प्राकृतिक जीवन में अमावस्या और ग्रहण जीवन में चलने वाली निरंतरता है जो मनुष्य के जीवन को भी प्रभावित करती है और किसी न किसी रूप में इस तरह के ग्रहण योग हर तीसरे व्यक्ति में मिलते हैं पर मार्गदर्शक एक सच्चा गुरु होता है जिस तरह प्रकृति संतुलन पर आधारित होती है उसी तरह मनुष्य के जीवन को गुरु संतुलित कर देता है। आज मैं बात कर रहा हूं मंडावा के गणेश जी महाराज की... जिनका जीवन परिचय इस प्रकार है। 22 अक्टूबर 1981 लक्ष्मणगढ़ रघुनाथ हॉस्पिटल में जन्म से 12 महीने पूर्व संत श्री परमानंद जी महाराज हॉस्पिटल पधारे थे जिनकी सेवा से आशीर्वाद स्वरूप गणेश महाराज जी का जन्म हुआ और साथ में ही भविष्यवाणी कर दी गई कि यह बालक बीस साल बाद ब्रह्मचारी बनकर पूरी प्रकृति का पुत्र बन जाएगा अर्थात सन्यास ही इसका कर्म होगा । कुछ वर्षों बाद लक्ष्मणगढ़ से नवलगढ़ महाराज जी के पिताजी का ट्रांसफर हो गया हॉस्पिटल लैबोरेट्री खून जांच x-ray operation theater मैं कई वर्षों तक कार्यरत रहते हुए नवलगढ़ रहे। जहां महाराज जी की पढ़ाई लिखाई सरकारी स्कूल पांचवी कक्षा तक पहुंची।प्रतिदिन छोटे बच्चों को साथ लेकर हनुमान चालीसा का पाठ महाराज स्वयं करते थे मंदिर में बैठकर गणेशपुरा में सूर्य मंडल के पास बालाजी का मंदिर जो महाराज जी के पिताजी ने ही बनाया था। एक बार फुटबॉल मैदान सूर्य मंडल नवलगढ़ में एक पहलवान के फुटबॉल पर स्टॉक करने पर फुटबॉल सीधा सीना पर आ लगा जिससे मूर्छित हो गए वही महाराज जी के दो बड़े भाई फुटबॉल खेल रहे थे उन्होंने बहुत प्रयास किए अंत में बाबा रामदेव जी महाराज के मंदिर में लाकर सुला दिया जहां आरती की घंटी के साथ ही चेतना आ गई और भभूति और जल पिलाया गया तब महाराज जी की आस्था ने पूर्ण आध्यात्मिक आस्था का रूप ले लिया। दुर्घटना वश जन्मदातरी माता का देहावसान होने पर पिताजी ने बालक की रक्षा करने के लिए दूसरा विवाह किया श्रीमती रतन देवी जो रामगढ़ शेखावाटी की मूल निवासी थी माता के रूप में महाराज जी को मिली जो कि सुर्य भगवान की उपासक है और आज भी नियमित सुंदरकांड करती है और जिनके आशीर्वाद से महाराज जी के संस्कार और सुदृढ़ होते चले गए। तत्पश्चात फतेहपुर में महाराज जी के पिताजी का ट्रांसफर हो गया जहां शिव मंदिर बावड़ी गेट पर स्थित हैं जिसमें केडिया धर्मशाला के नाम से अतिथि गृह चलता था उसमें प्रतिदिन पूजा नित्य कर्म करते हुए गृह त्याग कर बाल महाराज रहने लगे और सेठ जी बड़े प्रसन्न रहने लगे कि भगवान भोलेनाथ की अच्छी सेवा हो रही है और सेठजी ने प्रस्ताव रखा कि आप यही मैनेजर के रूप में भगवान की सेवा धारण करो तब ब्रह्मशक्ति में रत बालक महाराज ने कहा कि महादेव की सेवा करेंगे और बस केवल यही रहेंगे पर तनख्वाह नहीं लेंगे और महाराज अपने अध्ययन मे संस्कृत स्नातक तक लगे रहे और साथ ही कपड़ों का व्यापार भी करने लगे ताकि वे अपने सेवा कार्य को अपने श्रम के बल पर करें और अपने साथी विद्यार्थियों की हमेशा मदद करते किताब कॉपी कपड़े घरेलू सामान सभी व्यवस्थाएं जिम्मेदार की तरह निभाते थे। महाराज जी के पिताजी ने पहली बार फतेहपुर में दुर्गा पूजा कार्यक्रम शुरू किया जिसने आज विशाल रूप ले लिया और आज फतेहपुर में कम से कम 15 जगह दुर्गा पूजा पंडाल के रूप में विशाल कार्यक्रम होते हैं पिताजी ने जिस फोटो से दुर्गा पूजा घर में करते थे प्रतिवर्ष, गुप्त नवरात्र में वही फोटो केडिया अतिथि गृह में शिवालय में स्थापना करी और प्रथम दुर्गा पूजा शिवालय में करना शुरू किया जो आगजनी की घटना के बाद भी उसी तस्वीर के साथ नियमित रही। प्रतिदिन महाराज जी झांकी निकालते थे कभी राम बनते कभी इंद्र बने समुद्र मंथन की झांकी कभी भगत सिंह बने फांसी खाई....एक तरह से हिन्दुत्व ही जेहन मे बस गया और इसी क्रम में एक अखबार में आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरी के दस प्रश्नों ने जीवन की दिशा बदल दी। महाराज जी ने संस्कृत साहित्य पढ़ने के साथ गुणा भी था इसलिए अपने गुरुजी के माध्यम से वेदांत नाम की पुस्तक पुस्तकालय से प्राप्त की और प्रश्नोत्तर के जवाब लिखें जिसे देखकर स्वामी माधवानंद जी महाराज बड़े प्रसन्न होकर हिमाचल धर्मशाला में चिन्मय मिशन की जहां स्थापना है वहां से यात्रा कर जयपुर आए और महाराज जी के पिताजी से कहा हम आपके बालक को अपना शिष्य बनाना चाहते हैं और यहीं से वेदांत की शिक्षा प्रारंभ हो गई। गुरूजी ने कहा कि ब्रह्मचारी गणेश चैतन्य यदि वास्तव में इस वेदांत की पढ़ाई को जीवन में उतरना चाहते हो तो हरिद्वार वैराग्य बांध संतों के साथ कुछ दिन सत्संग जरूर करो तत्पश्चात महाराज जी साधना सदन हरिद्वार चले गए जहां संत श्री त्याग मूर्ति गणेश आनंद पुरी जी महाराज का दर्शन किया और उनके कहने से राजस्थान के संत रामसुखदास जी महाराज का दर्शन करे और साथ मे सानिध्य रहा गुरु भाई मधुर चैतन्य जी का। तत्पश्चात श्री रामसुखदास जी महाराज ने साधना सदन से आए जानकर कहा कि दिव्यानंद जी महाराज 10 नंबर कुटिया में रहते हैं गंगा जी किनारे और उनसे विद्या का आशीर्वाद मांगो तब दोनों गुरु भाई चल दिए और संस्कृति दयानंद जी महाराज ने कुटिया में रहने के लिए व्यवस्था दी और 12 महीने तक भगवान शंकराचार्य जी महाराज की विशेष रचना पंचद्शी का अध्ययन कराना शुरू किया। बड़े मनोयोग से अध्ययन अध्यापन पूर्ण होने पर उन्होंने कहा अभी तुम दो नंबर कुटिया मैं रहने वाले दंडी स्वामी हंसानंद सरस्वती जी महाराज के दर्शन हुए गुरु जी ने अपने कमरे में बुलाकर कहा कि सारी किताबें जमा कर दो केवल दो जोड़ी वस्त्र अपने साथ रखो प्रतिदिन गंगा किनारे कथा सुनो गुरुजी प्रतिदिन गंगा किनारे शाम को 1 घंटा कथा करते थे 12 महीने तक वही महाराज का यही नित्य कर्म था कथा सुना और उसे पूरी कथा को वैसा का वैसा लिखित में कर देना 12 महीने में 10 पुस्तक गुरु जी ने महाराज जी के नाम से छापने के लिए कह दिया और आशीर्वाद देकर कहां इस पुस्तक में पहली पुस्तक का नाम""मृत्यु के उस पार होगा"और लेखक ब्रह्मचारी गणेश चैतन्य होगा पर गणेश जी महाराज का सविनय निवेदन था कि गुरुजी सभी पुस्तक आपका नाम से ही छपेगी बस आपने जो अध्ययन कराया आशीर्वाद दिया हमें वही बहुत है। तब प्रसन्न होकर उन्होंने कहा गंगा जी के उस पार कैलाश आश्रम जाओ जहां राजस्थान के संत आचार्य महामंडलेश्वर है उनका आशीर्वाद लेना तब हम दोनों गुरु भाई आशीर्वाद लेने गए तो संतश्री मैं हम दोनों को अपने पास ही रखने का आदेश दे दिया और पूरे आश्रम की व्यवस्था दे दी सुबह 4:00 बजे गंगा आरती भगवान भोलेनाथ का प्रतिदिन अभिषेक रुद्री पाठ के साथ प्रतिदिन भंडारा में सभी को देखना व्यवस्थाएं करना सभी जिम्मेदारियां दे दी। एक दिन उन्होंने पता नहीं क्यों एक परीक्षा ली ली जिसमें महाराज उत्तीर्ण हो गए तो उन्होंने विदा कर कहा अब वापस हरिद्वार साधना सदन चले जाओ जहां त्याग मूर्ति जी आपको गुरु दीक्षा देंगे दोनों गुरु भाई वापस हरिद्वार आ गए और ब्रह्म सूत्र का अध्ययन करना शुरू कर दिया हमारे वापस आने से पहले गुरु जी ने संत श्री आचार्य महामंडलेश्वर विश्वात्मानंद पुरी जी महाराज को अपना शिष्य उत्तराधिकार दे दिया और महाराज जी को कहा कि अब इन्हीं से उज्जैन के कुंभ मेले में दीक्षा ले लो अपने माता-पिता को जरूर बुलाना कुंभ के मेले में तब तक हमें भी दीक्षा लेने का पक्का मन हो गया था तो उनके पिताजी की भी आज्ञा हुई। तब हमारी ब्रह्मचारी से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा हुई एक दिन महाराज जी की भागवत कथा सुनने की इच्छा हुई तो गुरु जी ने कहा किसी और से नहीं सुनो खुद करो आपको अच्छे से वेदांत आता है आपसे अच्छी भागवत कथा कोई नहीं कर सकता तब से लेकर आज तक महाराज जी ने 21 भागवत कथा लगभग भारतवर्ष में करी। आगे के क्रम मे गुरुजी ने आशीर्वाद देकर अपने पिताजी की सेवा करने के लिए महाराज जी को वापस घर भेज दिया गया इस आदेश के साथ कि जब तक पिताजी ना कहे तब तक वापस मत आना और महाराज वापस फतेहपुर आ गए और पिताजी की सेवा करने लगे और रहने के लिए पिताजी ने गांगियासर गांव फतेहपुर में आश्रम बनवा दिया । प्रति दो-तीन दिन से पिताजी को स्वास्थ्य देखने चले जाते और सामाजिक कार्यक्रम करते रहते फिर फतेहपुर से मंडावा आ गए। जिसके बाद झुंझुनू जिला षडदर्शन अखाड़ा मंडल समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए जिसको आज 8 वर्ष हो गए लेकिन सबकी संतों की प्रसन्नता आशीर्वाद से पांचवें वर्ष में बिना चुनाव अनवरत अध्यक्ष रहने का आशीर्वाद मिला। संत योगी आदित्यनाथ जी महाराज की स्थापित हिंदू वाहिनी के मंडावा ब्लॉक अध्यक्ष का पद भी प्राप्त हुआ। इसी बीच ब्राह्मण महासभा के झुंझुनू कार्यकारिणी के सभी पदाधिकारी के प्रसन्नता के कारण मंडावा ब्राह्मण महासभा अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया । हरिद्वार से संचालित सर्व दर्शन अखाड़ा में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति मिली आदेश मिला सभी संतों का नई कार्यकारिणी बनाओ और संत समाज को नई दिशा दो। किसी भी संत को कोई भी परेशानी हो या धर्म के हानि होती दिखे तो उनकी सहायता करो सनातन धर्म को प्रचारित प्रसारित करो।आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के सभी कार्यक्रमों में विशेष सम्मानित रूप से बुलाए जाने लगा और प्रदेश कार्यकारिणी में पद नियुक्त हुआसाथ ही अंतर्राष्ट्रीय हिंदू परिषद जिला झुंझुनू के पदाधिकारीयो ने झुंझुनू जिला धर्माचार्य का पदवी दे दिया.... और महाराज आज भी अपने सनातन धर्म से जुड़े हुए देश विदेश के शिष्यों की सहायता आज भी आध्यात्मिक रूप से करते हैं। और मैं राकेश अग्रवाल इन्हें प्रणाम करता हूँ।
प्राकृतिक जीवन में अमावस्या और ग्रहण जीवन में चलने वाली निरंतरता है जो मनुष्य के जीवन को भी प्रभावित करती है और किसी न किसी रूप में इस तरह के ग्रहण योग हर तीसरे व्यक्ति में मिलते हैं पर मार्गदर्शक एक सच्चा गुरु होता है जिस तरह प्रकृति संतुलन पर आधारित होती है उसी तरह मनुष्य के जीवन को गुरु संतुलित कर देता है। आज मैं बात कर रहा हूं मंडावा के गणेश जी महाराज की... जिनका जीवन परिचय इस प्रकार है। 22 अक्टूबर 1981 लक्ष्मणगढ़ रघुनाथ हॉस्पिटल में जन्म से 12 महीने पूर्व संत श्री परमानंद जी महाराज हॉस्पिटल पधारे थे जिनकी सेवा से आशीर्वाद स्वरूप गणेश महाराज जी का जन्म हुआ और साथ में ही भविष्यवाणी कर दी गई कि यह बालक बीस साल बाद ब्रह्मचारी बनकर पूरी प्रकृति का पुत्र बन जाएगा अर्थात सन्यास ही इसका कर्म होगा । कुछ वर्षों बाद लक्ष्मणगढ़ से नवलगढ़ महाराज जी के पिताजी का ट्रांसफर हो गया हॉस्पिटल लैबोरेट्री खून जांच x-ray operation theater मैं कई वर्षों तक कार्यरत रहते हुए नवलगढ़ रहे। जहां महाराज जी की पढ़ाई लिखाई सरकारी स्कूल पांचवी कक्षा तक पहुंची।प्रतिदिन छोटे बच्चों को साथ लेकर हनुमान चालीसा का पाठ महाराज स्वयं करते थे मंदिर में बैठकर गणेशपुरा में सूर्य मंडल के पास बालाजी का मंदिर जो महाराज जी के पिताजी ने ही बनाया था। एक बार फुटबॉल मैदान सूर्य मंडल नवलगढ़ में एक पहलवान के फुटबॉल पर स्टॉक करने पर फुटबॉल सीधा सीना पर आ लगा जिससे मूर्छित हो गए वही महाराज जी के दो बड़े भाई फुटबॉल खेल रहे थे उन्होंने बहुत प्रयास किए अंत में बाबा रामदेव जी महाराज के मंदिर में लाकर सुला दिया जहां आरती की घंटी के साथ ही चेतना आ गई और भभूति और जल पिलाया गया तब महाराज जी की आस्था ने पूर्ण आध्यात्मिक आस्था का रूप ले लिया। दुर्घटना वश जन्मदातरी माता का देहावसान होने पर पिताजी ने बालक की रक्षा करने के लिए दूसरा विवाह किया श्रीमती रतन देवी जो रामगढ़ शेखावाटी की मूल निवासी थी माता के रूप में महाराज जी को मिली जो कि सुर्य भगवान की उपासक है और आज भी नियमित सुंदरकांड करती है और जिनके आशीर्वाद से महाराज जी के संस्कार और सुदृढ़ होते चले गए। तत्पश्चात फतेहपुर में महाराज जी के पिताजी का ट्रांसफर हो गया जहां शिव मंदिर बावड़ी गेट पर स्थित हैं जिसमें केडिया धर्मशाला के नाम से अतिथि गृह चलता था उसमें प्रतिदिन पूजा नित्य कर्म करते हुए गृह त्याग कर बाल महाराज रहने लगे और सेठ जी बड़े प्रसन्न रहने लगे कि भगवान भोलेनाथ की अच्छी सेवा हो रही है और सेठजी ने प्रस्ताव रखा कि आप यही मैनेजर के रूप में भगवान की सेवा धारण करो तब ब्रह्मशक्ति में रत बालक महाराज ने कहा कि महादेव की सेवा करेंगे और बस केवल यही रहेंगे पर तनख्वाह नहीं लेंगे और महाराज अपने अध्ययन मे संस्कृत स्नातक तक लगे रहे और साथ ही कपड़ों का व्यापार भी करने लगे ताकि वे अपने सेवा कार्य को अपने श्रम के बल पर करें और अपने साथी विद्यार्थियों की हमेशा मदद करते किताब कॉपी कपड़े घरेलू सामान सभी व्यवस्थाएं जिम्मेदार की तरह निभाते थे। महाराज जी के पिताजी ने पहली बार फतेहपुर में दुर्गा पूजा कार्यक्रम शुरू किया जिसने आज विशाल रूप ले लिया और आज फतेहपुर में कम से कम 15 जगह दुर्गा पूजा पंडाल के रूप में विशाल कार्यक्रम होते हैं पिताजी ने जिस फोटो से दुर्गा पूजा घर में करते थे प्रतिवर्ष, गुप्त नवरात्र में वही फोटो केडिया अतिथि गृह में शिवालय में स्थापना करी और प्रथम दुर्गा पूजा शिवालय में करना शुरू किया जो आगजनी की घटना के बाद भी उसी तस्वीर के साथ नियमित रही। प्रतिदिन महाराज जी झांकी निकालते थे कभी राम बनते कभी इंद्र बने समुद्र मंथन की झांकी कभी भगत सिंह बने फांसी खाई....एक तरह से हिन्दुत्व ही जेहन मे बस गया और इसी क्रम में एक अखबार में आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरी के दस प्रश्नों ने जीवन की दिशा बदल दी। महाराज जी ने संस्कृत साहित्य पढ़ने के साथ गुणा भी था इसलिए अपने गुरुजी के माध्यम से वेदांत नाम की पुस्तक पुस्तकालय से प्राप्त की और प्रश्नोत्तर के जवाब लिखें जिसे देखकर स्वामी माधवानंद जी महाराज बड़े प्रसन्न होकर हिमाचल धर्मशाला में चिन्मय मिशन की जहां स्थापना है वहां से यात्रा कर जयपुर आए और महाराज जी के पिताजी से कहा हम आपके बालक को अपना शिष्य बनाना चाहते हैं और यहीं से वेदांत की शिक्षा प्रारंभ हो गई। गुरूजी ने कहा कि ब्रह्मचारी गणेश चैतन्य यदि वास्तव में इस वेदांत की पढ़ाई को जीवन में उतरना चाहते हो तो हरिद्वार वैराग्य बांध संतों के साथ कुछ दिन सत्संग जरूर करो तत्पश्चात महाराज जी साधना सदन हरिद्वार चले गए जहां संत श्री त्याग मूर्ति गणेश आनंद पुरी जी महाराज का दर्शन किया और उनके कहने से राजस्थान के संत रामसुखदास जी महाराज का दर्शन करे और साथ मे सानिध्य रहा गुरु भाई मधुर चैतन्य जी का। तत्पश्चात श्री रामसुखदास जी महाराज ने साधना सदन से आए जानकर कहा कि दिव्यानंद जी महाराज 10 नंबर कुटिया में रहते हैं गंगा जी किनारे और उनसे विद्या का आशीर्वाद मांगो तब दोनों गुरु भाई चल दिए और संस्कृति दयानंद जी महाराज ने कुटिया में रहने के लिए व्यवस्था दी और 12 महीने तक भगवान शंकराचार्य जी महाराज की विशेष रचना पंचद्शी का अध्ययन कराना शुरू किया। बड़े मनोयोग से अध्ययन अध्यापन पूर्ण होने पर उन्होंने कहा अभी तुम दो नंबर कुटिया मैं रहने वाले दंडी स्वामी हंसानंद सरस्वती जी महाराज के दर्शन हुए गुरु जी ने अपने कमरे में बुलाकर कहा कि सारी किताबें जमा कर दो केवल दो जोड़ी वस्त्र अपने साथ रखो प्रतिदिन गंगा किनारे कथा सुनो गुरुजी प्रतिदिन गंगा किनारे शाम को 1 घंटा कथा करते थे 12 महीने तक वही महाराज का यही नित्य कर्म था कथा सुना और उसे पूरी कथा को वैसा का वैसा लिखित में कर देना 12 महीने में 10 पुस्तक गुरु जी ने महाराज जी के नाम से छापने के लिए कह दिया और आशीर्वाद देकर कहां इस पुस्तक में पहली पुस्तक का नाम""मृत्यु के उस पार होगा"और लेखक ब्रह्मचारी गणेश चैतन्य होगा पर गणेश जी महाराज का सविनय निवेदन था कि गुरुजी सभी पुस्तक आपका नाम से ही छपेगी बस आपने जो अध्ययन कराया आशीर्वाद दिया हमें वही बहुत है। तब प्रसन्न होकर उन्होंने कहा गंगा जी के उस पार कैलाश आश्रम जाओ जहां राजस्थान के संत आचार्य महामंडलेश्वर है उनका आशीर्वाद लेना तब हम दोनों गुरु भाई आशीर्वाद लेने गए तो संतश्री मैं हम दोनों को अपने पास ही रखने का आदेश दे दिया और पूरे आश्रम की व्यवस्था दे दी सुबह 4:00 बजे गंगा आरती भगवान भोलेनाथ का प्रतिदिन अभिषेक रुद्री पाठ के साथ प्रतिदिन भंडारा में सभी को देखना व्यवस्थाएं करना सभी जिम्मेदारियां दे दी। एक दिन उन्होंने पता नहीं क्यों एक परीक्षा ली ली जिसमें महाराज उत्तीर्ण हो गए तो उन्होंने विदा कर कहा अब वापस हरिद्वार साधना सदन चले जाओ जहां त्याग मूर्ति जी आपको गुरु दीक्षा देंगे दोनों गुरु भाई वापस हरिद्वार आ गए और ब्रह्म सूत्र का अध्ययन करना शुरू कर दिया हमारे वापस आने से पहले गुरु जी ने संत श्री आचार्य महामंडलेश्वर विश्वात्मानंद पुरी जी महाराज को अपना शिष्य उत्तराधिकार दे दिया और महाराज जी को कहा कि अब इन्हीं से उज्जैन के कुंभ मेले में दीक्षा ले लो अपने माता-पिता को जरूर बुलाना कुंभ के मेले में तब तक हमें भी दीक्षा लेने का पक्का मन हो गया था तो उनके पिताजी की भी आज्ञा हुई। तब हमारी ब्रह्मचारी से नैष्ठिक ब्रह्मचारी की दीक्षा हुई एक दिन महाराज जी की भागवत कथा सुनने की इच्छा हुई तो गुरु जी ने कहा किसी और से नहीं सुनो खुद करो आपको अच्छे से वेदांत आता है आपसे अच्छी भागवत कथा कोई नहीं कर सकता तब से लेकर आज तक महाराज जी ने 21 भागवत कथा लगभग भारतवर्ष में करी। आगे के क्रम मे गुरुजी ने आशीर्वाद देकर अपने पिताजी की सेवा करने के लिए महाराज जी को वापस घर भेज दिया गया इस आदेश के साथ कि जब तक पिताजी ना कहे तब तक वापस मत आना और महाराज वापस फतेहपुर आ गए और पिताजी की सेवा करने लगे और रहने के लिए पिताजी ने गांगियासर गांव फतेहपुर में आश्रम बनवा दिया । प्रति दो-तीन दिन से पिताजी को स्वास्थ्य देखने चले जाते और सामाजिक कार्यक्रम करते रहते फिर फतेहपुर से मंडावा आ गए। जिसके बाद झुंझुनू जिला षडदर्शन अखाड़ा मंडल समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए जिसको आज 8 वर्ष हो गए लेकिन सबकी संतों की प्रसन्नता आशीर्वाद से पांचवें वर्ष में बिना चुनाव अनवरत अध्यक्ष रहने का आशीर्वाद मिला। संत योगी आदित्यनाथ जी महाराज की स्थापित हिंदू वाहिनी के मंडावा ब्लॉक अध्यक्ष का पद भी प्राप्त हुआ। इसी बीच ब्राह्मण महासभा के झुंझुनू कार्यकारिणी के सभी पदाधिकारी के प्रसन्नता के कारण मंडावा ब्राह्मण महासभा अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया । हरिद्वार से संचालित सर्व दर्शन अखाड़ा में प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति मिली आदेश मिला सभी संतों का नई कार्यकारिणी बनाओ और संत समाज को नई दिशा दो। किसी भी संत को कोई भी परेशानी हो या धर्म के हानि होती दिखे तो उनकी सहायता करो सनातन धर्म को प्रचारित प्रसारित करो।आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के सभी कार्यक्रमों में विशेष सम्मानित रूप से बुलाए जाने लगा और प्रदेश कार्यकारिणी में पद नियुक्त हुआसाथ ही अंतर्राष्ट्रीय हिंदू परिषद जिला झुंझुनू के पदाधिकारीयो ने झुंझुनू जिला धर्माचार्य का पदवी दे दिया.... और महाराज आज भी अपने सनातन धर्म से जुड़े हुए देश विदेश के शिष्यों की सहायता आज भी आध्यात्मिक रूप से करते हैं। और मैं राकेश अग्रवाल इन्हें प्रणाम करता हूँ।
- Post by Amit Sharma1
- पवन–कौशल्या पुजारी की स्वर्णिम वैवाहिक वर्षगांठ उल्लासपूर्वक के साथ मनाई, झुंझुनू, नगर परिषद के पूर्व उपसभापति एवं समाजसेवी पवन पुजारी तथा उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या पुजारी की 50वीं वैवाहिक वर्षगांठ सोमवार, 16 फरवरी को हमीरी रोड स्थित कृष्णा गेस्ट हाउस में श्रद्धा, उत्साह और पारिवारिक गरिमा के साथ मनाई गई। समारोह चंचलनाथजी टीले के पीठाधीश्वर संत ओमनाथजी महाराज के सानिध्य में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत पुजारी दंपत्ति की आकर्षक एंट्री से हुई। परिवारजनों ने पारंपरिक स्वागत के साथ उन्हें मंच तक पहुँचाया। मंच पर दंपत्ति ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाकर तथा केक काटकर स्वर्णिम वैवाहिक जीवन की खुशियाँ साझा कीं। उपस्थित जनों ने पुष्पवर्षा कर दंपत्ति को शुभाशीष प्रदान किए। समारोह में सामाजिक, धार्मिक एवं प्रशासनिक क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। पशुपति शर्मा, कार्तिकेय शर्मा, पूजा शर्मा, इंदौर से विष्णु शर्मा, दीपिका शर्मा, शिवचरण पुरोहित, उमाशंकर मंहमिया, डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा, एडवोकेट आलोक गौड़, नगर परिषद के पूर्व सभापति खालिद दुसेन, तैयब अली, रामनारायण कुमावत, देवेन्द्र खत्री, मनोहर धूपिया, शिवचरण हलवाई सहित बड़ी संख्या में शहरवासियों ने उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम का संचालन अरविंद पुजारी एवं डॉ. प्रदीप शर्मा ने संयोजन एवं सुस्पष्ट प्रस्तुति के साथ किया। आगंतुक अतिथियों का स्वागत एवं आतिथ्य जयप्रकाश पुजारी, आनंद पुजारी सहित संपूर्ण पुजारी परिवार ने किया। इस अवसर पर श्री गोपाल गोशाला के अध्यक्ष प्रमोद खण्डेलिया, मंत्री प्रदीप पाटोदिया, निवर्तमान मंत्री नेम्मी अग्रवाल, श्री श्याम आशीर्वाद सेवा संस्था के ट्रस्टी डॉ. डी.एन. तुलस्यान , संदीप केडिया ने पुजारी दंपत्ति को बधाई संदेश, स्मृति-चिन्ह एवं साफा पहनाकर सम्मानित किया। वक्ताओं ने दंपत्ति के सामाजिक योगदान, पारिवारिक संस्कारों और समाजसेवा के प्रति समर्पण की सराहना करते हुए उन्हें दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन की शुभकामनाएँ दीं। समारोह के समापन पर स्वरुचि भोज का आयोजन किया गया, जिसमें सभी अतिथियों ने पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लिया। इसके पश्चात नागौरी पार्टी द्वारा प्रस्तुत होली की धमाल एवं रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम ने वातावरण को उत्सवी बना दिया। देर रात तक चले गीत-संगीत एवं नृत्य कार्यक्रम का उपस्थित जनों ने भरपूर लुत्फ उठाया। उल्लेखनीय है कि पवन पुजारी एवं कौशल्या पुजारी का वैवाहिक जीवन समाजसेवा, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक समरसता का प्रेरक उदाहरण माना जाता है। उनकी स्वर्ण जयंती समारोह ने शहर में पारिवारिक उत्सवों की गरिमा और परंपरा का सुंदर संदेश दिया।1
- Post by Suresh saini2
- Post by नेहरु वाल्मिकी1
- *किन्नर समाज में बढ़ा टकराव,अब विवाद ले सकता है बड़ा रूप* सीकर से एक ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने किन्नर समाज के भीतर गहरी दरार की आशंका को जन्म दे दिया है. दो गुटों के बीच शुरू हुआ टकराव अब खुली लड़ाई का रूप लेता दिखाई दे रहा है, और आने वाले दिनों में इसके और भड़कने की संभावना जताई जा रही है. बताया जा रहा है कि इस झगड़े में सिर्फ आपसी वर्चस्व की लड़ाई ही नहीं, बल्कि साम्प्रदायिक रंग भी जुड़ गया है, जिससे मामला और संवेदनशील बन गया है. किन्नर समाज, जो अब तक अपनी एकजुटता के लिए जाना जाता रहा है, अब अंदरूनी खेमेबाज़ी और आरोप-प्रत्यारोप के दौर से गुजर रहा है. मामले ने उस वक्त नया मोड़ लिया, जब किन्नर समाज की सदस्य माही शेखावत को सरे बाजार कथित रूप से पीटने की घटना सामने आई. इस घटना के बाद माही ने खुलकर मोर्चा संभाल लिया है. उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए न सिर्फ घटना की जानकारी दी, बल्कि आने वाले दिनों में अपनी रणनीति का भी खुलासा किया. इस विवाद में अब किन्नर समाज की चर्चित हस्तियां भी खुलकर सामने आने लगी हैं। प्रसिद्ध डांसर लक्की “उड़ान” ने माही शेखावत के समर्थन में आवाज उठाई है, जिससे इस टकराव को और बल मिल गया है. फिलहाल, सीकर से शुरू हुआ यह विवाद अब स्थानीय सीमाओं से बाहर निकलकर देशव्यापी चर्चा का विषय बनता जा रहा है. किन्नर समाज के भीतर बढ़ती इस खाई का असर आने वाले समय में और व्यापक रूप ले सकता है. सभी की नजर अब इस बात पर टिकी है कि यह विवाद बातचीत से सुलझेगा या फिर और बड़ा रूप लेगा.1
- Post by Pandit Munna Lal Bhargav1
- Post by Dinesh rulan1
- झुंझुनूं मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. राकेश साबू के रवैये से आहत सेवारत चिकित्सकों ने जिलेभर में एकजुटता दिखाते हुए काली पट्टी बांधकर विरोध प्रदर्शन किया। अरिसदा के आह्वान पर करीब 400 चिकित्सकों ने छह माह में छह चिकित्सकों को बर्खास्त किए जाने के विरोध में आंदोलन शुरू किया। जिले के सबसे बड़े राजकीय बीडीके अस्पताल सहित विभिन्न पीएचसी, सीएचसी, उपजिला एवं जिला अस्पतालों के चिकित्सकों ने मुख्य द्वार पर प्रदर्शन कर जीबीएम आयोजित की। बैठक में निर्णय लिया गया कि कार्रवाई वापस नहीं होने तक विरोध जारी रहेगा तथा 20 तारीख से प्रतिदिन दो घंटे का कार्य बहिष्कार किया जाएगा। हालांकि आपातकालीन सेवाएं जारी रहेंगी। अरिसदा पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि बिना अतिरिक्त मानदेय के शिक्षण कार्य कर रहे चिकित्सकों को बर्खास्त करना तानाशाहीपूर्ण कदम है। साथ ही राज्यव्यापी आंदोलन की रूपरेखा पर भी चर्चा की गई। जिले के मलसीसर, सूरजगढ़, सुल्ताना व नवलगढ़ सहित कई स्थानों पर चिकित्सकों ने काली पट्टी बांधकर विरोध जताया।1