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अवैध ईसाई धर्मांतरण के विरुद्ध ग्राम स्वायत्तता पर सुप्रीम कोर्ट की अंतिम मुहर दुर्गूकोदल, कांकेर छग। बस्तर की धरती ने आज एक ऐतिहासिक संदेश दिया है सांस्कृतिक अस्मिता पर कोई आघात स्वीकार नहीं होगा। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर द्वारा पारित निर्णय (WPPIL No. 83/2025 एवं 86/2025, दिनांक 28 अक्टूबर 2025, पीठ: माननीय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं माननीय न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु) को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। Digbal Tandi v. State of Chhattisgarh (Diary No. 64814/2025) शीर्षक से दायर अपील पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ — न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने वरिष्ठ अधिवक्ता काॅलिन गोंसाल्वेस और साॅलिसिटर जनरल तुषार मेहता को सुनने के बाद दिनांक 16 फरवरी 2026 को सुनवाई के बाद आदेश पारित किया। यह केवल एक याचिका की असफलता नहीं है; यह उस विचार की पराजय है जो ग्राम सभाओं की सांस्कृतिक चेतना को असंवैधानिक घोषित करना चाहता था। यह मामला उन ग्राम सभाओं से जुड़ा था जिन्होंने अपने गांवों के प्रवेश द्वारों पर चेतावनी बोर्ड लगाए थे, जिनमें बाहरी पादरियों एवं धर्मांतरण गतिविधियों से संबंधित प्रवेश-नियंत्रण की सूचना अंकित थी। इन ग्राम सभाओं ने स्पष्ट कहा था कि वर्षों से प्रलोभन, आर्थिक सहायता, शिक्षा और चिकित्सा के नाम पर संगठित धार्मिक प्रभाव का विस्तार हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप परिवारों में विभाजन, सामाजिक तनाव और परंपरागत संरचना में दरारें उत्पन्न हो रही हैं। उच्च न्यायालय ने पेसा कानून के अंतर्गत ग्राम सभाओं के अधिकार को स्वीकार किया था। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील खारिज किए जाने से यह विधिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ बल, प्रलोभन या कपट से धर्मांतरण का अधिकार नहीं है। जिला पंचायत सदस्य देवेन्द्र टेकाम ने कहा “बस्तर की धरती किसी प्रयोगशाला का विषय नहीं है। यहाँ की आंगा-देव परंपरा, शीतला माता ,बूढ़ा देव की आराधना, देवी-देवताओं की श्रद्धा, गोटुल की सामाजिक व्यवस्था और जनजातीय जीवन पद्धति हजारों वर्षों से चली आ रही है। यदि योजनाबद्ध तरीके से इन जड़ों को कमजोर किया जाएगा, तो समाज चुप नहीं बैठेगा। हमने गांवों में देखा है कि किस प्रकार प्रलोभन, आर्थिक सहयोग और सामाजिक बराबरी के नाम पर वैचारिक प्रभाव डाला गया। परिणाम क्या हुआ? परिवारों में दरारें। पिता और पुत्र अलग आस्थाओं में बंट गए। माँ और बेटा अलग पहचान में खड़े हो गए। त्योहार अलग हो गए। ग्राम सभा विभाजित हो गई। यह केवल पूजा का परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने का विघटन है। हम स्पष्ट कहना चाहते हैं — निजी आस्था पर किसी का अधिकार नहीं है। लेकिन संगठित, संरचित और प्रलोभन आधारित ईसाई धर्मांतरण गतिविधियाँ यदि सामाजिक संतुलन बिगाड़ती हैं, तो उसका वैचारिक और वैधानिक प्रतिरोध होगा। आज न्यायालय ने ग्राम सभाओं की चेतावनी को खारिज नहीं किया — यह बस्तर की आत्मा की आवाज की पुष्टि है।” धर्मांतरण विरोधी अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने वाले देवेंद्र टेकाम ने कहा “इस मामले का मूल प्रश्न यह था कि क्या अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाएँ अपनी सांस्कृतिक रक्षा के लिए चेतावनी दे सकती हैं या नहीं। आज सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील निरस्त किए जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि ग्राम स्वायत्तता केवल कागज़ी शब्द नहीं है। अवैध धर्मांतरण को मौलिक अधिकार का कवच देने का प्रयास न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं पाया। अनुच्छेद 25 ‘बलपूर्वक या प्रलोभन द्वारा परिवर्तित करने ’ का अधिकार देता है, ‘ का नहीं। यदि ग्राम सभा को आशंका है कि प्रलोभन या कपट से धर्मांतरण की गतिविधियाँ चल रही हैं, तो वह संवैधानिक ढांचे के भीतर चेतावनी दे सकती है। यह निर्णय किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं है; यह उस प्रक्रिया के विरुद्ध है जो सामाजिक संरचना को प्रभावित करती है। पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का अधिकार है — और यह अधिकार अब न्यायिक रूप से पुष्ट है। अवैध ईसाई धर्मांतरण का विरोध संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहेगा। लेकिन सांस्कृतिक विघटन को मौन स्वीकृति नहीं दी जाएगी, यह निर्णय केवल कानूनी आदेश नहीं है; यह सांस्कृतिक आत्मरक्षा की वैधानिक स्वीकृति है।

4 hrs ago
user_डिकेश शर्मा
डिकेश शर्मा
संवाददाता दुर्गकोंदल, कांकेर, छत्तीसगढ़•
4 hrs ago
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अवैध ईसाई धर्मांतरण के विरुद्ध ग्राम स्वायत्तता पर सुप्रीम कोर्ट की अंतिम मुहर दुर्गूकोदल, कांकेर छग। बस्तर की धरती ने आज एक ऐतिहासिक संदेश दिया है सांस्कृतिक अस्मिता पर कोई आघात स्वीकार नहीं होगा। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर द्वारा पारित निर्णय (WPPIL No. 83/2025 एवं 86/2025, दिनांक 28 अक्टूबर 2025, पीठ: माननीय मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं माननीय न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु) को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी। Digbal Tandi v. State of Chhattisgarh (Diary No. 64814/2025) शीर्षक से दायर अपील पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ — न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने वरिष्ठ अधिवक्ता काॅलिन गोंसाल्वेस और साॅलिसिटर जनरल तुषार मेहता को सुनने के बाद दिनांक 16 फरवरी 2026 को सुनवाई के बाद आदेश पारित किया। यह केवल एक याचिका की असफलता नहीं है; यह उस विचार की पराजय है जो ग्राम सभाओं की सांस्कृतिक चेतना को असंवैधानिक घोषित करना चाहता था। यह मामला उन ग्राम सभाओं से जुड़ा था जिन्होंने अपने गांवों के प्रवेश द्वारों पर चेतावनी बोर्ड लगाए थे, जिनमें बाहरी पादरियों एवं धर्मांतरण गतिविधियों से संबंधित प्रवेश-नियंत्रण की सूचना अंकित थी। इन ग्राम सभाओं ने स्पष्ट कहा था कि वर्षों से प्रलोभन, आर्थिक सहायता, शिक्षा और चिकित्सा के नाम पर संगठित धार्मिक प्रभाव का विस्तार हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप परिवारों में विभाजन, सामाजिक तनाव और परंपरागत संरचना में दरारें उत्पन्न हो रही हैं। उच्च न्यायालय ने पेसा कानून के अंतर्गत ग्राम सभाओं के अधिकार को स्वीकार किया था। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील खारिज किए जाने से यह विधिक स्थिति और अधिक सुदृढ़ हो गई है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ बल, प्रलोभन या कपट से धर्मांतरण का अधिकार नहीं है। जिला पंचायत सदस्य देवेन्द्र टेकाम ने कहा “बस्तर की धरती किसी प्रयोगशाला का विषय नहीं है। यहाँ की आंगा-देव परंपरा, शीतला माता ,बूढ़ा देव की आराधना, देवी-देवताओं की श्रद्धा, गोटुल की सामाजिक व्यवस्था और जनजातीय जीवन पद्धति हजारों वर्षों से चली आ रही है। यदि योजनाबद्ध तरीके से इन जड़ों को कमजोर किया जाएगा, तो समाज चुप नहीं बैठेगा। हमने गांवों में देखा है कि किस प्रकार प्रलोभन, आर्थिक सहयोग और सामाजिक बराबरी के नाम पर वैचारिक प्रभाव डाला गया। परिणाम क्या हुआ? परिवारों में दरारें। पिता और पुत्र अलग आस्थाओं में बंट गए। माँ और बेटा अलग पहचान में खड़े हो गए। त्योहार अलग हो गए। ग्राम सभा विभाजित हो गई। यह केवल पूजा का परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने का विघटन है। हम स्पष्ट कहना चाहते हैं — निजी आस्था पर किसी का अधिकार नहीं है। लेकिन संगठित, संरचित और प्रलोभन आधारित ईसाई धर्मांतरण गतिविधियाँ यदि सामाजिक संतुलन बिगाड़ती हैं, तो उसका वैचारिक और वैधानिक प्रतिरोध होगा। आज न्यायालय ने ग्राम सभाओं की चेतावनी को खारिज नहीं किया — यह बस्तर की आत्मा की आवाज की पुष्टि है।” धर्मांतरण विरोधी अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने वाले देवेंद्र टेकाम ने कहा “इस मामले का मूल प्रश्न यह था कि क्या अनुसूचित क्षेत्रों की ग्राम सभाएँ अपनी सांस्कृतिक रक्षा के लिए चेतावनी दे सकती हैं या नहीं। आज सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील निरस्त किए जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि ग्राम स्वायत्तता केवल कागज़ी शब्द नहीं है। अवैध धर्मांतरण को मौलिक अधिकार का कवच देने का प्रयास न्यायिक परीक्षण में टिक नहीं पाया। अनुच्छेद 25 ‘बलपूर्वक या प्रलोभन द्वारा परिवर्तित करने ’ का अधिकार देता है, ‘ का नहीं। यदि ग्राम सभा को आशंका है कि प्रलोभन या कपट से धर्मांतरण की गतिविधियाँ चल रही हैं, तो वह संवैधानिक ढांचे के भीतर चेतावनी दे सकती है। यह निर्णय किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं है; यह उस प्रक्रिया के विरुद्ध है जो सामाजिक संरचना को प्रभावित करती है। पाँचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का अधिकार है — और यह अधिकार अब न्यायिक रूप से पुष्ट है। अवैध ईसाई धर्मांतरण का विरोध संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहेगा। लेकिन सांस्कृतिक विघटन को मौन स्वीकृति नहीं दी जाएगी, यह निर्णय केवल कानूनी आदेश नहीं है; यह सांस्कृतिक आत्मरक्षा की वैधानिक स्वीकृति है।

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  • 17 फरवरी मंगलवार को दोपहर 3 बजे मिली जानकारी अनुसार बता दें कि केसीजी पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। लगभग 30 वर्षों से फरार चल रहे स्थायी वारंटी को थाना खैरागढ़ पुलिस ने भिलाई से गिरफ्तार कर लिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार थाना खैरागढ़ में दर्ज अपराध क्रमांक 144/1992, धारा 379 भादवि के आरोपी अफसर अली, पिता असरफ अली, निवासी रूवाबांधा सेक्टर 6 (रिसाली), भिलाई, जिला दुर्ग, न्यायालय से जमानत के बाद फरार हो गया था। आरोपी के विरुद्ध न्यायालय द्वारा स्थायी वारंट जारी किया गया था। फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए खैरागढ़ पुलिस लगातार प्रयासरत थी। संभावित ठिकानों पर निगरानी रखी जा रही थी तथा मुखबिर तंत्र को सक्रिय किया गया था। इसी क्रम में 17 फरवरी को मिली सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने भिलाई में दबिश देकर आरोपी को गिरफ्तार किया। गिरफ्तार आरोपी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जहां से आदेशानुसार उसे न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया। खैरागढ़ पुलिस द्वारा फरार और स्थायी वारंटियों की गिरफ्तारी के लिए अभियान निरंतर जारी है।
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केसीजी पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। लगभग 30 वर्षों से फरार चल रहे स्थायी वारंटी को थाना खैरागढ़ पुलिस ने भिलाई से गिरफ्तार कर लिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार थाना खैरागढ़ में दर्ज अपराध क्रमांक 144/1992, धारा 379 भादवि के आरोपी अफसर अली, पिता असरफ अली, निवासी रूवाबांधा सेक्टर 6 (रिसाली), भिलाई, जिला दुर्ग, न्यायालय से जमानत के बाद फरार हो गया था। आरोपी के विरुद्ध न्यायालय द्वारा स्थायी वारंट जारी किया गया था।
फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए खैरागढ़ पुलिस लगातार प्रयासरत थी। संभावित ठिकानों पर निगरानी रखी जा रही थी तथा मुखबिर तंत्र को सक्रिय किया गया था। इसी क्रम में 17 फरवरी को मिली सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने भिलाई में दबिश देकर आरोपी को गिरफ्तार किया।
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  • राजधानी रायपुर में रोज सुबह ओपन प्राउंड में बैडमिंटन खेलने वाले ईदगाहभाठा निवासी कारोबारी 57 वर्षीय अमृत बजाज की बैडमिंटन खेलते समय ही कार्डियक अरेस्ट से मौत हो गई.
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    user_Shweksha Pathak
    Shweksha Pathak
    Local News Reporter Raipur, Chhattisgarh•
    4 hrs ago
  • आज रायपुर में रेलवे के जीएम से पत्रकार Vinod Khedule जनहित के मुद्दों पर सवाल करना चाहते थे, लेकिन अधिकारियों ने उन्हें प्रश्न पूछने से रोक दिया। क्या लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध है? पत्रकारिता की आवाज दबाना जनता के अधिकारों का हनन है। जवाबदेही से भागना बंद होना चाहिए। सोचिए,
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    आज रायपुर में रेलवे के जीएम से पत्रकार  Vinod Khedule  जनहित के मुद्दों पर सवाल करना चाहते थे, लेकिन अधिकारियों ने उन्हें प्रश्न पूछने से रोक दिया। क्या लोकतंत्र में प्रश्न पूछना अपराध है? पत्रकारिता की आवाज दबाना जनता के अधिकारों का हनन है। जवाबदेही से भागना बंद होना चाहिए। सोचिए,
    user_Pravakar srivastav
    Pravakar srivastav
    Raipur, Chhattisgarh•
    4 hrs ago
  • कुसमी बलरामपुर में चक्का जाम हाई अलर्ट।।
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    कुसमी बलरामपुर में चक्का जाम हाई अलर्ट।।
    user_SAHIL khess
    SAHIL khess
    Rajpur, Balrampur•
    4 hrs ago
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