शिक्षा के नाम पर बोझ या व्यवसाय? हर साल बदलता कोर्स बना अभिभावकों की परेशानी धौलपुर। एक ओर देश और राज्य सरकारें शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए लगातार नई योजनाएं लागू कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कुछ पहलू आम जनता के लिए भारी बोझ बनते जा रहे हैं। खासकर स्कूलों में हर साल बदलते कोर्स और नई किताबों की अनिवार्यता ने अभिभावकों की आर्थिक स्थिति पर गहरा असर डाला है। आज हालात ऐसे बन गए हैं कि चाहे बोर्ड आरबीएसई हो या सीबीएसई, हर वर्ष किताबों का बदलना एक आम प्रक्रिया बन चुकी है। पहले जहां एक ही किताब घर के दूसरे बच्चे भी उपयोग में ले लेते थे, वहीं अब हर साल नए सिलेबस और नई किताबों के नाम पर अभिभावकों को मजबूरन मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है। धौलपुर जिले में इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें शिक्षा के नाम पर हो रही कथित लूट का खुलासा किया गया है। पोस्ट में यह आरोप लगाया गया है कि किताबों का बार-बार बदलना सिर्फ शिक्षा सुधार के लिए नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक खेल का हिस्सा बन गया है। इस पूरे मामले ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वास्तव में शिक्षा को बेहतर बनाने के नाम पर यह बदलाव हो रहे हैं या फिर इसके पीछे कुछ और ही मंशा छिपी हुई है। धौलपुर में बुक मार्केट पर सवाल क्या शिक्षा माफिया हावी हैं वायरल हो रही पोस्ट में धौलपुर के एक चर्चित बुक स्टोर का भी जिक्र किया गया है, जिसे लेकर लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। आरोप है कि यह दुकान और इससे जुड़े कुछ अन्य लोग शिक्षा के नाम पर किताबों के कारोबार को एक तरह से नियंत्रित कर रहे हैं। कि हर साल कोर्स बदलने के पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है, जिसमें कुछ स्कूल, प्रकाशक और बुक सेलर शामिल हैं। यही कारण है कि किताबों का पैटर्न बार-बार बदला जाता है, ताकि पुराने किताबों का इस्तेमाल न हो सके और हर बार नई किताबें खरीदनी पड़े। सोशल मीडिया पर लोगों ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। कई अभिभावकों ने कमेंट्स में बताया कि उनकी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि वे हर साल हजारों रुपये किताबों पर खर्च कर सकें। एक यूजर ने लिखा, “एक ही घर में दो बच्चों की पढ़ाई कराना अब चुनौती बन गया है, क्योंकि हर साल नई किताबें खरीदना मजबूरी हो गया है।” वहीं कुछ लोगों ने इसे “शिक्षा माफिया” का नाम देते हुए कहा कि यह एक संगठित तरीका है, जिससे आम जनता को गुमराह किया जा रहा है। पोस्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि बड़े स्तर पर मिलीभगत के चलते इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह मुद्दा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है, उससे यह साफ है कि जनता के मन में गहरी नाराजगी और असंतोष है। जिम्मेदारों की चुप्पी और भविष्य की चिंता कैसे मिलेगा शिक्षा को असली बढ़ावा? इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इतने बड़े स्तर पर चर्चा और विरोध के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी अब तक कोई ठोस कदम उठाते नजर नहीं आ रहे हैं। लोगों का आरोप है कि संबंधित विभाग और अधिकारी इस मुद्दे पर आंखें बंद किए बैठे हैं, मानो उन्हें इस समस्या से कोई सरोकार ही नहीं है। जब शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकता ही महंगी और जटिल हो जाए, तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ी पर पड़ता है। बढ़ती महंगाई के बीच अगर शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब कई बच्चे सिर्फ आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई से वंचित रह जाएंगे। कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और स्थिरता बेहद जरूरी है। यदि सिलेबस में बदलाव करना भी हो, तो वह लंबे अंतराल के बाद और ठोस कारणों के आधार पर किया जाना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पुराने किताबों का उपयोग संभव हो, ताकि अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। यह भी जरूरी है कि सरकार और शिक्षा विभाग इस तरह के मामलों पर गंभीरता से ध्यान दें और यदि कहीं भी अनियमितता या मिलीभगत पाई जाती है, तो उस पर सख्त कार्रवाई की जाए। समाज के हर वर्ग को यह समझना होगा कि शिक्षा केवल एक सेवा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव है। यदि इस नींव को ही कमजोर कर दिया गया, तो देश का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। आज जरूरत है जागरूकता की, पारदर्शिता की और जिम्मेदारी की। अभिभावकों, शिक्षकों और प्रशासन को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा, ताकि शिक्षा का असली उद्देश्य ज्ञान का प्रसार और समाज का विकास पूरा हो सके। अगर समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है। और तब सवाल सिर्फ किताबों का नहीं रहेगा, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर उठेगा।
शिक्षा के नाम पर बोझ या व्यवसाय? हर साल बदलता कोर्स बना अभिभावकों की परेशानी धौलपुर। एक ओर देश और राज्य सरकारें शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए लगातार नई योजनाएं लागू कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कुछ पहलू आम जनता के लिए भारी बोझ बनते जा रहे हैं। खासकर स्कूलों में हर साल बदलते कोर्स और नई किताबों की अनिवार्यता ने अभिभावकों की आर्थिक स्थिति पर गहरा असर डाला है। आज हालात ऐसे बन गए हैं कि चाहे बोर्ड आरबीएसई हो या सीबीएसई, हर वर्ष किताबों का बदलना एक आम प्रक्रिया बन चुकी है। पहले जहां एक ही किताब घर के दूसरे बच्चे भी उपयोग में ले लेते थे, वहीं अब हर साल नए सिलेबस और नई किताबों के नाम पर अभिभावकों को मजबूरन मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है। धौलपुर जिले में इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें शिक्षा के नाम पर हो रही कथित लूट का खुलासा किया गया है। पोस्ट में यह आरोप लगाया गया है कि किताबों का बार-बार बदलना सिर्फ शिक्षा सुधार के लिए नहीं, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक खेल का हिस्सा बन गया है। इस पूरे मामले ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या वास्तव में शिक्षा को बेहतर बनाने के नाम पर यह बदलाव हो रहे हैं या फिर इसके पीछे कुछ और ही मंशा छिपी हुई है। धौलपुर में बुक मार्केट पर सवाल क्या शिक्षा माफिया हावी हैं वायरल हो रही पोस्ट में धौलपुर के एक चर्चित बुक स्टोर का भी जिक्र किया गया है, जिसे लेकर लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। आरोप है कि यह दुकान और इससे जुड़े कुछ अन्य लोग शिक्षा के नाम पर किताबों के कारोबार को एक तरह से नियंत्रित कर रहे हैं। कि हर साल कोर्स बदलने के पीछे एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है, जिसमें कुछ स्कूल, प्रकाशक और बुक सेलर शामिल हैं। यही कारण है कि किताबों का पैटर्न बार-बार बदला जाता है, ताकि पुराने किताबों का इस्तेमाल न हो सके और हर बार नई किताबें खरीदनी पड़े। सोशल मीडिया पर लोगों ने खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। कई अभिभावकों ने कमेंट्स में बताया कि उनकी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं है कि वे हर साल हजारों रुपये किताबों पर खर्च कर सकें। एक यूजर ने लिखा, “एक ही घर में दो बच्चों की पढ़ाई कराना अब चुनौती बन गया है, क्योंकि हर साल नई किताबें खरीदना मजबूरी हो गया है।” वहीं कुछ लोगों ने इसे “शिक्षा माफिया” का नाम देते हुए कहा कि यह एक संगठित तरीका है, जिससे आम जनता को गुमराह किया जा रहा है। पोस्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि बड़े स्तर पर मिलीभगत के चलते इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से यह मुद्दा सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है, उससे यह साफ है कि जनता के मन में गहरी नाराजगी और असंतोष है। जिम्मेदारों की चुप्पी और भविष्य की चिंता कैसे मिलेगा शिक्षा को असली बढ़ावा? इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इतने बड़े स्तर पर चर्चा और विरोध के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी अब तक कोई ठोस कदम उठाते नजर नहीं आ रहे हैं। लोगों का आरोप है कि संबंधित विभाग और अधिकारी इस मुद्दे पर आंखें बंद किए बैठे हैं, मानो उन्हें इस समस्या से कोई सरोकार ही नहीं है। जब शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकता ही महंगी और जटिल हो जाए, तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ी पर पड़ता है। बढ़ती महंगाई के बीच अगर शिक्षा का खर्च लगातार बढ़ता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब कई बच्चे सिर्फ आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई से वंचित रह जाएंगे। कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और स्थिरता बेहद जरूरी है। यदि सिलेबस में बदलाव करना भी हो, तो वह लंबे अंतराल के बाद और ठोस कारणों के आधार पर किया जाना चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि पुराने किताबों का उपयोग संभव हो, ताकि अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। यह भी जरूरी है कि सरकार और शिक्षा विभाग इस तरह के मामलों पर गंभीरता से ध्यान दें और यदि कहीं भी अनियमितता या मिलीभगत पाई जाती है, तो उस पर सख्त कार्रवाई की जाए। समाज के हर वर्ग को यह समझना होगा कि शिक्षा केवल एक सेवा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव है। यदि इस नींव को ही कमजोर कर दिया गया, तो देश का भविष्य भी खतरे में पड़ सकता है। आज जरूरत है जागरूकता की, पारदर्शिता की और जिम्मेदारी की। अभिभावकों, शिक्षकों और प्रशासन को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना होगा, ताकि शिक्षा का असली उद्देश्य ज्ञान का प्रसार और समाज का विकास पूरा हो सके। अगर समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है। और तब सवाल सिर्फ किताबों का नहीं रहेगा, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर उठेगा।
- धौलपुर । बार कौंसिल ऑफ़ राजस्थान का मतदान 22 अप्रैल को होगा। धौलपुर अभिभाषक संघ धौलपुर के अध्यक्ष हरिओम शर्मा ने बताया कि अभिभाषक संघ द्वारा पप्पू सिंह गुर्जर एडवोकेट को वार काउंसिल ऑफ राजस्थान के चुनाव में चुनाव अधिकारी नियुक्त किया गया है जो कि चुनाव संबंधित सभी गतिविधियों को सुचारु रूप से संपन्न करेंगे । चुनाव अधिकारी पप्पू सिंह गुर्जर एडवोकेट ने बताया कि बर काउंसिल आफ राजस्थान के चुनाव में मतदान 22 अप्रैल को प्रातः 8:00 बजे से 5: 00 बजे तक होगा। जिसमें 567 अधिवक्ता अपने मत का उपयोग करेंगे। मतदान के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ताओं तथा महिला अधिवक्ताओं के लिए अलग से काउंटर स्थापित किए गए हैं तथा मतदान केंद्र पर छाया पेयजल व हवा की उत्तम व्यवस्था की गई है। न्यायालय परिसर में चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराया जाएगा तथा मतदान के बाद मतदान पेटी जिला एवं सैशन न्यायाधीश को सुपुर्द कर दी जाएगी। मतदान को लेकर सभी तैयारियां को अंतिम रूप दे दिया गया है। मतदान के प्रभारी के रूप में उपखंड अधिकारी धौलपुर व कोर्ट मेनेजर बृजेश शर्मा ने तैयारी को अंतिम रूप दिया व मतदान केंद्र का निरीक्षण किया।3
- रिफाइनरी में भीषण आग. CDU यूनिट में आग लगने की सूचना से हड़कंप मच गया, बड़ी संख्या में दमकल वाहन आग पर काबू पाने के प्रयास में जुटे हुए हैं, रिफाइनरी परिसर में अफरा-तफरी का माहौल1
- *टैम्पो सवार महिलाओं से चोरी के मामले में निहालगंज थाना पुलिस को मिली सफलता* धौलपुर वारदात को अंजाम देने वाले दो आरोपी गिरफ्तार, आरोपियों द्वारा चोरी किए गए लाखों के आभूषण भी किए बरामद, भरतपुर निवासी हैं महिला आरोपी लक्ष्मी और रोशनी, बस स्टैंड के पास वारदात को अंजाम देकर हुई थी फरार, थानाप्रभारी अमित शर्मा के नेतृत्व में हुई गिरफ्तारी, एसपी विकास सांगवान, एडिशनल एसपी वैभव शर्मा, डीएसपी कृष्णराज जांगिड़ के निर्देश पर कार्यवाही।1
- Post by JP NEWS झोलाछाप पत्रकार /Rohit bajouriya1
- *सियासत तुम करो, फैसले नारी शक्ति करेगी!* 🗳️💪 महिला आरक्षण का विरोध करने वालों को 2024 का 65.8% महिला मतदान याद रखना चाहिए। अब नारी शक्ति न केवल वोट देगी, बल्कि विरोधियों का हिसाब भी करेगी। INDI गठबंधन की महिला विरोधी सोच को देश देख रहा है। अब राजनीति महिलाओं के लिए नहीं, महिलाएं राजनीति तय करेंगी! 🇮🇳🗳️ #महिला_विरोधी_कांग्रेस #AntiWomenAlliance #MahilaVirodhiCongress1
- Post by Reporter Rajkumar Sain Dholpur Rajasthan1
- आगरा में दीवानी परिसर के सामने खड़ी कर में अचानक 1 मिनट बाद ही आग लग गई मौके पर आज को देखकर के बदले मच गई कर के आसपास और भी वहां खड़ी नजर आए देखते ही देखते आग बेकाबू हो गई और अपनी आगोश मैं ले लिया और अन्य सामान को भी अपनी आगोश में ले लिया1
- खैरागढ़ कस्बे में जाम का जाम बना हुआ है या शादी विवाह को लेकर बाहर से आए मेहमानों एवं गलत ड्राइविंग के कारण लगने वाला जाम बताया जा रहा है जिससे लोगों का तपती धूप में परेशान होते नजर आए1