बबुरहवा गांव का रहस्यमय गोलीकांड: राम बाहल यादव की मौत पर सुलगते सवाल, कब थमेगी प्रशासनिक लीपापोती? अजीत मिश्रा (खोजी) छावनी थाना क्षेत्र में सनसनी: घर में सुरक्षित नहीं आम आदमी, पुलिसिया दावों की खुली पोल बबुरहवा गांव का रहस्यमय गोलीकांड: राम बाहल यादव की मौत पर सुलगते सवाल, कब थमेगी प्रशासनिक लीपापोती? क्या घरों तक पहुंच चुके हैं अवैध हथियार? बस्ती में हुई संदिग्ध मौत ने खड़े किए गंभीर सुरक्षा संबंधी प्रश्न बस्ती जिले के छावनी थाना क्षेत्र अंतर्गत बबुरहवा गांव में हुई राम बाहल यादव की संदिग्ध मौत ने एक बार फिर स्थानीय कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है। घर जैसी सुरक्षित चारदीवारी के भीतर एक अधेड़ व्यक्ति को गोली लग जाना और पुलिस का यह रटा-रटाया बयान सामने आना कि "मामले की सभी पहलुओं से जांच की जा रही है," प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। घटना गुरुवार शाम की है, लेकिन यह सवाल अपने आप में गंभीर है कि आखिर पचास वर्षीय राम बाहल यादव के घर में रहस्यमय परिस्थितियों में गोली चली कैसे? क्या ग्रामीण इलाकों में अवैध हथियारों की पहुंच इतनी आसान हो गई है कि अब लोग अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं हैं? जब घर के भीतर इस तरह की सनसनीखेज वारदातें होने लगें, तो पुलिस के चौबीसों घंटे गश्त और सुरक्षा के दावे केवल कागजी जुमले साबित होते हैं। क्षेत्राधिकारी के स्तर से यह बयान आना कि "वास्तविक परिस्थितियों का पता जांच के बाद ही चलेगा," महज़ लीपापोती की शुरुआत प्रतीत होती है। आखिर कब तक पुलिस हर बड़ी घटना के बाद केवल औपचारिकताएं पूरी करती रहेगी? यदि खुफिया तंत्र और स्थानीय पुलिस का खौफ अपराधियों के मन में होता, तो इस तरह सरेआम या घर के भीतर गोलियां चलने की हिम्मत किसी की नहीं होती। बबुरहवा गांव में इस घटना को लेकर दबी जुबान से चल रही तरह-तरह की चर्चाएं इस बात की गवाही दे रही हैं कि जनता में भय और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर अविश्वास गहराता जा रहा है। अब जरूरत इस बात की है कि पुलिस महकमा इस मामले को महज एक और 'संदिग्ध मौत' मानकर फाइलों में बंद करने की भूल न करे। घटना के पीछे छिपी असल सच्चाई, हथियारों के स्रोत और इसके वास्तविक कारणों को जल्द से जल्द बेनकाब किया जाना चाहिए। यदि इस मामले में त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह प्रशासनिक विफलता जनता का कानून से बचा-कुचा भरोसा भी पूरी तरह तोड़ देगी।
बबुरहवा गांव का रहस्यमय गोलीकांड: राम बाहल यादव की मौत पर सुलगते सवाल, कब थमेगी प्रशासनिक लीपापोती? अजीत मिश्रा (खोजी) छावनी थाना क्षेत्र में सनसनी: घर में सुरक्षित नहीं आम आदमी, पुलिसिया दावों की खुली पोल बबुरहवा गांव का रहस्यमय गोलीकांड: राम बाहल यादव की मौत पर सुलगते सवाल, कब थमेगी प्रशासनिक लीपापोती? क्या घरों तक पहुंच चुके हैं अवैध हथियार? बस्ती में हुई संदिग्ध मौत ने खड़े किए गंभीर सुरक्षा संबंधी प्रश्न बस्ती जिले के छावनी थाना क्षेत्र अंतर्गत बबुरहवा गांव में हुई राम बाहल यादव की संदिग्ध मौत ने एक बार फिर स्थानीय कानून-व्यवस्था और सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है। घर जैसी सुरक्षित चारदीवारी के भीतर एक अधेड़ व्यक्ति को गोली लग जाना और पुलिस का यह रटा-रटाया बयान सामने आना कि "मामले की सभी पहलुओं से जांच की जा रही है," प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। घटना गुरुवार शाम की है, लेकिन यह सवाल अपने आप में गंभीर है कि आखिर पचास वर्षीय राम बाहल यादव के घर में रहस्यमय परिस्थितियों में गोली चली कैसे? क्या ग्रामीण इलाकों में अवैध हथियारों की पहुंच इतनी आसान हो गई है कि अब लोग अपने ही घरों में सुरक्षित नहीं हैं? जब घर के भीतर इस तरह की
सनसनीखेज वारदातें होने लगें, तो पुलिस के चौबीसों घंटे गश्त और सुरक्षा के दावे केवल कागजी जुमले साबित होते हैं। क्षेत्राधिकारी के स्तर से यह बयान आना कि "वास्तविक परिस्थितियों का पता जांच के बाद ही चलेगा," महज़ लीपापोती की शुरुआत प्रतीत होती है। आखिर कब तक पुलिस हर बड़ी घटना के बाद केवल औपचारिकताएं पूरी करती रहेगी? यदि खुफिया तंत्र और स्थानीय पुलिस का खौफ अपराधियों के मन में होता, तो इस तरह सरेआम या घर के भीतर गोलियां चलने की हिम्मत किसी की नहीं होती। बबुरहवा गांव में इस घटना को लेकर दबी जुबान से चल रही तरह-तरह की चर्चाएं इस बात की गवाही दे रही हैं कि जनता में भय और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर अविश्वास गहराता जा रहा है। अब जरूरत इस बात की है कि पुलिस महकमा इस मामले को महज एक और 'संदिग्ध मौत' मानकर फाइलों में बंद करने की भूल न करे। घटना के पीछे छिपी असल सच्चाई, हथियारों के स्रोत और इसके वास्तविक कारणों को जल्द से जल्द बेनकाब किया जाना चाहिए। यदि इस मामले में त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह प्रशासनिक विफलता जनता का कानून से बचा-कुचा भरोसा भी पूरी तरह तोड़ देगी।
- अयोध्या में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। अयोध्या में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। वजीरगंज जप्ती स्थित शारदा निकेतन एसएन एकेडमी में जन्माष्टमी कार्यक्रम आयोजित हुआ। ब्रह्माकुमारी आश्रम में विद्यालय की ओर से हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कार्यक्रम हुआ। विद्यालय के प्रबंधक तनुज मल्होत्रा और प्रधानाचार्य कंचन मेहरोत्रा की मौजूदगी रही। शिक्षक-शिक्षिकाओं के सहयोग से कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। बच्चों ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की मनमोहक प्रस्तुति दी। श्रीकृष्ण-सुदामा मिलन का भावपूर्ण मंचन भी किया गया। बच्चों ने कृष्ण की विभिन्न लीलाओं को अपनी प्रस्तुतियों के जरिए जीवंत किया। आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का मन मोह लिया। जन्माष्टमी कार्यक्रम में बच्चों ने भक्ति, संस्कृति और उत्साह का सुंदर संगम प्रस्तुत किया।3
- अयोध्या। ट्यूशन पढ़ने गई किशोरी लापता, घटना का सीसीटीवी फुटेज आया सामने ब्रेकिंग अयोध्या। ट्यूशन पढ़ने गई किशोरी लापता, ट्यूशन पढ़ने वाले टीचर रोहित पर बहला फुसला कर किशोरी को भगा ले जाने का आरोप, स्कूटी पर बिठाकर ले जा रहा टीचर रोहित सीसीटीवी में आया नजर, किशोरी के पिता की तहरीर पर रोहित के खिलाफ मुकदमा दर्ज, पुलिस सीसीटीवी के आधार पर दोनों को कर रही तलाश, कोतवाली बीकापुर के जोहन गांव का मामला।2
- Available for Sale Item : भैंस Quantity Available : एक Price : 80000 City / Locality : पाली, अचलपुर, जिला अयोध्या Farming Sector : Livestock भैंस मूर्रा है1
- कृष्ण जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- महराज जी। कृष्ण जब अंधकार के बीच एक चेतना जन्म लेती है- महराज जी। अयोध्या। कृष्ण का जन्म उस रात हुआ था, जब बाहर भी अंधकार था और भीतर भी। मथुरा की कारागार में जन्मा वह बालक केवल देवकी और वसुदेव का पुत्र नहीं था; वह उस व्यवस्था के विरुद्ध जन्मी एक चेतना था, जो भय, अत्याचार और सत्ता के अहंकार पर खड़ी थी। शायद इसीलिए कृष्ण का जन्मोत्सव केवल धार्मिक उत्सव नहीं है। यह मनुष्य के भीतर प्रकाश के जन्म का उत्सव भी है। कृष्ण की कथा जितनी पुरानी है, उतनी ही आज की भी। समय बदला, राजसत्ताएँ बदलीं, शासन के तरीके बदले, समाज की संरचना बदली, लेकिन कंस का चरित्र समाप्त नहीं हुआ। हर युग में कोई न कोई सत्ता अपने अहंकार में मनुष्य की स्वतंत्रता को कुचलने लगती है। हर युग में भय को व्यवस्था का नाम दिया जाता है और मौन को विवेक समझ लिया जाता है। ऐसे समय में कृष्ण हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय के सामने निष्पक्ष रहना हमेशा न्याय के पक्ष में खड़ा होना नहीं होता। कृष्ण का जीवन विरोधाभासों का अद्भुत दर्शन है। उनके हाथ में बांसुरी है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर वही कृष्ण रणभूमि में सारथी बन जाते हैं। वे प्रेम के प्रतीक हैं, लेकिन अन्याय के सामने कठोर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते। वे राजमहल में भी सहज हैं और ग्वाल-बालों के बीच भी उतने ही अपने। उनकी यही व्यापकता उन्हें केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत रूप बनाती है। कृष्ण का दर्शन मनुष्य को भाग्य के भरोसे बैठने की शिक्षा नहीं देता। गीता में वे कर्म की ओर लौटाते हैं। उनका संदेश है कि मनुष्य अपने अधिकार और कर्तव्य से विमुख होकर जीवन की कठिनाइयों से मुक्त नहीं हो सकता। कर्म से पलायन शांति नहीं देता; वह केवल भीतर एक और युद्ध पैदा करता है। आज जब हम सफलता को परिणाम से और मनुष्य को उसकी उपयोगिता से मापने लगे हैं, तब कृष्ण का कर्मयोग हमें याद दिलाता है कि कर्म का मूल्य केवल उसके परिणाम में नहीं, उसकी निष्ठा में भी है। राजनीति के क्षेत्र में कृष्ण को समझना और भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। वे जानते थे कि सत्ता यदि लोककल्याण से कट जाए तो वह केवल शक्ति का प्रदर्शन बन जाती है। कंस का अंत इसलिए महत्वपूर्ण नहीं था कि एक राजा मारा गया; महत्वपूर्ण यह था कि भय के शासन के विरुद्ध न्याय की संभावना पैदा हुई। महाभारत में कृष्ण की राजनीति हमें एक और कठिन सत्य सिखाती है—अच्छे समाज के निर्माण के लिए केवल अच्छे इरादे पर्याप्त नहीं होते; विवेक, रणनीति और समय की पहचान भी आवश्यक होती है। उन्होंने युद्ध को उत्सव नहीं बनाया। उन्होंने शांति का प्रयास किया। लेकिन जब संवाद की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं और अन्याय अपनी सीमा पार कर गया, तब उन्होंने अर्जुन को कर्तव्य से भागने नहीं दिया। आज लोकतंत्र में हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी शायद यही है कि हम राजनीति को केवल सत्ता प्राप्त करने का साधन न बनने दें। राजनीति का अर्थ यदि जनता के जीवन को बेहतर बनाना है, तो उसमें कृष्ण का विवेक चाहिए—जहाँ नीति हो, लेकिन नीति के केंद्र में मनुष्य हो; जहाँ शक्ति हो, लेकिन शक्ति के ऊपर न्याय हो; जहाँ असहमति हो, लेकिन शत्रुता न हो। सामाजिक जीवन में भी कृष्ण की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। कृष्ण का लोकजीवन हमें बताता है कि संस्कृति केवल ऊँचे महलों और राजदरबारों में नहीं रहती। वह गाँव की गलियों में, लोकगीतों में, रिश्तों में, उत्सवों में और सामान्य मनुष्य की स्मृतियों में भी सांस लेती है। कृष्ण जितने राजाओं के हैं, उतने ही उस सामान्य जन के भी हैं जिसकी जिंदगी में उत्सव अक्सर कठिन परिस्थितियों के बीच आशा का एक छोटा-सा दीप होता है। इसीलिए जन्माष्टमी के अवसर पर हमें केवल कृष्ण की मूर्ति के सामने दीप नहीं जलाना चाहिए; हमें अपने भीतर भी यह देखना चाहिए कि कहीं कोई अंधकार तो नहीं पल रहा। क्या हम किसी कमजोर के साथ खड़े हैं? क्या हम अन्याय देखकर चुप तो नहीं हैं? क्या हमारी राजनीति समाज को जोड़ रही है या मनुष्यों के बीच दीवारें खड़ी कर रही है? क्या हमारा धर्म हमें अधिक संवेदनशील बना रहा है या केवल दूसरों को गलत साबित करने का हथियार बन गया है? कृष्ण की सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है कि वे हमें पूजा से आगे बढ़कर आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करते हैं। कृष्ण को जानना आसान है, कृष्ण को मानना भी आसान है; लेकिन कृष्ण को अपने आचरण में उतारना कठिन है। क्योंकि कृष्ण केवल बांसुरी की मधुरता नहीं हैं, वे अन्याय के विरुद्ध उठी हुई चेतना भी हैं। वे केवल राधा के प्रेम की स्मृति नहीं हैं, वे अर्जुन के संशय के बीच खड़ा हुआ विवेक भी हैं। वे केवल मंदिरों के देवता नहीं हैं, वे उस मनुष्य के भीतर की आवाज हैं जो अंधकार में भी प्रकाश की संभावना को बचाए रखना चाहता है। इस जन्माष्टमी पर यदि कृष्ण का जन्म सचमुच मनाना है, तो शायद हमें अपने भीतर तीन चीजों को जन्म देना होगा—विवेक, साहस और करुणा। विवेक ताकि हम सही और गलत में अंतर कर सकें। साहस ताकि सही के साथ खड़े हो सकें। और करुणा ताकि हमारी विजय किसी दूसरे मनुष्य की पराजय का उत्सव न बन जाए। कृष्ण की कथा हमें यह नहीं सिखाती कि जीवन में कभी अंधकार नहीं आएगा। वह तो यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, मनुष्य के भीतर प्रकाश को जन्म लेने से रोका नहीं जा सकता,और शायद इसीलिए कृष्ण का जन्म मथुरा की उस कारागार में एक बार नहीं हुआ था। वे हर उस क्षण जन्म लेते हैं, जब भय के विरुद्ध साहस खड़ा होता है,अन्याय के विरुद्ध न्याय आवाज उठाता है, और मनुष्य अपने भीतर के अंधकार पर प्रकाश को चुनता है। यही कृष्ण हैं,यही जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ है।1
- भारत ने नेपाल के लिए अपरेशन मदद मिशन के तहत मदद् कर रही है आओ मिलकर दुनिया वालो नेपाल में भारी तरस्दी को देखते हुए मदद करे उनका जीवन सावरे, मानवता यही कहती है जो सदेव मानवता को सबसे पहले और आगे हाथ बढ़ता है जीवन मानवता के साथ जीना चाहिए सुख दुःख सबके साथ आ सकता है जिस तरह से नेपाल में प्राकृतिक बढ़ आपदा में दुनिया को झकझोर कर रख दिया है वही पर मानवता के लिए भारत सबसे पहले हाथ बढ़ाया मदद के लिए , भारत ने अपरेशन मदद के तहत नेपाल में बचाव दल लगातार कार्य कर रही है ।। Aaj subah times।। ।। रिपोर्टिंग Lal Chand Soni,, भारत ने नेपाल के लिए अपरेशन मदद मिशन के तहत मदद् कर रही है आओ मिलकर दुनिया वालो नेपाल में भारी तरस्दी को देखते हुए मदद करे उनका जीवन सावरे, मानवता यही कहती है जो सदेव मानवता को सबसे पहले और आगे हाथ बढ़ता है जीवन मानवता के साथ जीना चाहिए सुख दुःख सबके साथ आ सकता है जिस तरह से नेपाल में प्राकृतिक बढ़ आपदा में दुनिया को झकझोर कर रख दिया है वही पर मानवता के लिए भारत सबसे पहले हाथ बढ़ाया मदद के लिए , भारत ने अपरेशन मदद के तहत नेपाल में बचाव दल लगातार कार्य कर रही है ।। Aaj subah times।। ।। रिपोर्टिंग Lal Chand Soni,,1
- शुक्रवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर बीकापुर कस्बा बाजार में निकल गई झांकी1
- कृष्ण जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने जारी किया पत्र बिग ब्रेकिंग अयोध्या। कृष्ण जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने जारी किया पत्र। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर संदेश महंत नृत्य गोपालदास जी महाराज ने देशवासियों को दी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं। स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण इस बार जन्माष्टमी पर मथुरा नहीं जाएंगे महंत नृत्य गोपालदास। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के नेतृत्व में साधु-संतों द्वारा कारसेवा के निर्णय पर साथ खड़े होने का दिया संकल्प। कृष्ण जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का जताया विश्वास । पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने की जताई उम्मीद। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के भी अध्यक्ष हैं महंत नृत्य गोपाल दास।3
- रामनगरी अयोध्या में भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की धूम,बाजारों में लड्डू गोपाल के सुंदर-सुंदर वस्त्र, मुकुट, बांसुरी, मोर पंख और झूले से दुकानें सजी रामनगरी अयोध्या में भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की धूम है। बाजारों में लड्डू गोपाल के सुंदर-सुंदर वस्त्र, मुकुट, बांसुरी, मोर पंख और झूले से दुकानें सजी हुई हैं। जन्माष्टमी को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। लोग अपने घरों में विराजमान लड्डू गोपाल के लिए नए कपड़े, मटकी, बांसुरी और सजावट का सामान खरीद रहे हैं। दुकानदार मूनू सैनी ने बताया - "हमारे पास मटकी है, बांसुरी है, भगवान की मूर्तियां हैं, मोर पंख है, मोर पंखी वाले झूले हैं, फूलों की सजावट का पूरा सामान है। हम 10 साल से ये दुकान लगा रहे हैं। इस दिन का इंतजार रहता है कि कब जन्माष्टमी आए। दुकानदारी ठीक चल रही है, सब लड्डू गोपाल की कृपा है।"2
- पर्यटन की दुनिया में आपका स्वागत है यदि आप किसी स्थल पर कही जाने का मुड़ बना रहे हैं तो सभी देश भर में नदी उफान पर चल रही है सवाधान सतर्कता से कही भी नदी में स्नान करे सिर्फ घाट पर ही स्नान करे, नही तो स्थानीय नागरिकों से पूछ ले की कहा पर स्नान करे, और यह भी ख्याल रखे की बीच धार मे स्नान नही करना चाहिए सावधानी बनाये रखे।।।। ।। Aaj subah times।। ।। रिपोर्टिंग Lal Chand Soni,, पर्यटन की दुनिया में आपका स्वागत है यदि आप किसी स्थल पर कही जाने का मुड़ बना रहे हैं तो सभी देश भर में नदी उफान पर चल रही है सवाधान सतर्कता से कही भी नदी में स्नान करे सिर्फ घाट पर ही स्नान करे, नही तो स्थानीय नागरिकों से पूछ ले की कहा पर स्नान करे, और यह भी ख्याल रखे की बीच धार मे स्नान नही करना चाहिए सावधानी बनाये रखे।।।। ।। Aaj subah times।। ।। रिपोर्टिंग Lal Chand Soni,,1