नेपाल की घटना से भी बड़ा खतरा उत्तरकाशी शहर के बिल्कुल सामने * हरनाय पर्वत पर चौड़ी होती दरारें: विशेष इन्वेस्टिगेशन रिसर्च रिपोर्ट एवं राष्ट्रव्यापी महा-चेतावनी शीर्षक: नेपाल की महा-तबाही से उत्तरकाशी तक: क्या उत्तराखंड को घोषित किया जाना चाहिए 'अति-संवेदनशील आपदा क्षेत्र'? क्या चीन से दोबारा नहीं हो सकती ऐसी चूक? प्रस्तुतकर्ता: विशाल शर्मा (फ्रीलांसर जर्नलिस्ट, रिसर्चर एवं जिज्ञासु पत्रकार) संस्थान: इंडिया न्यूज़ 9लाइव (India News 9Live) (जनता की आवाज़) दिनांक: 27 अगस्त 2026 1. प्रस्तावना: नेपाल का खौफनाक मंजर और हमारी गहरी खामोशी 26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा पर भोटे कोशी और त्रिशूली नदी बेसिन में जो प्रलय आई, उसने केवल नेपाल को नहीं बल्कि पूरी मानवता को झकझोर कर रख दिया है। सुबह के सूरज की पहली किरण के साथ ही प्रकृति का ऐसा रौद्र रूप देखने को मिला कि देखते ही देखते 165 से अधिक बेगुनाह जिंदगियां काल के गाल में समा गईं और 1,300 से ज्यादा लोग लापता हो गए। इस विभीषिका में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए हमारे 130 से अधिक भारतीय तीर्थयात्री भी उस जल-प्रलय की भेंट चढ़ गए। तिब्बत (चीन सीमा) के उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने और 'लैंडस्लाइड डैम' के फटने से आए इस फ्लैश फ्लड ने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या नेपाल की यह आपदा कोई अकेली घटना थी, या यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी और भयानक चेतावनी है? एक जिम्मेदार और जिज्ञासु पत्रकार के रूप में इंडिया न्यूज़ 9 लाइव की यह गहन इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट देश की जांच एजेंसियों, उत्तराखंड सरकार और केंद्र के नीति-निर्धारकों को झकझोरने के लिए प्रस्तुत है। 2. केस स्टडी: नेपाल आपदा से हमने क्या सबक सीखा? नेपाल की इस त्रासदी के पीछे के वैज्ञानिक और तकनीकी कारणों को समझना बेहद जरूरी है: * पूर्व-चेतावनी (Early Warning) की शून्यता: चूंकि आपदा का उद्गम स्थल तिब्बत का नियंत्रित क्षेत्र था, नेपाल के पास कोई ऐसा रीयल-टाइम डेटा या सेंसर नेटवर्क नहीं था जो ऊपर से आ रहे महा-सैलाब की खबर कुछ मिनट पहले भी दे सके। * अनियोजित विकास और नदी बेसिन की अनदेखी: नदियों के प्राकृतिक बहाव के साथ छेड़छाड़ और जलविद्युत परियोजनाओं के अति-दबाव ने तबाही के दायरे को कई गुना बढ़ा दिया। यदि नेपाल जैसी स्थिति भारत के भीतर (विशेषकर उत्तराखंड के सामरिक और संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में) पैदा हो गई, तो क्या हमारे पास उससे निपटने का कोई प्रशासनिक या तकनीकी कवच है? इसका जवाब डरावना है—कत्तई नहीं! 3. उत्तरकाशी और गंगोत्री का सुलगता सच: हरनाय पर्वत और जानलेवा झील अब ज़रा अपनी ज़मीन यानी उत्तरकाशी (उत्तराखंड) की ओर देखिए। नेपाल की घटना से भी बड़ा खतरा हमारे ठीक सामने मुंह बाए खड़ा है: * हरनाय पर्वत पर चौड़ी होती दरारें: उत्तरकाशी शहर के बिल्कुल सामने स्थित हरनाय पर्वत की छाती पर गहरी दरारें उभर चुकी हैं। भूवैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों की चिंताएं तब और बढ़ गईं जब इस पहाड़ी पर भूस्खलन के कारण मलबे से एक रहस्यमयी और खतरनाक प्राकृतिक झील (Natural Lake) का निर्माण हो गया। * एक 'टिकिंग टाइम बम': यदि यह झील ओवरफ्लो होती है या मानसून के इस दौर में बांध जैसा यह मलबा ढह जाता है, तो नीचे बसा पूरा उत्तरकाशी शहर चंद मिनटों में जलमग्न हो जाएगा। क्या प्रशासन किसी बहुत बड़े कयामत के आने का इंतजार कर रहा है? 4. खनन का आतंक और डायनामाइट के धमाके: हम खुद दे रहे हैं मौत को दावत पर्वतों के आंचल में जो खेल चल रहा है, वह किसी प्रायोजित षड्यंत्र से कम नहीं है: * गंगा किनारे खनन का नंगा नाच: मां गंगा के पावन तटों और उत्तराखंड के हर कोने में अवैध और अंधाधुंध स्टोन माइनिंग (Stone Mining) जारी है। नदियों के सीने को छलनी कर, रेता-बजरी निकालने की होड़ ने पहाड़ों की नींव को अंदर से खोखला कर दिया है। * डायनामाइट और सुरंगों की बौछार: विकास और चार ऑल-वेदर रोड या सुरंग परियोजनाओं के नाम पर पहाड़ों पर लगातार डायनामाइट के धमाके किए जा रहे हैं। क्या पहाड़ों की सहनशक्ति की कोई सीमा नहीं है? हम अपने ही हाथों से अपने अस्तित्व को मिटाने का प्रावधान कर रहे हैं। 5. सबसे बड़े यक्ष प्रश्न: क्या उत्तराखंड को 'अति-संवेदनशील क्षेत्र' घोषित नहीं किया जाना चाहिए? और क्या चीन से दोबारा नहीं हो सकती ऐसी चूक? इस इन्वेस्टिगेशन के केंद्र में दो सबसे अहम और गंभीर सवाल खड़े होते हैं: * ❓ क्या उत्तराखंड को तुरंत 'हाइपर-सेंसिटिव ज़ोन' (Hyper-Sensitive Zone) की श्रेणी में नहीं दिया जाना चाहिए? जब भौगोलिक और भूवैज्ञानिक रूप से उत्तराखंड की पूरी पर्वतमाला दरक रही है, यहां हरनाय जैसे पर्वत और अनगिनत कृत्रिम झीलें खतरे की घंटी बजा रही हैं, तो फिर शासन-प्रशासन इसे सामान्य क्षेत्रों की तरह क्यों मान रहा है? यहां निर्माण कार्यों और अंधाधुंध दोहन पर तत्काल रोक लगाकर इसे विशेष आपदा-संभावित क्षेत्र घोषित क्यों नहीं किया जा रहा? * ❓ क्या चीन की तरफ से या सीमा पार से दोबारा ऐसी चूक या आपदा नहीं हो सकती? चूंकि तिब्बत और उच्च हिमालयी क्षेत्र सीधे तौर पर चीन के नियंत्रण में हैं, और ट्रांस-बाउंड्री नदियों (सीमा पार बहने वाली नदियों) पर कोई पुख्ता साझा पूर्व-चेतावनी तंत्र (Real-Time Early Warning System) मौजूद नहीं है, तो क्या इस बात की कोई गारंटी है कि भविष्य में तिब्बत की तरफ से ऐसा कोई और जल-प्रलय भारत की सीमाओं (उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़) पर अचानक नहीं टूट पड़ेगा? क्या हमारी सरकारें इस भू-राजनीतिक और प्राकृतिक खतरे से पूरी तरह बेखबर रहना चाहती हैं? 6. जनता के लिए सख्त चेतावनी और एडवायजरी इंडिया न्यूज़ 9 लाइव की इस रिपोर्ट के माध्यम से उत्तराखंड और देश की आम जनता से हाथ जोड़कर यह अपील और सख्त चेतावनी है: * नदियों और नहरों के करीब घर न बनाएं: कृपया मां गंगा, उसकी सहायक नदियों, प्राकृतिक गदेरों, नालों और नहरों के मुहानों या बिल्कुल तटवर्ती हिस्सों पर अपने पक्के मकान या आशियाने बिल्कुल न बनाएं। * कमजोर पहाड़ों और ढलानों से सावधान रहें: जहां-जहां पहाड़ों में दरारें आ चुकी हैं या जो क्षेत्र भूस्खलन की जद में हैं, वहां रहना मौत को सीधे दावत देने जैसा है। सतर्क रहें, सुरक्षित स्थान चुनें। 7. इंडियन गवर्नमेंट और उत्तराखंड शासन-प्रशासन के लिए महा-चेतावनी * युद्ध स्तर पर हो एक्शन: केंद्र सरकार और उत्तराखंड शासन तत्काल प्रभाव से उत्तरकाशी के हरनाय पर्वत, हर्षिल और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों का उच्च-स्तरीय भूवैज्ञानिक ऑडिट करवाएं। * खनन माफियाओं पर नकेल: अवैध खनन और डायनामाइट ब्लास्टिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। * सीमा पार कूटनीतिक संवाद: चीन और नेपाल के साथ मिलकर ट्रांस-बाउंड्री नदियों पर 'रियल-टाइम सेंसर नेटवर्क' स्थापित किया जाए ताकि किसी भी आपदा की सूचना समय रहते मिल सके। निष्कर्ष: जागिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए! नेपाल की रोती हुई आंखें और उजड़े हुए घर हमें चीख-चीख कर यह बता रहे हैं कि प्रकृति जब अपना हिसाब मांगती है, तो वह किसी की हैसियत या कुर्सी नहीं देखती। आज अगर हमने उत्तराखंड की इन गंभीर चेतावनियों को अनसुना कर दिया, तो कल इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। क्या हमारी सरकारें, जांच एजेंसियां और हम खुद इस पर जागेंगे, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद केवल आंसू बहाए जाएंगे? सवाल कड़वा है, लेकिन जवाब देश और देवभूमि के भविष्य के लिए अनिवार्य है। सत्य, निष्पक्षता और राष्ट्रहित को समर्पित गहरी इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट: विशाल शर्मा फ्रीलांसर जर्नलिस्ट, रिसर्चर एवं जिज्ञासु पत्रकार इंडिया न्यूज़ 9लाइव (India News 9Live) (जनता की आवाज़)
नेपाल की घटना से भी बड़ा खतरा उत्तरकाशी शहर के बिल्कुल सामने * हरनाय पर्वत पर चौड़ी होती दरारें: विशेष इन्वेस्टिगेशन रिसर्च रिपोर्ट एवं राष्ट्रव्यापी महा-चेतावनी शीर्षक: नेपाल की महा-तबाही से उत्तरकाशी तक: क्या उत्तराखंड को घोषित किया जाना चाहिए 'अति-संवेदनशील आपदा क्षेत्र'? क्या चीन से दोबारा नहीं हो सकती ऐसी चूक? प्रस्तुतकर्ता: विशाल शर्मा (फ्रीलांसर जर्नलिस्ट, रिसर्चर एवं जिज्ञासु पत्रकार) संस्थान: इंडिया न्यूज़ 9लाइव (India News 9Live) (जनता की आवाज़) दिनांक: 27 अगस्त 2026 1. प्रस्तावना: नेपाल का खौफनाक मंजर और हमारी गहरी खामोशी 26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा पर भोटे कोशी और त्रिशूली नदी बेसिन में जो प्रलय आई, उसने केवल नेपाल को नहीं बल्कि पूरी मानवता को झकझोर कर रख दिया है। सुबह के सूरज की पहली किरण के साथ ही प्रकृति का ऐसा रौद्र रूप देखने को मिला कि देखते ही देखते 165 से अधिक बेगुनाह जिंदगियां काल के गाल में समा गईं और 1,300 से ज्यादा लोग लापता हो गए। इस विभीषिका में कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए हमारे 130 से अधिक भारतीय तीर्थयात्री भी उस जल-प्रलय की भेंट चढ़ गए। तिब्बत (चीन सीमा) के उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने और 'लैंडस्लाइड डैम' के फटने से आए इस फ्लैश फ्लड ने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या नेपाल की यह आपदा कोई अकेली घटना थी, या यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी और भयानक चेतावनी है? एक जिम्मेदार और जिज्ञासु पत्रकार के रूप में इंडिया न्यूज़ 9 लाइव की यह गहन इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट देश की जांच एजेंसियों, उत्तराखंड सरकार और केंद्र के नीति-निर्धारकों को झकझोरने के लिए प्रस्तुत है। 2. केस स्टडी: नेपाल आपदा से हमने क्या सबक सीखा? नेपाल की इस त्रासदी के पीछे के वैज्ञानिक और तकनीकी कारणों को समझना बेहद जरूरी है: * पूर्व-चेतावनी (Early Warning) की शून्यता: चूंकि आपदा का उद्गम स्थल
तिब्बत का नियंत्रित क्षेत्र था, नेपाल के पास कोई ऐसा रीयल-टाइम डेटा या सेंसर नेटवर्क नहीं था जो ऊपर से आ रहे महा-सैलाब की खबर कुछ मिनट पहले भी दे सके। * अनियोजित विकास और नदी बेसिन की अनदेखी: नदियों के प्राकृतिक बहाव के साथ छेड़छाड़ और जलविद्युत परियोजनाओं के अति-दबाव ने तबाही के दायरे को कई गुना बढ़ा दिया। यदि नेपाल जैसी स्थिति भारत के भीतर (विशेषकर उत्तराखंड के सामरिक और संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में) पैदा हो गई, तो क्या हमारे पास उससे निपटने का कोई प्रशासनिक या तकनीकी कवच है? इसका जवाब डरावना है—कत्तई नहीं! 3. उत्तरकाशी और गंगोत्री का सुलगता सच: हरनाय पर्वत और जानलेवा झील अब ज़रा अपनी ज़मीन यानी उत्तरकाशी (उत्तराखंड) की ओर देखिए। नेपाल की घटना से भी बड़ा खतरा हमारे ठीक सामने मुंह बाए खड़ा है: * हरनाय पर्वत पर चौड़ी होती दरारें: उत्तरकाशी शहर के बिल्कुल सामने स्थित हरनाय पर्वत की छाती पर गहरी दरारें उभर चुकी हैं। भूवैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों की चिंताएं तब और बढ़ गईं जब इस पहाड़ी पर भूस्खलन के कारण मलबे से एक रहस्यमयी और खतरनाक प्राकृतिक झील (Natural Lake) का निर्माण हो गया। * एक 'टिकिंग टाइम बम': यदि यह झील ओवरफ्लो होती है या मानसून के इस दौर में बांध जैसा यह मलबा ढह जाता है, तो नीचे बसा पूरा उत्तरकाशी शहर चंद मिनटों में जलमग्न हो जाएगा। क्या प्रशासन किसी बहुत बड़े कयामत के आने का इंतजार कर रहा है? 4. खनन का आतंक और डायनामाइट के धमाके: हम खुद दे रहे हैं मौत को दावत पर्वतों के आंचल में जो खेल चल रहा है, वह किसी प्रायोजित षड्यंत्र से कम नहीं है: * गंगा किनारे खनन का नंगा नाच: मां गंगा के पावन तटों और उत्तराखंड के हर कोने में अवैध और अंधाधुंध स्टोन माइनिंग (Stone Mining) जारी है।
नदियों के सीने को छलनी कर, रेता-बजरी निकालने की होड़ ने पहाड़ों की नींव को अंदर से खोखला कर दिया है। * डायनामाइट और सुरंगों की बौछार: विकास और चार ऑल-वेदर रोड या सुरंग परियोजनाओं के नाम पर पहाड़ों पर लगातार डायनामाइट के धमाके किए जा रहे हैं। क्या पहाड़ों की सहनशक्ति की कोई सीमा नहीं है? हम अपने ही हाथों से अपने अस्तित्व को मिटाने का प्रावधान कर रहे हैं। 5. सबसे बड़े यक्ष प्रश्न: क्या उत्तराखंड को 'अति-संवेदनशील क्षेत्र' घोषित नहीं किया जाना चाहिए? और क्या चीन से दोबारा नहीं हो सकती ऐसी चूक? इस इन्वेस्टिगेशन के केंद्र में दो सबसे अहम और गंभीर सवाल खड़े होते हैं: * ❓ क्या उत्तराखंड को तुरंत 'हाइपर-सेंसिटिव ज़ोन' (Hyper-Sensitive Zone) की श्रेणी में नहीं दिया जाना चाहिए? जब भौगोलिक और भूवैज्ञानिक रूप से उत्तराखंड की पूरी पर्वतमाला दरक रही है, यहां हरनाय जैसे पर्वत और अनगिनत कृत्रिम झीलें खतरे की घंटी बजा रही हैं, तो फिर शासन-प्रशासन इसे सामान्य क्षेत्रों की तरह क्यों मान रहा है? यहां निर्माण कार्यों और अंधाधुंध दोहन पर तत्काल रोक लगाकर इसे विशेष आपदा-संभावित क्षेत्र घोषित क्यों नहीं किया जा रहा? * ❓ क्या चीन की तरफ से या सीमा पार से दोबारा ऐसी चूक या आपदा नहीं हो सकती? चूंकि तिब्बत और उच्च हिमालयी क्षेत्र सीधे तौर पर चीन के नियंत्रण में हैं, और ट्रांस-बाउंड्री नदियों (सीमा पार बहने वाली नदियों) पर कोई पुख्ता साझा पूर्व-चेतावनी तंत्र (Real-Time Early Warning System) मौजूद नहीं है, तो क्या इस बात की कोई गारंटी है कि भविष्य में तिब्बत की तरफ से ऐसा कोई और जल-प्रलय भारत की सीमाओं (उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़) पर अचानक नहीं टूट पड़ेगा? क्या हमारी सरकारें इस भू-राजनीतिक और प्राकृतिक खतरे से पूरी तरह बेखबर रहना चाहती हैं? 6. जनता के लिए सख्त चेतावनी और एडवायजरी इंडिया न्यूज़ 9
लाइव की इस रिपोर्ट के माध्यम से उत्तराखंड और देश की आम जनता से हाथ जोड़कर यह अपील और सख्त चेतावनी है: * नदियों और नहरों के करीब घर न बनाएं: कृपया मां गंगा, उसकी सहायक नदियों, प्राकृतिक गदेरों, नालों और नहरों के मुहानों या बिल्कुल तटवर्ती हिस्सों पर अपने पक्के मकान या आशियाने बिल्कुल न बनाएं। * कमजोर पहाड़ों और ढलानों से सावधान रहें: जहां-जहां पहाड़ों में दरारें आ चुकी हैं या जो क्षेत्र भूस्खलन की जद में हैं, वहां रहना मौत को सीधे दावत देने जैसा है। सतर्क रहें, सुरक्षित स्थान चुनें। 7. इंडियन गवर्नमेंट और उत्तराखंड शासन-प्रशासन के लिए महा-चेतावनी * युद्ध स्तर पर हो एक्शन: केंद्र सरकार और उत्तराखंड शासन तत्काल प्रभाव से उत्तरकाशी के हरनाय पर्वत, हर्षिल और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों का उच्च-स्तरीय भूवैज्ञानिक ऑडिट करवाएं। * खनन माफियाओं पर नकेल: अवैध खनन और डायनामाइट ब्लास्टिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। * सीमा पार कूटनीतिक संवाद: चीन और नेपाल के साथ मिलकर ट्रांस-बाउंड्री नदियों पर 'रियल-टाइम सेंसर नेटवर्क' स्थापित किया जाए ताकि किसी भी आपदा की सूचना समय रहते मिल सके। निष्कर्ष: जागिए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए! नेपाल की रोती हुई आंखें और उजड़े हुए घर हमें चीख-चीख कर यह बता रहे हैं कि प्रकृति जब अपना हिसाब मांगती है, तो वह किसी की हैसियत या कुर्सी नहीं देखती। आज अगर हमने उत्तराखंड की इन गंभीर चेतावनियों को अनसुना कर दिया, तो कल इतिहास हमें माफ नहीं करेगा। क्या हमारी सरकारें, जांच एजेंसियां और हम खुद इस पर जागेंगे, या फिर किसी बड़े हादसे के बाद केवल आंसू बहाए जाएंगे? सवाल कड़वा है, लेकिन जवाब देश और देवभूमि के भविष्य के लिए अनिवार्य है। सत्य, निष्पक्षता और राष्ट्रहित को समर्पित गहरी इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट: विशाल शर्मा फ्रीलांसर जर्नलिस्ट, रिसर्चर एवं जिज्ञासु पत्रकार इंडिया न्यूज़ 9लाइव (India News 9Live) (जनता की आवाज़)
- उत्तराखण्ड में ग्रामीण महिलाएं फूलों की खेती कर बन रही हैं आत्मनिर्भर ।1
- मेडिकल कॉलेज टिहरी के इंणिया मे ही प्रस्तावित है वहीँ पर बनेगा : किशोर मेडिकल कॉलेज टिहरी के इंणिया मे ही प्रस्तावित है वहीँ पर बनेगा : किशोर1
- नेपाल से आया यह वीडियो रसुवा जिले का बताया जा रहा है। भोटेकोशी नदी में अचानक से आई बाढ़ कई लोगों को अपने साथ बहा ले गई जिसमें पुल भी बह गया।1
- पटेलनगर में वाहन चोरी का खुलासा, आरोपी गिरफ्तार, वाहन बरामद। The Aman Times पटेलनगर में वाहन चोरी का खुलासा, आरोपी गिरफ्तार देहरादून: पटेलनगर क्षेत्र में एक्टिवा चोरी के मामले का दून पुलिस ने खुलासा करते हुए एक वाहन चोर को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से चोरी की गई एक्टिवा स्कूटी भी बरामद कर ली है। पुलिस के अनुसार, 26 अगस्त को सहारनपुर रोड निवासी व्यक्ति ने अपनी एक्टिवा स्कूटी संख्या UK-07-DA-4494 चोरी होने की शिकायत दर्ज कराई थी। मामले में मुकदमा दर्ज कर पुलिस टीम ने घटनास्थल और आसपास के सीसीटीवी फुटेज खंगाले। सीसीटीवी और मुखबिर की सूचना के आधार पर पुलिस ने 27 अगस्त को चक्की टोला जाने वाले रास्ते से आरोपी राहुल थापा (32 वर्ष) को चोरी की स्कूटी के साथ गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में आरोपी ने बताया कि वह नशे का आदी है और नशे की जरूरतों को पूरा करने के लिए उसने स्कूटी चोरी की थी। पुलिस के मुताबिक आरोपी पूर्व में भी जेल जा चुका है और उसके आपराधिक इतिहास की जानकारी जुटाई जा रही है। बरामदगी: चोरी की एक्टिवा स्कूटी UK-07-DA-4494 पुलिस टीम: उपनिरीक्षक ओमवीर सिंह, कांस्टेबल संजीव कुमार और कांस्टेबल सौरभ कुमार।1
- कलियर में युवती से छेड़छाड़ और युवक की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल कलियर क्षेत्र में युवती से कथित छेड़छाड़ और एक युवक की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में कुछ लोग एक युवक के साथ मारपीट करते हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। हालांकि, वायरल वीडियो में दिखाई दे रहे घटनाक्रम की वास्तविकता और पूरे मामले की पुष्टि अभी पुलिस स्तर से नहीं हुई है। मामले में पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि घटना के पीछे वास्तविक वजह क्या थी और इसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं।1
- देहरादून के डालनवाला में महिला की संदिग्ध मौत, पति पर शक, पुलिस ने लिया हिरासत में। The Aman Times डालनवाला में महिला की संदिग्ध मौत, पति पर शक देहरादून के डालनवाला क्षेत्र में महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से सनसनी फैल गई। हत्या की आशंका में पुलिस जांच में जुटी है और शक महिला के पति पर भी जताया जा रहा है। एसपी सिटी प्रमोद कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे। एफएसएल टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए। मौत की असली वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद स्पष्ट होगी।1
- नेपाल में कुदरत का कहर: 95 की मौत, 750 से ज्यादा लापता; 133 भारतीय भी शामिल नेपाल के रसुवा क्षेत्र में नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई भीषण फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है। 26 अगस्त तक नेपाल में कम से कम 95 लोगों की मौत की खबर है, जबकि 750 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। लापता लोगों में 133 भारतीय नागरिक और 37 एनआरआई शामिल हैं। राहत एवं बचाव अभियान लगातार जारी है और मृतकों व लापता लोगों की संख्या बढ़ने की आशंका बनी हुई है।1
- पावर प्लांट-पुल बहे; 133 भारतीय लापता, कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जा रहे थे नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी में आई भीषण बाढ़ (फ्लैश फ्लड) के कारण भारी तबाही हुई है, जिसमें कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए 133 भारतीय पर्यटकों (105 भारतीय नागरिक और 37 एनआरआई) सहित करीब 400 तीर्थयात्री और ट्रेकर्स लापता (संपर्क से बाहर) हो गए हैं। बुधवार सुबह करीब 9 बजे आई इस अचानक बाढ़ की वजह से नेपाल और चीन (तिब्बत) को जोड़ने वाला नेपाल-चीन मितेरी पुल (फ्रेंडशिप ब्रिज) बह गया है और लगभग 11 हाइड्रो पावर प्लांट, 19 पुल और 40 किलोमीटर लंबी सड़क पूरी तरह तबाह हो गई है। लापता लोगों की संख्या: नेपाल पर्यटन बोर्ड (NTB) के अनुसार कुल 384 तीर्थयात्री लापता हैं, जिनमें 105 भारतीय, 37 एनआरआई (अनिवासी भारतीय), 93 नेपाली और अन्य देशों (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया आदि) के नागरिक शामिल हैं।सद्गुरु के समूह के लोग भी फंसे: ईशा फाउंडेशन के प्रमुख सद्गुरु ने बताया कि उनके एक तीर्थयात्री समूह के 77 लोग चीनी आव्रजन (इमिग्रेशन) कार्यालय के पास फंसे हुए हैं और बाढ़ में इमारत बहने के बाद से उनका कोई सुराग नहीं मिल पाया है।संपर्क पूरी तरह ठप: रसुवागढ़ी-केरुंग मार्ग (जो तिब्बत जाने का सबसे मुख्य निजी रास्ता है) पूरी तरह से बंद हो गया है। क्षेत्र में फाइबर और मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह ठप हो जाने के कारण यात्रियों से संपर्क नहीं हो पा रहा है।राहत और बचाव कार्य: नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और स्थानीय प्रशासन ने बड़े पैमाने पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया है। फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए 14-15 हेलीकॉप्टर तैनात किए गए हैं। ब्रेकिंग न्यूज़ संवाददाता आशीष मिश्रा दैनिक समाचार पत्र लखनऊ1