लोकतंत्र का महान तमाशा: सवाल पूछने की सजा और भाषणों की आज़ादी लोकतंत्र को अक्सर “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन” कहा जाता है। लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि इस वाक्य का वास्तविक अर्थ बदलकर कुछ और ही हो गया है—“जनता का वोट, नेताओं का शासन और जनता की चुप्पी”। आज का लोकतंत्र एक अद्भुत मंच बन चुका है, जहाँ नियम सबके लिए समान बताए जाते हैं, लेकिन लागू कुछ अलग-अलग तरीकों से होते हैं। --- विरोध का अधिकार और प्रोटोकॉल का चमत्कार अगर कोई आम नागरिक सड़कों पर उतरकर अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करे, तो प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया अक्सर व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर लाठीचार्ज या कड़ी कार्रवाई होती है। लेकिन जब बड़े नेता अपनी रैलियों के साथ सड़कों को जाम कर देते हैं और शहर का ट्रैफिक घंटों रुक जाता है, तो उसे “प्रोटोकॉल” कहा जाता है। और अगर किसान अपने अधिकारों की बात करने सड़क पर आ जाएँ, तो कभी-कभी उन्हें “व्यवस्था विरोधी” या “देशहित के खिलाफ” जैसे गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ता है। लेकिन राजनीतिक रैलियों से जब पूरे शहर की सड़कें जाम हो जाएँ, तब वही दृश्य अचानक “जन समर्थन” का प्रमाण बन जाता है। --- लोकतंत्र के रक्षक और परिवारवाद की परंपरा राजनीतिक मंचों से लोकतंत्र के महत्व पर लंबे-लंबे भाषण दिए जाते हैं। नेता खुद को लोकतंत्र का प्रहरी बताते हैं, उसके स्तंभ बताते हैं, उसके रक्षक बताते हैं। लेकिन जब चुनाव की बारी आती है तो टिकट अक्सर उन्हीं परिवारों में घूमते रहते हैं। ऐसा लगता है कि लोकतंत्र एक खुली प्रतियोगिता कम और पारिवारिक विरासत ज्यादा बन गया है। नए और योग्य लोगों के लिए राजनीति में प्रवेश के दरवाजे उतने खुले नहीं दिखते जितने भाषणों में दिखाई देते हैं। --- निगरानी का लोकतंत्र सड़क पर एक आम नागरिक सिग्नल तोड़ दे तो सीसीटीवी कैमरे तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। जुर्माना भी तुरंत लग जाता है। लेकिन वही कैमरे पुलिस थानों, सरकारी दफ्तरों या नेताओं के कार्यालयों में उतनी सक्रियता से दिखाई नहीं देते। ऐसा लगता है कि पारदर्शिता की तकनीक आम नागरिकों के लिए है, सत्ता के गलियारों के लिए नहीं। --- सरकारी सेवाएँ और निजी सुविधाएँ सरकारी अस्पतालों में अक्सर डॉक्टरों और सुविधाओं की कमी की शिकायतें सुनने को मिलती हैं। कई सरकारी स्कूलों में इमारतों और शिक्षकों की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण होती है। लेकिन जब उच्च पदों पर बैठे लोगों की बात आती है, तो उनका इलाज अक्सर विदेशों के अस्पतालों में और उनके बच्चों की शिक्षा विदेशी विश्वविद्यालयों में होती दिखाई देती है। इस विरोधाभास को देखकर आम नागरिक के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। --- समाज को बाँटने की राजनीति भारत जैसे विविध समाज में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय पहचान हमेशा से मौजूद रही हैं। लेकिन जब इन पहचानों को राजनीतिक हथियार बना दिया जाता है, तब समाज और अधिक विभाजित हो जाता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि लोगों को वास्तविक समस्याओं—जैसे रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य—से दूर रखने के लिए उन्हें अलग-अलग पहचान के आधार पर बाँटना आसान तरीका बन गया है। इतिहास में औपनिवेशिक शासन के दौरान “फूट डालो और राज करो” की नीति की चर्चा होती रही है। कई आलोचक मानते हैं कि आधुनिक राजनीति में भी कभी-कभी उसी मानसिकता के अंश दिखाई देते हैं। --- कानून और व्यवस्था के दो चेहरे ड्रिंक एंड ड्राइव पर कड़ी सजा और भारी जुर्माना लगाया जाता है—जो सड़क सुरक्षा के लिए जरूरी भी है। लेकिन इसी के साथ कई जगहों पर शराब के नए ठेके भी खुलते दिखाई देते हैं। अगर कोई नागरिक बिजली का बिल समय पर न दे पाए तो उसका कनेक्शन जल्दी काट दिया जाता है। लेकिन बड़े आर्थिक घोटालों के मामलों में अक्सर “जांच जारी है” का बोर्ड लंबे समय तक लगा रहता है। --- सुरक्षा की जांच और गड्ढों का सवाल सड़क सुरक्षा के नाम पर हेलमेट और सीट बेल्ट की जांच की जाती है। यह जरूरी भी है। लेकिन जब सड़कों पर बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई देते हैं, तो नागरिकों को लगता है कि शायद उनकी जांच करने वाली कोई व्यवस्था उतनी सक्रिय नहीं है। कई दुर्घटनाएँ ऐसी स्थितियों में हो जाती हैं जिन्हें बेहतर सड़क रखरखाव से रोका जा सकता था। --- बजट की कमी और प्राथमिकताएँ जब नागरिक बेहतर स्कूल, अस्पताल या सड़क की मांग करते हैं तो अक्सर जवाब मिलता है कि बजट सीमित है। लेकिन राजनीतिक आयोजनों और चुनावी अभियानों में संसाधनों की कमी कम ही दिखाई देती है। यह विरोधाभास भी कई लोगों के मन में प्रश्न पैदा करता है। --- योग्यता का सवाल सरकारी नौकरी पाने के लिए कठिन परीक्षाएँ और योग्यता की लंबी सूची होती है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि योग्य लोग प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाल सकें। लेकिन जब चुनाव लड़ने की बात आती है तो जनप्रतिनिधि बनने के लिए ऐसी स्पष्ट योग्यता या शैक्षिक मानक अक्सर अनिवार्य नहीं होते। इसलिए कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि देश और राज्यों की नीति तय करने वाले पदों के लिए भी न्यूनतम योग्यता पर चर्चा होनी चाहिए या नहीं। --- डिजिटल भारत और कागज़ी वास्तविकता देश में डिजिटल परिवर्तन और नई तकनीकों की बात जोर-शोर से होती है—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप और नवाचार की चर्चा होती है। लेकिन जमीन पर कई सरकारी प्रक्रियाएँ अब भी कागज़ी फॉर्म, लंबी कतारों और “आज सर्वर डाउन है” जैसे वाक्यों के बीच अटकी दिखाई देती हैं। --- स्टार्टअप और रिश्वत की दीवार युवाओं को उद्यमिता और स्टार्टअप शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन जब कोई युवा लाइसेंस या अनुमति लेने सरकारी दफ्तरों में जाता है, तो उसे कभी-कभी जटिल प्रक्रियाओं और अनौपचारिक “खर्चा-पानी” की मांगों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थितियाँ नवाचार की गति को धीमा कर देती हैं। --- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सवालों का डर लोकतंत्र में बोलने और सवाल पूछने की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है। लेकिन कई बार जब नागरिक या कार्यकर्ता सरकार से जवाब मांगते हैं, तो उन पर कठोर आरोप या कानूनी कार्रवाई की खबरें भी सामने आती हैं। इससे यह बहस फिर उठती है कि लोकतंत्र में असहमति को किस सीमा तक स्वीकार किया जाना चाहिए। --- निष्कर्ष लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। यह नागरिकों और शासन के बीच भरोसे का रिश्ता है। जब नागरिक सवाल पूछते हैं तो वे लोकतंत्र को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत कर रहे होते हैं। और जब शासन पारदर्शिता, जवाबदेही और समानता के सिद्धांतों को अपनाता है, तभी लोकतंत्र वास्तव में अपने अर्थ को पूरा करता है। शायद असली सवाल यही है—क्या हम लोकतंत्र को केवल भाषणों में महान बनाए रखना चाहते हैं, या उसे व्यवहार में भी उतना ही मजबूत देखना चाहते हैं | लेखक: तनिष्क नगायच (Author | Policy Thinker | Vision 2047)
लोकतंत्र का महान तमाशा: सवाल पूछने की सजा और भाषणों की आज़ादी लोकतंत्र को अक्सर “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन” कहा जाता है। लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि इस वाक्य का वास्तविक अर्थ बदलकर कुछ और ही हो गया है—“जनता का वोट, नेताओं का शासन और जनता की चुप्पी”। आज का लोकतंत्र एक अद्भुत मंच बन चुका है, जहाँ नियम सबके लिए समान बताए जाते हैं, लेकिन लागू कुछ अलग-अलग तरीकों से होते हैं। --- विरोध का अधिकार और प्रोटोकॉल का चमत्कार अगर कोई आम नागरिक सड़कों पर उतरकर अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करे, तो प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया अक्सर व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर लाठीचार्ज या कड़ी कार्रवाई होती है। लेकिन जब बड़े नेता अपनी रैलियों के साथ सड़कों को जाम कर देते हैं और शहर का ट्रैफिक घंटों रुक जाता है, तो उसे “प्रोटोकॉल” कहा जाता है। और अगर किसान अपने अधिकारों की बात करने सड़क पर आ जाएँ, तो कभी-कभी उन्हें “व्यवस्था विरोधी” या “देशहित के खिलाफ” जैसे गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ता है। लेकिन राजनीतिक रैलियों से जब पूरे शहर की सड़कें जाम हो जाएँ, तब वही दृश्य अचानक “जन समर्थन” का प्रमाण बन जाता है। --- लोकतंत्र के रक्षक और परिवारवाद की परंपरा राजनीतिक मंचों से लोकतंत्र के महत्व पर लंबे-लंबे भाषण दिए जाते हैं। नेता खुद को लोकतंत्र का प्रहरी बताते हैं, उसके स्तंभ बताते हैं, उसके रक्षक बताते हैं। लेकिन जब चुनाव की बारी आती है तो टिकट अक्सर उन्हीं परिवारों में घूमते रहते हैं। ऐसा लगता है कि लोकतंत्र एक खुली प्रतियोगिता कम और पारिवारिक विरासत ज्यादा बन गया है। नए और योग्य लोगों के लिए राजनीति में प्रवेश के दरवाजे उतने खुले नहीं दिखते जितने भाषणों में दिखाई देते हैं। --- निगरानी का लोकतंत्र सड़क पर एक आम नागरिक सिग्नल तोड़ दे तो सीसीटीवी कैमरे तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। जुर्माना भी तुरंत लग जाता है। लेकिन वही कैमरे पुलिस थानों, सरकारी दफ्तरों या नेताओं के कार्यालयों में उतनी सक्रियता से दिखाई नहीं देते। ऐसा लगता है कि पारदर्शिता की तकनीक आम नागरिकों के लिए है, सत्ता के गलियारों के लिए नहीं। --- सरकारी सेवाएँ और निजी सुविधाएँ सरकारी अस्पतालों में अक्सर डॉक्टरों और सुविधाओं की कमी की शिकायतें सुनने को मिलती हैं। कई सरकारी स्कूलों में इमारतों और शिक्षकों की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण होती है। लेकिन जब उच्च पदों पर बैठे लोगों की बात आती है, तो उनका इलाज अक्सर विदेशों के अस्पतालों में और उनके बच्चों की शिक्षा विदेशी विश्वविद्यालयों में होती दिखाई देती है। इस विरोधाभास को देखकर आम नागरिक के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। --- समाज को बाँटने की राजनीति भारत जैसे विविध समाज में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय पहचान हमेशा से मौजूद रही हैं। लेकिन जब इन पहचानों को राजनीतिक हथियार बना दिया जाता है, तब समाज और अधिक विभाजित हो जाता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि लोगों को वास्तविक समस्याओं—जैसे रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य—से दूर रखने के लिए उन्हें अलग-अलग पहचान के आधार पर बाँटना आसान तरीका बन गया है। इतिहास में औपनिवेशिक शासन के दौरान “फूट डालो और राज करो” की नीति की चर्चा होती रही है। कई आलोचक मानते हैं कि आधुनिक राजनीति में भी कभी-कभी उसी मानसिकता के अंश दिखाई देते हैं। --- कानून और व्यवस्था के दो चेहरे ड्रिंक एंड ड्राइव पर कड़ी सजा और भारी जुर्माना लगाया जाता है—जो सड़क सुरक्षा के लिए जरूरी भी है। लेकिन इसी के साथ कई जगहों पर शराब के नए ठेके भी खुलते दिखाई देते हैं। अगर कोई नागरिक बिजली का बिल समय पर न दे पाए तो उसका कनेक्शन जल्दी काट दिया जाता है। लेकिन बड़े आर्थिक घोटालों के मामलों में अक्सर “जांच जारी है” का बोर्ड लंबे समय तक लगा रहता है। --- सुरक्षा की जांच और गड्ढों का सवाल सड़क सुरक्षा के नाम पर हेलमेट और सीट बेल्ट की जांच की जाती है। यह जरूरी भी है। लेकिन जब सड़कों पर बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई देते हैं, तो नागरिकों को लगता है कि शायद उनकी जांच करने वाली कोई व्यवस्था उतनी सक्रिय नहीं है। कई दुर्घटनाएँ ऐसी स्थितियों में हो जाती हैं जिन्हें बेहतर सड़क रखरखाव से रोका जा सकता था। --- बजट की कमी और प्राथमिकताएँ जब नागरिक बेहतर स्कूल, अस्पताल या सड़क की मांग करते हैं तो अक्सर जवाब मिलता है कि बजट सीमित है। लेकिन राजनीतिक आयोजनों और चुनावी अभियानों में संसाधनों की कमी कम ही दिखाई देती है। यह विरोधाभास भी कई लोगों के मन में प्रश्न पैदा करता है। --- योग्यता का सवाल सरकारी नौकरी पाने के लिए कठिन परीक्षाएँ और योग्यता की लंबी सूची होती है। यह व्यवस्था इसलिए बनाई गई ताकि योग्य लोग प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाल सकें। लेकिन जब चुनाव लड़ने की बात आती है तो जनप्रतिनिधि बनने के लिए ऐसी स्पष्ट योग्यता या शैक्षिक मानक अक्सर अनिवार्य नहीं होते। इसलिए कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि देश और राज्यों की नीति तय करने वाले पदों के लिए भी न्यूनतम योग्यता पर चर्चा होनी चाहिए या नहीं। --- डिजिटल भारत और कागज़ी वास्तविकता देश में डिजिटल परिवर्तन और नई तकनीकों की बात जोर-शोर से होती है—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्टार्टअप और नवाचार की चर्चा होती है। लेकिन जमीन पर कई सरकारी प्रक्रियाएँ अब भी कागज़ी फॉर्म, लंबी कतारों और “आज सर्वर डाउन है” जैसे वाक्यों के बीच अटकी दिखाई देती हैं। --- स्टार्टअप और रिश्वत की दीवार युवाओं को उद्यमिता और स्टार्टअप शुरू करने के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन जब कोई युवा लाइसेंस या अनुमति लेने सरकारी दफ्तरों में जाता है, तो उसे कभी-कभी जटिल प्रक्रियाओं और अनौपचारिक “खर्चा-पानी” की मांगों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थितियाँ नवाचार की गति को धीमा कर देती हैं। --- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सवालों का डर लोकतंत्र में बोलने और सवाल पूछने की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है। लेकिन कई बार जब नागरिक या कार्यकर्ता सरकार से जवाब मांगते हैं, तो उन पर कठोर आरोप या कानूनी कार्रवाई की खबरें भी सामने आती हैं। इससे यह बहस फिर उठती है कि लोकतंत्र में असहमति को किस सीमा तक स्वीकार किया जाना चाहिए। --- निष्कर्ष लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। यह नागरिकों और शासन के बीच भरोसे का रिश्ता है। जब नागरिक सवाल पूछते हैं तो वे लोकतंत्र को कमजोर नहीं बल्कि मजबूत कर रहे होते हैं। और जब शासन पारदर्शिता, जवाबदेही और समानता के सिद्धांतों को अपनाता है, तभी लोकतंत्र वास्तव में अपने अर्थ को पूरा करता है। शायद असली सवाल यही है—क्या हम लोकतंत्र को केवल भाषणों में महान बनाए रखना चाहते हैं, या उसे व्यवहार में भी उतना ही मजबूत देखना चाहते हैं | लेखक: तनिष्क नगायच (Author | Policy Thinker | Vision 2047)
- Post by Sonu Faujdar1
- *रूपबास (भरतपुर)।बच्चों के भविष्य को लेकर जेल गई महिलाए का जेल से बाहर आने पर हुआ भव्य स्वागत* ```रूपवास क्षेत्र के गांव दौरदा मार्ग स्थित शराब गोदाम की आड़ में चल रहे अवैध शराब ठेका के मामले में जेल गई 15 महिलाओं सहित एक व्यक्ति को मिली जमानत, सेवर जेल से सभी रिहा``` जेल गई महिलाओं व एक व्यक्ति को जमानत पर जेल से बाहर आने पर किसान सेना के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेश, संभागीय अध्यक्ष राजेश शर्मा एवं तहसील महिला अध्यक्ष रूबी कुमारी व उनकी पूरी टीम ने महिलाओं का जेल से बाहर आने पर माला पहनाकर भव्य स्वागत किया और कहा कि आपने गांव में शराब बन्दी आंदोलन को जारी रखना बेहद जरूरी है। शराब बंदी से ही बच्चों का भविष्य है।* रुपबास क्षेत्र के भरतपुर धौलपुर नेशनल हाईवे स्थित गांव जरेला के श्री सृष्टि विद्यालय के निकट संचालित शराब गोदाम की आड़ में वर्षों से रिटेल में अवैध रूप शराब बेचने का काम दिन रात चल रहा था। जिससे विद्यालय जाने वाली छात्राएं एवं शौच जाने वाली महिलाएं बेहद परेशान थीं। इतना ही नही उस क्षेत्र में कृषि कार्य करने जाने वाले लोग भी शराबियों से परेशान थे। इस शराब के ठेके पर प्रतिदिन शराबियों का जमावड़ा लगा रहता था। जिसका बीते दिनों जरेला गांव की सैकड़ो महिलाएं एक जुट होकर अवैध शराब ठेके पर शराब बिक्री का केवल विरोध करने पहुंची थीं। जहां अज्ञात कारणों से अचानक ठेके में आग लग गई और उसका आरोप 15 महिलाओं सहित एक व्यक्ति पर शराब कारोबारी द्वारा लगा दिया गया। जिसके चलते पुलिस ने बिना जांच पड़ताल के ही महिलाओं को उक्त मामले का दोषी मानते हुए न्यायालय के आदेश पर जेल भेज दिया था। आज उन महिलाओं की एडीजे कोर्ट बयाना के कैंप कोर्ट रुपबास से जमानत हुई और महिलाओं को कोर्ट के आदेश पर सेवर जेल से रिहा कर दिया गया है। महिलाओं के जेल से बाहर आने पर किसान सेना के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेश , संभागीय अध्यक्ष राजेश शर्मा, तहसील अध्यक्ष रुबी कुमारी , प्रेम सिंह,हरीचरन, सुनील सेठी, अजय पाल आदि व उनकी टीम ने महिलाओं का माला पहनकर जोरदार स्वागत किया और कहा कि शराब आंदोलन को जारी रखें हम आपके साथ हैं। घर पहुंच कर अपने परिवारों के साथ होली मनाई। जेल गई महिलाओं ने प्रण लिया कि अब जरैला व उसके आस-पास शराब की बिक्री नहीं होने देंगे। इसके लिए हमें जो भी करना पड़े करेंगी। इस मौके पर किसान सेना के तमाम कार्यकर्ता व पदाधिकारी एवं सरपंच राजकुमार, रिंकू एवं अन्य गांव वासी मौजूद रहे।1
- रुदावल : थाना रुदावल पुलिस ने गश्त के दौरान एक युवक को अवैध हथियार के साथ गिरफ्तार किया है। एएसआई दाताराम मय जाप्ता ने गश्त के दौरान मुखबिर से सूचना मिली कि नारोली नहर के पास एक व्यक्ति के पास अवैध हथियार हो सकता है। सूचना पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची तो एक युवक पुलिस को देखकर भागने लगा। पुलिस ने पीछा कर उसे पकड़ लिया और नाम-पता पूछा तो उसने अपना नाम मनीष पुत्र मोहनसिंह निवासी करनपुरा थाना रुदावल बताया। तलाशी लेने पर उसके कब्जे से एक अवैध देशी कट्टा 315 बोर तथा दो जिंदा कारतूस बरामद हुए। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ थाना रुदावल में आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही है।1
- आज 10/03/2026 का पंचांग। नदबई भरतपुर से लाइव अपडेट। Follow me Friends 🎉1
- 🎤 नमस्कार… आप देख रहे हैं RPRNEWS TV DIGITAL। मुख्यमंत्री Yogi Adityanath की मां पर दिए गए विवादित बयान को लेकर पूरे प्रदेश में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। इसी कड़ी में Mathura जनपद के थाना Refinery Police Station क्षेत्र में भाजपा नेता Thakur Ramjilal अपने कार्यकर्ताओं के साथ टाउन शिप चौराहे स्थित बाद चौकी पर पहुंचकर आक्रोश व्यक्त करते नजर आए। भाजपा नेता ठाकुर रामजीलाल ने कहा कि मुख्यमंत्री की मां पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले Maulana Abdullah Salim को तुरंत गिरफ्तार किया जाए और ऐसे लोगों पर कठोर व दंडनीय कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने सरकार और पुलिस प्रशासन से मांग करते हुए कहा कि इस तरह के भड़काऊ और अपमानजनक बयान समाज में तनाव पैदा करते हैं, इसलिए दोषियों पर सख्त कार्रवाई बेहद जरूरी है। इस दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी नारेबाजी करते हुए प्रशासन से तत्काल गिरफ्तारी और कड़ी सजा की मांग की। अब देखना होगा कि इस पूरे मामले में पुलिस और प्रशासन क्या कदम उठाता है। 👉 ऐसी ही बड़ी और ताज़ा खबरों के लिए जुड़े रहें RPRNEWS TV DIGITAL के साथ। ---1
- Post by गौ रक्षक सागर चौधरी1
- Post by ATV INDIA HD (Ajeet chauhan)1
- Post by Sonu Faujdar1