लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता ICDS के 50 वर्ष, 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अब एक व्यापक कानून की जरूरत लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता ICDS के 50 वर्ष, 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अब एक व्यापक कानून की जरूरत भारत की आंगनवाड़ी व्यवस्था ने लगभग पाँच दशकों से देश के बच्चों, माताओं और वंचित परिवारों तक सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1975 में शुरू हुई एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) का उद्देश्य बच्चों को जीवन की बेहतर शुरुआत देना तथा माताओं और परिवारों को पोषण, स्वास्थ्य और विकास संबंधी सहायता उपलब्ध कराना था। पचास वर्ष बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भारतीय कल्याणकारी राज्य के सबसे महत्वपूर्ण जमीनी चेहरों में शामिल हैं। लेकिन इस व्यवस्था के केंद्र में एक गंभीर विरोधाभास आज भी मौजूद है। राज्य इन महिलाओं से महत्वपूर्ण और निरंतर सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा करता है, लेकिन उनके अधिकारों, सेवा-शर्तों, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाला कोई व्यापक केंद्रीय वैधानिक ढाँचा अब तक नहीं बना है। यही वह विरोधाभास है जिसे अब दूर करने की आवश्यकता है। भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। भारत की कल्याण व्यवस्था के पीछे खड़ा अदृश्य कार्यबल आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ केवल पोषण सामग्री वितरित करने या रजिस्टर भरने तक सीमित नहीं हैं। समय के साथ उनकी जिम्मेदारियों का दायरा लगातार बढ़ा है। वे प्रारंभिक बाल देखभाल एवं शिक्षा, बच्चों के पोषण और वृद्धि की निगरानी, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण संबंधी जागरूकता, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, सामुदायिक जागरूकता, गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं की सहायता, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, आँकड़ों के संकलन और रिपोर्टिंग जैसे अनेक कार्यों में योगदान देती हैं। कई परिस्थितियों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी गरीब या वंचित परिवार के लिए राज्य और नागरिक के बीच पहला संस्थागत संपर्क-बिंदु होती हैं। वे अपने समुदायों को करीब से जानती हैं। उन्हें पता होता है कि कौन-सा बच्चा कुपोषण या विकास संबंधी समस्या से जूझ रहा है, किस परिवार को सहायता की आवश्यकता है और किन महिलाओं को अतिरिक्त सहयोग चाहिए। फिर भी विडंबना यह है कि राज्य की योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुँचाने वाली यही महिलाएँ स्वयं पर्याप्त कानूनी सुरक्षा से वंचित हैं। यह केवल रोजगार नीति का प्रश्न नहीं है। यह लैंगिक न्याय, सामाजिक न्याय और संवैधानिक शासन का प्रश्न है। पचास वर्षों की सेवा का अर्थ पचास वर्षों की असुरक्षा नहीं हो सकता ICDS की यात्रा आधी सदी पार कर चुकी है। इस दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियों ने अपने समुदायों की सेवा की। लेकिन लंबी सेवा और बढ़ती जिम्मेदारियों के बावजूद उनके लिए ऐसी व्यापक वैधानिक व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी, जो उनके योगदान के अनुरूप अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करे। मूल प्रश्न सरल है— यदि राज्य किसी महिला को महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ सौंपता है, तो वही राज्य उसे उस गरिमा, सुरक्षा और कानूनी मान्यता से क्यों वंचित रखे, जो उन जिम्मेदारियों के अनुरूप होनी चाहिए? उन्हें “मानदेय आधारित”, “स्वैच्छिक” या “अंशकालिक” कह देना इस मूल प्रश्न का पर्याप्त उत्तर नहीं हो सकता, खासकर तब जब वास्तविक कार्यभार वर्षों में लगातार बढ़ा है। रिपोर्टिंग बढ़ी है। डिजिटल जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कार्य बढ़े हैं। प्रारंभिक बाल विकास की जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। इसलिए कानून और संस्थागत व्यवस्था को भी समय के साथ बदलना होगा। लैंगिक प्रश्न को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता आंगनवाड़ी कार्यबल में महिलाओं की संख्या अत्यधिक है। ऐसे में उनके श्रम को पर्याप्त वैधानिक मान्यता न मिलना अपने आप में एक गंभीर लैंगिक प्रश्न खड़ा करता है। समाज जब महिलाओं के श्रम को अपनी कल्याण व्यवस्था के लिए आवश्यक मानता है, लेकिन उसी श्रम के अधिकारों और मूल्य को कमतर आँकता है, तो यह एक पुरानी सामाजिक संरचना को दोहराता है। महिलाओं का काम तब “आवश्यक” माना जाता है जब समाज को उसकी जरूरत होती है, लेकिन जब वही महिलाएँ सम्मानजनक पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों की मांग करती हैं, तो उनके काम के मूल्य पर सवाल उठने लगते हैं। इसलिए आंगनवाड़ी सुधार को केवल वेतन अथवा सरकारी खर्च के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसे लैंगिक-संवेदनशील शासन के व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। एक आधुनिक कल्याणकारी राज्य महिला सशक्तीकरण की बात करते हुए उन लाखों महिलाओं को व्यापक वैधानिक सुरक्षा से वंचित नहीं रख सकता, जो उसके सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को घर-घर तक पहुँचाती हैं। “मानदेय” से अधिकार-आधारित सार्वजनिक सेवा की ओर आंगनवाड़ी व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास अपने आप में यह बताता है कि अब उसके मानव संसाधन ढाँचे की समीक्षा आवश्यक है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से राज्य की अपेक्षाएँ लगातार बढ़ी हैं। उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं, प्रशासनिक और डिजिटल कार्य बढ़े हैं तथा स्वास्थ्य, पोषण और प्रारंभिक बाल विकास से जुड़ी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हुई है। इसलिए केवल मानदेय में समय-समय पर वृद्धि करना पर्याप्त समाधान नहीं हो सकता। आवश्यकता ऐसी अधिकार-आधारित व्यवस्था की है, जिसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका की स्थिति, सेवा की न्यूनतम शर्तें और सामाजिक सुरक्षा कानून के माध्यम से स्पष्ट हों। नीतियाँ और सरकारी आदेश बदलते रहते हैं। लेकिन बुनियादी अधिकारों को केवल प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 में क्या होना चाहिए? एक व्यापक केंद्रीय कानून राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, जबकि राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ और लाभ देने की स्वतंत्रता दी जा सकती है। ऐसे कानून में कम से कम निम्नलिखित विषयों पर विचार होना चाहिए— 1. वैधानिक मान्यता आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को सार्वजनिक कल्याण व्यवस्था में स्पष्ट वैधानिक दर्जा दिया जाए। 2. उचित और पारदर्शी पारिश्रमिक पारिश्रमिक वास्तविक जिम्मेदारियों और कार्यभार के अनुरूप हो तथा उसे समय-समय पर संशोधित करने की पारदर्शी व्यवस्था हो। 3. सामाजिक सुरक्षा पेंशन अथवा सेवानिवृत्ति लाभ, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ, दुर्घटना मुआवजा, दिव्यांगता सुरक्षा, जीवन बीमा और अन्य आवश्यक सामाजिक सुरक्षा उपायों के लिए प्रभावी व्यवस्था हो। 4. कार्य की गरिमा आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को केवल किसी अस्थायी सरकारी योजना की कार्यकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि प्रशिक्षित सामुदायिक स्तर की महत्वपूर्ण कार्यकर्ता के रूप में मान्यता मिले। 5. सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, आवश्यक उपकरण, आधारभूत सुविधाएँ और व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा के न्यूनतम मानक तय किए जाएँ। 6. उत्पीड़न और भेदभाव से सुरक्षा यौन उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, धमकी, भेदभाव और मनमानी अनुशासनात्मक कार्रवाई के विरुद्ध प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था हो। 7. उचित कार्यभार यदि अतिरिक्त सरकारी जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं तो उनके अनुरूप प्रशिक्षण, संसाधन और पारिश्रमिक भी उपलब्ध कराया जाए। लगातार जिम्मेदारियाँ बढ़ाना, लेकिन संसाधन और सुरक्षा न बढ़ाना, संरचनात्मक शोषण की स्थिति पैदा कर सकता है। 8. प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास प्रशिक्षण, प्रमाणन, कौशल विकास, पदोन्नति अथवा करियर प्रगति के अवसरों की स्पष्ट व्यवस्था हो। 9. तकनीक का इस्तेमाल बोझ घटाने के लिए हो डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक काम को सरल बनाना होना चाहिए, न कि कार्यकर्ताओं पर अतिरिक्त डेटा-एंट्री और रिपोर्टिंग का बोझ डालना। तकनीकी उपकरण, कनेक्टिविटी, प्रशिक्षण और सहायता भी व्यवस्था का हिस्सा होने चाहिए। 10. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधियों को उनकी कार्य परिस्थितियों और नीतियों से संबंधित चर्चाओं में अपनी बात रखने का संस्थागत अवसर मिलना चाहिए। जो लोग नीतियों को लागू करते हैं, उनकी आवाज नीति-निर्माण में भी सुनी जानी चाहिए। प्रारंभिक बाल विकास ही राष्ट्र निर्माण है आंगनवाड़ी व्यवस्था को केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम मानना उसके वास्तविक महत्व को कम करके देखना होगा। यह भारत की मानव पूंजी में निवेश है। बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके स्वास्थ्य, पोषण, सीखने की क्षमता, संज्ञानात्मक विकास और भविष्य के शैक्षिक परिणामों पर गहरा प्रभाव डालते हैं। जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी बच्चे के पोषण, स्वास्थ्य जागरूकता, प्रारंभिक शिक्षा और सामाजिक विकास में योगदान देती हैं, वे केवल आज की समस्या का समाधान नहीं कर रही होतीं। वे भारत के भविष्य के नागरिक और कार्यबल की नींव मजबूत कर रही होती हैं। यदि भारत स्वस्थ, शिक्षित और सक्षम पीढ़ी चाहता है, तो उसे उस पीढ़ी की नींव मजबूत करने वाली महिलाओं को भी मजबूत करना होगा। संवैधानिक प्रश्न: क्या लैंगिक न्याय बिना अधिकारों के संभव है? आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम की मांग केवल प्रशासनिक सुधार की मांग नहीं है। इसके पीछे संवैधानिक दृष्टि भी मौजूद है। भारतीय संविधान समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39, 42 और 47 आजीविका, मानवीय कार्य परिस्थितियों, मातृत्व संरक्षण, पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे विषयों के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं। ऐसे में यह विचार करना आवश्यक है कि क्या मुख्यतः महिला कार्यबल से महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ लेकर उन्हें पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा से वंचित रखना समानता और गरिमा की संवैधानिक भावना के अनुरूप है? इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए— “क्या भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वैधानिक अधिकार देने का खर्च उठा सकता है?” बल्कि बड़ा प्रश्न यह होना चाहिए— “क्या कोई कल्याणकारी राज्य उन महिलाओं को अधिकार न देने की सामाजिक और मानवीय कीमत उठा सकता है, जो दशकों से उसकी कल्याण व्यवस्था को जमीनी स्तर पर चला रही हैं?” राष्ट्रीय न्यूनतम मानक और सहकारी संघवाद आंगनवाड़ी सेवाएँ केंद्र और राज्यों की साझा सरकारी संरचना से जुड़ी हैं। इसलिए प्रस्तावित कानून को राष्ट्रीय स्तर पर अधिकारों और सुरक्षा का न्यूनतम मानक निर्धारित करना चाहिए। इसके साथ राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ और लाभ देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इससे सहकारी संघवाद की भावना भी मजबूत होगी और देश के अलग-अलग राज्यों में समान जिम्मेदारियाँ निभाने वाली कार्यकर्ताओं के बीच अत्यधिक असमानताओं को कम करने की दिशा में मदद मिलेगी। राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की आवश्यकता प्रस्तावित कानून के अंतर्गत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की स्थापना पर भी विचार किया जा सकता है। यह आयोग— वैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन की निगरानी; पारिश्रमिक और सेवा शर्तों की समीक्षा; संरचनात्मक शिकायतों की जांच; वार्षिक रिपोर्ट का प्रकाशन; सरकारों को नीति संबंधी सुझाव; लैंगिक असमानताओं का अध्ययन; प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाओं में सुधार की सिफारिश; तथा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की आवाज नीति-निर्माण तक पहुँचाने जैसे कार्य कर सकता है। इससे आंगनवाड़ी कार्यकर्ता केवल सरकारी आदेशों की निष्क्रिय प्राप्तकर्ता न रहकर सामाजिक विकास व्यवस्था की मान्यता प्राप्त हितधारक बन सकेंगी। लाभार्थी से हितधारक बनने की ओर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अब केवल नौकरशाही व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर निर्देशों को लागू करने वाली कर्मियों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे भारत के विकास की वास्तविक हितधारक हैं। वे उन समुदायों को समझती हैं जहाँ सरकारी संस्थानों की पहुँच सीमित हो सकती है। वे बच्चों, माताओं और परिवारों के साथ निरंतर संपर्क में रहती हैं। वे कई सामाजिक और पोषण संबंधी समस्याओं को आधिकारिक आँकड़ों में दिखाई देने से पहले पहचान लेती हैं। उनका अनुभव और स्थानीय ज्ञान स्वयं एक राष्ट्रीय संसाधन है। इसलिए उन्हें केवल योजनाओं को लागू करने वाली कार्यकर्ता नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति के निर्माण और सुधार में योगदान देने वाली पेशेवर साझेदार के रूप में देखना चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 — पाँच सिद्धांतों की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता प्रस्तावित कानून की आधारशिला पाँच मूल सिद्धांतों पर होनी चाहिए— मान्यता। गरिमा। सुरक्षा। समानता। भागीदारी। हर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के लिए न्यूनतम वैधानिक अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ और राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ देने की स्वतंत्रता मिले। कानून में इस कार्यबल के विशेष लैंगिक आयाम को स्वीकार किया जाए। सामाजिक सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल, शिकायत निवारण, व्यावसायिक विकास और सेवानिवृत्ति सुरक्षा को प्रभावी बनाया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश को स्पष्ट संदेश देना चाहिए— “जो महिलाएँ भारत के बच्चों का भविष्य बनाती हैं, वे कानूनी रूप से अदृश्य नहीं रह सकतीं।” भारत की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता की एक कसौटी भारत एक मजबूत, विकसित और सामाजिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन किसी राष्ट्र की शक्ति केवल GDP, बुनियादी ढाँचे या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती। एक मजबूत राष्ट्र वह है जो उन लोगों की गरिमा की रक्षा करता है, जो उसकी कल्याण व्यवस्था को वास्तव में कार्यशील बनाते हैं। एक लैंगिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र केवल महिला सशक्तीकरण की बात नहीं करता—वह महिलाओं को लागू किए जा सकने वाले प्रभावी अधिकार देता है। और एक कल्याणकारी राज्य केवल नागरिकों के लिए योजनाएँ नहीं बनाता—वह उन कार्यकर्ताओं की भी सुरक्षा करता है, जो उन योजनाओं को नागरिकों तक पहुँचाते हैं। ICDS के पचास वर्ष पूरे होने के बाद अब समय आ गया है कि भारत अस्थायी व्यवस्थाओं और बिखरे हुए प्रशासनिक आदेशों से आगे बढ़े। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार देश में लगभग 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। इन लाखों महिलाओं के योगदान को केवल मानदेय की व्यवस्था तक सीमित रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्हें उनके कार्य के अनुरूप सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा और वैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। लैंगिक न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता केवल भाषणों और नीतियों में नहीं, बल्कि लागू किए जा सकने वाले अधिकारों के रूप में दिखाई देनी चाहिए। अब समय है—आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 का। कार्यकर्ता के लिए। बच्चे के लिए। महिला के लिए। संविधान के लिए। भारत के भविष्य के लिए। लेखिका — डॉ. रेनू डी. सिंह पिछले 45 वर्षों से जेंडर राइट्स एक्टिविस्ट
लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता ICDS के 50 वर्ष, 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अब एक व्यापक कानून की जरूरत लैंगिक न्याय को आधी सदी तक नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता ICDS के 50 वर्ष, 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और अब एक व्यापक कानून की जरूरत भारत की आंगनवाड़ी व्यवस्था ने लगभग पाँच दशकों से देश के बच्चों, माताओं और वंचित परिवारों तक सरकारी कल्याणकारी योजनाओं को पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 1975 में शुरू हुई एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) का उद्देश्य बच्चों को जीवन की बेहतर शुरुआत देना तथा माताओं और परिवारों को पोषण, स्वास्थ्य और विकास संबंधी सहायता उपलब्ध कराना था। पचास वर्ष बाद आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भारतीय कल्याणकारी राज्य के सबसे महत्वपूर्ण जमीनी चेहरों में शामिल हैं। लेकिन इस व्यवस्था के केंद्र में एक गंभीर विरोधाभास आज भी मौजूद है। राज्य इन महिलाओं से महत्वपूर्ण और निरंतर सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ निभाने की अपेक्षा करता है, लेकिन उनके अधिकारों, सेवा-शर्तों, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाला कोई व्यापक केंद्रीय वैधानिक ढाँचा अब तक नहीं बना है। यही वह विरोधाभास है जिसे अब दूर करने की आवश्यकता है। भारत को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। भारत की कल्याण व्यवस्था के पीछे खड़ा अदृश्य कार्यबल आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएँ केवल पोषण सामग्री वितरित करने या रजिस्टर भरने तक सीमित नहीं हैं। समय के साथ उनकी जिम्मेदारियों का दायरा लगातार बढ़ा है। वे प्रारंभिक बाल देखभाल एवं शिक्षा, बच्चों के पोषण और वृद्धि की निगरानी, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण संबंधी जागरूकता, पूर्व-प्राथमिक शिक्षा, सामुदायिक जागरूकता, गर्भवती एवं स्तनपान कराने वाली महिलाओं की सहायता, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, आँकड़ों के संकलन और रिपोर्टिंग जैसे अनेक कार्यों में योगदान देती हैं। कई परिस्थितियों में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी गरीब या वंचित परिवार के लिए राज्य और नागरिक के बीच पहला संस्थागत संपर्क-बिंदु होती हैं। वे अपने समुदायों को करीब से जानती हैं। उन्हें पता होता है कि कौन-सा बच्चा कुपोषण या विकास संबंधी समस्या से जूझ रहा है, किस परिवार को सहायता की आवश्यकता है और किन महिलाओं को अतिरिक्त सहयोग चाहिए। फिर भी विडंबना यह है कि राज्य की योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुँचाने वाली यही महिलाएँ स्वयं पर्याप्त कानूनी सुरक्षा से वंचित हैं। यह केवल रोजगार नीति का प्रश्न नहीं है। यह लैंगिक न्याय, सामाजिक न्याय और संवैधानिक शासन का प्रश्न है। पचास वर्षों की सेवा का अर्थ पचास वर्षों की असुरक्षा नहीं हो सकता ICDS की यात्रा आधी सदी पार कर चुकी है। इस दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियों ने अपने समुदायों की सेवा की। लेकिन लंबी सेवा और बढ़ती जिम्मेदारियों के बावजूद उनके लिए ऐसी व्यापक वैधानिक व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी, जो उनके योगदान के अनुरूप अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करे। मूल प्रश्न सरल है— यदि राज्य किसी महिला को महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ सौंपता है, तो वही राज्य उसे उस गरिमा, सुरक्षा और कानूनी मान्यता से क्यों वंचित रखे, जो उन जिम्मेदारियों के अनुरूप होनी चाहिए? उन्हें “मानदेय आधारित”, “स्वैच्छिक” या “अंशकालिक” कह देना इस मूल प्रश्न का पर्याप्त उत्तर नहीं हो सकता, खासकर तब जब वास्तविक कार्यभार वर्षों में लगातार बढ़ा है। रिपोर्टिंग बढ़ी है। डिजिटल जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कार्य बढ़े हैं। प्रारंभिक बाल विकास की जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। इसलिए कानून और संस्थागत व्यवस्था को भी समय के साथ बदलना होगा। लैंगिक प्रश्न को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता आंगनवाड़ी कार्यबल में महिलाओं की संख्या अत्यधिक है। ऐसे में उनके श्रम को पर्याप्त वैधानिक मान्यता न मिलना अपने आप में एक गंभीर लैंगिक प्रश्न खड़ा करता है। समाज जब महिलाओं के श्रम को अपनी कल्याण व्यवस्था के लिए आवश्यक मानता है, लेकिन उसी श्रम के अधिकारों और मूल्य को कमतर आँकता है, तो यह एक पुरानी सामाजिक संरचना को दोहराता है। महिलाओं का काम तब “आवश्यक” माना जाता है जब समाज को उसकी जरूरत होती है, लेकिन जब वही महिलाएँ सम्मानजनक पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा और अधिकारों की मांग करती हैं, तो उनके काम के मूल्य पर सवाल उठने लगते हैं। इसलिए आंगनवाड़ी सुधार को केवल वेतन अथवा सरकारी खर्च के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसे लैंगिक-संवेदनशील शासन के व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। एक आधुनिक कल्याणकारी राज्य महिला सशक्तीकरण की बात करते हुए उन लाखों महिलाओं को व्यापक वैधानिक सुरक्षा से वंचित नहीं रख सकता, जो उसके सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों को घर-घर तक पहुँचाती हैं। “मानदेय” से अधिकार-आधारित सार्वजनिक सेवा की ओर आंगनवाड़ी व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास अपने आप में यह बताता है कि अब उसके मानव संसाधन ढाँचे की समीक्षा आवश्यक है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से राज्य की अपेक्षाएँ लगातार बढ़ी हैं। उनकी जिम्मेदारियाँ बढ़ी हैं, प्रशासनिक और डिजिटल कार्य बढ़े हैं तथा स्वास्थ्य, पोषण और प्रारंभिक बाल विकास से जुड़ी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हुई है। इसलिए केवल मानदेय में समय-समय पर वृद्धि करना पर्याप्त समाधान नहीं हो सकता। आवश्यकता ऐसी अधिकार-आधारित व्यवस्था की है, जिसमें आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका की स्थिति, सेवा की न्यूनतम शर्तें और सामाजिक सुरक्षा कानून के माध्यम से स्पष्ट हों। नीतियाँ और सरकारी आदेश बदलते रहते हैं। लेकिन बुनियादी अधिकारों को केवल प्रशासनिक निर्णयों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 में क्या होना चाहिए? एक व्यापक केंद्रीय कानून राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है, जबकि राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ और लाभ देने की स्वतंत्रता दी जा सकती है। ऐसे कानून में कम से कम निम्नलिखित विषयों पर विचार होना चाहिए— 1. वैधानिक मान्यता आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को सार्वजनिक कल्याण व्यवस्था में स्पष्ट वैधानिक दर्जा दिया जाए। 2. उचित और पारदर्शी पारिश्रमिक पारिश्रमिक वास्तविक जिम्मेदारियों और कार्यभार के अनुरूप हो तथा उसे समय-समय पर संशोधित करने की पारदर्शी व्यवस्था हो। 3. सामाजिक सुरक्षा पेंशन अथवा सेवानिवृत्ति लाभ, स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ, दुर्घटना मुआवजा, दिव्यांगता सुरक्षा, जीवन बीमा और अन्य आवश्यक सामाजिक सुरक्षा उपायों के लिए प्रभावी व्यवस्था हो। 4. कार्य की गरिमा आंगनवाड़ी कार्यकर्ता को केवल किसी अस्थायी सरकारी योजना की कार्यकर्ता के रूप में नहीं, बल्कि प्रशिक्षित सामुदायिक स्तर की महत्वपूर्ण कार्यकर्ता के रूप में मान्यता मिले। 5. सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ कार्यस्थल पर सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, आवश्यक उपकरण, आधारभूत सुविधाएँ और व्यावसायिक जोखिमों से सुरक्षा के न्यूनतम मानक तय किए जाएँ। 6. उत्पीड़न और भेदभाव से सुरक्षा यौन उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, धमकी, भेदभाव और मनमानी अनुशासनात्मक कार्रवाई के विरुद्ध प्रभावी शिकायत-निवारण व्यवस्था हो। 7. उचित कार्यभार यदि अतिरिक्त सरकारी जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं तो उनके अनुरूप प्रशिक्षण, संसाधन और पारिश्रमिक भी उपलब्ध कराया जाए। लगातार जिम्मेदारियाँ बढ़ाना, लेकिन संसाधन और सुरक्षा न बढ़ाना, संरचनात्मक शोषण की स्थिति पैदा कर सकता है। 8. प्रशिक्षण और व्यावसायिक विकास प्रशिक्षण, प्रमाणन, कौशल विकास, पदोन्नति अथवा करियर प्रगति के अवसरों की स्पष्ट व्यवस्था हो। 9. तकनीक का इस्तेमाल बोझ घटाने के लिए हो डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य प्रशासनिक काम को सरल बनाना होना चाहिए, न कि कार्यकर्ताओं पर अतिरिक्त डेटा-एंट्री और रिपोर्टिंग का बोझ डालना। तकनीकी उपकरण, कनेक्टिविटी, प्रशिक्षण और सहायता भी व्यवस्था का हिस्सा होने चाहिए। 10. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रतिनिधियों को उनकी कार्य परिस्थितियों और नीतियों से संबंधित चर्चाओं में अपनी बात रखने का संस्थागत अवसर मिलना चाहिए। जो लोग नीतियों को लागू करते हैं, उनकी आवाज नीति-निर्माण में भी सुनी जानी चाहिए। प्रारंभिक बाल विकास ही राष्ट्र निर्माण है आंगनवाड़ी व्यवस्था को केवल एक कल्याणकारी कार्यक्रम मानना उसके वास्तविक महत्व को कम करके देखना होगा। यह भारत की मानव पूंजी में निवेश है। बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्ष उसके स्वास्थ्य, पोषण, सीखने की क्षमता, संज्ञानात्मक विकास और भविष्य के शैक्षिक परिणामों पर गहरा प्रभाव डालते हैं। जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता किसी बच्चे के पोषण, स्वास्थ्य जागरूकता, प्रारंभिक शिक्षा और सामाजिक विकास में योगदान देती हैं, वे केवल आज की समस्या का समाधान नहीं कर रही होतीं। वे भारत के भविष्य के नागरिक और कार्यबल की नींव मजबूत कर रही होती हैं। यदि भारत स्वस्थ, शिक्षित और सक्षम पीढ़ी चाहता है, तो उसे उस पीढ़ी की नींव मजबूत करने वाली महिलाओं को भी मजबूत करना होगा। संवैधानिक प्रश्न: क्या लैंगिक न्याय बिना अधिकारों के संभव है? आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम की मांग केवल प्रशासनिक सुधार की मांग नहीं है। इसके पीछे संवैधानिक दृष्टि भी मौजूद है। भारतीय संविधान समानता, गरिमा और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता व्यक्त करता है। नीति-निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 39, 42 और 47 आजीविका, मानवीय कार्य परिस्थितियों, मातृत्व संरक्षण, पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे विषयों के प्रति राज्य की जिम्मेदारी को रेखांकित करते हैं। ऐसे में यह विचार करना आवश्यक है कि क्या मुख्यतः महिला कार्यबल से महत्वपूर्ण सार्वजनिक जिम्मेदारियाँ लेकर उन्हें पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा से वंचित रखना समानता और गरिमा की संवैधानिक भावना के अनुरूप है? इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए— “क्या भारत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को वैधानिक अधिकार देने का खर्च उठा सकता है?” बल्कि बड़ा प्रश्न यह होना चाहिए— “क्या कोई कल्याणकारी राज्य उन महिलाओं को अधिकार न देने की सामाजिक और मानवीय कीमत उठा सकता है, जो दशकों से उसकी कल्याण व्यवस्था को जमीनी स्तर पर चला रही हैं?” राष्ट्रीय न्यूनतम मानक और सहकारी संघवाद आंगनवाड़ी सेवाएँ केंद्र और राज्यों की साझा सरकारी संरचना से जुड़ी हैं। इसलिए प्रस्तावित कानून को राष्ट्रीय स्तर पर अधिकारों और सुरक्षा का न्यूनतम मानक निर्धारित करना चाहिए। इसके साथ राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ और लाभ देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। इससे सहकारी संघवाद की भावना भी मजबूत होगी और देश के अलग-अलग राज्यों में समान जिम्मेदारियाँ निभाने वाली कार्यकर्ताओं के बीच अत्यधिक असमानताओं को कम करने की दिशा में मदद मिलेगी। राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की आवश्यकता प्रस्तावित कानून के अंतर्गत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आयोग की स्थापना पर भी विचार किया जा सकता है। यह आयोग— वैधानिक अधिकारों के क्रियान्वयन की निगरानी; पारिश्रमिक और सेवा शर्तों की समीक्षा; संरचनात्मक शिकायतों की जांच; वार्षिक रिपोर्ट का प्रकाशन; सरकारों को नीति संबंधी सुझाव; लैंगिक असमानताओं का अध्ययन; प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाओं में सुधार की सिफारिश; तथा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की आवाज नीति-निर्माण तक पहुँचाने जैसे कार्य कर सकता है। इससे आंगनवाड़ी कार्यकर्ता केवल सरकारी आदेशों की निष्क्रिय प्राप्तकर्ता न रहकर सामाजिक विकास व्यवस्था की मान्यता प्राप्त हितधारक बन सकेंगी। लाभार्थी से हितधारक बनने की ओर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को अब केवल नौकरशाही व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर निर्देशों को लागू करने वाली कर्मियों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे भारत के विकास की वास्तविक हितधारक हैं। वे उन समुदायों को समझती हैं जहाँ सरकारी संस्थानों की पहुँच सीमित हो सकती है। वे बच्चों, माताओं और परिवारों के साथ निरंतर संपर्क में रहती हैं। वे कई सामाजिक और पोषण संबंधी समस्याओं को आधिकारिक आँकड़ों में दिखाई देने से पहले पहचान लेती हैं। उनका अनुभव और स्थानीय ज्ञान स्वयं एक राष्ट्रीय संसाधन है। इसलिए उन्हें केवल योजनाओं को लागू करने वाली कार्यकर्ता नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति के निर्माण और सुधार में योगदान देने वाली पेशेवर साझेदार के रूप में देखना चाहिए। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 — पाँच सिद्धांतों की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता प्रस्तावित कानून की आधारशिला पाँच मूल सिद्धांतों पर होनी चाहिए— मान्यता। गरिमा। सुरक्षा। समानता। भागीदारी। हर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के लिए न्यूनतम वैधानिक अधिकार सुनिश्चित किए जाएँ और राज्यों को उससे बेहतर सुविधाएँ देने की स्वतंत्रता मिले। कानून में इस कार्यबल के विशेष लैंगिक आयाम को स्वीकार किया जाए। सामाजिक सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, सुरक्षित कार्यस्थल, शिकायत निवारण, व्यावसायिक विकास और सेवानिवृत्ति सुरक्षा को प्रभावी बनाया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश को स्पष्ट संदेश देना चाहिए— “जो महिलाएँ भारत के बच्चों का भविष्य बनाती हैं, वे कानूनी रूप से अदृश्य नहीं रह सकतीं।” भारत की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता की एक कसौटी भारत एक मजबूत, विकसित और सामाजिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन किसी राष्ट्र की शक्ति केवल GDP, बुनियादी ढाँचे या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जाती। एक मजबूत राष्ट्र वह है जो उन लोगों की गरिमा की रक्षा करता है, जो उसकी कल्याण व्यवस्था को वास्तव में कार्यशील बनाते हैं। एक लैंगिक रूप से जिम्मेदार राष्ट्र केवल महिला सशक्तीकरण की बात नहीं करता—वह महिलाओं को लागू किए जा सकने वाले प्रभावी अधिकार देता है। और एक कल्याणकारी राज्य केवल नागरिकों के लिए योजनाएँ नहीं बनाता—वह उन कार्यकर्ताओं की भी सुरक्षा करता है, जो उन योजनाओं को नागरिकों तक पहुँचाते हैं। ICDS के पचास वर्ष पूरे होने के बाद अब समय आ गया है कि भारत अस्थायी व्यवस्थाओं और बिखरे हुए प्रशासनिक आदेशों से आगे बढ़े। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार देश में लगभग 13.31 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। इन लाखों महिलाओं के योगदान को केवल मानदेय की व्यवस्था तक सीमित रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्हें उनके कार्य के अनुरूप सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा और वैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। लैंगिक न्याय के प्रति भारत की प्रतिबद्धता केवल भाषणों और नीतियों में नहीं, बल्कि लागू किए जा सकने वाले अधिकारों के रूप में दिखाई देनी चाहिए। अब समय है—आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अधिनियम, 2026 का। कार्यकर्ता के लिए। बच्चे के लिए। महिला के लिए। संविधान के लिए। भारत के भविष्य के लिए। लेखिका — डॉ. रेनू डी. सिंह पिछले 45 वर्षों से जेंडर राइट्स एक्टिविस्ट
- *एसएसपी दून के नेतृत्व में शराब तस्करों पर जारी दून पुलिस का एक्शन* *अलग-अलग थाना क्षेत्रों से शराब तस्करी में लिप्त 04 अभियुक्तों को पुलिस ने किया गिरफ्तार* *अभियुक्तों के कब्जे से 05 पेटी से अधिक अवैध देसी शराब हुई बरामद* *शराब तस्करी में प्रयुक्त वाहन छोटा हाथी को पुलिस ने किया सीज* वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून द्वारा सभी अधीनस्थों को अपने-अपने थाना क्षेत्रान्तर्गत मादक पदार्थों/अवैध शराब की तस्करी में लिप्त अभियुक्तों को चिन्हित करते हुए उनके विरूद्ध प्रभावी कार्यवाही किये जाने के निर्देश दिये गये हैं। निर्देशों के अनुपालन में जनपद के सभी थाना क्षेत्रों में पुलिस टीमों द्वारा लगातार ऐसे अभियुक्तों को चिन्हित कर उनके विरूद्ध। प्रभावी कार्यवाही की जा रही है। इसी क्रम में दून पुलिस द्वारा की गई कार्यवाही का विवरण निम्नवत है:- *1- कोतवाली ऋषिकेश* *लगभग 04 पेटी अवैध देसी शराब के साथ 03 अभियुक्त गिरफ्तार, तस्करी में प्रयुक्त वाहन को पुलिस ने किया सीज :-* कोतवाली ऋषिकेश पर गठित अलग-अलग टीमों द्वारा दिनांक: 15-09-24 को चैकिंग के दौरान पुराने रेलवे स्टेशन गेट, डाकघर आईडीपीएल के सामने एवं परशुराम चौक ऋषिकेश से 03 अभियुक्तों 01: रोबिन कुमार पुत्र नरेश कुमार, 02: सौरब पुत्र रमेश कुमार तथा 03: भोले पुत्र सुरेश को अवैध शराब की तस्करी करते हुए गिरफ्तार किया गया। सभी अभियुक्तों के विरूद्ध आबकारी अधिनियम के अन्तर्गत अभियोग पंजीकृत किये गये। शराब तस्करी में प्रयुक्त वाहन छोटा हाथी संख्या: यू0के0-14-सीए -2855 को सीज किया गया। *विवरण गिरफ्तार अभियुक्त:* 1- रोबिन कुमार पुत्र नरेश कुमार निवासी 134 अवधूत मार्ग वाल्मिकी नगर, थाना ऋषिकेश, देहरादून, उम्र 40 वर्ष। 2- सौरब पुत्र रमेश कुमार निवासी तुलसी विहार कालोनी हनुमान मन्दिर के पास श्यामपुर, ऋषिकेश, देहरादून, उम्र 25 वर्ष। 3- भोले पुत्र सुरेश निवासी। गोविन्द नगर झुग्गी झोपडी परशुराम चौक, थाना ऋषिकेश, देहरादून, उम्र 29 वर्ष। *बरामदगी:* (1) अभियुक्त रोबिन कुमार के कब्जे से 27 ट्रेटा पैक माल्टा मसालेदार देशी शराब (2) अभियुक्त सौरब के कब्जे से 35 ट्रेटा पैक माल्टा मसालेदार देशी शराब (3) अभियुक्त भोले के कब्जे से 110 ट्रेटा पैक माल्टा देशी शराब (4) टाटा ऐस (छोटा हाथी) वाहन संख्या यू0के0-14-सीए-2855 *2- कोतवाली पटेलनगर* *86 ट्रेटा पैक देशी शराब के साथ 01 अभियुक्त गिरफ्तार:* पटेलनगर पुलिस द्वारा दिनांक 15-09-2026 को मुखबिर की सूचना पर महाराणा प्रताप ग्राउण्ड आईएसबीटी पटेलनगर के पास से 01 अभियुक्त अमित पुत्र मुकेश कुमार को 86 टेट्रा पैक देशी मसालेदार शराब के साथ गिरफ्तार किया गया। अभियुक्त के विरुद्व थाना पटेलनगर पर मु0अ0सं0-639/2026 धारा 60 आबकारी अधिनियम में अभियोग पंजीकृत किया गया। *विवरण गिरफ्तार अभियुक्त:* 1- अमित पुत्र मुकेश कुमार निवासी टर्नर रोड, लेन नम्बर 01, क्लेमनटाउन, उम्र 38 वर्ष *बरामदगी:* 86 टैट्रा पैक देसी शराब3
- 🌾 डोईवाला के खेरी गांव में बंदरों का आतंक, गन्ने की फसल तबाह The Aman Times 🌾 डोईवाला के खेरी गांव में बंदरों का आतंक, गन्ने की फसल तबाह डोईवाला। मारखम ग्रांट ग्राम पंचायत के खेरी गांव में बंदरों के झुंड ने किसानों की गन्ने की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया है। किसान राजकुमार मौर्य, तरसेम सिंह, राजा और अरविंद की फसल बंदरों ने बर्बाद कर दी। किसानों का कहना है कि लच्छीवाला वन रेंज के खेरी जंगलों से बंदर, हाथी और अन्य जंगली जानवर लगातार खेतों की ओर आ रहे हैं और फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इससे किसानों की महीनों की मेहनत बर्बाद हो रही है। मारखम ग्रांट ग्राम पंचायत के प्रधान परमिंदर सिंह बाबू ने कहा कि वन विभाग से किसानों की सुरक्षा के लिए प्रभावी इंतजाम करने की मांग की गई है, ताकि किसानों की मेहनत बर्बाद न हो। उन्होंने कहा कि जंगली जानवरों से हुए फसल नुकसान का किसानों को मुआवजा दिलाने के लिए भी प्रयास किए जाएंगे। किसानों ने वन विभाग से फसलों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम और नुकसान का उचित मुआवजा देने की मांग की है।1
- बिना लाइसेंस चल रहे हुक्का बार की अब नहीं खैर, बिना लाइसेंस चल रहे बार का काटा चालान। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हरिद्वार के निर्देश पर होटल, ढाबा, रेस्टोरेंट, कैफे आदि प्रतिष्ठानों में औचक चैकिंग/सत्यापन अभियान के दौरान कोतवाली गंगनहर पुलिस ने क्षेत्र में चलाए जा रहे हुक्का बार पहुंचकर रिकॉर्ड खंगाले तो सामने आया कि संचालक द्वारा उक्त बार बिना लाइसेंस के संचालित किया जा रहा था। साथ ही संचालक द्वारा बिना सत्यापन के ही नियुक्त किए गए स्टॉफ से काम लिया जा रहा था। नियमानुसार आरोपी संचालक के खिलाफ कार्यवाही करते हुए पुलिस टीम ने आरोपी का पुलिस अधिनियम के तहत ₹10000/- का चालान काटा। उक्त संचालक सहित अन्य होटल, ढाबो, बार के संचालकों को स्पष्ट शब्दों में बताया गया कि बिना वैध लाइसेंस न ऐसे बार संचालित किए जाएं न बिना वैध आईडी किसी व्यक्ति को रुकने दिया जाए। बिना सत्यापन कर्मचारी रखने पर भी कड़ी चालानी कार्रवाई करने की संबंधित को स्पष्ट चेतावनी दी गई। इसके साथ ही संचालकों को अपने प्रतिष्ठान में सी.सी.टी.वी. कैमरा और सुरक्षा उपकरण चालू दशा में रखने, एंट्री/ एग्जिट पॉइंट्स पर अच्छी गुणवत्ता के कैमरे लगाने एवं संदिग्ध व्यक्ति या गतिविधि दिखाई देने पर तत्काल पुलिस को सूचना देने के निर्देश दिए गए। *विवरण आरोपी संचालक-* फहीम कुरेशी पुत्र तस्लीम कुरैशी निवासी रामपुर चुंगी1
- शांतरशाह में युवक को गोली मारकर फरार हुए दो बदमाश, पुलिस जांच में जुटी हरिद्वार। बहादराबाद थाना क्षेत्र के शांतरशाह गांव में सोमवार को उस समय हड़कंप मच गया, जब दो अज्ञात युवकों ने एक युवक पर कथित तौर पर गोली चला दी। गोली लगने से युवक गंभीर रूप से घायल हो गया। वारदात को अंजाम देने के बाद दोनों आरोपी मौके से फरार हो गए। घटना के बाद आसपास के क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। जानकारी के अनुसार, शांतरशाह निवासी हैप्पी पुत्र राजकुमार किसी काम से जा रहा था। इसी दौरान दो अज्ञात बदमाशों ने उस पर गोली चला दी। गोली लगने से हैप्पी घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा। घटना के बाद आरोपी वहां से फरार हो गए। आसपास मौजूद लोगों ने घायल युवक को तत्काल उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया। घटना की जानकारी मिलते ही बहादराबाद थाना पुलिस मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण किया। पुलिस ने मामले की जानकारी जुटाने के साथ ही वारदात से जुड़े साक्ष्यों को एकत्र करना शुरू कर दिया है। पुलिस आसपास के क्षेत्र में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाल रही है, ताकि हमलावरों की पहचान की जा सके। इसके अलावा पुलिस की टीमें संभावित स्थानों पर आरोपियों की तलाश में जुटी हैं। फिलहाल गोली चलाने के पीछे की वजह सामने नहीं आई है। पुलिस घायल युवक से घटना के संबंध में जानकारी जुटाने का प्रयास कर रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच के बाद ही वारदात की वास्तविक वजह और आरोपियों की पहचान स्पष्ट हो सकेगी। गोलीकांड के बाद स्थानीय लोगों में भी चिंता का माहौल है। पुलिस ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और घटना से संबंधित कोई जानकारी होने पर पुलिस को सूचित करने की अपील की है।1
- घर पर गोलगप्पे बनाने से डर लगता है तो ये रेसिपी आपके लिए है।1
- बड़कोट सीएचसी में स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल, विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति को लेकर उठी आवाज, मांग पूरी नही होने पर आंदोलन की चेतावनी । NIU देहरादून NIU ✍️ #BadkotCHC उत्तरकाशी में यमुनाघाटी क्षेत्र के लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बड़कोट में डॉक्टरों के रिक्त पदों का मामला एक बार फिर गरमा गया है। लंबे समय से विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे अस्पताल को लेकर क्षेत्रवासियों ने मोर्चा खोल दिया है। लोगों ने मुख्यमंत्री से अस्पताल में स्वीकृत सभी चिकित्सकीय पदों पर तत्काल नियुक्ति करने की मांग की है। क्षेत्रवासियों के अनुसार, वर्ष 2015 में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बड़कोट के लिए आठ चिकित्सकीय पद स्वीकृत किए गए थे। लेकिन इन पदों के सापेक्ष अब तक सिर्फ एक दंत चिकित्सक की नियुक्ति हो सकी है। बाकी पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती नहीं होने से मरीजों को सामान्य उपचार के लिए भी जिला अस्पताल या देहरादून सहित दूसरे बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। पहाड़ी क्षेत्र में दूरी, खराब मौसम और सीमित परिवहन व्यवस्था के कारण गंभीर मरीजों और गर्भवती महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है। बड़कोट और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की बड़ी आबादी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए इसी केंद्र पर निर्भर है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि अस्पताल में प्रसव सुविधा, स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और अन्य जरूरी विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बेहद आवश्यक है। विशेषज्ञ चिकित्सकों के अभाव में गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ता है। आपात स्थिति में मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता। इससे कई बार मरीजों और उनके परिजनों को आर्थिक बोझ के साथ-साथ जान जोखिम में डालकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।1
- खानपुर विकासखंड कार्यालय बना शोपीस! फरियादी काट रहे चक्कर, 11:45 तक कई कर्मचारी सीट से नदारद लक्सर के खानपुर विकासखंड कार्यालय में अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित लेटलतीफी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कार्यालय खुलने के बावजूद कई कर्मचारी और अधिकारी समय पर अपनी सीटों पर नहीं पहुंचे, जबकि दूर-दराज से आए फरियादी अपने जरूरी काम के लिए घंटों इंतजार करते रहे। जन्म प्रमाण पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र, परिवार रजिस्टर की नकल समेत अन्य सरकारी सेवाओं के लिए पहुंचे लोगों ने समय और पैसा बर्बाद होने की बात कही। बताया गया कि विकासखंड के अधिकारी करीब 10:30 बजे के बाद कार्यालय पहुंचे, जबकि 11:45 बजे तक भी कई कर्मचारी अपनी सीटों पर मौजूद नहीं थे। अब सवाल है—सरकारी कार्यालयों में समय की पाबंदी कब सुनिश्चित होगी और फरियादियों को समय पर सरकारी सेवाएं कब मिलेंगी? श्रद्धा टीवी नेटवर्क — ना डरता है, ना झुकता है, ना बिकता है… निष्पक्ष खबर, सच्चाई के साथ। #लक्सर #खानपुर #उत्तराखंड #सरकारीकार्यालय #ShraddhaTVNetwork1
- रानी पोखरी में हाथी का आतंक, धान की फसल रौंदी।।।।।।।।।।।। The Aman Times रानी पोखरी में हाथी का आतंक, धान की फसल रौंदी रानी पोखरी/डोईवाला। डोईवाला विधानसभा क्षेत्र में हाथियों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। ताजा मामला रानी पोखरी के मौजा रानी पोखरी का है, जहां हाथी धान के खेत में घुस गया और फसल को भारी नुकसान पहुंचाया। पूर्व सैनिक राजेंद्र सिंह रावत की धान की फसल हाथी ने रौंदकर तहस-नहस कर दी। गांव के प्रधान प्रतिनिधि विक्रम सिंह भंडारी ने वन विभाग से जंगली जानवरों की आबादी को आबादी वाले क्षेत्रों और खेतों में घुसने से रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की है।1