*कागज़ों में बनी सड़क, जमीन पर दलदल — बेनीपुर में मनरेगा के लाखों गुम, गरीबों का रास्ता आज भी जंगल में* *अमीर पहुंचे पक्की सड़क तक, मजदूर और बच्चे कीचड़ में — बोर्ड गड़ा, पैसा खर्च, लेकिन रास्ता नहीं बना* शंकरगढ़,प्रयागराज। यमुनानगर क्षेत्र की बारा तहसील के शंकरगढ़ ब्लाक अंतर्गत ग्राम पंचायत बेनीपुर की कहानी विकास के दावों पर करारा तमाचा मारती दिखाई देती है। यहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत सड़क निर्माण का बोर्ड तो वर्षों पहले गाड़ दिया गया, लाखों रुपये खर्च भी दिखा दिए गए, लेकिन हकीकत यह है कि आज तक सड़क नहीं बनी। कीचड़, गड्ढे और जंगल के बीच रहने को मजबूर गरीब ग्रामीण आज भी उसी रास्ते से गुजर रहे हैं, जहां बरसात में निकलना नामुमकिन हो जाता है। ग्राम पंचायत बेनीपुर में कटहा पुलिया से प्राइमरी स्कूल तक डब्ल्यू बी एम रोड निर्माण का कार्य दर्शाया गया है। बोर्ड पर दर्ज विवरण के अनुसार इस कार्य में श्रम मद में चौतीस लाख चार हजार बहत्तर रुपये और सामग्री मद में तीन लाख बाईस हजार चार सौ सोलह रुपये खर्च दिखाया गया है। मजदूरी की दर प्रतिदिन दो सौ चार रुपये लिखी गई है। इतना बड़ा खर्च दिखाने के बावजूद जमीन पर एक गज भी सड़क दिखाई नहीं देती। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि बोर्ड पर कार्य प्रारंभ होने की तारीख नहीं लिखी गई, कार्य पूरा होने की तारीख नहीं लिखी गई, कार्यदायी संस्था का नाम नहीं लिखा गया, यहां तक कि पूरा कार्य विवरण भी अधूरा छोड़ दिया गया। यानी कि बोर्ड गाड़कर खानापूर्ति कर दी गई, लेकिन काम कब हुआ, किसने किया, किसे पैसा मिला — यह सब जानकारी गायब कर दी गई। ग्रामीणों का कहना है कि जिस दिन बोर्ड लगा था, उस दिन लोगों को लगा था कि अब गांव की किस्मत बदलेगी। बच्चों को स्कूल जाने में दिक्कत नहीं होगी, बीमार को अस्पताल ले जाना आसान होगा, मजदूरों को शहर तक जाने में परेशानी नहीं होगी। लेकिन साल बीतते गए और सड़क का सपना सपना ही रह गया। आज हालत यह है कि जिनके पास पैसा है, जिनके पास साधन है, वह पक्की सड़क तक पहुंच जाते हैं, लेकिन जो गरीब हैं, जो मजदूरी करके पेट पालते हैं, जो जंगल के किनारे झोपड़ी बनाकर रहते हैं, उनके लिए आज भी रास्ता कीचड़ और धूल से भरा है। बरसात के दिनों में यह रास्ता दलदल बन जाता है और स्कूली बच्चों का भविष्य उसी कीचड़ में फिसलता दिखाई देता है। छोटे-छोटे बच्चे किताब लेकर निकलते हैं, लेकिन कई बार स्कूल तक पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है। गांव के मजदूर और गरीब परिवारों का कहना है कि सड़क बन जाती तो उनकी जिंदगी बदल जाती, लेकिन यहां तो बोर्ड लगाकर ही विकास दिखा दिया गया। मीडिया द्वारा जब गांव में जाकर जानकारी ली गई तो कई ग्रामीण कैमरे पर आने से डरते दिखे। लोगों ने साफ कहा कि यहां ऐसा माहौल है कि कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता, लेकिन दर्द सबके दिल में है। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि अगर कोई सक्षम अधिकारी खुद गांव आकर देख ले, तो उसे पता चल जाएगा कि लाखों रुपये खर्च दिखाने के बाद भी गांव आज भी जंगल जैसी जिंदगी जी रहा है। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बोर्ड क्यों गाड़ा गया, पैसा किस बात का खर्च दिखाया गया, किस ठेकेदार को काम मिला, किस अधिकारी ने माप किया,और बिना सड़क बने भुगतान कैसे हो गया। बेनीपुर की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस सच्चाई की कहानी है जहां अमीरों के लिए सड़क बनती है और गरीबों के हिस्से में कीचड़ आता है, जहां कागज़ों में विकास दौड़ता है और जमीन पर गरीब पैदल ही रह जाता है। अब ग्रामीणों की निगाह प्रशासन की जांच पर टिकी है कि शायद इस बार सच सामने आए और बेनीपुर को भी वह सड़क मिले, जिसका बोर्ड वर्षों से गड़ा हुआ है।
*कागज़ों में बनी सड़क, जमीन पर दलदल — बेनीपुर में मनरेगा के लाखों गुम, गरीबों का रास्ता आज भी जंगल में* *अमीर पहुंचे पक्की सड़क तक, मजदूर और बच्चे कीचड़ में — बोर्ड गड़ा, पैसा खर्च, लेकिन रास्ता नहीं बना* शंकरगढ़,प्रयागराज। यमुनानगर क्षेत्र की बारा तहसील के शंकरगढ़ ब्लाक अंतर्गत ग्राम पंचायत बेनीपुर की कहानी विकास के दावों पर करारा तमाचा मारती दिखाई देती है। यहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत सड़क निर्माण का बोर्ड तो वर्षों पहले गाड़ दिया गया, लाखों रुपये खर्च भी दिखा दिए गए, लेकिन हकीकत यह है कि आज तक सड़क नहीं बनी। कीचड़, गड्ढे और जंगल के बीच रहने को मजबूर गरीब ग्रामीण आज भी उसी रास्ते से गुजर रहे हैं, जहां बरसात में निकलना नामुमकिन हो जाता है। ग्राम पंचायत बेनीपुर में कटहा पुलिया से प्राइमरी स्कूल तक डब्ल्यू बी एम रोड निर्माण का कार्य दर्शाया गया है। बोर्ड पर दर्ज विवरण के अनुसार इस कार्य में श्रम मद में चौतीस लाख चार हजार बहत्तर रुपये और सामग्री मद में तीन लाख बाईस हजार चार सौ सोलह रुपये खर्च दिखाया गया है। मजदूरी की दर प्रतिदिन दो सौ चार रुपये लिखी गई है। इतना बड़ा खर्च दिखाने के बावजूद जमीन पर एक गज भी सड़क दिखाई नहीं देती। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि बोर्ड पर कार्य प्रारंभ होने की तारीख नहीं लिखी गई, कार्य पूरा होने की तारीख नहीं लिखी गई, कार्यदायी संस्था का नाम नहीं लिखा गया, यहां तक कि पूरा कार्य विवरण भी अधूरा छोड़ दिया गया। यानी कि बोर्ड गाड़कर खानापूर्ति कर दी गई, लेकिन काम कब हुआ, किसने किया, किसे पैसा मिला — यह सब जानकारी गायब कर दी गई। ग्रामीणों का कहना है कि जिस दिन बोर्ड लगा था, उस दिन लोगों को लगा था कि अब गांव की किस्मत बदलेगी। बच्चों को स्कूल जाने में दिक्कत नहीं होगी, बीमार को अस्पताल ले जाना आसान होगा, मजदूरों को शहर तक जाने में परेशानी नहीं होगी। लेकिन साल बीतते गए और सड़क का सपना सपना ही रह गया। आज हालत यह है कि जिनके पास पैसा है, जिनके पास साधन है, वह पक्की सड़क तक पहुंच जाते हैं, लेकिन जो गरीब हैं, जो मजदूरी करके पेट पालते हैं, जो जंगल के किनारे झोपड़ी बनाकर रहते हैं, उनके लिए आज भी रास्ता कीचड़ और धूल से भरा है। बरसात के दिनों में यह रास्ता दलदल बन जाता है और स्कूली बच्चों का भविष्य उसी कीचड़ में फिसलता दिखाई देता है। छोटे-छोटे बच्चे किताब लेकर निकलते हैं, लेकिन कई बार स्कूल तक पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है। गांव के मजदूर और गरीब परिवारों का कहना है कि सड़क बन जाती तो उनकी जिंदगी बदल जाती, लेकिन यहां तो बोर्ड लगाकर ही विकास दिखा दिया गया। मीडिया द्वारा जब गांव में जाकर जानकारी ली गई तो कई ग्रामीण कैमरे पर आने से डरते दिखे। लोगों ने साफ कहा कि यहां ऐसा माहौल है कि कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता, लेकिन दर्द सबके दिल में है। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि अगर कोई सक्षम अधिकारी खुद गांव आकर देख ले, तो उसे पता चल जाएगा कि लाखों रुपये खर्च दिखाने के बाद भी गांव आज भी जंगल जैसी जिंदगी जी रहा है। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बोर्ड क्यों गाड़ा गया, पैसा किस बात का खर्च दिखाया गया, किस ठेकेदार को काम मिला, किस अधिकारी ने माप किया,और बिना सड़क बने भुगतान कैसे हो गया। बेनीपुर की यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस सच्चाई की कहानी है जहां अमीरों के लिए सड़क बनती है और गरीबों के हिस्से में कीचड़ आता है, जहां कागज़ों में विकास दौड़ता है और जमीन पर गरीब पैदल ही रह जाता है। अब ग्रामीणों की निगाह प्रशासन की जांच पर टिकी है कि शायद इस बार सच सामने आए और बेनीपुर को भी वह सड़क मिले, जिसका बोर्ड वर्षों से गड़ा हुआ है।
- औरई CO साहब की चुप्पी का राज क्या? अतिक्रमण के बाद भी चौक पर कब्जा, क्यों नहीं हो रही FIR?" #Aurai #Muzaffarpur #bihar #trending #viral #BiharNews #NitishKumar #AkashPriyadarshi1
- Post by Pitam Parjapati4
- Post by मारोती काकडे1
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- Post by Dr.Mirza Md.Meher Abbas1
- देवळी (जि. वर्धा) : परिसरात सुरू असलेल्या बेकायदेशीर व विषारी दारू विक्रीचा पर्दाफाश केल्याच्या कारणावरून एका पत्रकारावर व त्यांच्या पत्नीवर हल्ला झाल्याची धक्कादायक घटना देवळी येथे घडली आहे. या प्रकरणाची वरिष्ठ स्तरावरून सखोल चौकशी करून आरोपींवर कठोर कारवाई करावी, अशी मागणी करण्यात येत आहे. मिळालेल्या माहितीनुसार, ऑल इंडिया मीडिया असोसिएशनचे पत्रकार शंकर अंबादास केवदे (रा. देवळी, जि. वर्धा) यांनी परिसरात सुरू असलेल्या बेकायदेशीर व विषारी दारू विक्रीबाबत बातमी प्रसारित केली होती. तसेच या संदर्भात संबंधित पोलिसांसोबत झालेल्या संभाषणाची रेकॉर्डिंग सार्वजनिक हिताच्या दृष्टीने सोशल मीडियावर प्रसारित केली होती. सदर बाबीची माहिती संबंधित व्यक्तींना मिळाल्यानंतर त्यांनी पत्रकार शंकर केवदे यांना घरातून बोलावून घेतले व त्यांनीच ती रेकॉर्डिंग त्यांना ऐकवली. त्यानंतर “तू आमच्या विरोधात तक्रार का करतोस” या कारणावरून आरोपींनी त्यांच्यावर तसेच त्यांच्या पत्नीवर एकत्रितपणे मारहाण केली. या मारहाणीमध्ये त्यांच्या पत्नीच्या हाताला दुखापत झाली असून घटनेदरम्यान आरोपींकडे शस्त्र असल्यामुळे त्यांच्या जीवितास धोका निर्माण झाल्याचे सांगण्यात येत आहे. या प्रकरणातील आरोपींची नावे पुढीलप्रमाणे असल्याचे सांगण्यात आले आहे : रामदास डायरे विशाल पारिसे (देवळी)श्रावण डाहे (रा. निंबोली) सदर सर्व व्यक्ती बेकायदेशीर दारू विक्रीच्या व्यवसायाशी संबंधित असल्याची माहिती समोर येत असून परिसरात त्यांच्या दादागिरीमुळे नागरिकांमध्ये भीतीचे वातावरण निर्माण झाल्याचे सांगितले जात आहे. या घटनेबाबत स्थानिक पोलीस ठाण्यात तक्रार दिल्यानंतर पोलिसांनी केवळ भारतीय दंड संहिता कलम 115 व 352 अंतर्गत गुन्हा नोंद केल्याचे समजते. मात्र घटनेचे स्वरूप गंभीर असताना अधिक कठोर व संबंधित कलमान्वये गुन्हा नोंद करावा, अशी मागणी करण्यात येत आहे. तसेच पत्रकार शंकर केवदे यांच्या पत्नीचा मेडिकल रिपोर्ट (MLC) देण्यात न आल्याची बाबही समोर आली आहे. त्यामुळे या संपूर्ण प्रकरणाची वरिष्ठ स्तरावरून सखोल व निष्पक्ष चौकशी करून संबंधित आरोपींवर कठोर कारवाई करावी, अशी मागणी करण्यात येत आहे. पत्रकारांवर होणाऱ्या अशा प्रकारच्या हल्ल्यांमुळे पत्रकारांच्या सुरक्षिततेबाबत गंभीर प्रश्न निर्माण होत असल्याचे मत नागरिकांमधून व्यक्त होत आहे. — शंकर अंबादास केवदे पत्रकार, ऑल इंडिया मीडिया असोसिएशन रा. देवळी, जि. वर्धा मोबाईल : 70584167432
- मुंबई/ चंद्रपूर: महिला आयोगाच्या निधीच्या मागणीबद्दल आज सभागृहात भूमिका मांडली. महिला आयोगाने खर्च केलेल्या ४.५ कोटी रुपये निधी पैकी किती निधी हा महिला आयोगाच्या कर्मचारी वेतनासाठी खर्च झाला ? महिला आयोगाची सध्याची मनुष्यबळ संख्या ३५ आहे, राज्यातील ६.५ कोटी महिलांना सेवा देण्यासाठी हे मनुष्यबळ पुरेसे आहे का ? आवश्यकता असल्यास या मनुष्यबळात वाढ करणार का ? असे महत्त्वाचे प्रश्न सभागृहात मांडले.1
- इंडिया में थी ट्रक पर हॉस्पिटल कैसी हालत थी मैंने किसी से बोल मदद करने की तो उसने भी बात नहीं की और मेरा काम करता था उसने भी मदद की इस क्षेत्र में मैं क्या कर सकता था और मन भरोस इलाज करवाता रहा और आज मीटिंग चाहिए लेकिन किसी ने मदद नहीं की है देख सकते हो आप2