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Suresh Chandra Agrawal: सदा जपिये हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे I हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे और हमेशा खुश रहिये Ii हमेशा प्रसन्न रहो 🌹🙏🏾 *।।श्रीकृष्ण।।* *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,* *हे नाथ नारायण वासुदेवाय!!!* सभी कृष्ण भक्तों को सादर दंडवत प्रणाम 🙏🌹 अध्याय 2 श्लोक 7 2 एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनं प्राप्य विमुह्यति | स्थितवास्यमन्तकालेस्पि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति 72 यह आध्यात्मिक एवं ईश्वरीय जीवन का पथ है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता | यदि किसी जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह स्थित हो, तो उसे भगवद्धाम की प्राप्ति होती है | मनुष्य कृष्णभावनामृत या दिव्य जीवन को एक क्षण में प्राप्त कर सकता है और हो सकता है कि उसे लाखों जन्मों के बाद भी कोई प्राप्त न हो | यह तो सत्य संकेत और स्वीकार करने की बात है | खटवांग महाराज ने अपनी मृत्यु के कुछ ही मिनट पहले पूर्व कृष्ण के शरणागत में ऐसा जीवन पाया जो राज्य प्राप्त कर ली | निर्वाण का अर्थ है – भौतिकवादी जीवन शैली का अंत | बौद्ध दर्शन के अनुसार इस भौतिक जीवन के पूर्ण होने पर केवल शून्य शेष रह जाता है, बौद्ध धर्म की शिक्षा भिन्न है | वास्तविक जीवन का शुभारम्भ इस भौतिक जीवन का पूर्ण होना होता है | इस भौतिक जीवन का अंत निश्चित है, इस आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत लोगों के लिए इस जीवन के बाद अन्य जीवन की स्थापना होती है। इस जीवन का अंत से पूर्व यदि कोई कृष्णभावना भावित हो जाये तो उसे ब्रह्म-निर्वाण अवस्था प्राप्त हो जाती है | भगवद्धाम और भगवद्भक्ति के बीच कोई अंतर नहीं है | दोनों चरम पद हैं, मूल रूप से भगवान के दिव्य प्रेमीभक्ति में स्थिर निवास का अर्थ है - भगवद्धाम को प्राप्त करना | भौतिक जगत में इंद्रयतृप्ति विषयक कार्य होते हैं और आध्यात्मिक जगत में कृष्णभावनामृत विषयक | इसी जीवन में ही कृष्णभावनामृत की प्राप्ति होती है और जो कृष्णभावनामृत में स्थित होता है, वह निश्चित रूप से पहले ही भगवद्धाम में प्रवेश कर चुका होता है | ब्रह्म और भौतिक पदार्थ एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं | मूलतः ब्राह्मी-स्थिति का अर्थ है, "भौतिक कार्य के पद पर न होना |" भगवद्गीता में भगवद्भक्ति को मुक्त अवस्था माना गया है (स गुणसमतीतां ब्रह्मभूयाय कल्पते) | मूलतः ब्राह्मी स्थिति भौतिक बंधन से मुक्ति है | श्रील भक्ति विनोद ठाकुर के इस द्वितीय अध्याय को संपूर्ण ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषय के रूप में तैयार किया गया है भगवद्गीता के प्रतिपाद्य हैं - कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग | इस द्वितीय अध्याय में कर्मयोग तथा ज्ञानयोग की स्पष्ट व्याख्या की गयी है एवं भक्तियोग की भी झाँकी दी गयी है | इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय "गीता का सार" की भक्तिवेदांत धारा पूर्ण हुई I कुशल व्यवहार एक राजा था। उसने एक सपना देखा। सपने में उससे एक परोपकारी साधु कह रहा था कि, बेटा! कल रात को तुम्हें एक विषैला सांप काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुमसे पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है। सुबह हुई। राजा सोकर उठा। और सपने की बात अपनी आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? इसे लेकर विचार करने लगा। सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया। शाम होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने की कोशिश न करें। रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था। इस तरह क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुंचाने की चेष्टा नहीं करते। यह असाधारण सी लगने वाले दृश्य देखकर सांप के मन में स्नेह उमड़ आया। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मंत्रमुग्ध कर लिया था। कहां वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुंचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूं तो किस प्रकार काटूं? यह प्रश्न के चलते वह दुविधा में पड़ गया। राजा के पलंग तक जाने तक सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया। उधर समय से कुछ देर बाद सांप राजा के शयन कक्ष में पहुंचा। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सदव्यवहार  ने मुझे परास्त कर दिया। अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूं। लो इसे अपने पास रखो। इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सांप चला गया। शिक्षा यह महज कहानी नहीं जीवन की सच्चाई है। अच्छा व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को सरल बनाने का उपाय रखता है। यदि व्यक्ति का व्यवहार कुशल है तो वो सब कुछ पा सकता है जो पाने की वो हार्दिक इच्छा रखता है..!! मंगलमय प्रभात प्रणाम *अंगूर खाने के जबरदस्त फायदे* 1. काले अंगूर का जूस नियमित पीने से हार्ट पेसेंट(Heart Patient) को बहुत फायदा होता है 2. यदि आप कब्ज से परेशांन है तो अंगूर में नमक और काली मिर्च (Black pepper) डालकर खाने से कब्ज में राहत मिलती है 3. अंगूर में की फाइबर(fiber) और विटामिन सी,(Vitamin C) और विटामिन ई (Vitamin E) बहुत अधिक मात्रा में पायी जाती है जो कि हमें कई रोगों से बचाने के साथ साथ वजन कम (weight loss) करने में भी सहायक होते है 4. यदि हम अंगूर के एक कप रस में दो चम्मच शहद (Honey) मिलाकर पिये तो यह हमारे शुगर लेबल (Diabetes) को नियंत्रित करता है  5. अंगूर का जूस पीने से कॉलस्ट्रॉल (Cholesterol) नियंत्रित रहता है 6. अंगूर खाने से हड्डियाँ मजबूत हो जाती है जय जय श्री राधे 🙏🌹

3 hrs ago
user_Suresh Chandra Agrawal
Suresh Chandra Agrawal
चौमू, जयपुर, राजस्थान•
3 hrs ago

Suresh Chandra Agrawal: सदा जपिये हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे I हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे और हमेशा खुश रहिये Ii हमेशा प्रसन्न रहो 🌹🙏🏾 *।।श्रीकृष्ण।।* *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,* *हे नाथ नारायण वासुदेवाय!!!* सभी कृष्ण भक्तों को सादर दंडवत प्रणाम 🙏🌹 अध्याय 2 श्लोक 7 2 एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनं प्राप्य विमुह्यति | स्थितवास्यमन्तकालेस्पि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति 72 यह आध्यात्मिक एवं ईश्वरीय जीवन का पथ है, जिसे प्राप्त करके मनुष्य मोहित नहीं होता | यदि किसी जीवन के अंतिम समय में भी इस तरह स्थित हो, तो उसे भगवद्धाम की प्राप्ति होती है | मनुष्य कृष्णभावनामृत या दिव्य जीवन को एक क्षण में प्राप्त कर सकता है और हो सकता है कि उसे लाखों जन्मों के बाद भी कोई प्राप्त न हो | यह तो सत्य संकेत और स्वीकार करने की बात है | खटवांग महाराज ने अपनी मृत्यु के कुछ ही मिनट पहले पूर्व कृष्ण के शरणागत में ऐसा जीवन पाया जो राज्य प्राप्त कर ली | निर्वाण का अर्थ है – भौतिकवादी जीवन शैली का अंत | बौद्ध दर्शन के अनुसार इस भौतिक जीवन के पूर्ण होने पर केवल शून्य शेष रह जाता है, बौद्ध धर्म की शिक्षा भिन्न है | वास्तविक जीवन का शुभारम्भ इस भौतिक जीवन का पूर्ण होना होता है | इस भौतिक जीवन का अंत निश्चित है, इस आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत लोगों के लिए इस जीवन के बाद अन्य जीवन की स्थापना होती है। इस जीवन का अंत से पूर्व यदि कोई कृष्णभावना भावित हो जाये तो उसे ब्रह्म-निर्वाण अवस्था प्राप्त हो जाती है | भगवद्धाम और भगवद्भक्ति के बीच कोई अंतर नहीं है | दोनों चरम पद हैं, मूल रूप से भगवान के दिव्य प्रेमीभक्ति में स्थिर निवास का अर्थ है - भगवद्धाम को प्राप्त करना | भौतिक जगत में इंद्रयतृप्ति विषयक कार्य होते हैं और आध्यात्मिक जगत में कृष्णभावनामृत विषयक | इसी जीवन में ही कृष्णभावनामृत की प्राप्ति होती है और जो कृष्णभावनामृत में स्थित होता है, वह निश्चित रूप से पहले ही भगवद्धाम में प्रवेश कर चुका होता है | ब्रह्म और भौतिक पदार्थ एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं | मूलतः ब्राह्मी-स्थिति का अर्थ है, "भौतिक कार्य के पद पर न होना |" भगवद्गीता में भगवद्भक्ति को मुक्त अवस्था माना गया है (स गुणसमतीतां ब्रह्मभूयाय कल्पते) | मूलतः ब्राह्मी स्थिति भौतिक बंधन से मुक्ति है | श्रील भक्ति विनोद ठाकुर के इस द्वितीय अध्याय को संपूर्ण ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषय के रूप में तैयार किया गया है भगवद्गीता के प्रतिपाद्य हैं - कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग | इस द्वितीय अध्याय में कर्मयोग तथा ज्ञानयोग की स्पष्ट व्याख्या की गयी है एवं भक्तियोग की भी झाँकी दी गयी है | इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय "गीता का सार" की भक्तिवेदांत धारा पूर्ण हुई I कुशल व्यवहार एक राजा था। उसने एक सपना देखा। सपने में उससे एक परोपकारी साधु कह रहा था कि, बेटा! कल रात को तुम्हें एक विषैला सांप काटेगा और उसके काटने से तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। वह तुमसे पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेना चाहता है। सुबह हुई। राजा सोकर उठा। और सपने की बात अपनी आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए? इसे लेकर विचार करने लगा। सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुंचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया। शाम होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुंचाने की कोशिश न करें। रात को सांप अपनी बांबी में से बाहर निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे आगे बढ़ता गया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, जगह-जगह पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था। इस तरह क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे-जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुंचाने की चेष्टा नहीं करते। यह असाधारण सी लगने वाले दृश्य देखकर सांप के मन में स्नेह उमड़ आया। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मंत्रमुग्ध कर लिया था। कहां वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुंचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूं तो किस प्रकार काटूं? यह प्रश्न के चलते वह दुविधा में पड़ गया। राजा के पलंग तक जाने तक सांप का निश्चय पूरी तरह से बदल गया। उधर समय से कुछ देर बाद सांप राजा के शयन कक्ष में पहुंचा। सांप ने राजा से कहा, राजन! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सदव्यवहार  ने मुझे परास्त कर दिया। अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूं। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूं। लो इसे अपने पास रखो। इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सांप चला गया। शिक्षा यह महज कहानी नहीं जीवन की सच्चाई है। अच्छा व्यवहार कठिन से कठिन कार्यों को सरल बनाने का उपाय रखता है। यदि व्यक्ति का व्यवहार कुशल है तो वो सब कुछ पा सकता है जो पाने की वो हार्दिक इच्छा रखता है..!! मंगलमय प्रभात प्रणाम *अंगूर खाने के जबरदस्त फायदे* 1. काले अंगूर का जूस नियमित पीने से हार्ट पेसेंट(Heart Patient) को बहुत फायदा होता है 2. यदि आप कब्ज से परेशांन है तो अंगूर में नमक और काली मिर्च (Black pepper) डालकर खाने से कब्ज में राहत मिलती है 3. अंगूर में की फाइबर(fiber) और विटामिन सी,(Vitamin C) और विटामिन ई (Vitamin E) बहुत अधिक मात्रा में पायी जाती है जो कि हमें कई रोगों से बचाने के साथ साथ वजन कम (weight loss) करने में भी सहायक होते है 4. यदि हम अंगूर के एक कप रस में दो चम्मच शहद (Honey) मिलाकर पिये तो यह हमारे शुगर लेबल (Diabetes) को नियंत्रित करता है  5. अंगूर का जूस पीने से कॉलस्ट्रॉल (Cholesterol) नियंत्रित रहता है 6. अंगूर खाने से हड्डियाँ मजबूत हो जाती है जय जय श्री राधे 🙏🌹

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