यू.पी.एस.सी. के प्रत्येक उम्मीदवार का कहना है कि वह लोगों की मदद करना चाहता/चाहती है और गरीबों, आदि के लिए काम करना चाहता/चाहती है। फिर भी नौकरशाही में अभी भी इतना भ्रष्टाचार क्यों है? सेवा में प्रवेश करने पर उनकी महत्वाकांक्षाएँ कहाँ चली जाती हैं? जितने भी छात्र प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करते है उन्हें यह पहले से पता होता है कि, प्रशासनिक अधिकारीयों को नौकरी से निकालने, पदोन्नत करने, पुरस्कार देने आदि का अधिकार मुख्यमंत्री, गृहमंत्री आदि के पास होता है। प्रशासनिक प्रशिक्षुओ से यह सवाल पुछा जाना चाहिए कि - मान लीजिये आपने अपने विभाग के सरकारी ठेके में कई सौ करोड़ का गबन पकड़ा है, और आप अमुक आरोपी ठेकेदार पर कानूनी कार्यवाही करना चाहते है। मान लीजिये कि अमुक ठेकेदार मुख्यमंत्री का चहेता है और मुख्यमंत्री या सम्बन्धित विभाग का मंत्री आपको अमुक ठेकेदार पर कोई कार्यवाही न करने का आदेश देते है, तो आप क्या करेंगे ? यदि वे मुख्यमंत्री के आदेश का पालन नहीं करेंगे तो उनकी नौकरी जायेगी !! यदि वे मुख्यमंत्री के आदेश का पालन करेंगे तो उनकी नौकरी चालू रहेगी !! दुसरे शब्दों में, प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करने वाले ज्यादातर छात्र पहले से ही पद-ख्याति-प्रतिष्ठा-शक्ति लोलुप एवं भ्रष्ट होते है, और जो भ्रष्ट नहीं होते वे नौकरी पाने के हफ्ते भर में भ्रष्ट हो जाते है। सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे राजनेताओ के प्रति वफ़ादारी बनाकर रखें, न कि क़ानून या जनता के प्रति। यदि वे नेताओं के गलत आदेशो का पालन नहीं करेंगे तो उनकी नौकरी हफ्ते भर से ज्यादा चलेगी नहीं। या तो वे निकाल दिए जायेंगे या फिर वे इस्तीफा दे देंगे। व्यवस्था का निर्माण कानूनों द्वारा होता है। यदि किसी देश में अच्छे क़ानून लागू है तो व्यवस्था अच्छी एवं बुरे क़ानून लागू है तो व्यवस्था बुरे तरीके से काम करेगी। क़ानून बनाने का काम जनप्रतिनिधियों (सांसद, विधायक, पार्षद) का है। अत: यदि कोई व्यक्ति व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने या सिस्टम सुधारने के प्रति वाकयी गम्भीर है तो उन्हें चुनावी राजनीती में आना चाहिए !! तकनिकी रूप से सिर्फ चुनावी राजनीती ही एक मात्र रास्ता है, जिसके माध्यम से आप व्यवस्था सुधार सकते है। प्रशासनिक अधिकारी तो उन नेताओं के सही-गलत आदेशो का पालन मात्र करते है जो आदेश उन्हें जनप्रतिनिधि देते है। युवाओं को चुनावी राजनीति से दूर रखने के लिए पेड मीडिया द्वारा समाज में यह धारणा खड़ी की गयी है कि, प्रशासनिक सेवाएं देशहित में काम करने का एक जरिया है — जो कि सरासर बकवास बात है।
यू.पी.एस.सी. के प्रत्येक उम्मीदवार का कहना है कि वह लोगों की मदद करना चाहता/चाहती है और गरीबों, आदि के लिए काम करना चाहता/चाहती है। फिर भी नौकरशाही में अभी भी इतना भ्रष्टाचार क्यों है? सेवा में प्रवेश करने पर उनकी महत्वाकांक्षाएँ कहाँ चली जाती हैं? जितने भी छात्र प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करते है उन्हें यह पहले से पता होता है कि, प्रशासनिक अधिकारीयों को नौकरी से निकालने, पदोन्नत करने, पुरस्कार देने आदि का अधिकार मुख्यमंत्री, गृहमंत्री आदि के पास होता है। प्रशासनिक प्रशिक्षुओ से यह सवाल पुछा जाना चाहिए कि - मान लीजिये आपने अपने विभाग के सरकारी ठेके में कई सौ करोड़ का गबन पकड़ा है, और आप अमुक आरोपी ठेकेदार पर कानूनी कार्यवाही करना चाहते है। मान लीजिये कि अमुक ठेकेदार मुख्यमंत्री का चहेता है और मुख्यमंत्री या सम्बन्धित विभाग का मंत्री आपको अमुक ठेकेदार पर कोई कार्यवाही न करने का आदेश देते है, तो आप क्या करेंगे ? यदि वे मुख्यमंत्री के आदेश का पालन नहीं करेंगे तो उनकी नौकरी जायेगी !! यदि वे मुख्यमंत्री के आदेश का पालन करेंगे तो उनकी नौकरी चालू रहेगी !! दुसरे शब्दों में, प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करने वाले ज्यादातर छात्र पहले से ही पद-ख्याति-प्रतिष्ठा-शक्ति लोलुप एवं भ्रष्ट होते है, और जो भ्रष्ट नहीं होते वे नौकरी पाने के हफ्ते भर में भ्रष्ट हो जाते है। सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे राजनेताओ के प्रति वफ़ादारी बनाकर रखें, न कि क़ानून या जनता के प्रति। यदि वे नेताओं के गलत आदेशो का पालन नहीं करेंगे तो उनकी नौकरी हफ्ते भर से ज्यादा चलेगी नहीं। या तो वे निकाल दिए जायेंगे या फिर वे इस्तीफा दे देंगे। व्यवस्था का निर्माण कानूनों द्वारा होता है। यदि किसी देश में अच्छे क़ानून लागू है तो व्यवस्था अच्छी एवं बुरे क़ानून लागू है तो व्यवस्था बुरे तरीके से काम करेगी। क़ानून बनाने का काम जनप्रतिनिधियों (सांसद, विधायक, पार्षद) का है। अत: यदि कोई व्यक्ति व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने या सिस्टम सुधारने के प्रति वाकयी गम्भीर है तो उन्हें चुनावी राजनीती में आना चाहिए !! तकनिकी रूप से सिर्फ चुनावी राजनीती ही एक मात्र रास्ता है, जिसके माध्यम से आप व्यवस्था सुधार सकते है। प्रशासनिक अधिकारी तो उन नेताओं के सही-गलत आदेशो का पालन मात्र करते है जो आदेश उन्हें जनप्रतिनिधि देते है। युवाओं को चुनावी राजनीति से दूर रखने के लिए पेड मीडिया द्वारा समाज में यह धारणा खड़ी की गयी है कि, प्रशासनिक सेवाएं देशहित में काम करने का एक जरिया है — जो कि सरासर बकवास बात है।
- Post by अनार जीत दास पेंटर4
- गरीबों का हेल्प न्यूज़ 🙏1
- आज देर शाम मौसम ने अचानक करवट ली और तेज आंधी के साथ जोरदार बारिश शुरू हो गई। बारिश के साथ ही शहर और ग्रामीण इलाकों में जमकर ओले (बर्फ) भी गिरे। जैसा कि आप इस वीडियो के माध्यम से देख सकते हैं, इस बेमौसम आंधी-तूफान और ओलावृष्टि के कारण फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे किसानों की कमर टूट गई है। अचानक हुई इस बारिश और ओले गिरने से खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो गई हैं। स्थानीय किसानों का कहना है कि इस प्राकृतिक आपदा से उन्हें काफी आर्थिक क्षति हुई है और वे अब सरकार से मुआवजे की उम्मीद कर रहे हैं।1
- Post by Lalit Kashyap Tufan1
- Post by Chhotu Kumar1
- Post by 24 Dainik Bihar Gramin1
- कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा कैमुरांचल सांगठनिक कमेटी दिनांक -31 मार्च 2026 ----------------------- प्रेस विज्ञप्ति कैमूर के पठारीय वन क्षेत्र में रह रहे आदिवासियों एवं अन्य वन निवासियों के परंपरागत एवं नैसर्गिक जीवन में आरएसएस बीजेपी सरकार तथा उसके वन विभाग के बढ़ते हस्तक्षेप एवं कुल 58 आदिवासी बहुल गांव के उजाड़ कर बाघ अभ्यारण बनाने के विरुद्ध कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा एवं ऑल इंडिया ट्राइबल फोरम ने संयुक्त रूप से 14 सूत्रीय मांगों को लेकर आज दिनांक 31 मार्च 2026 को जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी के सासाराम कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन एवं आंदोलन किया। कैमूर वन क्षेत्र से भारी संख्या में आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों ने हाथों में बैनर झंडा तख्ती कुल्हाड़ी एवं तीर धनुष लिए हुए दिन के 12:00 बजे रेलवे मैदान सासाराम से एक विशाल प्रदर्शन निकाला जो पुरानी जीटी रोड होते हुए जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी के कार्यालय के सामने जाकर सभा में तब्दील हो गया जिसकी अध्यक्षता एवं संचालन मोर्चा के अध्यक्ष धनंजय उरांव ने किया। इस मौके पर आदिवासी समुदाय के सांस्कृतिक कर्मियों ने अपने पारंपरिक वाद्य यंत्र की थाप पर लोक नृत्य किया और लोकगीत गाए। जल जंगल जमीन पर अधिकार हमारा है, कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा ने ललकारा है के नारों से वातावरण गूंज उठा। सभा को संबोधित करते हुए मोर्चा के अध्यक्ष धनंजय उरांव ने कहा कि ब्रिटिश शासन काल में वन संपदा के लूट के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाया गया वन विभाग आज भी हम आदिवासियों के साथ गुलामों जैसा बर्ताव करता है आज हम अपने ही जंगल में असुरक्षित महसूस कर रहे हैं कैमूर वन क्षेत्र में कभी कोई बाघों का नामोनिशान नहीं था फिर भी 58 गांव को उजाड़ कर सरकार बाघ अभ्यारण बना रही है। इसके विरोध में आज हम डीएफओ साहब के कार्यालय पर आए हैं। इस मौके पर सभा को संबंधित करने वाले मुख्य वक्ताओं में मोर्चा के पूर्व संयोजक सुरेंद्र सिंह, सूरज उरांव, सुनील चेरो, पलटन चेरो, अनीता चेरो, कौशल्या चेरो, संजीव खरवार, बीरेंद्र उरांव, कमलेश उरांव डोमा खरवार, आर्लेस चेरो, कामेश्वर उरांव, शिवराज उरांव, मोती उरांव, चंपा चेरो आदि मुख्य थे। इस मौके पर निम्न मैंगो का ज्ञापन सोपा गया :----- 1 कैमूर बाग अभ्यारण परियोजना रद्द करो 2 कैमूर पठारिय वन क्षेत्र को संविधान की पांचवी अनुसूची में शामिल करो। 3 वन अधिकार कानून 2006 को मूल रूप से लागू करो। 4 ग्राम सभाओं की अनुमति के बिना कैमूर वन क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण एवं विशेष योजनाओं के अमल पर रोक लगाओ। 5 कैमूर वन क्षेत्र में मौजूद बिहार सरकार भूमि को वन विभाग के अतिक्रमण से मुक्त कराओ। कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा एवं ऑल इंडिया ट्राइबल फ़ोरम के नेताओं ने वन प्रमंडल पदाधिकारी डीएफओ रोहतास को चेताया कि यदि हमारी मांगों को अनसुना किया गया तो हम अपने आंदोलन को और अधिक तीव्र करेंगे तथा वन विभाग के कामकाज को ठप कर देंगे। भवदीय धनंजय उरांव अध्यक्ष कैमूर वन अधिकार संघर्ष मोर्चा4
- Post by अनार जीत दास पेंटर1