सूखे की मार, पर हार नहीं मानेगा किसान — जहानाबाद के धान किसानों के लिए राहत, समाधान और सरकारी सहायता की पूरी जानकारी धान की खेती जहानाबाद जिले के किसानों की जीवन-रेखा है। यही फसल उनके परिवार का साल भर का अन्न, बच्चों की पढ़ाई, बुज़ुर्गों की दवा और घर की छोटी-बड़ी ज़रूरतों को पूरा करती है। लेकिन इस वर्ष वर्षा के अभाव ने पूरे जिले के किसानों की कमर तोड़ दी है। खेतों में दरारें पड़ चुकी हैं, रोपे गए धान के पौधे मुरझा रहे हैं और किसान भाइयों के चेहरों पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं। लेकिन घबराने की ज़रूरत नहीं। सरकार की ओर से कई योजनाएँ हैं, कृषि विज्ञान ने कम पानी में पकने वाली कई किस्में विकसित की हैं, और कुछ ऐसे उपाय भी हैं जिन्हें अपनाकर किसान भाई इस संकट से उबर सकते हैं। भाग एक — सरकार से मिलने वाली सहायता जो हर किसान को जाननी चाहिए बिहार राज्य फसल सहायता योजना के अंतर्गत सूखा या कम बारिश से फसल क्षति होने पर बिहार सरकार प्रति हेक्टेयर मुआवज़ा देती है। बीस प्रतिशत तक क्षति होने पर सात हज़ार पाँच सौ रुपये प्रति हेक्टेयर और बीस प्रतिशत से अधिक क्षति होने पर दस हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर तक की सहायता मिलती है। आवेदन के लिए किसान भाई अपने प्रखंड सहकारिता कार्यालय से संपर्क करें। कृषि इनपुट अनुदान योजना के तहत सूखे की स्थिति में सिंचाई के लिए डीज़ल पर अनुदान दिया जाता है। यह अनुदान पचहत्तर रुपये प्रति लीटर की दर से, प्रति एकड़ अधिकतम दस लीटर तक मिलता है। आवेदन प्रखंड कृषि पदाधिकारी कार्यालय या नज़दीकी CSC केंद्र पर किया जा सकता है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत जिन किसानों ने बीमा कराया है, वे तुरंत अपने बैंक शाखा या CSC केंद्र पर जाकर क्लेम दर्ज कराएँ। यह योजना प्राकृतिक आपदा से हुई क्षति की भरपाई करती है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से हर पंजीकृत किसान को सालाना छह हज़ार रुपये तीन किश्तों में मिलते हैं। अगर अभी तक पंजीकरण नहीं है, तो नज़दीकी CSC या प्रखंड कृषि कार्यालय पर तुरंत करवाएँ। इसके अलावा जिला कृषि कार्यालय, जहानाबाद से भी संपर्क किया जा सकता है। जब क्षेत्र को सूखा प्रभावित घोषित किया जाता है, तो विशेष राहत पैकेज दिया जाता है। किसान भाई अपने प्रखंड कृषि पदाधिकारी यानी BAO से मिलकर पूरी जानकारी लें। भाग दो — कम पानी में उगने वाली धान की उन्नत किस्में अगर बारिश देर से हो या कम हो, तो किसान भाई इन उन्नत किस्मों को अपना सकते हैं। सहभागी धान एक सूखा-सहनशील किस्म है, जो कम पानी में भी अच्छी उपज देती है और एक सौ पाँच से एक सौ दस दिनों में पक जाती है। स्वर्णा-सब वन किस्म जलजमाव और सूखा दोनों सहन कर लेती है, यह एक सौ चालीस से एक सौ पैंतालीस दिनों में तैयार होती है। DRR धान बयालीस और चौवालीस किस्में कम पानी में भी चालीस से पैंतालीस क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती हैं और एक सौ पंद्रह से एक सौ बीस दिनों में पक जाती हैं। राजेंद्र भगवती बिहार के लिए विशेष रूप से अनुशंसित किस्म है, जो एक सौ दस से एक सौ पंद्रह दिनों में तैयार हो जाती है। सी आर धान चालीस ऊँची और कम नमी वाली जमीन के लिए उपयुक्त है, यह लगभग एक सौ पाँच दिनों में पक जाती है। ये सभी बीज बिहार राज्य बीज निगम और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), जहानाबाद पर उपलब्ध हैं। भाग तीन — पानी के अभाव में क्या करें, व्यावहारिक विकल्प पहला उपाय है धान की सीधी बुआई तकनीक (DSR)। इसमें रोपाई की ज़रूरत नहीं होती, तीस से पैंतीस प्रतिशत कम पानी लगता है और मजदूरी की भी अच्छी बचत होती है। दूसरा उपाय है पुआल की मल्चिंग। खेत में पुआल बिछाने से मिट्टी की नमी बनी रहती है और वाष्पीकरण से पानी की बर्बादी रुकती है। तीसरा उपाय है AWD तकनीक यानी बारी-बारी से सुखाना और भिगोना। लगातार खेत में पानी भरने के बजाय, सूखने और भरने का चक्र अपनाने से लगभग पच्चीस प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। चौथा उपाय है मनरेगा योजना से डोभा या तालाब का निर्माण। किसान अपने खेत के कोने में मनरेगा के अंतर्गत डोभा बनवा सकते हैं, जो भविष्य में सिंचाई का स्थायी स्रोत बनेगा। पाँचवाँ विकल्प है वैकल्पिक फसल पर विचार। अगर धान की खेती संभव न हो, तो मक्का, अरहर, उड़द, तिल और बाजरा जैसी कम पानी वाली फसलें लगाई जा सकती हैं। इनके लिए भी सरकार की ओर से बीज पर सब्सिडी उपलब्ध है। भाग चार — मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के सस्ते और प्रभावी उपाय पहला उपाय है जीवामृत और घन-जीवामृत का प्रयोग। यह गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी से बना एक जैविक टॉनिक है, जो फसल की जड़ों को मज़बूती देता है। दूसरा उपाय है वर्मी कम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद का उपयोग। यह मिट्टी की जल-धारण क्षमता बढ़ाती है, जिससे कम पानी में भी फसल टिक पाती है। तीसरा उपाय है हरी खाद का प्रयोग। ढैंचा और सनई जैसी फसलें बोकर उन्हें खेत में ही पलट देने से मिट्टी में नाइट्रोजन और जैविक तत्व बढ़ते हैं। चौथा उपाय है नीम की खली और गोबर की सड़ी खाद का प्रयोग। यह न सिर्फ पोषण देती है, बल्कि कीट-रोगों से भी बचाती है। पाँचवाँ उपाय है मिट्टी की जाँच। हर तीन साल में एक बार मिट्टी की जाँच ज़रूर कराएँ। जहानाबाद के जिला कृषि कार्यालय में यह सुविधा निःशुल्क उपलब्ध है। किसान भाइयों से विशेष अपील संकट की इस घड़ी में अकेले परेशान न हों। अपने प्रखंड कृषि पदाधिकारी, कृषि सलाहकार और किसान समन्वयक से नियमित संपर्क में रहें। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए ज़रूरी है कि आपके पास आधार कार्ड, बैंक का खाता बुक उपलवद्ध हो
सूखे की मार, पर हार नहीं मानेगा किसान — जहानाबाद के धान किसानों के लिए राहत, समाधान और सरकारी सहायता की पूरी जानकारी धान की खेती जहानाबाद जिले के किसानों की जीवन-रेखा है। यही फसल उनके परिवार का साल भर का अन्न, बच्चों की पढ़ाई, बुज़ुर्गों की दवा और घर की छोटी-बड़ी ज़रूरतों को पूरा करती है। लेकिन इस वर्ष वर्षा के अभाव ने पूरे जिले के किसानों की कमर तोड़ दी है। खेतों में दरारें पड़ चुकी हैं, रोपे गए धान के पौधे मुरझा रहे हैं और किसान भाइयों के चेहरों पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं। लेकिन घबराने की ज़रूरत नहीं। सरकार की ओर से कई योजनाएँ हैं, कृषि विज्ञान ने कम पानी में पकने वाली कई किस्में विकसित की हैं, और कुछ ऐसे उपाय भी हैं जिन्हें अपनाकर किसान भाई इस संकट से उबर सकते हैं। भाग एक — सरकार से मिलने वाली सहायता जो हर किसान को जाननी चाहिए बिहार राज्य फसल सहायता योजना के अंतर्गत सूखा या कम बारिश से फसल क्षति होने पर बिहार सरकार प्रति हेक्टेयर मुआवज़ा देती है। बीस प्रतिशत तक क्षति होने पर सात हज़ार पाँच सौ रुपये प्रति हेक्टेयर और बीस प्रतिशत से अधिक क्षति होने पर दस हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर तक की सहायता मिलती है। आवेदन के लिए किसान भाई अपने प्रखंड सहकारिता कार्यालय से संपर्क करें। कृषि इनपुट अनुदान योजना के तहत सूखे की स्थिति में सिंचाई के लिए डीज़ल पर अनुदान दिया जाता है। यह अनुदान पचहत्तर रुपये प्रति लीटर की दर से, प्रति एकड़ अधिकतम दस लीटर तक मिलता है। आवेदन प्रखंड कृषि पदाधिकारी कार्यालय या नज़दीकी CSC केंद्र पर किया जा सकता है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत जिन किसानों ने बीमा कराया है, वे तुरंत अपने बैंक शाखा या CSC केंद्र पर जाकर क्लेम दर्ज कराएँ। यह योजना प्राकृतिक आपदा से हुई क्षति की भरपाई करती है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना से हर पंजीकृत किसान को सालाना छह हज़ार रुपये तीन किश्तों में मिलते हैं। अगर अभी तक पंजीकरण नहीं है, तो नज़दीकी CSC या प्रखंड कृषि कार्यालय पर तुरंत करवाएँ। इसके अलावा जिला कृषि कार्यालय, जहानाबाद से भी संपर्क किया जा सकता है। जब क्षेत्र को सूखा प्रभावित घोषित किया जाता है, तो विशेष राहत पैकेज दिया जाता है। किसान भाई अपने प्रखंड कृषि पदाधिकारी यानी BAO से मिलकर पूरी जानकारी लें। भाग दो — कम पानी में उगने वाली धान की उन्नत किस्में अगर बारिश देर से हो या कम हो, तो किसान भाई इन उन्नत किस्मों को अपना सकते हैं। सहभागी धान एक सूखा-सहनशील किस्म है, जो कम पानी में भी अच्छी उपज देती है और एक सौ पाँच से एक सौ दस दिनों में पक जाती है। स्वर्णा-सब वन किस्म जलजमाव और सूखा दोनों सहन कर लेती है, यह एक सौ चालीस से एक सौ पैंतालीस दिनों में तैयार होती है। DRR धान बयालीस और चौवालीस किस्में कम पानी में भी चालीस से पैंतालीस क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती हैं और एक सौ पंद्रह से एक सौ बीस दिनों में पक जाती हैं। राजेंद्र भगवती बिहार के लिए विशेष रूप से अनुशंसित किस्म है, जो एक सौ दस से एक सौ पंद्रह दिनों में तैयार हो जाती है। सी आर धान चालीस ऊँची और कम नमी वाली जमीन के लिए उपयुक्त है, यह लगभग एक सौ पाँच दिनों में पक जाती है। ये सभी बीज बिहार राज्य बीज निगम और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), जहानाबाद पर उपलब्ध हैं। भाग तीन — पानी के अभाव में क्या करें, व्यावहारिक विकल्प पहला उपाय है धान की सीधी बुआई तकनीक (DSR)। इसमें रोपाई की ज़रूरत नहीं होती, तीस से पैंतीस प्रतिशत कम पानी लगता है और मजदूरी की भी अच्छी बचत होती है। दूसरा उपाय है पुआल की मल्चिंग। खेत में पुआल बिछाने से मिट्टी की नमी बनी रहती है और वाष्पीकरण से पानी की बर्बादी रुकती है। तीसरा उपाय है AWD तकनीक यानी बारी-बारी से सुखाना और भिगोना। लगातार खेत में पानी भरने के बजाय, सूखने और भरने का चक्र अपनाने से लगभग पच्चीस प्रतिशत तक पानी की बचत होती है। चौथा उपाय है मनरेगा योजना से डोभा या तालाब का निर्माण। किसान अपने खेत के कोने में मनरेगा के अंतर्गत डोभा बनवा सकते हैं, जो भविष्य में सिंचाई का स्थायी स्रोत बनेगा। पाँचवाँ विकल्प है वैकल्पिक फसल पर विचार। अगर धान की खेती संभव न हो, तो मक्का, अरहर, उड़द, तिल और बाजरा जैसी कम पानी वाली फसलें लगाई जा सकती हैं। इनके लिए भी सरकार की ओर से बीज पर सब्सिडी उपलब्ध है। भाग चार — मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के सस्ते और प्रभावी उपाय पहला उपाय है जीवामृत और घन-जीवामृत का प्रयोग। यह गोबर, गौमूत्र, गुड़, बेसन और मिट्टी से बना एक जैविक टॉनिक है, जो फसल की जड़ों को मज़बूती देता है। दूसरा उपाय है वर्मी कम्पोस्ट यानी केंचुआ खाद का उपयोग। यह मिट्टी की जल-धारण क्षमता बढ़ाती है, जिससे कम पानी में भी फसल टिक पाती है। तीसरा उपाय है हरी खाद का प्रयोग। ढैंचा और सनई जैसी फसलें बोकर उन्हें खेत में ही पलट देने से मिट्टी में नाइट्रोजन और जैविक तत्व बढ़ते हैं। चौथा उपाय है नीम की खली और गोबर की सड़ी खाद का प्रयोग। यह न सिर्फ पोषण देती है, बल्कि कीट-रोगों से भी बचाती है। पाँचवाँ उपाय है मिट्टी की जाँच। हर तीन साल में एक बार मिट्टी की जाँच ज़रूर कराएँ। जहानाबाद के जिला कृषि कार्यालय में यह सुविधा निःशुल्क उपलब्ध है। किसान भाइयों से विशेष अपील संकट की इस घड़ी में अकेले परेशान न हों। अपने प्रखंड कृषि पदाधिकारी, कृषि सलाहकार और किसान समन्वयक से नियमित संपर्क में रहें। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए ज़रूरी है कि आपके पास आधार कार्ड, बैंक का खाता बुक उपलवद्ध हो
- मिड-डे मील में कीड़ा मिलने के बाद केंद्रीकृत रसोई ने दी सफाई, कहा– "हर स्तर पर होती है जांच, गुणवत्ता से नहीं होता समझौता" मिड-डे मील में कीड़ा मिलने के बाद केंद्रीकृत रसोई ने दी सफाई, कहा– "हर स्तर पर होती है जांच, गुणवत्ता से नहीं होता समझौता" व्यवस्थापक बोले– स्टील के सीलबंद कंटेनरों में भेजा जाता है भोजन, स्कूल पहुंचने के बाद ही खुलता है डिब्बा; मामले की निष्पक्ष जांच की मांग मसौढ़ी प्रखंड के प्राथमिक विद्यालय तरेगना मुशहरी में मंगलवार को बच्चों को परोसे गए मध्याह्न भोजन (एमडीएम) की थाली में कथित रूप से कीड़ा मिलने के मामले के बाद पीएम पोषण योजना के तहत संचालित केंद्रीकृत रसोईघर की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। घटना के बाद मसौढ़ी के संवाददाता ने विद्यालय के समीप स्थित टीम एक्सीलेंस द्वारा संचालित केंद्रीकृत रसोईघर पहुंचकर पूरे मामले की पड़ताल की और वहां की व्यवस्थाओं का बारीकी से निरीक्षण किया। केंद्रीकृत रसोईघर के व्यवस्थापक रंजीत कुमार ने घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संस्था से निकलने वाला प्रत्येक भोजन पूरी गुणवत्ता जांच और स्वच्छता मानकों का पालन करने के बाद ही स्टेनलेस स्टील के विशेष कंटेनरों में पैक कर संबंधित विद्यालयों तक भेजा जाता है। उनका कहना था कि भोजन तैयार करने से लेकर पैकिंग और वितरण तक हर चरण की नियमित निगरानी की जाती है। उन्होंने कहा कि जब एमडीएम कर्मी विद्यालय में भोजन पहुंचाते हैं तो वहां बच्चों को परोसने से पहले विद्यालय प्रशासन द्वारा भी भोजन का निरीक्षण किया जाना चाहिए। यदि भोजन में किसी प्रकार की गड़बड़ी थी तो विद्यालय स्तर पर इसकी पहचान क्यों नहीं हो सकी, यह भी जांच का विषय है। उन्होंने कहा कि संस्था की छवि खराब करने की कोशिश से भी इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। रंजीत कुमार ने बताया कि रसोईघर में प्रतिदिन साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। भोजन तैयार करने वाले कर्मचारियों को स्वच्छता संबंधी सभी मानकों का पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में भोजन जिन स्टेनलेस स्टील कंटेनरों में भेजा जाता है, वे उच्च गुणवत्ता वाले हैं। अगले महीने से भोजन को अधिक समय तक गर्म और सुरक्षित रखने वाले नए एवं बेहतर गुणवत्ता के इंसुलेटेड कंटेनर उपलब्ध कराने की भी तैयारी की जा रही है। उन्होंने बिहार सरकार से यह भी मांग की कि विद्यालयों में संस्था के कर्मचारी स्वयं बच्चों को भोजन परोसने की व्यवस्था हो, ताकि भोजन की गुणवत्ता को लेकर किसी भी प्रकार का विवाद या भ्रम उत्पन्न न हो। इस दौरान मसौढ़ी के संवाददाता ने केंद्रीकृत रसोईघर में भोजन तैयार होने, गुणवत्ता जांच, पैकिंग और सीलबंद स्टील कंटेनरों में विद्यालय भेजने की पूरी प्रक्रिया का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान रसोईघर में साफ-सफाई की व्यवस्था, कर्मचारियों द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रिया तथा पैकिंग प्रणाली को भी देखा गया। कर्मचारियों ने बताया कि रसोईघर से सीलबंद होकर निकलने वाले भोजन के कंटेनर विद्यालय पहुंचने के बाद ही खोले जाते हैं। गौरतलब है कि प्राथमिक विद्यालय तरेगना मुशहरी में बच्चों के भोजन में कथित रूप से कीड़ा मिलने की घटना के बाद अभिभावकों और स्थानीय लोगों में चिंता का माहौल है। अब इस मामले में प्रशासनिक जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि भोजन में कीड़ा किस स्तर पर पहुंचा और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है। वहीं, केंद्रीकृत रसोईघर प्रबंधन ने दावा किया है कि वह गुणवत्ता और स्वच्छता के सभी मानकों का पूरी गंभीरता से पालन करता है तथा भविष्य में ऐसी शिकायतों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरती जाएगी।1
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