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*वायरल वीडियो/प्रकरण वर्ष 2022 का है,जिसमें तत्समय आवश्यक विधिक कार्रवाई की जा चुकी है। वर्तमान में स्थिति पूर्णतः सामान्य एवं शांति व्यवस्था कायम है।कृपया भ्रामक/पुरानी खबरें प्रसारित न करें। ऐसे भ्रामक सामग्री फैलाने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स को चिन्हित कर उनके विरुद्ध विधिक कार्रवाई की जायेगी। उक्त सम्बन्ध में CO आलापुर श्री प्रदीप कुमार चन्देल द्वारा दी गई बाईट-*
राजेश.तिवारी.पतकार
*वायरल वीडियो/प्रकरण वर्ष 2022 का है,जिसमें तत्समय आवश्यक विधिक कार्रवाई की जा चुकी है। वर्तमान में स्थिति पूर्णतः सामान्य एवं शांति व्यवस्था कायम है।कृपया भ्रामक/पुरानी खबरें प्रसारित न करें। ऐसे भ्रामक सामग्री फैलाने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स को चिन्हित कर उनके विरुद्ध विधिक कार्रवाई की जायेगी। उक्त सम्बन्ध में CO आलापुर श्री प्रदीप कुमार चन्देल द्वारा दी गई बाईट-*
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- अजीत मिश्रा (खोजी) मुजफ्फरनगर। थाने वाली रोड पर एक बेटी अपनी माँ के साथ घर के बाहर खड़ी थी। दिनदहाड़े बाइक पर दो लड़के आए। रेकी की। लौटे। और सीधे पूछा – "क्या रेट है?" ये सवाल नहीं था। ये ऐलान था उस बेखौफी का जो रसूख की कोख से पैदा होती है। पीड़िता चीख-चीख कर बता रही है: "बोले- हमारे पीछे बैठ के चल। मैंने कहा ये मेरा घर है, मेरी मम्मी है। बोले- फिर हम तेरे घर के अंदर चल रहे हैं।" गालियां दीं। धक्का दिया। भाग गए। हैवानियत यहीं नहीं रुकी। पुलिस के आने के बाद भी आरोपी दोबारा लौटा। गली में चिल्लाया – "उस लड़की को बुलाओ, मुझे उसके पैसे लगाने हैं!" रोकने वाले चाचा को धक्का मारा। स्कूटी की चाबी छीनने पर ही भागा। नाम अब सामने हैं – आर्यमान और शौर्य गुप्ता। आर्यमान BJP के पूर्व मंत्री का बेटा बताया जा रहा है। दोनों गिरफ्तार हैं। सलाखों के पीछे हैं। लेकिन सवाल सलाखों से बड़ा है। सवाल 1: घर की दहलीज़ पर खड़ी लड़की को 'रेट' पूछने का दुस्साहस कहाँ से आता है? जवाब साफ है – ताकत के नशे से। 'पापा मंत्री थे' वाले नशे से। 'थाने-पुलिस हमारा कुछ नहीं बिगाड़ेगी' वाले नशे से। सवाल 2: पुलिस के सामने दोबारा लौटकर "पैसे लगाने हैं" कहना क्या है? ये कानून को ठेंगा दिखाना है। ये बताना है कि 'हमारी पहुँच ऊपर तक है, हमारा कोई क्या कर लेगा।' पीड़िता का एक-एक शब्द इस सिस्टम के मुँह पर तमाचा है: "मैं अपने घर में अपने भाई की तू-तड़ाक नहीं सुनती। कोई गैर आदमी आकर इतनी गंदी गाली दे जाए, मैं चुप नहीं बैठूंगी। इनकी बढ़िया पिटाई हो। लड़कियां घर के बाहर भी सेफ नहीं हैं।" ये सिर्फ छेड़छाड़ की खबर नहीं है। ये ऐलान-ए-जंग है। ये जंग है उस सोच के खिलाफ जो बेटी को घर के बाहर देखते ही 'माल' समझती है। ये जंग है उस रसूख के खिलाफ जो बाइक पर बैठकर बेटियों का 'रेट' तय करने निकलता है। गिरफ्तारी हो गई है। बहुत अच्छी बात। अब इंसाफ का इम्तिहान है। अगर ये 'साहबज़ादे' दो दिन में ज़मानत पर बाहर घूमते मिले, तो समझ लेना कि इस शहर की हर बेटी का रेट 'दो कौड़ी' तय हो गया है। और अगर कानून ने मिसाल बनाई, तो शायद कल कोई बाइक वाला किसी बेटी से 'रेट' पूछने से पहले सौ बार सोचेगा। फैसला अब अदालत का नहीं, पूरे सिस्टम का होगा। या तो बेटियां बचेंगी, या 'साहबज़ादों' का रसूख।1
- ज़माना चाँद पर पहुँच गया और हमारे गाँव की सड़कें आज भी आज़ादी का इंतज़ार कर रही हैं। कच्ची राहें और टूटते सपने... आखिर कब तक? 🛤️🥀1
- nice1
- Post by Anand Yadav1
- कानून के रखवाले या ‘रेट-लिस्ट’ के सौदागर ₹20 हजार में बिकती दिखी वर्दी!” आजमगढ़ के सरायमीर थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर अभिषेक सिंह को एंटी करप्शन यूनिट ने रिश्वत लेते रंगे हाथ दबोच लिया। मामला वही पुराना—मुकदमे से नाम हटाने की ‘सेवा’, लेकिन कीमत ₹1 लाख तय। सवाल ये है कि क्या अब थानों में न्याय नहीं, “डील” तय होती है? पीड़ित अवनीश राय ने हिम्मत दिखाई, शिकायत की—और फिर सिस्टम ने भी एक दिन के लिए ईमानदारी का चेहरा दिखा दिया। केमिकल लगे नोट, जाल बिछा, और जैसे ही ₹20 हजार की पहली किस्त जेब में गई… वर्दी का रंग भी बदल गया। अब बड़ा सवाल— क्या ये सिर्फ एक सब इंस्पेक्टर की कहानी है, या सिस्टम में कहीं गहराई तक “रेट कार्ड” छिपा बैठा है? क्या वर्दी अब सुरक्षा का प्रतीक है या डर और सौदेबाजी का? आजमगढ़। जिले के सरायमीर थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर अभिषेक सिंह को एंटी करप्शन यूनिट ने रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। यह कार्रवाई एक पीड़ित की शिकायत के आधार पर की गई, जिसने आरोप लगाया था कि मुकदमे से नाम हटाने के बदले उससे ₹1 लाख की रिश्वत मांगी जा रही थी। जानकारी के अनुसार, बिलरियागंज थाना क्षेत्र के गंगापुर निवासी अवनीश राय ने एंटी करप्शन यूनिट को शिकायती पत्र देकर बताया कि सब इंस्पेक्टर लगातार उस पर पैसे देने का दबाव बना रहे थे। परेशान होकर उसने मामले की शिकायत संबंधित विभाग से की। शिकायत की पुष्टि के बाद एंटी करप्शन टीम ने जाल बिछाया और योजना के तहत पीड़ित को केमिकल लगे नोट देकर सब इंस्पेक्टर के पास भेजा गया। जैसे ही अभिषेक सिंह ने ₹20,000 की रिश्वत ली, पहले से मौजूद टीम ने तत्काल उसे गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार आरोपी सब इंस्पेक्टर को न्यायालय में पेश किया जा रहा है, जहां आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। मामले में एंटी करप्शन यूनिट की कार्रवाई से पुलिस विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।2
- Post by अपना प्रतापगढ़ न्यूज1
- hi dosto aplog Kaise hai hame malum hai ki aap aap ache honge2
- अजीत मिश्रा (खोजी) ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश दिनांक: 18 अप्रैल 2026 स्थान: हरैया, बस्ती हरैया (बस्ती)। उत्तर प्रदेश सरकार एक तरफ 'निपुण भारत' मिशन के तहत परिषदीय विद्यालयों की सूरत बदलने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर बस्ती जनपद के विकास खंड हरैया अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय मझौवा बाबू से आई एक तस्वीर ने पूरी व्यवस्था को शर्मसार कर दिया है। यहाँ मध्याह्न भोजन (MDM) पकाने के लिए किसी लकड़ी या गैस का नहीं, बल्कि उस ब्लैकबोर्ड (श्यामपट्ट) का इस्तेमाल किया गया, जिस पर बच्चों का भविष्य लिखा जाना था। सिलेंडर है तो धुआं क्यों? सरकार ने हर विद्यालय में रसोई गैस सिलेंडर की व्यवस्था सुनिश्चित की है ताकि पर्यावरण बचा रहे और बच्चों को स्वच्छ माहौल में भोजन मिले। लेकिन मझौवा बाबू विद्यालय में नियमों को ताक पर रखकर चूल्हे पर रोटियां सेंकी जा रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या गैस सिलेंडर रिफिल कराने के पैसे डकारे जा रहे हैं या फिर जिम्मेदारों की सुस्ती इस कदर हावी है कि उन्हें चूल्हे का धुआं नजर नहीं आता? शिक्षा के 'हथियार' की आहुति हैरानी की बात तो यह है कि चूल्हा जलाने के लिए सूखी लकड़ियों के बजाय विद्यालय के ब्लैकबोर्ड को फाड़कर आग के हवाले कर दिया गया। जिस श्यामपट्ट पर शिक्षक ककहरा सिखाते थे, वह आज चूल्हे में जलकर राख हो रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई यह तस्वीर चीख-चीख कर कह रही है कि विद्यालय प्रशासन के लिए शिक्षा के उपकरणों की क्या अहमियत है। गंदगी का अंबार: स्कूल या तबेला? विद्यालय की अव्यवस्था यहीं खत्म नहीं होती। क्लासरूम के अंदर फैला पुआल और चारों तरफ पसरी गंदगी स्वच्छ भारत अभियान के दावों की पोल खोल रही है। जिस परिसर में बच्चों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए, वहां गंदगी का साम्राज्य जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है। बड़ा सवाल: > "अगर गैस खत्म थी, तो लकड़ी का इंतजाम क्यों नहीं हुआ? और अगर कुछ नहीं मिला, तो क्या सीधे बच्चों की पढ़ाई के संसाधनों को ही जला देना एकमात्र विकल्प था?" मूकदर्शक बना विभाग इस पूरे प्रकरण में विद्यालय के जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी पूरी तरह मौन हैं। नियमों की धज्जियां उड़ती देख भी ब्लॉक स्तर के अधिकारियों की चुप्पी यह इशारा करती है कि शायद मिलीभगत का खेल ऊपर तक है। अब देखना यह है कि इस वायरल तस्वीर और खबर के बाद जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के आला अधिकारी मझौवा बाबू विद्यालय के लापरवाह जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई करते हैं, या फिर कागजी घोड़ों के बीच इस मामले को भी दबा दिया जाएगा।1
- Post by रवि चन्द्र पत्रकार1