रीवा शहर का चोरहटा रतहरा बायपास की 'दरार' और सिस्टम का 'जुगाड़': रीवा की जनता को हर रात मिल रहा 'महाजाम' का प्रसाद! रीवा शहर का बायपास पुल इन दिनों सिर्फ गाड़ियों का बोझ नहीं ढो रहा, बल्कि जिला प्रशासन और पुलिस की 'कुशल कार्यप्रणाली' का जीता-जागता स्मारक बन चुका है। पुल में आई एक दरार ने पूरे शहर को डाइवर्जन और जाम के ऐसे चक्रव्यूह में फंसा दिया है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता शायद हमारे हुक्मरानों को भी नहीं पता। दिन भर की मेहनत के बाद जब आम आदमी सुकून से घर लौटना चाहता है, तो प्रशासन उसे 'भयंकर जाम' का सरप्राइज गिफ्ट देता है। सिस्टम की इस शानदार 'नाकामी' को देखकर ज़ेहन में कुछ तीखे सवाल उठना लाज़िमी हैं: क्या प्रशासन को लकवा मार गया है? एक पुल की दरार को दुरुस्त करने या एक सुचारू वैकल्पिक मार्ग बनाने में आखिर इतने हफ्ते या महीने क्यों लग रहे हैं? क्या इसके लिए किसी विदेशी इंजीनियर या 'दिव्य चमत्कार' का इंतज़ार हो रहा है? ट्रैफिक पुलिस रात में कहाँ 'विश्राम' करती है? जैसे ही रात का अंधेरा घिरता है और भारी वाहनों का प्रवेश शुरू होता है, शहर के अंदर और बाहर गाड़ियों की कतारें लग जाती हैं। ऐसे में जाम खुलवाने वाली व्यवस्था आखिर किस वीआईपी के स्वागत में बिछी रहती है? क्या यह 'स्मार्ट सिटी' का नया मॉडल है? जहां आम जनता ट्रकों के धुएं और कान फोड़ू हॉर्न के बीच घंटों रेंगने को मजबूर है। क्या प्रशासन ने मान लिया है कि रीवा वासियों को अब ऐसे ही घुट-घुट कर चलने की आदत डाल लेनी चाहिए? डाइवर्जन के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, उसने शहर की सांसें रोक दी हैं। 'साहब' लोग तो शायद हूटर बजाकर या दूसरे रास्तों से निकल जाते होंगे, लेकिन आम जनता इस जाम में अपना पेट्रोल, समय और खून तीनों जला रही है। रीवा प्रशासन और पुलिस से बस इतनी सी गुज़ारिश है— अगर पुल की दरार तुरंत नहीं भर सकते, तो कम से कम जनता के सब्र की दरार को तो और चौड़ा मत कीजिए! व्यवस्था सुधारिए, क्योंकि जनता टैक्स सड़कों पर चलने के लिए देती है, रेंगने और जाम में खड़े रहने के लिए नहीं। #Rewa #रीवा #RataharaBypass #रतहरा_बायपास #RewaTrafficJam #रीवा_महाजाम #rewacity
रीवा शहर का चोरहटा रतहरा बायपास की 'दरार' और सिस्टम का 'जुगाड़': रीवा की जनता को हर रात मिल रहा 'महाजाम' का प्रसाद! रीवा शहर का बायपास पुल इन दिनों सिर्फ गाड़ियों का बोझ नहीं ढो रहा, बल्कि जिला प्रशासन और पुलिस की 'कुशल कार्यप्रणाली' का जीता-जागता स्मारक बन चुका है। पुल में आई एक दरार ने पूरे शहर को डाइवर्जन और जाम के ऐसे चक्रव्यूह में फंसा दिया है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता शायद हमारे हुक्मरानों को भी नहीं पता। दिन भर की मेहनत के बाद जब आम आदमी सुकून से घर लौटना चाहता है, तो प्रशासन उसे 'भयंकर जाम' का सरप्राइज गिफ्ट देता है। सिस्टम की इस शानदार 'नाकामी' को देखकर ज़ेहन में कुछ तीखे सवाल उठना लाज़िमी हैं: क्या प्रशासन को लकवा मार गया है? एक पुल की दरार को दुरुस्त करने या एक सुचारू वैकल्पिक मार्ग बनाने में आखिर इतने हफ्ते या महीने क्यों लग रहे हैं? क्या इसके लिए किसी विदेशी इंजीनियर या 'दिव्य चमत्कार' का इंतज़ार हो रहा है? ट्रैफिक पुलिस रात में कहाँ 'विश्राम' करती है? जैसे ही रात का अंधेरा घिरता है और भारी वाहनों का प्रवेश शुरू होता है, शहर के अंदर और बाहर गाड़ियों की कतारें लग जाती हैं। ऐसे में जाम खुलवाने वाली व्यवस्था आखिर किस वीआईपी के स्वागत में बिछी रहती है? क्या यह 'स्मार्ट सिटी' का नया मॉडल है? जहां आम जनता ट्रकों के धुएं और कान फोड़ू हॉर्न के बीच घंटों रेंगने को मजबूर है। क्या प्रशासन ने मान लिया है कि रीवा वासियों को अब ऐसे ही घुट-घुट कर चलने की आदत डाल लेनी चाहिए? डाइवर्जन के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, उसने शहर की सांसें रोक दी हैं। 'साहब' लोग तो शायद हूटर बजाकर या दूसरे रास्तों से निकल जाते होंगे, लेकिन आम जनता इस जाम में अपना पेट्रोल, समय और खून तीनों जला रही है। रीवा प्रशासन और पुलिस से बस इतनी सी गुज़ारिश है— अगर पुल की दरार तुरंत नहीं भर सकते, तो कम से कम जनता के सब्र की दरार को तो और चौड़ा मत कीजिए! व्यवस्था सुधारिए, क्योंकि जनता टैक्स सड़कों पर चलने के लिए देती है, रेंगने और जाम में खड़े रहने के लिए नहीं। #Rewa #रीवा #RataharaBypass #रतहरा_बायपास #RewaTrafficJam #रीवा_महाजाम #rewacity
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- Post by JOURNALIST RIPPU PANDEY4
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