देश में बढ़ते हिंसक प्रदर्शन के पीछे किसका हाथ है? . सरकार के फैसलों पर प्रतिभाव देने के लिए मतदाताओं के पास यदि कोई अधिकृत, पारदर्शी, सत्यापित प्रक्रिया नहीं होगी तो वे प्रतिक्रिया देने के लिए सड़को पर आएंगे। और ज्यादा लोग प्रदर्शन के लिए सड़को पर उतरेंगे तो हिंसा होने की सम्भावना बढ़ जायेगी। तो संवाद की आवश्यक प्रक्रियाएं न होने की वजह से लोग सड़को पर आने के लिए बाध्य है, और प्रदर्शन शुरू होने के बाद यह स्वत: स्फूर्त हिंसक हो जाता है !! . निचे दिए गए 3 क़ानून लागू करके इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है : . जिला, राज्य एवं देश व्यापी स्तर पर जनमत संग्रह के लिए टीसीपी लागू करना। पेड मिडिया को ठीक करने के लिए दूरदर्शन अध्यक्ष को वोट वापसी के दायरे में लाना। हाईजेक्ड सोशल मिडिया को रेगुलेट करने और अदालतें-पुलिस को सुधारने के लिए जूरी कोर्ट। . मूल उत्तर इतना ही है। इसे अधिक स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त ब्यौरा मैंने अगले खंड में दिया है। . —————- . सत्ता एवं नागरिको के बीच यदि संवाद करने की अधिकृत प्रक्रियाएं नहीं होने से नागरिक अपना असंतोष प्रकट करने के लिए विभिन्न "अनाधिकृत एवं बेतरबीब" तरीको का सहारा लेना शुरू कर देते है। राजतंत्र में जनता के पास राजा से संवाद करने का कोई तरीका नहीं था, अत: राजा के खिलाफ जब असंतोष बढ़ जाता तो हिंसा ही एक मात्र रास्ता बचता था। वोटिंग राइट्स आने के बाद इस तरह की हिंसा/ विद्रोह में कमी आ गयी। दरअसल , वोटिंग सिस्टम नागरिक को शासन के काम काज पर अधिकृत रूप से टिप्पणी करने का अवसर देता है। . लोकतंत्र एक लेबल है और इसका कोई ठीक ठीक अर्थ नहीं होता है। किन्तु फ्रोड राजनेता, पेड बुद्धिजीवी, पेड मीडियाकर्मी, पेड राजनीती शास्त्र के विशेषग्य वोटिंग राइट्स को लोकतंत्र के पर्यायवाची के रूप में प्रचारित करते है। काम की बात संवाद के अधिकृत तरीके है। यदि किसी शासन व्यवस्था में जनता के पास अपनी आवाज पहुँचाने के पर्याप्त तरीके नहीं होंगे तो नागरिक उल जलूल तरीको का इस्तेमाल करेंगे और अशान्ति फैलेगी। किसी शासन व्यवस्था में नागरिको के पास संवाद करने के निम्नलिखित अधिकृत तरीके हो सकते है : . वोट देने का अधिकार वोट वापसी जनमत संग्रह मल्टी इलेक्शन जूरी कोर्ट . अमेरिका जैसे देश में नागरिको के पास ऊपर दी गयी सभी प्रक्रियाएं है जबकि भारतीयों के पास सिर्फ इसमें से सिर्फ 1 तरीका है – वोट देने का अधिकार !! यदि हम भारत में ऐसी प्रक्रियाएं लागू करें जिससे नागरिको द्वारा सरकार से संवाद करने के अवसरों में वृद्धि हो तो बेतरबीब ढंग से विरोध प्रदर्शन करने वाले लोगो की संख्या में कमी आने लगेगी। दरअसल प्रदर्शन करने वालो में से ज्यादातर लोग अपनी प्रतिक्रिया सरकार एवं जनता के सामने दर्ज कराना चाहते है, किन्तु कोई व्यवस्थित तरीका न होने की वजह से ये सड़को पर निकल आते है। और इसी झुण्ड में कुछ लोग हिंसा भी शुरू कर देते है, और प्रदर्शन हिंसक हो जाता है !! . उदाहरण के लिए, आज भारतीयों के पास शासक वर्ग से संवाद करने का एक मात्र तरीका वोटिंग राईट है, और यदि हम भारत से वोटिंग राइट्स हटा दें तो आधा देश सड़को पर जाएगा, और हिंसा भी होने लगेगी। किन्तु वोटिंग राइट्स की वजह से नागरिक चुनावों के दौरान शान्ति से व्यवस्थित रूप से सरकार पर अपनी टिप्पणी वोट के रूप में दर्ज करवा देते है। लेकिन मेरा मनाना है कि भारत में कई अवसरों पर जो भी सामाजिक अशांति ( Civil unrest ) नजर आती है, उसमे कमी लाने के लिए हमें संवाद की अन्य प्रक्रियाओं को भी लागू करने की जरूरत है। . (1) समाधान – टीसीपी . इस प्रक्रिया के गैजेट में आने के बाद नागरिक तमीज से अपनी शिकायत / राय / सुझाव सरकार एवं देश के नागरिको के सम्मुख रख सकेंगे और सड़क पर आकर तमाशा करने को विवश नागरिको की संख्या में तेजी से गिरावट आने लगेगी। . इसे जिला, राज्य एवं राष्ट्रिय स्तर पर कल की तारीख में लागू किया जा सकता है। ड्राफ्टिंग मैंने निचे दी है। पीएम या सीएम को सिर्फ इस पर साइन करके अशोक स्तम्भ का ठप्पा लगाना है, और गैजेट में छाप देना है। इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए किसी प्रकार के अतिरिक्त विभाग की जरूरत नहीं है। गैजेट में आने के साथ ही लगभग नगण्य बजट में यह प्रक्रिया 30 दिनों में लागू हो जायेगी, और 90 दिनों में विधिवत रूप से काम करने लगेगी। . (जिला कलेक्टर के लिए आदेश ) (1) यदि कोई मतदाता कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई भी शपथपत्र प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डालने का अनुरोध करता है तो कलेक्टर प्रति पृष्ठ 20 रूपये की दर से शुल्क ले कर यह शपथपत्र स्वीकार करेगा और इसे स्कैन करके प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर इस तरह रखेगा कि कोई भी नागरिक बिना लॉग इन के इसे देख सके। यदि अर्जी जिला स्तर की है तो इसे जिला वेबसाइट पर और यदि अर्जी राज्य के विषय की है तो इसे मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा। . (पटवारी के लिए आदेश ) (2) यदि कोई मतदाता पटवारी की कचहरी में अपनी वोट वापसी पासबुक / मतदाता पहचान पत्र के साथ उपस्थित होकर किसी शपथपत्र पर हां या नहीं दर्ज करवाता है तो पटवारी मतदाता की हाँ / नहीं को अपने कम्प्यूटर में दर्ज करेगा और मतदाता से 3 रुपये ले कर बदले में छपी हुयी रसीद देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी। पटवारी मतदाता की हाँ / नहीं को पारदर्शी तरीके से पीएम / सीएम की वेबसाइट पर भी रखेगा। . (कलेक्टर के लिए आदेश ) (3) कलेक्टर ऐसा सिस्टम बनायेंगे कि मतदाता अपना मोबाइल नंबर पटवारी / तहसील / कलेक्टरी / सिविक सेंटर / नागरिक सेवा केंद्र में जाकर रजिस्टर्ड करवा सके, ताकि मतदाता अपनी हाँ / ना SMS या किसी मोबाइल APP के माध्यम से दर्ज कर सकते है। यदि मतदाता किसी एफिडेविट पर हाँ / ना SMS या APP के माध्यम से दर्ज करते है तो इसके लिए शुल्क का निर्धारण कलेक्टर करेगा। . (सूचना सचिव ) (4) नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर (NIC) के प्रभारी सचिव को आदेश जारी किये जाते है कि वे ऐसी आवश्यक वेबसाइट आदि की रचना करे जिससे कलेक्टर, पटवारी आदि ऊपर दी गयी धाराओं में दर्ज प्रक्रिया को लागू कर सके। . (5) सभी नागरिको के लिए सूचना एवं निर्देश : . यह कानून लागू होने के बाद, अपने ज़िला कलेक्टर कार्यालय में जाकर अपना कोई भी एफिडेविट क्लर्क को जमा करवा सकते है। यह एफिडेविट कोई शिकायत या आपके द्वारा प्रस्तावित कानून, सलाह, मांग, अनुरोध या अन्य कोई याचनात्मक समाधान हो सकता है। एफिडेविट स्वीकार करने के दौरान कलेक्टर आपसे आपका मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड , वोट वापसी पासबुक लाने के लिए कह सकता है और आपसे शून्य से लेकर पांच गवाह तक, जो कि आपको निजी रूप से जानते हो, लाने के लिए भी कह सकता है। क्लर्क आपकी फोटो और फिंगरप्रिंट भी ले सकता है। यदि आप एक बार एफिडेविट फ़ाइल कर देते है तो बाद में आप उसे हटा नहीं सकेंगे। अदालत के आदेश को छोड़कर किसी भी अधिकारी को आपके एफिडेविट को हटाने की अनुमति नहीं होगी। और साथ ही आपको इस बारे में भी सूचित किया जाता है कि - कोई अदालत आपको एफिडेविट में अनुचित जानकारी देने के लिए या किसी भी अनुचित मानहानिकारक ( या निन्दात्मक ) कथन के लिए सजा दे सकती है। आपको भारत भर में दर्ज सभी एफिडेविटो पर हाँ / ना दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है। ये आपकी पसंद पर निर्भर है कि आप किस एफिडेविट पर विचार करना चाहते और किस एफिडेविट को नकारना चाहते है। जिस भी एफिडेविट पर आप हाँ / ना दर्ज करना चाहते है, उन पर अपनी राय दर्ज करवा सकते है। किसी भी एफिडेविट पर हाँ / ना दर्ज करने पर आपको कोई भी सजा नहीं होगी, तब भी जबकि अमुक एफिडेविट में कोई अनुचित या निन्दात्मक कथन है। आप अपना मोबाइल नंबर मतदाता सूची का रखरखाव करने वाले क्लर्क को दर्ज करवा सकते है। अमुक फ़ोन नंबर आपके नाम पर या आपके नजदीकी पारिवारिक सदस्य के नाम पर होना चाहिए। यदि आप अपना मोबाईल नंबर दर्ज करवाते है तो जब भी आप कोई एफिडेविट फ़ाइल करेंगे या किसी एफिडेविट पर हाँ / ना दर्ज करेंगे तो आपको फीडबैक के लिए एक एस एम एस प्राप्त होगा। यह एस एम एस उसी तरह का होगा जैसा एटीएम आदि से नकदी निकालने पर खाताधारक को प्राप्त होता है। और यदि कोई अन्य व्यक्ति छल द्वारा आपके नाम पर एफिडेविट फ़ाइल करने का प्रयास कर रहा है या आपके नाम से हाँ / ना दर्ज करवा रहा है तब भी आपको ऐसा एस एम एस प्राप्त होगा। इस स्थिति में आप पुलिस में शिकायत कर सकते है। आपको वोटर कार्ड जैसा एक मैगनेटिक कार्ड ( एटीएम कार्ड के समान ) भी दिया जा सकता है, और तलाटी कार्यालय के पास एटीएम जैसी मशीन भी लगवायी जा सकती है, ताकि आप मशीन में किसी एफिडेविट का नंबर डाल कर उस पर अपनी हाँ / ना दर्ज कर सके। उपलब्ध होने पर आप इस सुविधा का उपयोग कर सकते है। इस सिस्टम में प्रत्येक हाँ / ना दर्ज करने या बदलने पर आपको 1 रू शुल्क चुकाना होगा। . (6) मुख्यमंत्री, मेयर, जिला / तहसील / ग्राम सरपंचों के लिए टिप्पणी : आप इस कानून में वांछित बदलाव करके ( जैसे प्रधानमंत्री शब्द को मुख्यमंत्री या मेयर आदि से बदलकर और अन्य आवश्यक परिवर्तन करके ) पारित कर सकते है, एवं राज्य / नगर / जिला / तहसील / ग्राम स्तर पर ऐसा टी सी पी क़ानून लागू कर सकते है। . 1.1. यह क़ानून क्या बदलाव लाएगा ? इस प्रकिया के आने से विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ता, समर्थक एवं वोटर किसी मुद्दे पर अपनी मंशा प्रकट करने के लिए एसोसिएट हो सकेंगे। उदाहरण के लिए, मैं बीजेपी=संघ का समर्थक या मतदाता नहीं हूँ, लेकिन यदि मैं बीजेपी द्वारा छापे गये CAB के कानून का समर्थन करना चाहता हूँ तो मैं बिना बीजेपी का समर्थन किये भी इस क़ानून के पक्ष में अपनी सहमती दर्ज करवा सकूँगा। इस तरह यह क़ानून मतदाता को यह सुविधा देता है कि वह मतदान के बाद भी सरकार के अच्छे फैसलों का समर्थन कर सके, चाहे वह अमुक सरकार का समर्थक हो या नहीं हो !! दुसरे शब्दों में यह क़ानून उन लोगो को भी अच्छे मुद्दों को आगे बढाने के लिए एकजुट कर देता है, जो प्रतिद्वंदी पार्टियों/ विचारधाराओं के है । इस क़ानून के आने के बाद ज्यादातर नागरिको को किसी फैसले का समर्थन एवं विरोध करने के लिए या अपनी मांग रखने के लिए सड़को पर आकर मजमा लगाने की जरूरत नहीं रह जायेगी। प्रदर्शन वगेरह करने के लिए जिस फुर्सत, फितरत एवं ऊर्जा की जरूरत होती है, ज्यादातर लोग इससे वंचित होते है। इस तरह के प्रदर्शन करने में रुचि रखने वालो की संख्या सिर्फ 0.01% होती है किन्तु सड़को पर आने के कारण इनकी ही राय नजर आती है, और ये डोमिनेट करने लगते है। लेकिन इस क़ानून के आने के बाद शेष 99% के पास भी सड़को पर आये बिना अपनी राय प्रकट करने का विकल्प आ जाएगा। . 1.2. पेड मीडिया, एवं सभी राजनैतिक पार्टियाँ इस क़ानून का विरोध क्यों कर रहे है ? . मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों एवं नेताओं के पास मजमा लगाने का मेकेनिज्म एवं संसाधन होते है। अत: ये लोग 5-10 शहरो में 1-2 लाख लोगो को इकट्ठा करके यह स्थापित कर देते है कि जनता अमुक फैसले का विरोध / समर्थन कर रही है। और फिर पेड मीडिया यह मजमा पूरे देश को दिखाकर कह पाता है कि – अधिकांश लोग इसका विरोध / समर्थन कर रहे है !! दुसरे शब्दों में वे जनता की मंशा की व्याख्या अपने मन मुताबिक कर पाते है। . उदाहरण के लिए, भारत में 90 करोड़ मतदाता है। लेकिन पेड मीडिया द अन्ना के 1 लाख लोगो को बार बार दिखाकर यह भ्रम खड़ा कर देता है कि पूरा देश जनलोकपाल के लिए मरा जा रहा है !! और कैब के साथ भी यही हो रहा है। यदि टीसीपी होता तो यह साफ़ नजर आता था कि आज दिल्ली में 10 हजार लोगो ने कैब के विरोध में प्रदर्शन किया लेकिन 5 लाख लोगो ने इसके समर्थन में स्वीकृति दी है !! और तब पेड मीडिया यह रिपोर्ट नहीं कर पाता कि – देखो, दिल्ली में लोग कैब का विरोध कर रहे है !! क्योंकि तब लोग देख सकते थे कि पेड मीडियाकर्मी झूठ बोल रहा है !! . दूसरे शब्दों में, यह क़ानून जनता की राय की व्याख्या करने का अधिकार पेड मीडिया एवं राजनेताओ से छीन लेता है !! . इसीलिए पेड मीडिया के स्पोंसर्स भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं चाहते जिससे भारत के आम नागरिक शान्तिप्रद तरीके से अपनी सहमती / असहमति दर्ज करवा सके। और इस क़ानून की जरूरत को रफा दफा करने के लिए पेड रविश कुमार जैसे पत्रकार लगातार यह लेक्चर देते है कि, लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए नागरिको को आवाज उठाने के लिए बाहर निकलना चाहिए। . मतलब काम धंधा छोड़कर भारत के करोड़ो लोग सड़क पर आ जाए !! यूँ !!! . तो पहले वे टीसीपी जैसे क़ानून का विरोध करते है, ताकि एक आम नागरिक को अपनी अधिकृत सहमती / असहमति पारदर्शी एवं सत्यापित तरीके से दर्ज करने से वंचित किया जा सके, और फिर वे नागरिको को चाबी देते है कि यदि तुम जागे हुए हो तो लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़को पर आओ !! क्योंकि वे जानते है कि अपना काम धंधा छोड़कर कोई भी हफ्तों हफ्तों के लिए सड़क पर मजमा लगाने के लिए नहीं आने वाला है !! . 1.3. यदि सड़को पर प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ेगी तो अन्ततोगत्वा यह हिंसक हो जाएगा !! . फर्स्ट राउंड में, यदि प्रदर्शनकारीयों की संख्या कम रहेगी तो हिंसा की सम्भावना भी कम होगी। तब विरोध करने वालो का झुण्ड कहेगा कि लोग “जागरुक” नहीं है, इसीलिए सड़को पर नहीं निकल रहे है। और सरकार कहेगी कि जनता हमारे साथ है, अत: प्रदर्शनकारियो को समर्थन नहीं मिल रहा है !! . सेकेण्ड राउंड में, यदि प्रदर्शन कारियों की संख्या बढती है तो हिंसा होने की सम्भावना भी बढ़ जायेगी। जैसे जैसे सड़को पर लोगो की संख्या बढ़ेगी वैसे वैसे प्रदर्शन का आयोजन करने वाले लोगो के हाथ से नियंत्रण निकल जाएगा, और हिंसा होनी शुरू हो जायेगी। कैसे ? यदि किसी प्रदर्शन में 5,000 लोगो मौजूद है तो हिंसा शुरू करने के लिए सिर्फ 5 लोग चाहिए । और 5 लोग हिंसा की शुरुआत कर दें तो अगले 2 मिनिट में इस समूह के 100 लोग इन्हें जॉइन कर लेंगे और हिंसा का पैमाना बड़ा हो जाएगा !! सरकार को जब प्रदर्शन कारियों की बैंड बजानी होती है तो वे अपने 100-50 आदमी इस झुण्ड में शामिल कर देगी और वे मौका देखकर हिंसा / लूटपाट शुरू कर देंगे !! सरकार धारा 144 लागू कर देगी जिससे प्रदर्शन करने वालों को लगेगा कि हमें दबाया जा रहा है। अत: यह उन्हें हिंसा करने के लिए उकसायेगा । यदि समूह में युवाओ की संख्या मौजूद है तो हिंसा की सम्भावना बेहद बढ़ जाती है !! जनता का ध्यान आकर्षित करने और सरकार पर दबाव बनाने के लिए भी बहुधा प्रदर्शनकारी जानबूझकर हिंसा का सहारा लेते है। . दुसरे शब्दों में किसी भी प्रकार के प्रदर्शन का पैमाना बढ़ने लगेगा तो अंत में इसे हिंसक होना ही है। हाँ यदि प्रदर्शन का तरीका ऐसा है कि जमाव किसी खाली मैदान / चारदीवारी / स्टेडियम आदि में किसी सभा के रूप में किया जा रहा है, तो यह हिंसक नहीं होगा। लेकिन ऐसे प्रदर्शन को यदि मीडिया कवरेज नहीं है तो इस प्रदर्शन का प्रभाव शून्य होता है। जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए यह जरुरी है कि इसे सार्वजनिक खुली जगहों जैसे सड़क आदि पर किया जाए, और जब आप सड़को पर आयेंगे तो हिंसा की सम्भावना बढ़ जायेगी। . अब मान लीजिये कि फिर भी यदि हिंसा नहीं हो रही है और आन्दोलन बढ़ता जा रहा है तो सरकार के पास किसी आन्दोलन को रफा दफा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे हिंसक बना दिया जाए। और सरकार के पास किसी भी आन्दोलन को हिंसक बना देने के दर्जनों तरीके है। . कुल मिलाकर यदि प्रदर्शन का पैमाना बढेगा तो अंतत यह हिंसक हो जायेगा, और यदि यह हिंसक नहीं हो रहा है तो सरकार इसे हिंसक बना देगी। और फिर हम भारत के सभी बुद्धिजीवियों को इस बिंदु पर एक अंतहीन बहस करते देखेंगे कि, हिंसा की शुरुआत किसने की थी ? पुलिस ने या प्रदर्शनकारियों ने !! वे इस बहस को फिर महीनो तक रगेद सकते है, और उसके बाद ये जीनियस लोग “जांच कराए जाने” पर सहमत हो जायेंगे !! और फिर सरकार खुद के खिलाफ आरोपों की जांच खुद ही जांच करेगी !! . लेकिन ये बुद्धिजीवी इस बात पर कभी भी चर्चा नहीं करेंगे कि नागरिको के पास ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जिससे आम नागरिक अपनी सहमती / असहमति शांतिपूर्ण तरीके से दर्ज करवा सके। वे पहले लोकतंत्र के नाम पर लोगो को सड़को पर ठेलेंगे और फिर कहेंगे कि — अहिंसक तरीके से प्रदर्शन करो !! और ये सभी बुद्धिजीवी इस बात से वाकिफ है कि प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ेगी या सरकार मांगे नहीं मानेगी तो अंत में हिंसा शुरू होनी ही है। इसे किसी भी तरह से न तो कंट्रोल किया जा सकता है, और न ही रोका जा सकता है। . यही वजह है कि, भारत में पिछले 70 सालों से जो भी प्रदर्शन बढ़ना शुरू होते है, अंत में वे हिंसक हो ही जाते है। . इस सर्कस में कमी लाने के लिए हमें टीसीपी जैसी प्रक्रिया की जरूरत है । ऐसी प्रक्रिया लाने की जगह हमारे चारो और ऐसे बुद्धिजीवी है जो पहले लोकतंत्र के नाम पर लोगो को सड़को पर धकेलते है, फिर पुलिस को उनको सामने भेजते है ताकि पत्थरबाजी, आंसू गैस, आगजनी, गोलियां, लाठी, तोड़फोड़ आदि का सामान तैयार किया जा सके !! . टीसीपी के आने बाद भी प्रदर्शन होते रहेंगे और लोकतंत्र में प्रदर्शन होने भी चाहिए। लेकिन तब प्रदर्शनो के हिंसक होने की सम्भावना काफी कम हो जायेगी। क्योंकि तब प्रदर्शनकारी यह मोरल ग्राउंड खो देंगे कि, हमें सुना नहीं जा रहा है, और इसीलिए हम सड़क पर आकर जमाव बना रहे है !! . अत: टीसीपी आने के बाद सड़को पर जो प्रदर्शनकारी आयेंगे वे शांति प्रिय ढंग से प्रदर्शन करेंगे. क्योंकि उनमे यह भय रहेगा कि यदि हमने हिंसा की तो आम नागरिक की नजर में हम गिर जायेंगे, और चूंकि अब आम नागरिक टीसीपी का प्रयोग करके उनके प्रदर्शन का भी समर्थन / विरोध कर सकता है, अत: वे बेहद अनुशासन से प्रदर्शन करेंगे। . दूसरो शब्दों में प्रदर्शनकारी तब ज्यादा शालीनता एवं ज्यादा सभ्य तरीके से पेश आने लगेंगे। वे संवाद बनाने की कोशिश करेंगे ताकि नागरिक उनके बिंदु का समर्थन करें. इस तरह टीसीपी प्रदर्शनकारियों पर जनता का अंकुश ले आता है। और इससे सरकार पर भी अंकुश आएगा कि वह प्रदर्शनकारियो का जाया दमन न करे, क्योंकि तब नागरिक सरकार के कदम का विरोध करने के लिए टीसीपी का इस्तेमाल करना शुरू कर सकते है। . और यदि तब भी प्रदर्शन में हिंसा होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रदर्शनकारियो की होगी और पुलिस बिना आरोप झेले उनसे हाथ खोलकर निपट सकती है !! . (2) पेड मिडिया को ठीक करने के लिए दूरदर्शन अध्यक्ष को वोट वापसी के दायरे में लाना। . पेड मीडिया इस तरह के प्रदर्शनों को किस तरह चाबी देता है, इस बारे में आप सभी अच्छे से वाकिफ है। पेड मीडिया एकाधिकार वाला धंधा है। यदि मुख्यधारा का एक भी चैनल सच्ची ख़बरें दिखाना शुरू कर दे तो भ्रम फैलाने वाले सभी चैनल एक्सपोज होने लगेंगे, और अपने दर्शक खो देंगे। दूरदर्शन अकेला इतना ताकतवर है कि हम इसके माध्यम से पेड मीडिया को ठीक कर सकते है। . दूरदर्शन के पास बेहद विशाल संसाधन और संपत्तियां है, और कोई कारण नहीं कि दूरदर्शन अन्य निजी चैनल्स से अच्छा प्रदर्शन न कर सके। वोट वापसी पासबुक के दायरे में आने के बाद दूरदर्शन अध्यक्ष यह सुनिश्चित करेगा कि देश के सभी नागरिको तक सभी महत्व्पूर्ण जानकारी पहुंचे। इससे सभी निजी चैनल मिलकर भी किसी खबर को छुपा नहीं पाएंगे। अत: सच को छुपाने के लिए किये जा रहे भुगतान के व्यर्थ हो जाने के कारण धनिक वर्ग न्यूज चैनल्स को पेमेंट करना बंद कर देंगे। . (3) हाईजेक्ड सोशल मिडिया को रेगुलेट करने और अदालतें-पुलिस को सुधारने के लिए जूरी कोर्ट। . भारत में कोई भी आदमी फेक एकाउंट बनाकर कुछ भी अपलोड कर सकता है, और फिर हमारे पास ऐसे करोड़ो यूजर है जो बिना यह जाने कि यह सामग्री फेक है या असली, इसे सर्कुलेट कर सकते है !! दुसरे शब्दों में हमारे पास इस ऑनलाइन बारूद को रोकने का कोई मैकेनिज्म नहीं है। शिकायत करने के लिए कोई प्रक्रिया नहीं है। कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त पुलिस नहीं है। और फिर सजा सुनाने के लिए त्वरित अदालतें नहीं है !! फेसबुक को डिजाइन ही इस तरह से किया गया है कि फेसबुक चाहे तो 3 दिन के अंदर पूरे देश में आग लगा सकता है, और यह आपको कभी नजर नहीं आएगा कि यह काण्ड फेसबुक ने किया है !! . दुसरे शब्दों में , सभी को सभी कुछ लिखने, अपलोड करने की आजादी है !! . व्यवस्थागत सुधार के लिए मेरा प्रस्ताव जूरी कोर्ट का है। जूरी कोर्ट क़ानून आने के 3 महीने के भीतर सोशल मीडिया से अश्लीलता, फेक आईडी, गाली गलौज, ट्रोलिंग, महिलाओ का वाचिक उत्पीड़न, फेक वीडियो, फेक न्यूज आदि सामग्रियों में लगभग 70% तक की कमी आ जायेगी। अंतिम समाधान कम्युनिकेशन में एफडीआई को रोकना है। किन्तु जूरी कोर्ट अपने आप में इतना ताकतवर है कि एफडीआई जारी भी रहती है तो समस्या में 70% तक की गिरावट आ जायेगी। . फेसबुक के फंक्शन एवं समाधान के बारे में अतिरिक्त जानकारी आप इस जवाब में देख सकते है - Pawan Jury का जवाब - फेसबुक क्या है? . 3.1. सोशल मीडिया पर आने वाली फेक न्यूज को रोकने के लिए कुछ पोपुलर लेकिन फर्जी समाधान : किसी भी व्यवस्था में गड़बड़ी फैलाने वालो की संख्या बेहद कम ( 0.1% ) होती है। जब इन 0.1% को रोकने एवं दण्डित करने के लिए हमारे पास पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती तो गड़बड़ी फैलाने वालो का हौंसला बढ़ने लगता है, और इससे गड़बड़ी करने वालो की संख्या में भी इजाफा होता है। मैं गड़बड़ी फैलाने वाले इन 0.1% लोगो को रोकने में मानता हूँ, और इनमें से ज्यादातर को सिर्फ क़ानून एवं दंड द्वारा ही रोका जा सकता है। किन्तु कई लोग इसकी जगह पर निचे दिए गए तरीके सुझाते है : . बुद्धिजीवीयों का कहना होता है कि, हमें इन शेष 99.9% लोगो को सुधारने के लिए नैतिक पतन पर लेक्चर देने चाहिए, उन पर लानत भेजनी चाहिए और उन्हें कोस कर भर्त्सना करनी चाहिए। इससे लोगो में जागरूकता आएगी और बदलाव आने लगेगा !! हालांकि इससे गड़बड़ी फैलाने वालो की हरकतों में कोई बदलाव नहीं आता। दरअसल इन बुद्धिजीवियों का उद्देश्य होता है कि इन 0.1% लोगो का हवाला देकर शेष सभी लोगो को कोसा जा सके। क्योंकि बुद्धिजीवी बनने की यह कॉमन प्रेक्टिस है कि खुद को बुद्धिजीवी दिखाने के लिए शेष भारतीयों को कोसा जाये !! पेड रविश कुमार का मानना है कि सोशल मीडिया को रेगुलेट करने के लिए हमें किसी क़ानून की आवश्यकता पर बात नहीं करनी चाहिए। इसकी जगह हमें एल्ट न्यूज जैसे चेनल में पीछे से पैसा लगाना चाहिए और फिर एनडीटीवी पर आकर बताना चाहिए कि यदि आप जानना चाहते हो कि कौनसी न्यूज फेक है तो एल्ट न्यूज देखो !! इससे आपको दोहरा फायदा होता है। आपको क्रेडिट भी मिलता है और पैसा भी !! मैं इसे समस्या में ही समाधान खोज निकालना कहता हूँ। जैसे कोई व्यक्ति फर्स्ट राउंड में लोगो को देशी गाय के घी के फायदे और देशी गाय की कम होती संख्या के बारे सूचित करता है, और फिर सेकेण्ड राउंड में देशी गाय को बचाने के लिए आवश्यक कानून लागू करवाने का प्रयास करने की जगह खुद ही देशी घी बेचने का कारोबार करने लगता है। ( पतंजलि के ब्रांड एम्बेसेडर ने भी स्वदेशी आन्दोलन का समाधान कुछ इसी तरह से निकाला है !! ) कई अन्य पेड पत्रकार एवं पेड न्यूज चेनल मानते है कि यदि सोशल मीडिया पर 100 फेक न्यूज चल रही है तो हमें उनमे से उन 4 खबरों को एक्सपोज कर देना चाहिए जिन्हें एक्सपोज करने के लिए हमें पेमेंट मिली हो। पेड सुधीर चौधरी इस तरीके में ज्यादा विश्वास करते है !! जहाँ तक राजनैतिक दलों की बात है, यह व्यवस्था उनके फायदे की है। क्योंकि इस तरह के हड़बोंग में वे अपनी आईटी सेल्स के माध्यम से जनता को चयनित दिशा में सोचने के लिए धकेल सकते है !! अत: वे कहते है कि भारत की जनता समझदार है, और उन्हें सब पता है कि कौनसी खबर असली है, और कौनसी फेक है !! . बहरहाल , मैं इस तरह के सभी प्रस्तावों को खारिज करता हूँ, और मेरा मानना है कि टीसीपी, जूरी कोर्ट एवं वोट वापसी क़ानून लाकर इस तरह के प्रदर्शनों में होने वाली हिंसा में काफी हद तक कमी लायी जा सकती है । . यदि आप अपने जिले / राज्य / देश में टीसीपी एवं जूरी कोर्ट क़ानून चाहते है तो प्रधानमंत्री या अपने मुख्यमंत्री से इसकी मांग कर सकते है। मांग करने के लिए उन्हें पोस्टकार्ड या ट्विट भेजे। पोस्टकार्ड या ट्विट में यह लिखें —- #TCP , #JuryCourt . मुझसे कई कार्यकर्ता बहुधा यह पूछते है कि कौनसा पत्रकार सच्ची पत्रकारिता करता है, और किस चैनल पर भरोसा किया जाना चाहिए। मैं आपसे आग्रह करूँगा कि यह जानने के लिए आप निचे दिए गए कदम उठाये : . (i) अपने फेवरेट पत्रकार को टीसीपी की ऊपर दी गयी 5 धाराओं का पीडीऍफ़/टेक्स्ट भेजें। इसके लिए आप उन्हें ट्विट या मेल कर सकते है। (i) उनसे कहे कि, आपका मानना है कि यदि यह क़ानून गेजेट में प्रकाशित हो जाता है तो भारत की व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आएगा । (iii) उनसे कहें कि, यदि यह क़ानून दोषपूर्ण है तो क्या वे इससे बेहतर प्रक्रिया का सुझाव दे सकते है, जिससे भारत के नागरिक अपनी बात अधिकृत एवं पारदर्शी तरीके से सरकार के सम्मुख रख सके। (iv) उनसे कहें कि, क्या वे एक नागरिक के तौर पर इस क़ानून को गेजेट में छापने के लिए प्रधानमंत्री को एक पोस्टकार्ड या ट्विट भेज सकते है । . यदि आप अपने फेवरिट पत्रकार से इस तरह का संवाद स्थापित करने का प्रयास करेंगे तो जल्दी ही ऐसे पत्रकार को खोज लेंगे जो देश की व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने में रुचि रखता है !! . ===============
देश में बढ़ते हिंसक प्रदर्शन के पीछे किसका हाथ है? . सरकार के फैसलों पर प्रतिभाव देने के लिए मतदाताओं के पास यदि कोई अधिकृत, पारदर्शी, सत्यापित प्रक्रिया नहीं होगी तो वे प्रतिक्रिया देने के लिए सड़को पर आएंगे। और ज्यादा लोग प्रदर्शन के लिए सड़को पर उतरेंगे तो हिंसा होने की सम्भावना बढ़ जायेगी। तो संवाद की आवश्यक प्रक्रियाएं न होने की वजह से लोग सड़को पर आने के लिए बाध्य है, और प्रदर्शन शुरू होने के बाद यह स्वत: स्फूर्त हिंसक हो जाता है !! . निचे दिए गए 3 क़ानून लागू करके इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है : . जिला, राज्य एवं देश व्यापी स्तर पर जनमत संग्रह के लिए टीसीपी लागू करना। पेड मिडिया को ठीक करने के लिए दूरदर्शन अध्यक्ष को वोट वापसी के दायरे में लाना। हाईजेक्ड सोशल मिडिया को रेगुलेट करने और अदालतें-पुलिस को सुधारने के लिए जूरी कोर्ट। . मूल उत्तर इतना ही है। इसे अधिक स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त ब्यौरा मैंने अगले खंड में दिया है। . —————- . सत्ता एवं नागरिको के बीच यदि संवाद करने की अधिकृत प्रक्रियाएं नहीं होने से नागरिक अपना असंतोष प्रकट करने के लिए विभिन्न "अनाधिकृत एवं बेतरबीब" तरीको का सहारा लेना शुरू कर देते है। राजतंत्र में जनता के पास राजा से संवाद करने का कोई तरीका नहीं था, अत: राजा के खिलाफ जब असंतोष बढ़ जाता तो हिंसा ही एक मात्र रास्ता बचता था। वोटिंग राइट्स आने के बाद इस तरह की हिंसा/ विद्रोह में कमी आ गयी। दरअसल , वोटिंग सिस्टम नागरिक को शासन के काम काज पर अधिकृत रूप से टिप्पणी करने का अवसर देता है। . लोकतंत्र एक लेबल है और इसका कोई ठीक ठीक अर्थ नहीं होता है। किन्तु फ्रोड राजनेता, पेड बुद्धिजीवी, पेड मीडियाकर्मी, पेड राजनीती शास्त्र के विशेषग्य वोटिंग राइट्स को लोकतंत्र के पर्यायवाची के रूप में प्रचारित करते है। काम की बात संवाद के अधिकृत तरीके है। यदि किसी शासन व्यवस्था में जनता के पास अपनी आवाज पहुँचाने के पर्याप्त तरीके नहीं होंगे तो नागरिक उल जलूल तरीको का इस्तेमाल करेंगे और अशान्ति फैलेगी। किसी शासन व्यवस्था में नागरिको के पास संवाद करने के निम्नलिखित अधिकृत तरीके हो सकते है : . वोट देने का अधिकार वोट वापसी जनमत संग्रह मल्टी इलेक्शन जूरी कोर्ट . अमेरिका जैसे देश में नागरिको के पास ऊपर दी गयी सभी प्रक्रियाएं है जबकि भारतीयों के पास सिर्फ इसमें से सिर्फ 1 तरीका है – वोट देने का अधिकार !! यदि हम भारत में ऐसी प्रक्रियाएं लागू करें जिससे नागरिको द्वारा सरकार से संवाद करने के अवसरों में वृद्धि हो तो बेतरबीब ढंग से विरोध प्रदर्शन करने वाले लोगो की संख्या में कमी आने लगेगी। दरअसल प्रदर्शन करने वालो में से ज्यादातर लोग अपनी प्रतिक्रिया सरकार एवं जनता के सामने दर्ज कराना चाहते है, किन्तु कोई व्यवस्थित तरीका न होने की वजह से ये सड़को पर निकल आते है। और इसी झुण्ड में कुछ लोग हिंसा भी शुरू कर देते है, और प्रदर्शन हिंसक हो जाता है !! . उदाहरण के लिए, आज भारतीयों के पास शासक वर्ग से संवाद करने का एक मात्र तरीका वोटिंग राईट है, और यदि हम भारत से वोटिंग राइट्स हटा दें तो आधा देश सड़को पर जाएगा, और हिंसा भी होने लगेगी। किन्तु वोटिंग राइट्स की वजह से नागरिक चुनावों के दौरान शान्ति से व्यवस्थित रूप से सरकार पर अपनी टिप्पणी वोट के रूप में दर्ज करवा देते है। लेकिन मेरा मनाना है कि भारत में कई अवसरों पर जो भी सामाजिक अशांति ( Civil unrest ) नजर आती है, उसमे कमी लाने के लिए हमें संवाद की अन्य प्रक्रियाओं को भी लागू करने की जरूरत है। . (1) समाधान – टीसीपी . इस प्रक्रिया के गैजेट में आने के बाद नागरिक तमीज से अपनी शिकायत / राय / सुझाव सरकार एवं देश के नागरिको के सम्मुख रख सकेंगे और सड़क पर आकर तमाशा करने को विवश नागरिको की संख्या में तेजी से गिरावट आने लगेगी। . इसे जिला, राज्य एवं राष्ट्रिय स्तर पर कल की तारीख में लागू किया जा सकता है। ड्राफ्टिंग मैंने निचे दी है। पीएम या सीएम को सिर्फ इस पर साइन करके अशोक स्तम्भ का ठप्पा लगाना है, और गैजेट में छाप देना है। इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए किसी प्रकार के अतिरिक्त विभाग की जरूरत नहीं है। गैजेट में आने के साथ ही लगभग नगण्य बजट में यह प्रक्रिया 30 दिनों में लागू हो जायेगी, और 90 दिनों में विधिवत रूप से काम करने लगेगी। . (जिला कलेक्टर के लिए आदेश ) (1) यदि कोई मतदाता कलेक्टर कार्यालय में उपस्थित होकर कोई भी शपथपत्र प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर डालने का अनुरोध करता है तो कलेक्टर प्रति पृष्ठ 20 रूपये की दर से शुल्क ले कर यह शपथपत्र स्वीकार करेगा और इसे स्कैन करके प्रधानमन्त्री की वेबसाईट पर इस तरह रखेगा कि कोई भी नागरिक बिना लॉग इन के इसे देख सके। यदि अर्जी जिला स्तर की है तो इसे जिला वेबसाइट पर और यदि अर्जी राज्य के विषय की है तो इसे मुख्यमंत्री की वेबसाइट पर रखा जाएगा। . (पटवारी के लिए आदेश ) (2) यदि कोई मतदाता पटवारी की कचहरी में अपनी वोट वापसी पासबुक / मतदाता पहचान पत्र के साथ उपस्थित होकर किसी शपथपत्र पर हां या नहीं दर्ज करवाता है तो पटवारी मतदाता की हाँ / नहीं को अपने कम्प्यूटर में दर्ज करेगा और मतदाता से 3 रुपये ले कर बदले में छपी हुयी रसीद देगा। BPL कार्ड धारक के लिए फ़ीस 1 रुपया होगी। पटवारी मतदाता की हाँ / नहीं को पारदर्शी तरीके से पीएम / सीएम की वेबसाइट पर भी रखेगा। . (कलेक्टर के लिए आदेश ) (3) कलेक्टर ऐसा सिस्टम बनायेंगे कि मतदाता अपना मोबाइल नंबर पटवारी / तहसील / कलेक्टरी / सिविक सेंटर / नागरिक सेवा केंद्र में जाकर रजिस्टर्ड करवा सके, ताकि मतदाता अपनी हाँ / ना SMS या किसी मोबाइल APP के माध्यम से दर्ज कर सकते है। यदि मतदाता किसी एफिडेविट पर हाँ / ना SMS या APP के माध्यम से दर्ज करते है तो इसके लिए शुल्क का निर्धारण कलेक्टर करेगा। . (सूचना सचिव ) (4) नेशनल इन्फार्मेटिक्स सेंटर (NIC) के प्रभारी सचिव को आदेश जारी किये जाते है कि वे ऐसी आवश्यक वेबसाइट आदि की रचना करे जिससे कलेक्टर, पटवारी आदि ऊपर दी गयी धाराओं में दर्ज प्रक्रिया को लागू कर सके। . (5) सभी नागरिको के लिए सूचना एवं निर्देश : . यह कानून लागू होने के बाद, अपने ज़िला कलेक्टर कार्यालय में जाकर अपना कोई भी एफिडेविट क्लर्क को जमा करवा सकते है। यह एफिडेविट कोई शिकायत या आपके द्वारा प्रस्तावित कानून, सलाह, मांग, अनुरोध या अन्य कोई याचनात्मक समाधान हो सकता है। एफिडेविट स्वीकार करने के दौरान कलेक्टर आपसे आपका मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड , वोट वापसी पासबुक लाने के लिए कह सकता है और आपसे शून्य से लेकर पांच गवाह तक, जो कि आपको निजी रूप से जानते हो, लाने के लिए भी कह सकता है। क्लर्क आपकी फोटो और फिंगरप्रिंट भी ले सकता है। यदि आप एक बार एफिडेविट फ़ाइल कर देते है तो बाद में आप उसे हटा नहीं सकेंगे। अदालत के आदेश को छोड़कर किसी भी अधिकारी को आपके एफिडेविट को हटाने की अनुमति नहीं होगी। और साथ ही आपको इस बारे में भी सूचित किया जाता है कि - कोई अदालत आपको एफिडेविट में अनुचित जानकारी देने के लिए या किसी भी अनुचित मानहानिकारक ( या निन्दात्मक ) कथन के लिए सजा दे सकती है। आपको भारत भर में दर्ज सभी एफिडेविटो पर हाँ / ना दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है। ये आपकी पसंद पर निर्भर है कि आप किस एफिडेविट पर विचार करना चाहते और किस एफिडेविट को नकारना चाहते है। जिस भी एफिडेविट पर आप हाँ / ना दर्ज करना चाहते है, उन पर अपनी राय दर्ज करवा सकते है। किसी भी एफिडेविट पर हाँ / ना दर्ज करने पर आपको कोई भी सजा नहीं होगी, तब भी जबकि अमुक एफिडेविट में कोई अनुचित या निन्दात्मक कथन है। आप अपना मोबाइल नंबर मतदाता सूची का रखरखाव करने वाले क्लर्क को दर्ज करवा सकते है। अमुक फ़ोन नंबर आपके नाम पर या आपके नजदीकी पारिवारिक सदस्य के नाम पर होना चाहिए। यदि आप अपना मोबाईल नंबर दर्ज करवाते है तो जब भी आप कोई एफिडेविट फ़ाइल करेंगे या किसी एफिडेविट पर हाँ / ना दर्ज करेंगे तो आपको फीडबैक के लिए एक एस एम एस प्राप्त होगा। यह एस एम एस उसी तरह का होगा जैसा एटीएम आदि से नकदी निकालने पर खाताधारक को प्राप्त होता है। और यदि कोई अन्य व्यक्ति छल द्वारा आपके नाम पर एफिडेविट फ़ाइल करने का प्रयास कर रहा है या आपके नाम से हाँ / ना दर्ज करवा रहा है तब भी आपको ऐसा एस एम एस प्राप्त होगा। इस स्थिति में आप पुलिस में शिकायत कर सकते है। आपको वोटर कार्ड जैसा एक मैगनेटिक कार्ड ( एटीएम कार्ड के समान ) भी दिया जा सकता है, और तलाटी कार्यालय के पास एटीएम जैसी मशीन भी लगवायी जा सकती है, ताकि आप मशीन में किसी एफिडेविट का नंबर डाल कर उस पर अपनी हाँ / ना दर्ज कर सके। उपलब्ध होने पर आप इस सुविधा का उपयोग कर सकते है। इस सिस्टम में प्रत्येक हाँ / ना दर्ज करने या बदलने पर आपको 1 रू शुल्क चुकाना होगा। . (6) मुख्यमंत्री, मेयर, जिला / तहसील / ग्राम सरपंचों के लिए टिप्पणी : आप इस कानून में वांछित बदलाव करके ( जैसे प्रधानमंत्री शब्द को मुख्यमंत्री या मेयर आदि से बदलकर और अन्य आवश्यक परिवर्तन करके ) पारित कर सकते है, एवं राज्य / नगर / जिला / तहसील / ग्राम स्तर पर ऐसा टी सी पी क़ानून लागू कर सकते है। . 1.1. यह क़ानून क्या बदलाव लाएगा ? इस प्रकिया के आने से विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ता, समर्थक एवं वोटर किसी मुद्दे पर अपनी मंशा प्रकट करने के लिए एसोसिएट हो सकेंगे। उदाहरण के लिए, मैं बीजेपी=संघ का समर्थक या मतदाता नहीं हूँ, लेकिन यदि मैं बीजेपी द्वारा छापे गये CAB के कानून का समर्थन करना चाहता हूँ तो मैं बिना बीजेपी का समर्थन किये भी इस क़ानून के पक्ष में अपनी सहमती दर्ज करवा सकूँगा। इस तरह यह क़ानून मतदाता को यह सुविधा देता है कि वह मतदान के बाद भी सरकार के अच्छे फैसलों का समर्थन कर सके, चाहे वह अमुक सरकार का समर्थक हो या नहीं हो !! दुसरे शब्दों में यह क़ानून उन लोगो को भी अच्छे मुद्दों को आगे बढाने के लिए एकजुट कर देता है, जो प्रतिद्वंदी पार्टियों/ विचारधाराओं के है । इस क़ानून के आने के बाद ज्यादातर नागरिको को किसी फैसले का समर्थन एवं विरोध करने के लिए या अपनी मांग रखने के लिए सड़को पर आकर मजमा लगाने की जरूरत नहीं रह जायेगी। प्रदर्शन वगेरह करने के लिए जिस फुर्सत, फितरत एवं ऊर्जा की जरूरत होती है, ज्यादातर लोग इससे वंचित होते है। इस तरह के प्रदर्शन करने में रुचि रखने वालो की संख्या सिर्फ 0.01% होती है किन्तु सड़को पर आने के कारण इनकी ही राय नजर आती है, और ये डोमिनेट करने लगते है। लेकिन इस क़ानून के आने के बाद शेष 99% के पास भी सड़को पर आये बिना अपनी राय प्रकट करने का विकल्प आ जाएगा। . 1.2. पेड मीडिया, एवं सभी राजनैतिक पार्टियाँ इस क़ानून का विरोध क्यों कर रहे है ? . मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों एवं नेताओं के पास मजमा लगाने का मेकेनिज्म एवं संसाधन होते है। अत: ये लोग 5-10 शहरो में 1-2 लाख लोगो को इकट्ठा करके यह स्थापित कर देते है कि जनता अमुक फैसले का विरोध / समर्थन कर रही है। और फिर पेड मीडिया यह मजमा पूरे देश को दिखाकर कह पाता है कि – अधिकांश लोग इसका विरोध / समर्थन कर रहे है !! दुसरे शब्दों में वे जनता की मंशा की व्याख्या अपने मन मुताबिक कर पाते है। . उदाहरण के लिए, भारत में 90 करोड़ मतदाता है। लेकिन पेड मीडिया द अन्ना के 1 लाख लोगो को बार बार दिखाकर यह भ्रम खड़ा कर देता है कि पूरा देश जनलोकपाल के लिए मरा जा रहा है !! और कैब के साथ भी यही हो रहा है। यदि टीसीपी होता तो यह साफ़ नजर आता था कि आज दिल्ली में 10 हजार लोगो ने कैब के विरोध में प्रदर्शन किया लेकिन 5 लाख लोगो ने इसके समर्थन में स्वीकृति दी है !! और तब पेड मीडिया यह रिपोर्ट नहीं कर पाता कि – देखो, दिल्ली में लोग कैब का विरोध कर रहे है !! क्योंकि तब लोग देख सकते थे कि पेड मीडियाकर्मी झूठ बोल रहा है !! . दूसरे शब्दों में, यह क़ानून जनता की राय की व्याख्या करने का अधिकार पेड मीडिया एवं राजनेताओ से छीन लेता है !! . इसीलिए पेड मीडिया के स्पोंसर्स भारत में ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं चाहते जिससे भारत के आम नागरिक शान्तिप्रद तरीके से अपनी सहमती / असहमति दर्ज करवा सके। और इस क़ानून की जरूरत को रफा दफा करने के लिए पेड रविश कुमार जैसे पत्रकार लगातार यह लेक्चर देते है कि, लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए नागरिको को आवाज उठाने के लिए बाहर निकलना चाहिए। . मतलब काम धंधा छोड़कर भारत के करोड़ो लोग सड़क पर आ जाए !! यूँ !!! . तो पहले वे टीसीपी जैसे क़ानून का विरोध करते है, ताकि एक आम नागरिक को अपनी अधिकृत सहमती / असहमति पारदर्शी एवं सत्यापित तरीके से दर्ज करने से वंचित किया जा सके, और फिर वे नागरिको को चाबी देते है कि यदि तुम जागे हुए हो तो लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़को पर आओ !! क्योंकि वे जानते है कि अपना काम धंधा छोड़कर कोई भी हफ्तों हफ्तों के लिए सड़क पर मजमा लगाने के लिए नहीं आने वाला है !! . 1.3. यदि सड़को पर प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ेगी तो अन्ततोगत्वा यह हिंसक हो जाएगा !! . फर्स्ट राउंड में, यदि प्रदर्शनकारीयों की संख्या कम रहेगी तो हिंसा की सम्भावना भी कम होगी। तब विरोध करने वालो का झुण्ड कहेगा कि लोग “जागरुक” नहीं है, इसीलिए सड़को पर नहीं निकल रहे है। और सरकार कहेगी कि जनता हमारे साथ है, अत: प्रदर्शनकारियो को समर्थन नहीं मिल रहा है !! . सेकेण्ड राउंड में, यदि प्रदर्शन कारियों की संख्या बढती है तो हिंसा होने की सम्भावना भी बढ़ जायेगी। जैसे जैसे सड़को पर लोगो की संख्या बढ़ेगी वैसे वैसे प्रदर्शन का आयोजन करने वाले लोगो के हाथ से नियंत्रण निकल जाएगा, और हिंसा होनी शुरू हो जायेगी। कैसे ? यदि किसी प्रदर्शन में 5,000 लोगो मौजूद है तो हिंसा शुरू करने के लिए सिर्फ 5 लोग चाहिए । और 5 लोग हिंसा की शुरुआत कर दें तो अगले 2 मिनिट में इस समूह के 100 लोग इन्हें जॉइन कर लेंगे और हिंसा का पैमाना बड़ा हो जाएगा !! सरकार को जब प्रदर्शन कारियों की बैंड बजानी होती है तो वे अपने 100-50 आदमी इस झुण्ड में शामिल कर देगी और वे मौका देखकर हिंसा / लूटपाट शुरू कर देंगे !! सरकार धारा 144 लागू कर देगी जिससे प्रदर्शन करने वालों को लगेगा कि हमें दबाया जा रहा है। अत: यह उन्हें हिंसा करने के लिए उकसायेगा । यदि समूह में युवाओ की संख्या मौजूद है तो हिंसा की सम्भावना बेहद बढ़ जाती है !! जनता का ध्यान आकर्षित करने और सरकार पर दबाव बनाने के लिए भी बहुधा प्रदर्शनकारी जानबूझकर हिंसा का सहारा लेते है। . दुसरे शब्दों में किसी भी प्रकार के प्रदर्शन का पैमाना बढ़ने लगेगा तो अंत में इसे हिंसक होना ही है। हाँ यदि प्रदर्शन का तरीका ऐसा है कि जमाव किसी खाली मैदान / चारदीवारी / स्टेडियम आदि में किसी सभा के रूप में किया जा रहा है, तो यह हिंसक नहीं होगा। लेकिन ऐसे प्रदर्शन को यदि मीडिया कवरेज नहीं है तो इस प्रदर्शन का प्रभाव शून्य होता है। जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए यह जरुरी है कि इसे सार्वजनिक खुली जगहों जैसे सड़क आदि पर किया जाए, और जब आप सड़को पर आयेंगे तो हिंसा की सम्भावना बढ़ जायेगी। . अब मान लीजिये कि फिर भी यदि हिंसा नहीं हो रही है और आन्दोलन बढ़ता जा रहा है तो सरकार के पास किसी आन्दोलन को रफा दफा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे हिंसक बना दिया जाए। और सरकार के पास किसी भी आन्दोलन को हिंसक बना देने के दर्जनों तरीके है। . कुल मिलाकर यदि प्रदर्शन का पैमाना बढेगा तो अंतत यह हिंसक हो जायेगा, और यदि यह हिंसक नहीं हो रहा है तो सरकार इसे हिंसक बना देगी। और फिर हम भारत के सभी बुद्धिजीवियों को इस बिंदु पर एक अंतहीन बहस करते देखेंगे कि, हिंसा की शुरुआत किसने की थी ? पुलिस ने या प्रदर्शनकारियों ने !! वे इस बहस को फिर महीनो तक रगेद सकते है, और उसके बाद ये जीनियस लोग “जांच कराए जाने” पर सहमत हो जायेंगे !! और फिर सरकार खुद के खिलाफ आरोपों की जांच खुद ही जांच करेगी !! . लेकिन ये बुद्धिजीवी इस बात पर कभी भी चर्चा नहीं करेंगे कि नागरिको के पास ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए जिससे आम नागरिक अपनी सहमती / असहमति शांतिपूर्ण तरीके से दर्ज करवा सके। वे पहले लोकतंत्र के नाम पर लोगो को सड़को पर ठेलेंगे और फिर कहेंगे कि — अहिंसक तरीके से प्रदर्शन करो !! और ये सभी बुद्धिजीवी इस बात से वाकिफ है कि प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ेगी या सरकार मांगे नहीं मानेगी तो अंत में हिंसा शुरू होनी ही है। इसे किसी भी तरह से न तो कंट्रोल किया जा सकता है, और न ही रोका जा सकता है। . यही वजह है कि, भारत में पिछले 70 सालों से जो भी प्रदर्शन बढ़ना शुरू होते है, अंत में वे हिंसक हो ही जाते है। . इस सर्कस में कमी लाने के लिए हमें टीसीपी जैसी प्रक्रिया की जरूरत है । ऐसी प्रक्रिया लाने की जगह हमारे चारो और ऐसे बुद्धिजीवी है जो पहले लोकतंत्र के नाम पर लोगो को सड़को पर धकेलते है, फिर पुलिस को उनको सामने भेजते है ताकि पत्थरबाजी, आंसू गैस, आगजनी, गोलियां, लाठी, तोड़फोड़ आदि का सामान तैयार किया जा सके !! . टीसीपी के आने बाद भी प्रदर्शन होते रहेंगे और लोकतंत्र में प्रदर्शन होने भी चाहिए। लेकिन तब प्रदर्शनो के हिंसक होने की सम्भावना काफी कम हो जायेगी। क्योंकि तब प्रदर्शनकारी यह मोरल ग्राउंड खो देंगे कि, हमें सुना नहीं जा रहा है, और इसीलिए हम सड़क पर आकर जमाव बना रहे है !! . अत: टीसीपी आने के बाद सड़को पर जो प्रदर्शनकारी आयेंगे वे शांति प्रिय ढंग से प्रदर्शन करेंगे. क्योंकि उनमे यह भय रहेगा कि यदि हमने हिंसा की तो आम नागरिक की नजर में हम गिर जायेंगे, और चूंकि अब आम नागरिक टीसीपी का प्रयोग करके उनके प्रदर्शन का भी समर्थन / विरोध कर सकता है, अत: वे बेहद अनुशासन से प्रदर्शन करेंगे। . दूसरो शब्दों में प्रदर्शनकारी तब ज्यादा शालीनता एवं ज्यादा सभ्य तरीके से पेश आने लगेंगे। वे संवाद बनाने की कोशिश करेंगे ताकि नागरिक उनके बिंदु का समर्थन करें. इस तरह टीसीपी प्रदर्शनकारियों पर जनता का अंकुश ले आता है। और इससे सरकार पर भी अंकुश आएगा कि वह प्रदर्शनकारियो का जाया दमन न करे, क्योंकि तब नागरिक सरकार के कदम का विरोध करने के लिए टीसीपी का इस्तेमाल करना शुरू कर सकते है। . और यदि तब भी प्रदर्शन में हिंसा होती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रदर्शनकारियो की होगी और पुलिस बिना आरोप झेले उनसे हाथ खोलकर निपट सकती है !! . (2) पेड मिडिया को ठीक करने के लिए दूरदर्शन अध्यक्ष को वोट वापसी के दायरे में लाना। . पेड मीडिया इस तरह के प्रदर्शनों को किस तरह चाबी देता है, इस बारे में आप सभी अच्छे से वाकिफ है। पेड मीडिया एकाधिकार वाला धंधा है। यदि मुख्यधारा का एक भी चैनल सच्ची ख़बरें दिखाना शुरू कर दे तो भ्रम फैलाने वाले सभी चैनल एक्सपोज होने लगेंगे, और अपने दर्शक खो देंगे। दूरदर्शन अकेला इतना ताकतवर है कि हम इसके माध्यम से पेड मीडिया को ठीक कर सकते है। . दूरदर्शन के पास बेहद विशाल संसाधन और संपत्तियां है, और कोई कारण नहीं कि दूरदर्शन अन्य निजी चैनल्स से अच्छा प्रदर्शन न कर सके। वोट वापसी पासबुक के दायरे में आने के बाद दूरदर्शन अध्यक्ष यह सुनिश्चित करेगा कि देश के सभी नागरिको तक सभी महत्व्पूर्ण जानकारी पहुंचे। इससे सभी निजी चैनल मिलकर भी किसी खबर को छुपा नहीं पाएंगे। अत: सच को छुपाने के लिए किये जा रहे भुगतान के व्यर्थ हो जाने के कारण धनिक वर्ग न्यूज चैनल्स को पेमेंट करना बंद कर देंगे। . (3) हाईजेक्ड सोशल मिडिया को रेगुलेट करने और अदालतें-पुलिस को सुधारने के लिए जूरी कोर्ट। . भारत में कोई भी आदमी फेक एकाउंट बनाकर कुछ भी अपलोड कर सकता है, और फिर हमारे पास ऐसे करोड़ो यूजर है जो बिना यह जाने कि यह सामग्री फेक है या असली, इसे सर्कुलेट कर सकते है !! दुसरे शब्दों में हमारे पास इस ऑनलाइन बारूद को रोकने का कोई मैकेनिज्म नहीं है। शिकायत करने के लिए कोई प्रक्रिया नहीं है। कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त पुलिस नहीं है। और फिर सजा सुनाने के लिए त्वरित अदालतें नहीं है !! फेसबुक को डिजाइन ही इस तरह से किया गया है कि फेसबुक चाहे तो 3 दिन के अंदर पूरे देश में आग लगा सकता है, और यह आपको कभी नजर नहीं आएगा कि यह काण्ड फेसबुक ने किया है !! . दुसरे शब्दों में , सभी को सभी कुछ लिखने, अपलोड करने की आजादी है !! . व्यवस्थागत सुधार के लिए मेरा प्रस्ताव जूरी कोर्ट का है। जूरी कोर्ट क़ानून आने के 3 महीने के भीतर सोशल मीडिया से अश्लीलता, फेक आईडी, गाली गलौज, ट्रोलिंग, महिलाओ का वाचिक उत्पीड़न, फेक वीडियो, फेक न्यूज आदि सामग्रियों में लगभग 70% तक की कमी आ जायेगी। अंतिम समाधान कम्युनिकेशन में एफडीआई को रोकना है। किन्तु जूरी कोर्ट अपने आप में इतना ताकतवर है कि एफडीआई जारी भी रहती है तो समस्या में 70% तक की गिरावट आ जायेगी। . फेसबुक के फंक्शन एवं समाधान के बारे में अतिरिक्त जानकारी आप इस जवाब में देख सकते है - Pawan Jury का जवाब - फेसबुक क्या है? . 3.1. सोशल मीडिया पर आने वाली फेक न्यूज को रोकने के लिए कुछ पोपुलर लेकिन फर्जी समाधान : किसी भी व्यवस्था में गड़बड़ी फैलाने वालो की संख्या बेहद कम ( 0.1% ) होती है। जब इन 0.1% को रोकने एवं दण्डित करने के लिए हमारे पास पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती तो गड़बड़ी फैलाने वालो का हौंसला बढ़ने लगता है, और इससे गड़बड़ी करने वालो की संख्या में भी इजाफा होता है। मैं गड़बड़ी फैलाने वाले इन 0.1% लोगो को रोकने में मानता हूँ, और इनमें से ज्यादातर को सिर्फ क़ानून एवं दंड द्वारा ही रोका जा सकता है। किन्तु कई लोग इसकी जगह पर निचे दिए गए तरीके सुझाते है : . बुद्धिजीवीयों का कहना होता है कि, हमें इन शेष 99.9% लोगो को सुधारने के लिए नैतिक पतन पर लेक्चर देने चाहिए, उन पर लानत भेजनी चाहिए और उन्हें कोस कर भर्त्सना करनी चाहिए। इससे लोगो में जागरूकता आएगी और बदलाव आने लगेगा !! हालांकि इससे गड़बड़ी फैलाने वालो की हरकतों में कोई बदलाव नहीं आता। दरअसल इन बुद्धिजीवियों का उद्देश्य होता है कि इन 0.1% लोगो का हवाला देकर शेष सभी लोगो को कोसा जा सके। क्योंकि बुद्धिजीवी बनने की यह कॉमन प्रेक्टिस है कि खुद को बुद्धिजीवी दिखाने के लिए शेष भारतीयों को कोसा जाये !! पेड रविश कुमार का मानना है कि सोशल मीडिया को रेगुलेट करने के लिए हमें किसी क़ानून की आवश्यकता पर बात नहीं करनी चाहिए। इसकी जगह हमें एल्ट न्यूज जैसे चेनल में पीछे से पैसा लगाना चाहिए और फिर एनडीटीवी पर आकर बताना चाहिए कि यदि आप जानना चाहते हो कि कौनसी न्यूज फेक है तो एल्ट न्यूज देखो !! इससे आपको दोहरा फायदा होता है। आपको क्रेडिट भी मिलता है और पैसा भी !! मैं इसे समस्या में ही समाधान खोज निकालना कहता हूँ। जैसे कोई व्यक्ति फर्स्ट राउंड में लोगो को देशी गाय के घी के फायदे और देशी गाय की कम होती संख्या के बारे सूचित करता है, और फिर सेकेण्ड राउंड में देशी गाय को बचाने के लिए आवश्यक कानून लागू करवाने का प्रयास करने की जगह खुद ही देशी घी बेचने का कारोबार करने लगता है। ( पतंजलि के ब्रांड एम्बेसेडर ने भी स्वदेशी आन्दोलन का समाधान कुछ इसी तरह से निकाला है !! ) कई अन्य पेड पत्रकार एवं पेड न्यूज चेनल मानते है कि यदि सोशल मीडिया पर 100 फेक न्यूज चल रही है तो हमें उनमे से उन 4 खबरों को एक्सपोज कर देना चाहिए जिन्हें एक्सपोज करने के लिए हमें पेमेंट मिली हो। पेड सुधीर चौधरी इस तरीके में ज्यादा विश्वास करते है !! जहाँ तक राजनैतिक दलों की बात है, यह व्यवस्था उनके फायदे की है। क्योंकि इस तरह के हड़बोंग में वे अपनी आईटी सेल्स के माध्यम से जनता को चयनित दिशा में सोचने के लिए धकेल सकते है !! अत: वे कहते है कि भारत की जनता समझदार है, और उन्हें सब पता है कि कौनसी खबर असली है, और कौनसी फेक है !! . बहरहाल , मैं इस तरह के सभी प्रस्तावों को खारिज करता हूँ, और मेरा मानना है कि टीसीपी, जूरी कोर्ट एवं वोट वापसी क़ानून लाकर इस तरह के प्रदर्शनों में होने वाली हिंसा में काफी हद तक कमी लायी जा सकती है । . यदि आप अपने जिले / राज्य / देश में टीसीपी एवं जूरी कोर्ट क़ानून चाहते है तो प्रधानमंत्री या अपने मुख्यमंत्री से इसकी मांग कर सकते है। मांग करने के लिए उन्हें पोस्टकार्ड या ट्विट भेजे। पोस्टकार्ड या ट्विट में यह लिखें —- #TCP , #JuryCourt . मुझसे कई कार्यकर्ता बहुधा यह पूछते है कि कौनसा पत्रकार सच्ची पत्रकारिता करता है, और किस चैनल पर भरोसा किया जाना चाहिए। मैं आपसे आग्रह करूँगा कि यह जानने के लिए आप निचे दिए गए कदम उठाये : . (i) अपने फेवरेट पत्रकार को टीसीपी की ऊपर दी गयी 5 धाराओं का पीडीऍफ़/टेक्स्ट भेजें। इसके लिए आप उन्हें ट्विट या मेल कर सकते है। (i) उनसे कहे कि, आपका मानना है कि यदि यह क़ानून गेजेट में प्रकाशित हो जाता है तो भारत की व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव आएगा । (iii) उनसे कहें कि, यदि यह क़ानून दोषपूर्ण है तो क्या वे इससे बेहतर प्रक्रिया का सुझाव दे सकते है, जिससे भारत के नागरिक अपनी बात अधिकृत एवं पारदर्शी तरीके से सरकार के सम्मुख रख सके। (iv) उनसे कहें कि, क्या वे एक नागरिक के तौर पर इस क़ानून को गेजेट में छापने के लिए प्रधानमंत्री को एक पोस्टकार्ड या ट्विट भेज सकते है । . यदि आप अपने फेवरिट पत्रकार से इस तरह का संवाद स्थापित करने का प्रयास करेंगे तो जल्दी ही ऐसे पत्रकार को खोज लेंगे जो देश की व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाने में रुचि रखता है !! . ===============
- सामाजिक सुरक्षा पेंशन// 🙏🙏 ग्राम पंचायत राज बेरई उत्तरी वार्ड नं 02 में पेंशन को लेकर बातचीत 2026 बिहार1
- NS 27 simri tu Darbhanga road mein ghatna hua hai lekin Jaan Mal ka Koi nuksani nahin Hai4
- Post by Chhotu Kumar1
- Darbhanga में अतिक्रमण हटाने पहुंचे नगर निगम की टीम और गृहस्वामी में तीखी नोकझोंक, कुछ देर तनाव! #Darbhangapolice #MurderCase #murders #BulldozerPower #BulldozerBaba #BulldozerAction #CrimeUpdate #police #CrimeNews #crimnal #BREAKING #darbhanga #BiharNews #darbhangadiaries #darbhanganews #breakingnews #bigupdate #bihardarbhanga #breakingnewstoday #mithila #darbhangasamachar #darbhangamithila #bihar #darbhanga_mithila #Newsupdate #murder #PoliceAction #Bihar #new #news1
- bihar प्रशांत किशोर ने कहा आप अपने बच्चों का भबीष्य देखिये नेताओं के बच्चे सेट है उनको बिरासत मे गद्दी मिलती है1
- आनन्दपुर सहोड़ा पंचायत के पंचायत सरकार भवन जो वर्षों से गांव के ही वीर कुमार शर्मा द्वारा अतिक्रमण कर दो झोपड़ी बनाया गया था जिसको लेकर पंचायत के मुखिया और मिथिला स्टूडेंट यूनियन की भूख हड़ताल जिसको समर्थन मुखिया नागेश्वर दास और मनीष सिंह ने समर्थन दिया था भारी पुलिस बल और अंचलाधिकारी के मौजूदगी में एपीएम थाना अध्यक्ष ने झोपड़ी पर चलवाया बुलडोजर1
- Post by Arvind Kumar News 7 Samastipur1
- Bihar सरकार के 100 दिन पर उपमुख्यमंत्री सह राजस्व भूमि सुधार बिभाग मंत्री बिजय सिन्हा को सुनिए जनता से किया बादा निभाएंगे1