*बस यही फ़र्क है मोहन सरकार और शिवराज सरकार में…?* व्यंग्य–राजेन्द्र सिंह जादौन मोहन जी, ज़रा शिवराज की तरह “रोड़छाप” नेता बन जाइए।।वीवीआईपी कल्चर की चमचमाती कार से उतरकर कभी धूल में खड़े होकर देखिए।वहाँ सवाल मिलेंगे, जवाब नहीं। सीधी ज़िले में सैकड़ों करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास हो रहा था। मंच पर विकास मुस्कुरा रहा था, पोस्टर पर भविष्य चमक रहा था और माइक पर उपलब्धियाँ बोल रही थीं। ठीक उसी समय नीचे भीड़ में एक आवाज़ रो रही थी।“मैं बैगा आदिवासी हूं, मुझे डॉक्टर बनना है… पर पापा के पास इतने पैसे नहीं हैं…”।यह कोई नाटक नहीं था, कोई विपक्षी साज़िश नहीं थी। यह एक आदिवासी बच्ची की कच्ची, सच्ची और असहाय फरियाद थी। नाम।अनामिका बैगा। वह रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, सुरक्षाकर्मियों से कहती रही।“बस एक बार मिल लेने दीजिए…”लेकिन वीवीआईपी कल्चर के कड़े पहरे में इंसान नहीं, सिर्फ़ पास और प्रोटोकॉल की एंट्री होती है। मुख्यमंत्री तक पहुँचना, जैसे भगवान से मिलने का आवेदन हो। अनामिका कहती है।“मैं विधायक के पास गई, सांसद के पास गई, कलेक्टर के पास गई… सब जगह से हार चुकी हूं।”।यानी लोकतंत्र की पूरी सीढ़ी चढ़ चुकी है, लेकिन दरवाज़ा कहीं नहीं खुला। अब सवाल सीधा है, और कड़वा भी।लाड़ली बहना योजना पर हर महीने लगभग ₹18 हज़ार करोड़ खर्च करने वाली मध्यप्रदेश सरकार, क्या एक बैगा आदिवासी बच्ची को डॉक्टर बनाने का सपना नहीं संभाल सकती? यह योजना पर सवाल नहीं है। यह प्राथमिकता पर सवाल है। शिवराज सरकार की एक पहचान थी।वे कभी खेत में उतर जाते थे, कभी बहन के घर चाय पी लेते थे, कभी किसी बच्ची का सिर थपथपा देते थे। राजनीति थी, कैमरा था, लेकिन “मुलाक़ात” तो होती थी। मोहन सरकार में फ़र्क यही दिख रहा है।यहाँ मंच ऊँचा है, और जनता बहुत नीचे। आज विकास की फाइलें भारी हैं, लेकिन संवेदनशीलता हल्की हो गई है। आज योजनाओं के नाम बड़े हैं, पर सपनों के कद छोटे पड़ रहे हैं। मोहन जी, मुख्यमंत्री होना सिर्फ़ शिलान्यास करने का नाम नहीं है। मुख्यमंत्री होना उस बच्ची की आँखों में झांकने का नाम है, जो कहती है “एक बार मिल लीजिए।”अगर सरकार एक अनामिका को डॉक्टर नहीं बना सकती, तो फिर यह बताइए।इतने करोड़ों का विकास आख़िर किसके लिए है? और हाँ, रोड़छाप होना गाली नहीं है। रोड़छाप वही होता है जो सड़क पर खड़े आदमी की बात सुन ले। शायद यही वो फ़र्क है,।जिसे जनता आज महसूस कर रही है
*बस यही फ़र्क है मोहन सरकार और शिवराज सरकार में…?* व्यंग्य–राजेन्द्र सिंह जादौन मोहन जी, ज़रा शिवराज की तरह “रोड़छाप” नेता बन जाइए।।वीवीआईपी कल्चर की चमचमाती कार से उतरकर कभी धूल में खड़े होकर देखिए।वहाँ सवाल मिलेंगे, जवाब नहीं। सीधी ज़िले में सैकड़ों करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास हो रहा था। मंच पर विकास मुस्कुरा रहा था, पोस्टर पर भविष्य चमक रहा था और माइक पर उपलब्धियाँ बोल रही थीं। ठीक उसी समय नीचे भीड़ में एक आवाज़ रो रही थी।“मैं बैगा आदिवासी हूं, मुझे डॉक्टर बनना है… पर पापा के पास इतने पैसे नहीं हैं…”।यह कोई नाटक नहीं था, कोई विपक्षी साज़िश नहीं थी। यह एक आदिवासी बच्ची की कच्ची, सच्ची और असहाय फरियाद थी। नाम।अनामिका बैगा। वह रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, सुरक्षाकर्मियों से कहती रही।“बस एक बार मिल लेने दीजिए…”लेकिन वीवीआईपी कल्चर के कड़े पहरे में इंसान नहीं, सिर्फ़ पास और प्रोटोकॉल की एंट्री होती है। मुख्यमंत्री तक पहुँचना, जैसे भगवान से मिलने का आवेदन हो। अनामिका कहती है।“मैं विधायक के पास गई, सांसद के पास गई, कलेक्टर के पास गई… सब जगह से हार चुकी हूं।”।यानी लोकतंत्र की पूरी सीढ़ी चढ़ चुकी है, लेकिन दरवाज़ा कहीं नहीं खुला। अब सवाल सीधा है, और कड़वा भी।लाड़ली बहना योजना पर हर महीने लगभग ₹18 हज़ार करोड़ खर्च करने वाली मध्यप्रदेश सरकार, क्या एक बैगा आदिवासी बच्ची को डॉक्टर बनाने का सपना नहीं संभाल सकती? यह योजना पर सवाल नहीं है। यह प्राथमिकता पर सवाल है। शिवराज सरकार की एक पहचान थी।वे कभी खेत में उतर जाते थे, कभी बहन के घर चाय पी लेते थे, कभी किसी बच्ची का सिर थपथपा देते थे। राजनीति थी, कैमरा था, लेकिन “मुलाक़ात” तो होती थी। मोहन सरकार में फ़र्क यही दिख रहा है।यहाँ मंच ऊँचा है, और जनता बहुत नीचे। आज विकास की फाइलें भारी हैं, लेकिन संवेदनशीलता हल्की हो गई है। आज योजनाओं के नाम बड़े हैं, पर सपनों के कद छोटे पड़ रहे हैं। मोहन जी, मुख्यमंत्री होना सिर्फ़ शिलान्यास करने का नाम नहीं है। मुख्यमंत्री होना उस बच्ची की आँखों में झांकने का नाम है, जो कहती है “एक बार मिल लीजिए।”अगर सरकार एक अनामिका को डॉक्टर नहीं बना सकती, तो फिर यह बताइए।इतने करोड़ों का विकास आख़िर किसके लिए है? और हाँ, रोड़छाप होना गाली नहीं है। रोड़छाप वही होता है जो सड़क पर खड़े आदमी की बात सुन ले। शायद यही वो फ़र्क है,।जिसे जनता आज महसूस कर रही है
- LbaratMaharajganj, Uttar Pradesh😡14 hrs ago
- Mehtab Khanकोटमा, अनूपपुर, मध्य प्रदेश👏1 day ago
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- Post by Siddharth brajpuriya1
- Post by Pankaj sahu1
- मुफ्त योजनाएं, बढ़ता कर्ज और थमता विकास। मध्यप्रदेश के बजट का 70% से ज्यादा हिस्सा सब्सिडी, वेतन-पेंशन और कर्ज अदायगी में खर्च हो रहा है। हर माह 1890 करोड़ लाड़ली बहना पर, 2800 करोड़ मुफ्त राशन पर, 95 हजार करोड़ सालाना वेतन-पेंशन में। साल 2025 खत्म होने से पहले ही सरकार ने 3500 करोड़ का नया कर्ज लिया, और चालू वित्त वर्ष में कुल कर्ज पहुंचा 53,100 करोड़। सवाल साफ है, क्या राहत के नाम पर कर्ज बढ़ेगा या विकास और रोजगार को मिलेगी प्राथमिकता?1
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