केतार प्रखंड में पंडा नदी किसानों के लिए बनी संकट, मुकुन्दपुर गांव में 55 एकड़ से अधिक रैयती भूमि नदी में विलीन, किसान हो रहे भूमिहीन केतार। केतार प्रखंड की लाइफ लाइन कही जाने वाली पंडा नदी अब मुकुन्दपुर गांव के किसानों के लिए अभिशाप बनती जा रही है। नदी के लगातार हो रहे कटाव से गांव के दर्जनों किसानों की रैयती भूमि हर वर्ष नदी में समा रही है। हालात ऐसे हैं कि कई किसान धीरे-धीरे भूमिहीन होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। मुकुन्दपुर गांव के किसान हिरामन साह, दीपक वर्मा, सतीश चौबे, सुनील चौबे, लक्ष्मण साह, अवधेश ठाकुर, पारसनाथ साह, महेंद्र चौबे सहित अन्य किसानों ने बताया कि बरसात के मौसम में पंडा नदी उफान पर आ जाती है। तेज बहाव के कारण खेतों का बड़ा हिस्सा कटकर नदी में चला जाता है। कभी तीन फसल देने वाली उपजाऊ भूमि आज बाढ़ के पानी के साथ आई बालू से पट चुकी है, जिससे खेती करना लगभग असंभव हो गया है। किसानों का कहना है कि वर्ष 1978 से अब तक करीब 55 एकड़ से अधिक रैयती भूमि पूरी तरह पंडा नदी में विलीन हो चुकी है। खेत खत्म होने से न सिर्फ किसानों की आमदनी पर असर पड़ा है, बल्कि उनके सामने परिवार के भरण-पोषण का भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीणों ने बताया कि इस समस्या को लेकर कई बार स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया गया, लेकिन अब तक नदी कटाव रोकने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई है। यदि समय रहते तटबंध निर्माण या अन्य कटावरोधी कार्य नहीं कराए गए, तो आने वाले वर्षों में मुकुन्दपुर गांव के दर्जनों किसान पूरी तरह भूमिहीन हो जाएंगे। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पंडा नदी के कटाव को रोकने के लिए शीघ्र प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि किसानों की रैयती भूमि और उनका भविष्य दोनों सुरक्षित रह सके।।
केतार प्रखंड में पंडा नदी किसानों के लिए बनी संकट, मुकुन्दपुर गांव में 55 एकड़ से अधिक रैयती भूमि नदी में विलीन, किसान हो रहे भूमिहीन केतार। केतार प्रखंड की लाइफ लाइन कही जाने वाली पंडा नदी अब मुकुन्दपुर गांव के किसानों के लिए अभिशाप बनती जा रही है। नदी के लगातार हो रहे कटाव से गांव के दर्जनों किसानों की रैयती भूमि हर वर्ष नदी में समा रही है। हालात ऐसे हैं कि कई किसान धीरे-धीरे भूमिहीन होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। मुकुन्दपुर गांव के किसान हिरामन साह, दीपक वर्मा, सतीश चौबे, सुनील चौबे, लक्ष्मण साह, अवधेश ठाकुर, पारसनाथ साह, महेंद्र चौबे
सहित अन्य किसानों ने बताया कि बरसात के मौसम में पंडा नदी उफान पर आ जाती है। तेज बहाव के कारण खेतों का बड़ा हिस्सा कटकर नदी में चला जाता है। कभी तीन फसल देने वाली उपजाऊ भूमि आज बाढ़ के पानी के साथ आई बालू से पट चुकी है, जिससे खेती करना लगभग असंभव हो गया है। किसानों का कहना है कि वर्ष 1978 से अब तक करीब 55 एकड़ से अधिक रैयती भूमि पूरी तरह पंडा नदी में विलीन हो चुकी है। खेत खत्म होने से न सिर्फ किसानों की आमदनी पर असर पड़ा है, बल्कि उनके सामने परिवार के
भरण-पोषण का भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है। ग्रामीणों ने बताया कि इस समस्या को लेकर कई बार स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया गया, लेकिन अब तक नदी कटाव रोकने के लिए कोई ठोस पहल नहीं की गई है। यदि समय रहते तटबंध निर्माण या अन्य कटावरोधी कार्य नहीं कराए गए, तो आने वाले वर्षों में मुकुन्दपुर गांव के दर्जनों किसान पूरी तरह भूमिहीन हो जाएंगे। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पंडा नदी के कटाव को रोकने के लिए शीघ्र प्रभावी कदम उठाए जाएं, ताकि किसानों की रैयती भूमि और उनका भविष्य दोनों सुरक्षित रह सके।।
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