ओबरा सी की बुलंद दीवारें और मजदूरों का 'दम घोंटता' खौफ ओबरा सी की बुलंद दीवारें और मजदूरों का 'दम घोंटता' खौफ ओबरा (सोनभद्र)। औद्योगिक विकास की दौड़ में हम अक्सर उन हाथों की कीमत भूल जाते हैं जो इन इमारतों को सींचते हैं। सोनभद्र की 'ओबरा सी' तापीय विद्युत परियोजना में वर्तमान में जो स्थितियां बन रही हैं, वे केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की हत्या है। आधे घंटे का 'अघोषित कारावास' मजदूरों की शिकायत है कि दोपहर 12 बजे लंच होने के बावजूद गेट को 12:30 बजे तक नहीं खोला जाता। सुरक्षाकर्मियों का यह कहना कि "यह प्रदर्शन की सजा है", यह बताने के लिए काफी है कि प्रबंधन अब व्यवस्था के नाम पर प्रतिशोध ले रहा है। आधे घंटे तक चिलचिलाती धूप में खुले आसमान के नीचे मजदूरों को खड़ा रखना किस नियमावली का हिस्सा है? क्या यह प्रशासनिक कर प्रणाली का हिस्सा है या किसी निजी तानाशाही का? गरीबी और छंटनी का 'हथियार' परियोजना में एक ऐसा 'खौफ का तंत्र' विकसित कर दिया गया है जहाँ मजदूर अपनी जायज तकलीफ बोलने से भी कतरा रहे हैं। कारण स्पष्ट है—आवाज उठाने वाले को सीधे काम से बाहर कर दिया जाता है। गरीबी और परिवार की आजीविका की मजबूरी ने मजदूरों को 'मूक गुलाम' बनने पर विवश कर दिया है। श्रम विभाग और जिला प्रशासन का मौन इस शोषण को मौन स्वीकृति दे रहा है। प्रशासनिक उत्तरदायित्व कहाँ है? क्या श्रम आयुक्त और जिलाधिकारी महोदय इस बात से अवगत हैं कि उनके आश्वासन के बाद भी मजदूरों की स्थिति और बदतर हुई है? यदि विकास की कीमत मजदूरों का आत्मसम्मान और उनकी बुनियादी सुविधाएं हैं, तो ऐसा विकास खोखला है। उच्चाधिकारियों को तत्काल धरातल पर आकर इस 'डर के माहौल' को समाप्त करना होगा, वरना यह शांति किसी बड़े जन-आक्रोश का संकेत हो सकती है।
ओबरा सी की बुलंद दीवारें और मजदूरों का 'दम घोंटता' खौफ ओबरा सी की बुलंद दीवारें और मजदूरों का 'दम घोंटता' खौफ ओबरा (सोनभद्र)। औद्योगिक विकास की दौड़ में हम अक्सर उन हाथों की कीमत भूल जाते हैं जो इन इमारतों को सींचते हैं। सोनभद्र की 'ओबरा सी' तापीय विद्युत परियोजना में वर्तमान में जो स्थितियां बन रही हैं, वे केवल श्रम कानूनों का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की हत्या है। आधे घंटे का 'अघोषित कारावास' मजदूरों की शिकायत है कि दोपहर 12 बजे लंच होने के बावजूद गेट को 12:30 बजे तक नहीं खोला जाता। सुरक्षाकर्मियों का यह कहना कि "यह प्रदर्शन की सजा है", यह बताने के लिए काफी है कि प्रबंधन अब व्यवस्था के नाम पर प्रतिशोध ले रहा है। आधे घंटे तक चिलचिलाती धूप में खुले आसमान के नीचे मजदूरों को खड़ा रखना किस नियमावली का हिस्सा है? क्या यह प्रशासनिक कर प्रणाली का हिस्सा है या किसी निजी तानाशाही का? गरीबी और छंटनी का 'हथियार' परियोजना में एक ऐसा 'खौफ का तंत्र' विकसित कर दिया गया है जहाँ मजदूर अपनी जायज तकलीफ बोलने से भी कतरा रहे हैं। कारण स्पष्ट है—आवाज उठाने वाले को सीधे काम से बाहर कर दिया जाता है। गरीबी और परिवार की आजीविका की मजबूरी ने मजदूरों को 'मूक गुलाम' बनने पर विवश कर दिया है। श्रम विभाग और जिला प्रशासन का मौन इस शोषण को मौन स्वीकृति दे रहा है। प्रशासनिक उत्तरदायित्व कहाँ है? क्या श्रम आयुक्त और जिलाधिकारी महोदय इस बात से अवगत हैं कि उनके आश्वासन के बाद भी मजदूरों की स्थिति और बदतर हुई है? यदि विकास की कीमत मजदूरों का आत्मसम्मान और उनकी बुनियादी सुविधाएं हैं, तो ऐसा विकास खोखला है। उच्चाधिकारियों को तत्काल धरातल पर आकर इस 'डर के माहौल' को समाप्त करना होगा, वरना यह शांति किसी बड़े जन-आक्रोश का संकेत हो सकती है।
- Post by @PappuKumar-ky6qb you tube my channel1
- si grauli Kya kya ho rahe hai dost aap bhi mdt kariye ,,, जय हिंद2
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