाले, माता को पुनः जीवन देने वाले, बुद्धिमान और क्षत्रियों का अंत करने वाले प्रभु हैं। 🍁 रामः परशुहस्तश्च कार्तवीर्यमदापहः । रेणुकादुःखशोकघ्नो विशोकः शोकनाशनः ॥ ५॥ अर्थ: वे राम हैं, हाथ में फरसा धारण करने वाले, कार्तवीर्य अर्जुन के अहंकार को नष्ट करने वाले, माता रेणुका के दुःख का नाश करने वाले, स्वयं शोक रहित और सबका शोक हरने वाले हैं। 🍁 नवीननीरदश्यामो रक्तोत्पलविलोचनः । घोरो दण्डधरो धीरो ब्रह्मण्यो ब्राह्मणप्रियः ॥ ६॥ अर्थ: वे नवीन मेघ के समान श्यामवर्ण वाले, लाल कमल के समान नेत्रों वाले हैं। भयंकर, दण्ड धारण करने वाले, धीर, ब्राह्मणों के हितैषी और प्रिय हैं। 🍁 तपोधनो महेन्द्रादौ न्यस्तदण्डः प्रशान्तधीः । उपगीयमानचरितः सिद्धगन्धर्वचारणैः ॥ ७॥ अर्थ: वे तप के धनी हैं, महेन्द्र पर्वत आदि पर निवास करते हैं, जिन्होंने क्रोध का त्याग कर शान्त चित्त धारण किया है, और जिनके चरित्र का गान सिद्ध, गंधर्व और चारण करते हैं। 🍁 जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखशोकभयातिगः । इत्यष्टाविंशतिर्नाम्नामुक्ता स्तोत्रात्मिका शुभा ॥ ८॥ अर्थ: वे जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग, दुःख, शोक और भय से परे हैं। इस प्रकार ये अट्ठाईस (२८) नामों का शुभ स्तोत्र कहा गया। 🍁 अनया प्रीयतां देवो जामदग्न्यो महेश्वरः । नेदं स्तोत्रमशान्ताय नादान्तायातपस्विने ॥ ९॥ अर्थ: इस स्तोत्र से भगवान जमदग्नि पुत्र परशुराम प्रसन्न हों। यह स्तोत्र अशांत, असंयमी और तपहीन व्यक्ति को नहीं देना चाहिए। 🍁 नावेदविदुषे वाच्यमशिष्याय खलाय च । नासूयकायानृजवे न चानिर्दिष्टकारिणे ॥ १०॥ अर्थ: इसे वेद न जानने वाले, शिष्य न होने वाले, दुष्ट, ईर्ष्यालु, कपटी और अनुशासनहीन व्यक्ति को नहीं बताना चाहिए। 🍁 इदं प्रियाय पुत्राय शिष्यायानुगताय च । रहस्यधर्मो वक्तव्यो नान्यस्मै तु कदाचन ॥ ११॥ अर्थ: यह स्तोत्र केवल प्रिय, योग्य पुत्र, शिष्य या आज्ञाकारी व्यक्ति को ही बताना चाहिए। यह एक गुप्त धर्म है, जिसे किसी अन्य को नहीं बताना चाहिए। ॥ इति परशुराम अष्टाविंशति नाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ 🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀🍀 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 भागवताचार्य पंडित पवन कृष्ण शास्त्री
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- The Aman Times 🚨 👉 दून पुलिस का “ऑपरेशन प्रहार” जारी 🍾 डोईवाला पुलिस ने लालतप्पड़ क्षेत्र में चेकिंग के दौरान शराब तस्कर को किया गिरफ्तार 📦 आरोपी के पास से 05 पेटी अवैध देशी शराब “माल्टा” बरामद 👤 गिरफ्तार आरोपी: कृष्णवीर (निवासी बिजनौर, हाल निवासी लालतप्पड़) ⚖️ पुलिस ने आबकारी अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर शुरू की कार्रवाई 👮♂️ पुलिस टीम की सतर्कता से अवैध शराब तस्करी पर लगा अंकुश1
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- देहरादून। नरेंद्र मोदी दिल्ली-देहरादून इकोनॉमिक कॉरिडोर के लोकार्पण के अवसर पर देहरादून पहुंचे, जहां उनका भव्य और ऐतिहासिक स्वागत हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत प्रधानमंत्री ने प्रसिद्ध डाट काली मंदिर में पूजा-अर्चना से की और देश व उत्तराखंड की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की। इसके बाद प्रधानमंत्री ने देहरादून कैंट स्थित सभा स्थल तक लगभग 12 किलोमीटर लंबा रोड शो किया। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री द्वारा किया गया यह अब तक का सबसे लंबा रोड शो है। रोड शो के दौरान सड़कों के दोनों ओर हजारों की संख्या में युवा, महिलाएं और आमजन मौजूद रहे। “भारत माता की जय” के नारों से वातावरण गूंज उठा। लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला और हर कोई प्रधानमंत्री की एक झलक पाने को उत्सुक नजर आया। प्रधानमंत्री ने हाथ जोड़कर और हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन स्वीकार किया। जनता के इस अपार प्रेम और समर्थन से वे प्रसन्न और उत्साहित दिखाई दिए। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड से उन्हें हमेशा विशेष ऊर्जा मिलती है। यहां के लोगों का स्नेह और आशीर्वाद उन्हें देश के विकास के लिए और अधिक प्रेरित करता है और वे इस बार भी उत्तराखंड से नई ऊर्जा लेकर जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने रोड शो में उमड़े जनसैलाब और लोगों के प्यार पर आभार जताया। उन्होंने कहा कि 12 किलोमीटर लंबे रोड शो में जनता का प्यार देखते हुए वह तेजी से वाहन चलवाकर जनसभा में नहीं पहुंच पाए। लोगों का अभिवादन करने के लिए उनके वाहन को धीरे-धीरे चलाया गया, जिस कारण जनसभा में पहुंचने में एक घंटे से अधिक का विलंब हो गया। इसके लिए उन्होंने जनसभा में उपस्थित लोगों से क्षमा मांगी। यह भव्य रोड शो इकोनॉमिक कॉरिडोर के महत्व के साथ-साथ उत्तराखंड की जनता और प्रधानमंत्री के बीच गहरे जुड़ाव को भी दर्शाता है।4
- गतिमान "ऑपरेशन प्रहार" को सफल बनाने और जिले में शांति व्यवस्था प्रभावित करने वाले तत्वों से शख्ती से निपटने के संबंध में एसएसपी नवनीत सिंह द्वारा सुस्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। उक्त निर्देशों के अनुपालन में थाना पथरी पुलिस ने दिनांक 07/04/2026 को इब्राहिमपुर में हुए झगड़े के मामले में फरार चल रहे पांच-पांच हजार के तीन ईनामी आरोपियों को गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की। अन्य विधिक कार्यवाही जारी है। दोनों भाइयों के बंटवारे को लेकर हुआ था विवाद जिसकी सोशल मीडिया पर वीडियो हुई थी वायरस मुकदमा दर्ज कर आरोपियों की तलाश के लिए पुलिस ने संभावित स्थानों पर दबिश दी गई लेकिन उनके लगातार फरार रहने पर एसएसपी नवनीत सिंह द्वारा इन तीनों आरोपियों पर पांच-पांच हजार का ईनाम घोषित किया गया था। *पकड़े गए इनामी आरोपित-* 1- अमजद पुत्र रिफाकत उम्र 28 वर्ष 2- तजमुल पुत्र रिफाकत उम्र 26 वर्ष 3- तनवीर पुत्र रिफाकत उम्र 20 वर्ष समस्त निवासी गण ग्राम इब्राहिमपुर थाना पथरी हरिद्वार *दर्ज मुकदमा व धारा-* मु.अ.सं.-158/26 धारा - 115(2)/190/191(2)/191(3)/109/351(3)/324(2)BNS *पुलिस टीम-* 1- व.उ.नि.उपेन्द्र सिंह 2- उ.नि.बबलू चौहान 3- कां. राकेश नेगी 4- कां सुशील कुमार 5- कां ब्रह्मदत्त जोशी 6- का. अजीत तोमर1
- 📢 The Aman Times 🚨 डोईवाला में कांग्रेस नेताओं को पुलिस ने रोका डोईवाला में उस समय हलचल मच गई जब परवा दून कांग्रेस जिलाध्यक्ष मोहित उनियाल सहित कई कांग्रेस नेताओं को पुलिस ने कोतवाली के बाहर ही रोक दिया। ✈️ कांग्रेस नेता जोली ग्रांट एयरपोर्ट जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करना चाहते थे और क्षेत्र व राज्य की समस्याओं को लेकर ज्ञापन सौंपने की तैयारी में थे। 👮♂️ हालांकि, पुलिस ने उन्हें आगे जाने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद डोईवाला कोतवाली के वरिष्ठ उप निरीक्षक विनोद सिंह राणा ने मौके पर ही कांग्रेस नेताओं से ज्ञापन प्राप्त किया। 🗣️ कांग्रेस नेताओं का कहना है कि वे जनता की समस्याओं को सीधे प्रधानमंत्री तक पहुंचाना चाहते थे,। लेकिन पुलिस प्रशासन ने उन्हें रोक दिया। 📌 इस घटना के बाद स्थानीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है2
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