धरहरकला, पुष्पराजगढ़ के स्वयंभू श्री सिद्ध बटुक गणेश जी अनूपपुर - अमरकंटक मार्ग मे राजेन्द्रग्राम से लगभग 10 किमी दक्षिण की ओर धरहरकला गांव मे श्री सिद्ध गणेशजी के बालस्वरूप प्रतिमा के दर्शन होते हैं। मैं यहाँ 1981 से लगभग नियमित जाता रहा हूं और मैने यह पाया कि यह दुनिया भर मर पाई जाने वाली सामान्य चतुर्भुज गणेश प्रतिमाओं से अलग दिखाई देते हैं। बालस्वरुप होने के कारण यह प्रतिमा द्विभुज है और बाएं हाथ में कटोरा/पात्र लिये हुए हैं । इसलिए इन्हे बटुक गणेश भी कहा जाता है। पुरातत्व विभाग के अनुसार यह प्रतिमा कल्चुरी कालीन, धार्मिक ,आध्यात्मिक, ऐतिहासिक महत्व की प्रतिमा है। जिसके मन्दिर परिसर मे इतिहास के बहुत से अवशेष बिखरे पडे हैं। स्थानीय परंपरा और जन श्रुतियों के अनुसार इस बाल स्वरूप को गणेशजी के विद्यार्थी/बटुक स्वरूप से जोड़ा जाता है। दशकों पहले इसमे जनेऊ नही दिखता था किंतु अब प्रतिमा पर जनेऊ भी स्पष्ट दिखाई देता है। जिले के वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्रग्राम निवासी श्री आशुतोष सिंह दीक्षित इसे प्राचीन परंपरा से जोड़ते हुए बताया है कि उपनयन संस्कार के बाद बटुक को शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजे जाने की परंपरा में पात्र/भिक्षापात्र का विशेष संदर्भ रहा है । यह पात्र विद्या, विनय, संयम और ब्रह्मचर्य के संकेत से जुड़ सकता है। गणपति की यह प्रतिमा कल्चुरीकालीन मानी जाती है और स्थानीय मान्यता है कि इसका आकार समय के साथ बढ़ रहा है। हालांकि प्रतिमा के प्रतिवर्ष बढ़ने की बात की पुरातात्विक/वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं होने के बावजूद स्थानीय लोगों मे इसकी चर्चा सुनी जा सकती है । इसके आसपास कल्चुरीकालीन शिव, ब्रह्मा, विष्णु की प्राचीन प्रतिमाएँ तथा गौरी कुंड भी हैं। धरहरकला के प्राचीन शिवमंदिर और स्वयंभू गणेश मंदिर को राज्य पुरातत्व की दृष्टि से भी संरक्षित स्मारक क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है। धरहर गणेश की इस प्रतिमा की मुद्रा, सूंड, हाथ में पात्र, जनेऊ, वाहन और इसे भव्य ,दिव्य स्वरुप प्रदान करते हैं । मां नर्मदा की उद्गम अमरकंटक से उत्तर दिशा मे स्थित होने के कारण मान्यता यह भी है कि अमरकंटक मे माई के और जलेश्वरधाम मे भगवान शिव के दर्शन से पूर्व धरहरधाम के श्री गणेश के दर्शन जरुर करना चाहिये। जनश्रुति यह भी है कि इस सुदर्शन गणपति प्रतिमा की विशेषताओं को देखते हुए कुछ लोगों ने प्रतिमा को यहां से अन्यत्र विस्थापित करने की पूरी कोशिश की लेकिन इसके सारे प्रयास विफल हो गये। मन्दिर के समीप एक शिवालय का भग्नावशेष भी है जिसे कुछ लोग सूर्य मन्दिर भी कहते है। इसके पश्चिम मे कुछ ही दूर पर प्राकृतिक झरना भी है। यहां आकर प्रकति के हर रंग और हर संगीत की अनुभूति की जा सकती है। समय के अनुरुप श्रद्धालुओं की संख्या मे वृद्धि हुई है । जिसके चलते यहां मन्दिर को नया स्वरुप दिया गया है और आसपास कुछ पक्के निर्माण किये गये हैं। वर्ष मे यहां मेला भी लगता है। आवश्यकता इस बात की जरुर है कि मुख्य मार्ग से लगभग 500 मीटर दूर इस प्राकृतिक सुरम्य स्थान मे पक्के निर्माण ,अतिक्रमण सख्ती से रोके जाएं। यह देखना स्थानीय पंचायत का कार्य है कि यहां अब कोई अतिक्रमण ,कोई पक्का निर्माण ना कराया जाए। मनोकामना सिद्धि के लिये विख्यात इस बटुक गणपति मन्दिर मे आने वाले सभी श्रद्धालुओं से यही अपील है कि यहां आकर पुण्य जरुर कमाएं लेकिन यहां की पवित्रता और शुद्धता को बनाए रख कर।
धरहरकला, पुष्पराजगढ़ के स्वयंभू श्री सिद्ध बटुक गणेश जी अनूपपुर - अमरकंटक मार्ग मे राजेन्द्रग्राम से लगभग 10 किमी दक्षिण की ओर धरहरकला गांव मे श्री सिद्ध गणेशजी के बालस्वरूप प्रतिमा के दर्शन होते हैं। मैं यहाँ 1981 से लगभग नियमित जाता रहा हूं और मैने यह पाया कि यह दुनिया भर मर पाई जाने वाली सामान्य चतुर्भुज गणेश प्रतिमाओं से अलग दिखाई देते हैं। बालस्वरुप होने के कारण यह प्रतिमा द्विभुज है और बाएं हाथ में कटोरा/पात्र लिये हुए हैं । इसलिए इन्हे बटुक गणेश भी कहा जाता है। पुरातत्व विभाग के अनुसार यह प्रतिमा कल्चुरी कालीन, धार्मिक ,आध्यात्मिक, ऐतिहासिक महत्व की प्रतिमा है। जिसके मन्दिर परिसर मे इतिहास के बहुत से अवशेष बिखरे पडे हैं। स्थानीय परंपरा और जन श्रुतियों के अनुसार इस बाल स्वरूप को गणेशजी के विद्यार्थी/बटुक स्वरूप से जोड़ा जाता है। दशकों पहले इसमे जनेऊ नही दिखता था किंतु अब प्रतिमा पर जनेऊ भी स्पष्ट दिखाई देता है। जिले के वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्रग्राम निवासी श्री आशुतोष सिंह दीक्षित इसे प्राचीन परंपरा से जोड़ते हुए बताया है कि उपनयन संस्कार के बाद बटुक को शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजे जाने की परंपरा में पात्र/भिक्षापात्र का विशेष संदर्भ रहा है । यह पात्र विद्या, विनय, संयम और ब्रह्मचर्य के संकेत से जुड़ सकता है। गणपति की यह प्रतिमा कल्चुरीकालीन मानी जाती है और स्थानीय मान्यता है कि इसका आकार समय के साथ बढ़ रहा है। हालांकि प्रतिमा के प्रतिवर्ष बढ़ने की बात की पुरातात्विक/वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं होने के बावजूद स्थानीय लोगों मे इसकी चर्चा सुनी जा सकती है । इसके आसपास कल्चुरीकालीन शिव, ब्रह्मा, विष्णु की प्राचीन प्रतिमाएँ तथा गौरी कुंड भी हैं। धरहरकला के प्राचीन शिवमंदिर और स्वयंभू गणेश मंदिर को राज्य पुरातत्व की दृष्टि से भी संरक्षित स्मारक क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है। धरहर गणेश की इस प्रतिमा की मुद्रा, सूंड, हाथ में पात्र, जनेऊ, वाहन और इसे भव्य ,दिव्य स्वरुप प्रदान करते हैं । मां नर्मदा की उद्गम अमरकंटक से उत्तर दिशा मे स्थित होने के कारण मान्यता यह भी है कि अमरकंटक मे माई के और जलेश्वरधाम मे भगवान शिव के दर्शन से पूर्व धरहरधाम के श्री गणेश के दर्शन जरुर करना चाहिये। जनश्रुति यह भी है कि इस सुदर्शन गणपति प्रतिमा की विशेषताओं को देखते हुए कुछ लोगों ने प्रतिमा को यहां से अन्यत्र विस्थापित करने की पूरी कोशिश की लेकिन इसके सारे प्रयास विफल हो गये। मन्दिर के समीप एक शिवालय का भग्नावशेष भी है जिसे कुछ लोग सूर्य मन्दिर भी कहते है। इसके पश्चिम मे कुछ ही दूर पर प्राकृतिक झरना भी है। यहां आकर प्रकति के हर रंग और हर संगीत की अनुभूति की जा सकती है। समय के अनुरुप श्रद्धालुओं की संख्या मे वृद्धि हुई है । जिसके चलते यहां मन्दिर को नया स्वरुप दिया गया है और आसपास कुछ पक्के निर्माण किये गये हैं। वर्ष मे यहां मेला भी लगता है। आवश्यकता इस बात की जरुर है कि मुख्य मार्ग से लगभग 500 मीटर दूर इस प्राकृतिक सुरम्य स्थान मे पक्के निर्माण ,अतिक्रमण सख्ती से रोके जाएं। यह देखना स्थानीय पंचायत का कार्य है कि यहां अब कोई अतिक्रमण ,कोई पक्का निर्माण ना कराया जाए। मनोकामना सिद्धि के लिये विख्यात इस बटुक गणपति मन्दिर मे आने वाले सभी श्रद्धालुओं से यही अपील है कि यहां आकर पुण्य जरुर कमाएं लेकिन यहां की पवित्रता और शुद्धता को बनाए रख कर।
- ऋषि पंचमी पर अमरकंटक में महाराष्ट्र की महिलाओं ने लगाई नर्मदा में आस्था की डुबकी पारंपरिक वेशभूषा में महिलाओं ने नर्मदा तट पर बनाए पार्थिव शिवलिंग व गणेश प्रतिमा, प्रकृति प्रदत्त सामग्रियों से किया पूजन-अर्चन अनूपपूर/अमरकंटक - प्रदेश के प्रमुख धार्मिक एवं आध्यात्मिक तीर्थ स्थल पवित्र नगरी अमरकंटक में ऋषि पंचमी के पावन अवसर पर महाराष्ट्र से आए हजारों श्रद्धालुओं ने पुण्य सलिला मां नर्मदा के रामघाट तट पर आस्था और भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित की। नागपुर, कामठी, भंडारा, अमरावती, नासिक, पुणे, बारामती सहित महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचीं महिलाओं ने प्रातःकाल से ही नर्मदा तट पर पहुंचकर विधि-विधानपूर्वक पुण्य स्नान किया और मां नर्मदा के पावन जल में आस्था की डुबकी लगाई। ऋषि पंचमी के धार्मिक विधान के अनुरूप महिलाओं ने नर्मदा तट पर ही मिट्टी से पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया। इसके साथ ही प्रकृति से प्राप्त पत्तियों, फूल, बेलपत्र, घास-फूस तथा खेतों में उपलब्ध अनाज आदि पारंपरिक सामग्रियों से आदि देव भगवान गणेश की प्रतिमाएं तैयार कर उनका विधिवत पूजन-अर्चन किया। महिलाओं ने भगवान भोलेनाथ और गणपति बप्पा को पुष्प, बेलपत्र एवं अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर आरती की। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं के सामूहिक पूजन से नर्मदा तट का वातावरण श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास से भर उठा। सुबह करीब 5 बजे से ही महाराष्ट्र से आए श्रद्धालुओं का नर्मदा तट पर पहुंचना शुरू हो गया था। स्नान, ध्यान, जप, पूजन-अर्चन और आरती का क्रम काफी देर तक चलता रहा। नर्मदा की कल-कल करती जलधारा, वैदिक एवं धार्मिक मंत्रोच्चार और महिलाओं द्वारा की जा रही आरती से रामघाट का वातावरण भक्तिमय नजर आया। ऋषि पंचमी का धार्मिक महत्व हिंदू धर्म परंपरा में ऋषि पंचमी का विशेष धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व माना गया है। यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाया जाता है और सप्तऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता तथा आत्मशुद्धि की भावना से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, ऋषियों का स्मरण तथा श्रद्धापूर्वक पूजन करने से मनुष्य अपने जीवन में शुद्धता, संयम और सदाचार के भाव को पुष्ट करता है। विशेष रूप से महिलाएं इस दिन व्रत एवं पूजन कर ऋषि परंपरा के प्रति श्रद्धा अर्पित करती हैं। ऋषि पंचमी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति, ऋषि परंपरा और सनातन संस्कारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व भी माना जाता है। अमरकंटक जैसे तपोभूमि और नर्मदा उद्गम क्षेत्र में इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व और भी विशेष हो जाता है, जहां नर्मदा के पावन तट पर श्रद्धालु स्नान एवं पूजन के माध्यम से आत्मिक शांति और पुण्य की कामना करते हैं। तीन-चार वर्षों से बन रही अमरकंटक आने की परंपरा उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र प्रांत से श्रद्धालु महिलाएं एवं भक्तजन पिछले तीन-चार वर्षों से लगातार ऋषि पंचमी के अवसर पर अमरकंटक पहुंच रहे हैं। नर्मदा स्नान, मां नर्मदा के दर्शन तथा भगवान शिव एवं गणेश के पूजन के लिए प्रत्येक वर्ष महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का आगमन हो रहा है। इस वर्ष भी ऋषि पंचमी का पर्व मनाने के लिए महाराष्ट्र से सैकड़ों वाहनों में महिलाएं, पुरुष एवं अन्य श्रद्धालु अमरकंटक पहुंचे हैं।1
- थाना अमलाई पुलिस को मिली बड़ी सफलता, हत्या के प्रयास के 3 आरोपी गिरफ्तार अमलाई, शहडोल - जिला शहडोल के थाना अमलाई पुलिस ने हत्या के प्रयास के गंभीर मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए फरार चल रहे सभी 03 नामजद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस के अनुसार अपराध क्रमांक 277/2026 के तहत यह कार्रवाई की गई है। घटना का विवरण - दिनांक 14/09/2026 को राजा चिकन सेंटर के सामने, आलमगंज चीफ हाउस निवासी फरियादी मोहम्मद आशिक उम्र 40 वर्ष के साथ आरोपियों ने गाली-गलौज और मारपीट की थी। विवाद बढ़ने पर आरोपियों ने फरियादी पर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया था। फरियादी की रिपोर्ट पर थाना अमलाई में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 109(1), 351(3) और 3(5) के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना प्रारंभ की गई थी। गिरफ्तार आरोपी - पुलिस टीम ने तत्परता दिखाते हुए मामले के तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किया है - अरसद अंसारी भक्ती कोल योगेन्द्र उर्फ छोट्टू तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर माननीय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। उक्त सम्पूर्ण कार्रवाई थाना प्रभारी अमलाई भूपेंद्र मणी पांडे के नेतृत्व में विवेचना अधिकारी कार्यवाहक उप-निरीक्षक श्याम सिंह एवं अमलाई पुलिस टीम की सराहनीय भूमिका रही।3
- कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने आज साप्ताहिक जनसुनवाई में लोगों की समस्याएं एवं शिकायते सुनी एवं निराकरण के निर्देश संबंधित अधिकारियों को दिए।1
- एमसीबी-चिरमिरी में कबाड़ से लदी पिकअप पकड़ी, पुलिस की बड़ी कार्रवाई1
- कोरिया। बैकुंठपुर वन मंडल क्षेत्र में एक बार फिर हाथियों की मौजूदगी से ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई है। उत्तर तर्रा की ओर से होते हुए करीब 12 हाथियों का दल दामुज क्षेत्र में पहुंचा है, जहां फिलहाल हाथियों के विश्राम करने की जानकारी सामने आई है। हाथियों की लगातार आवाजाही को देखते हुए वन विभाग ने आसपास के गांवों में निगरानी बढ़ा दी है। बताया जा रहा है कि हाथियों का यह दल उत्तर तर्रा क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए दामुज इलाके में पहुंचा है। वर्तमान में हाथियों की गतिविधियों पर वन विभाग की टीम लगातार नजर बनाए हुए है। करीब एक दर्जन हाथियों के एक साथ क्षेत्र में पहुंचने की खबर के बाद आसपास के ग्रामीणों में भी दहशत और चिंता का माहौल है।1
- कलेक्टर श्री पार्थ जायसवाल ने आज कलेक्ट्रेट कार्यालय के विराट सभागार में सोशल मीडिया इंफ्लूएंसरो की बैठक ली। उन्होंने कहा कि जिले में 17 सितम्बर से 17 अक्टूबर 2026 तक में सेवा संकल्प अभियान चलाया जाएगा, जिसमें विविध कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सेवा संकल्प अभियान के सफल आयोजन हेतु सोशल मीडिया इंफ्लूएंसरो की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया जन संचार का सशक्त माध्यम है, सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर शासन की जनहितकारी योजनाओं की जानकारी अंतिम छोर पर बैठे व्यक्तियों तक पहुंचाए, जिससे वे योजनाओं का लाभ लेकर सशक्त और आत्मनिर्भर बन सकें। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक चलने वाले सेवा संकल्प अभियान की कार्यक्रमों में अपनी सहभागिता भी सुनिश्चित करें। बैठक में अन्य विषयों पर चर्चा की गई। इस अवसर पर मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत श्री शिवम प्रजापति सहित सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर मौजूद रहें। #शहडोल #shahdol1
- धान में पीलेपन और झुलसने से किसान चिंतित, चूसक कीटों का बढ़ा प्रकोप* *कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने किसानों को किया सतर्क, एक एकड़ में 12 स्प्रे पंप के अनुसार दवा छिड़काव की सलाह* डिंडौरी। जिले में इन दिनों धान की फसल में पीलापन आने और पौधों के झुलसने की समस्या सामने आ रही है। खेतों में रस चूसक कीटों, विशेषकर भूरा एवं सफेद फुदका के प्रकोप से धान के पौधे कमजोर होकर पीले पड़ रहे हैं। कीट पौधों के निचले हिस्से से रस चूसकर फसल को नुकसान पहुंचा रहे हैं। किसानों की समस्या को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र डिंडौरी के *वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पी.एल. अंबूलकर* ने किसानों को धान की फसल की नियमित निगरानी करने तथा कीटों का प्रकोप दिखाई देने पर समय रहते नियंत्रण के उपाय करने की सलाह दी है। दो दवाओं में से किसी एक का ही करें छिड़काव डॉ. अंबूलकर द्वारा दी गई सलाह के अनुसार चूसक कीटों के नियंत्रण के लिए एक एकड़ क्षेत्र में 12 स्प्रे पंप के हिसाब से निम्न में से किसी एक दवा का उपयोग किया जा सकता है— थायमेथोक्सम 25 WG — 80 ग्राम प्रति एकड़ इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL — लगभग 60 मिलीलीटर प्रति एकड़ किसानों को विशेष रूप से ध्यान रखना है कि दोनों दवाओं का एक साथ उपयोग नहीं करना है। दोनों में से किसी एक दवा का ही अनुशंसित मात्रा में छिड़काव करें। विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि दवा का छिड़काव कीटों की स्थिति देखकर और अनुशंसित मात्रा में ही करें। बिना विशेषज्ञ की सलाह के अलग-अलग रसायनों को मिलाकर छिड़काव न करें तथा दवा के लेबल पर दिए सुरक्षा निर्देशों का पालन करें। अधिक प्रकोप होने पर दोबारा छिड़काव *वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गीता सिंह* ने कृषकों को सलाह देते हुए बताया कि यदि फसल में कीटों का प्रकोप अधिक रहता है तो मौसम की स्थिति को देखते हुए 10 से 15 दिन बाद दोबारा छिड़काव किया जा सकता है। हालांकि अनावश्यक रूप से बिना परामर्श रसायनों का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे फसल को नुकसान पहुंच सकता है। नीमास्त्र और जीवामृत के उपयोग की सलाह कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को प्राकृतिक एवं जैविक उपायों को भी अपनाने की सलाह दी है। किसानों से नीमास्त्र तैयार कर उसका उपयोग करने तथा खाद के रूप में जीवामृत का छिड़काव करने की सलाह दी गई है। इससे फसल प्रबंधन में रासायनिक दवाओं पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। फसल की लगातार निगरानी जरूरी विशेषज्ञों ने किसानों से कहा है कि धान के खेतों में लगातार निगरानी रखें। जहां पौधों में अचानक पीलापन, झुलसने के लक्षण या चूसक कीटों की संख्या बढ़ती दिखाई दे, वहां तत्काल कृषि विशेषज्ञ या कृषि विभाग से सलाह लेकर नियंत्रण उपाय करें। समय पर कीटों का नियंत्रण नहीं होने पर धान की पैदावार प्रभावित हो सकती है।1
- नगर में गड्ढा या गड्ढे में नगर बादल सड़के जनता परेशान. उमरिया जिले से ब्यूरो चीफ शम्मी खान नियाजी. Mo. No✨78690837101