आर्टिकल 341 🔥 महासंग्राम: गांव की 'सीमा' से खदेड़ने और 'संविधान' से मिटाने की दोहरी साजिश का पर्दाफाश! 🔥 — "न जमीन बची, न पहचान: अब याचना नहीं, रण होगा!" मेरे आत्मीय समाज बंधुओं, आज यह लेख लिखते समय मेरी कलम भी कांप रही है, क्योंकि हमारे समाज के साथ जो छल हुआ है, वह इतिहास का सबसे काला अध्याय है। हमें दो तरफ से मारा गया है— एक तरफ "जमीन" से बेदखल करके, और दूसरी तरफ "संविधान" में हमारी पहचान मिटाकर। 1️⃣ पहला प्रहार: हमारे अस्तित्व और आवास पर (गांव की सीमा और तालाब का सच) इतिहास गवाह है कि हमारे साथ छुआछूत और भेदभाव का खेल सदियों से खेला गया। जरा अपने-अपने गांवों का नक्शा याद कीजिए। उच्च कुल के लोग और जमींदार हमेशा गांव के बीचों-बीच सुरक्षित और ऊंचे स्थानों पर महलों में रहे। लेकिन हम प्रजापति/कुम्हारों को कहाँ बसाया गया? हमें हमेशा "गांव की सीमा के बाहरी छोर" पर धकेला गया। हमें गांव के गंदे जोहड़ों (तालाबों), पोखरों और नालों के किनारे जगह दी गई। तर्क यह दिया गया कि "तुम्हें मिट्टी और पानी का काम है", लेकिन असलियत यह थी कि हमें मुख्य आबादी से दूर, गंदगी और उपेक्षा के बीच रहने पर मजबूर किया गया। 🚧 आज की 'नई डकैती' - सौंदर्यीकरण का खेल: हमारे पूर्वजों ने उस अपमान को सहा। उस कीचड़ और गंदगी के बीच रहकर भी हमने "सभ्यता का निर्माण" किया। उन जोहड़ों को अपने पसीने से सींचा और रहने लायक बनाया। लेकिन आज? आज जब शहर फैल गए हैं, गांवों की जमीनें सोना उगल रही हैं, तो सरकार और भू-माफियाओं की गिद्ध जैसी नजर हमारे उन आशियानों पर पड़ गई है। जिस जोहड़ के किनारे हम पीढ़ियों से बसे हैं, आज प्रशासन उसे "तालाब चौड़ीकरण" और "सौंदर्यकरण" के नाम पर हमसे छीन रहा है। * सवाल: जब वह जगह बंजर, गंदी और पानी से भरी थी, तब वह "कुम्हार की" थी। * आज: जब वह "प्राइम लोकेशन" बन गई, तो सरकार कह रही है कि हम अतिक्रमणकारी हैं? यह सिर्फ तालाब की खुदाई नहीं है, यह हमें दूसरी बार विस्थापित करने की साजिश है। पहले सामाजिक रूप से गांव के बाहर धकेला गया, अब आर्थिक रूप से बेघर किया जा रहा है। याद रखना, "जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है - क्योंकि उसे हमारे पूर्वजों ने आबाद किया है!" 2️⃣ दूसरा प्रहार: हमारी संवैधानिक पहचान पर (341 की चोरी और मुल्तानी साजिश) जमीन छीनने के साथ-साथ, राजनीतिक तंत्र ने हमारा "संवैधानिक हक" भी छीन लिया। आजादी के 75 साल बाद भी अगर कुम्हार समाज हासिए पर है, तो उसका कारण है— "जानकारी का अभाव"। ⚠️ साजिश का पर्दाफाश (हिंदू बनाम मुल्तानी कुम्हार): जब संविधान बन रहा था, तो आरक्षण की व्यवस्था जातियों की सामाजिक स्थिति पर आधारित थी। * सच्चाई: उस समय आर्टिकल 340 (OBC) की व्यवस्था मुख्य रूप से उन "मुल्तानी कुम्हारों" (मुस्लिम कम्युनिटी) के लिए की गई थी जो समाज की मुख्यधारा से अलग थे। * धोखा: शासन-प्रशासन ने एक गहरी साजिश रची। उन्होंने हम "हिंदू कुम्हारों" को—जो कि ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 'शिल्पकार' (Scheduled Caste) थे—जबरदस्ती ओबीसी (340) की भीड़ में धकेल दिया। हमें "हिंदू-हिंदू" का पाठ पढ़ाकर धर्म की अफीम चटा दी गई और हमारे असली हक (Article 341) से दूर कर दिया गया। 👇 340 (OBC) और 341 (SC) का असली अंतर समझिए: 🛑 अनुच्छेद 340 (OBC) - 'गुलामी का रास्ता': यह एक बहुत बड़ी भीड़ है। जिसमें दबंग और रसूखदार जातियां बैठी हैं। * कुम्हार समाज यहाँ सिर्फ 'वोट देने वाली मशीन' है। सरकारी नौकरियों और मलाईदार पदों पर दबंगों का कब्जा है। हमें यहाँ न सम्मान मिलता है, न सुरक्षा। ✅ अनुच्छेद 341 (SC/शिल्पकार) - 'राजसत्ता की चाबी': हमारे पूर्वजों के व्यवसाय और सामाजिक स्थिति के आधार पर हम 'शिल्पकार' हैं। * फायदा: 341 में आने का मतलब है— राजनीतिक आरक्षण। यानी, हमारे समाज के बेटे-बेटियों के लिए सांसदी और विधायकी की सीटें आरक्षित होंगी। * सुरक्षा: एससी/एसटी एक्ट जैसी सुरक्षा मिलेगी, जिससे गांव का कोई भी सामंतवादी व्यक्ति हमारी जमीन या सम्मान को छूने की हिम्मत नहीं करेगा। 🤝 समाधान: अतिपिछड़ा एकीकरण और नेतृत्व आज हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है, न जमीन और न ही पहचान। अब समय आ गया है कि हम अपनी नींद तोड़ें। ⚔️ नेतृत्व: अनिल प्रजापति (योद्धा) ⚔️ जब पूरा सिस्टम और समाज के दलाल खामोश थे, तब अनिल प्रजापति जी ने बीड़ा उठाया। उन्होंने शासन की आंखों में आंख डालकर यह सवाल पूछा है कि "हमें मुल्तानी कुम्हारों वाली कैटेगरी (OBC) में क्यों सड़ा रहे हो? हमें हमारा शिल्पकार (341) का दर्जा दो!" यह लड़ाई अब किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है। 📣 अंतिम आवाहन: 🤝 समाधान: अतिपिछड़ा एकीकरण (Unity) आज समय की मांग है कि हम उपजातियों और संगठनों के छोटे दायरों से बाहर निकलें। अब सरकार को अपनी असली पहचान बताने का वक्त आ गया है। अब कोई खेल नहीं, हमें हमारी पहचान (341) चाहिए। साथियों, यह लड़ाई फेसबुक और व्हाट्सएप तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। * हमें अपने तालाबों और घरों को बचाने के लिए लाठी भी उठानी पड़ी तो पीछे नहीं हटेंगे। * हमें अपनी राजनीतिक पहचान (341) के लिए संसद का घेराव भी करना पड़ा तो करेंगे। जागो समाज के युवाओं! अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान से जुड़ो। अपनी ताकत पहचानो। "अधिकार मांगो नहीं, छीनो! क्योंकि खामोश समाज को इतिहास और भूगोल दोनों भुला देते हैं।" ..................................................... 🔄 शेयर करें: इस पोस्ट को हर उस कुम्हार के घर तक पहुंचाएं जिसे लगता है कि ओबीसी में रहना ही उसका भाग्य है। सच को बाहर लाएं! #ShilpkarAarakshan #Article341 #LandRights #AnilPrajapati #MultaniConspiracy #AtipichhdaEkikaran #JusticeForPrajapati निवेदक: ✍️ वैद्य देवेंद्र कुमार प्रजापति (आईटी सेल प्रभारी - अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान)
आर्टिकल 341 🔥 महासंग्राम: गांव की 'सीमा' से खदेड़ने और 'संविधान' से मिटाने की दोहरी साजिश का पर्दाफाश! 🔥 — "न जमीन बची, न पहचान: अब याचना नहीं, रण होगा!" मेरे आत्मीय समाज बंधुओं, आज यह लेख लिखते समय मेरी कलम भी कांप रही है, क्योंकि हमारे समाज के साथ जो छल हुआ है, वह इतिहास का सबसे काला अध्याय है। हमें दो तरफ से मारा गया है— एक तरफ "जमीन" से बेदखल करके, और दूसरी तरफ "संविधान" में हमारी पहचान मिटाकर। 1️⃣ पहला प्रहार: हमारे अस्तित्व और आवास पर (गांव की सीमा और तालाब का सच) इतिहास गवाह है कि हमारे साथ छुआछूत और भेदभाव का खेल सदियों से खेला गया। जरा अपने-अपने गांवों का नक्शा याद कीजिए। उच्च कुल के लोग और जमींदार हमेशा गांव के बीचों-बीच सुरक्षित और ऊंचे स्थानों पर महलों में रहे। लेकिन हम प्रजापति/कुम्हारों को कहाँ बसाया गया? हमें हमेशा "गांव की सीमा के बाहरी छोर" पर धकेला गया। हमें गांव के गंदे जोहड़ों (तालाबों), पोखरों और नालों के किनारे जगह दी गई। तर्क यह दिया गया कि "तुम्हें मिट्टी और पानी का काम है", लेकिन असलियत यह थी कि हमें मुख्य आबादी से दूर, गंदगी और उपेक्षा के बीच रहने पर मजबूर किया गया। 🚧 आज की 'नई डकैती' - सौंदर्यीकरण का खेल: हमारे पूर्वजों ने उस अपमान को सहा। उस कीचड़ और गंदगी के बीच रहकर भी हमने "सभ्यता का निर्माण" किया। उन जोहड़ों को अपने पसीने से सींचा और रहने लायक बनाया। लेकिन आज? आज जब शहर फैल गए हैं, गांवों की जमीनें सोना उगल रही हैं, तो सरकार और भू-माफियाओं की गिद्ध जैसी नजर हमारे उन आशियानों पर पड़ गई है। जिस जोहड़ के किनारे हम पीढ़ियों से बसे हैं, आज प्रशासन उसे "तालाब चौड़ीकरण" और "सौंदर्यकरण" के नाम पर हमसे छीन रहा है। * सवाल: जब वह जगह बंजर, गंदी और पानी से भरी थी, तब वह "कुम्हार की" थी। * आज: जब वह "प्राइम लोकेशन" बन गई, तो सरकार कह रही है कि हम अतिक्रमणकारी हैं? यह सिर्फ तालाब की खुदाई नहीं है, यह हमें दूसरी बार विस्थापित करने की साजिश है। पहले सामाजिक रूप से गांव के बाहर धकेला गया, अब आर्थिक रूप से बेघर किया जा रहा है। याद रखना, "जो जमीन सरकारी है, वो जमीन हमारी है - क्योंकि उसे हमारे पूर्वजों ने आबाद किया है!" 2️⃣ दूसरा प्रहार: हमारी संवैधानिक पहचान पर (341 की चोरी और मुल्तानी साजिश) जमीन छीनने के साथ-साथ, राजनीतिक तंत्र ने हमारा "संवैधानिक हक" भी छीन लिया। आजादी के 75 साल बाद भी अगर कुम्हार समाज हासिए पर है, तो उसका कारण है— "जानकारी का अभाव"। ⚠️ साजिश का पर्दाफाश (हिंदू बनाम मुल्तानी कुम्हार): जब संविधान बन रहा था, तो आरक्षण की व्यवस्था जातियों की सामाजिक स्थिति पर आधारित थी। * सच्चाई: उस समय आर्टिकल 340 (OBC) की व्यवस्था मुख्य रूप से उन "मुल्तानी कुम्हारों" (मुस्लिम कम्युनिटी) के लिए की गई थी जो समाज की मुख्यधारा से अलग थे। * धोखा: शासन-प्रशासन ने एक गहरी साजिश रची। उन्होंने हम "हिंदू कुम्हारों" को—जो कि ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार 'शिल्पकार' (Scheduled Caste) थे—जबरदस्ती ओबीसी (340) की भीड़ में धकेल दिया। हमें "हिंदू-हिंदू" का पाठ पढ़ाकर धर्म की अफीम चटा दी गई और हमारे असली हक (Article 341) से दूर कर दिया गया। 👇 340 (OBC) और 341 (SC) का असली अंतर समझिए: 🛑 अनुच्छेद 340 (OBC) - 'गुलामी का रास्ता': यह एक बहुत बड़ी भीड़ है। जिसमें दबंग और रसूखदार जातियां बैठी हैं। * कुम्हार समाज यहाँ सिर्फ 'वोट देने वाली मशीन' है। सरकारी नौकरियों और मलाईदार पदों पर दबंगों का कब्जा है। हमें यहाँ न सम्मान मिलता है, न सुरक्षा। ✅ अनुच्छेद 341 (SC/शिल्पकार) - 'राजसत्ता की चाबी': हमारे पूर्वजों के व्यवसाय और सामाजिक स्थिति के आधार पर हम 'शिल्पकार' हैं। * फायदा: 341 में आने का मतलब है— राजनीतिक आरक्षण। यानी, हमारे समाज के बेटे-बेटियों के लिए सांसदी और विधायकी की सीटें आरक्षित होंगी। * सुरक्षा: एससी/एसटी एक्ट जैसी सुरक्षा मिलेगी, जिससे गांव का कोई भी सामंतवादी व्यक्ति हमारी जमीन या सम्मान को छूने की हिम्मत नहीं करेगा। 🤝 समाधान: अतिपिछड़ा एकीकरण और नेतृत्व आज हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है, न जमीन और न ही पहचान। अब समय आ गया है कि हम अपनी नींद तोड़ें। ⚔️ नेतृत्व: अनिल प्रजापति (योद्धा) ⚔️ जब पूरा सिस्टम और समाज के दलाल खामोश थे, तब अनिल प्रजापति जी ने बीड़ा उठाया। उन्होंने शासन की आंखों में आंख डालकर यह सवाल पूछा है कि "हमें मुल्तानी कुम्हारों वाली कैटेगरी (OBC) में क्यों सड़ा रहे हो? हमें हमारा शिल्पकार (341) का दर्जा दो!" यह लड़ाई अब किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है। 📣 अंतिम आवाहन: 🤝 समाधान: अतिपिछड़ा एकीकरण (Unity) आज समय की मांग है कि हम उपजातियों और संगठनों के छोटे दायरों से बाहर निकलें। अब सरकार को अपनी असली पहचान बताने का वक्त आ गया है। अब कोई खेल नहीं, हमें हमारी पहचान (341) चाहिए। साथियों, यह लड़ाई फेसबुक और व्हाट्सएप तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। * हमें अपने तालाबों और घरों को बचाने के लिए लाठी भी उठानी पड़ी तो पीछे नहीं हटेंगे। * हमें अपनी राजनीतिक पहचान (341) के लिए संसद का घेराव भी करना पड़ा तो करेंगे। जागो समाज के युवाओं! अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान से जुड़ो। अपनी ताकत पहचानो। "अधिकार मांगो नहीं, छीनो! क्योंकि खामोश समाज को इतिहास और भूगोल दोनों भुला देते हैं।" ..................................................... 🔄 शेयर करें: इस पोस्ट को हर उस कुम्हार के घर तक पहुंचाएं जिसे लगता है कि ओबीसी में रहना ही उसका भाग्य है। सच को बाहर लाएं! #ShilpkarAarakshan #Article341 #LandRights #AnilPrajapati #MultaniConspiracy #AtipichhdaEkikaran #JusticeForPrajapati निवेदक: ✍️ वैद्य देवेंद्र कुमार प्रजापति (आईटी सेल प्रभारी - अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान)
- बरगदवा में वन विभाग की नाक के नीचे चल रही कुल्हाड़ी, हरे पेड़ों के कत्लेआम में विभाग और पुलिस की मिलीभगत की आशंका! रिपोर्टर विंध्यवासिनी यादव संत कबीर नगर1
- हनुमान पासवान के नेतृत्व में विश्वनाथपुर में मनाई गई स्वामी विवेकानंद की जयंती-- सीताराम पाण्डेय संत कबीर नगर संत कबीर नगर जनपद के खलीलाबाद ब्लाक अंतर्गत विश्वनाथपुर ग्राम सभा में भावी ग्राम प्रधान प्रत्यासी हनुमान प्रसाद पासवान ने अपने आवास पर स्वामी विवेकानंद की जयंती के अवसर पर एक वैठक का आयोजन किया । सर्वप्रथम विवेकानंद के चित्र पर माल्यार्पण कर तथा दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया हनुमान पासवान ने बताया कि स्वामी विवेकानंद एक युग पुरुष थे और युवाओं के सच्चे मसीहा थे उनके अंदर नेतृत्व की अपार संभावनाएं थी । भारतीय युवा वर्ग उनके जन्मदिन को युवा दिवस के रूप में मनाता है वह हम सबके प्रेरणा स्रोत थे आप सभी लोगों के सहयोग से हम विश्वनाथपुर ग्राम सभा का प्रधान चयनित होने पर गांव का संपूर्ण रूप से विकास करूंगा। स्वामी विवेकानंद हमारे आदर्श है उन्हीं के पद चिन्ह पर चलते हुए हम अपने ग्राम सभा के बुजुर्गों,जरूरतमंदों और असहयों और निर्मलो की मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहता हूं । ग्राम सभा की प्रत्येक पुत्री के विवाह में अपने समर्थ के अनुसार आवश्यक सामग्री सभी घरों में देने और सुख दुख में हमेशा लोगों का सहयोग करने के लिए तत्पर रहता हूं । इनके नेक कार्य को देखते हुए जनता युवा वर्ग ने मन बना लिया है कि आशीर्वाद स्वरुप प्रत्याशी हनुमान पासवान को आगामी ग्राम पंचायत के चुनाव में हम लोग ने भारी बहुत से विजय बनाएंगे। जिस मौके पर उनके सहयोगी राम बिहारी पासवान, धूमपाल, धर्मराज पासवान, श्याम कुमार, शिव शंकर पासवान, पवन ,आलोक कुमार, पन्नेलाल विजयपाल, नितेश, मानसिंह, हरिश्चंद्र, राजपाल,लक्ष्मण यादव, मेवालाल यादव, रामबचन यादव, पारसनाथ पासवान,नीतिश पासवान, हिंद लाल, संजय पासवान,सुग्रीव पासवान,गोविंद प्रसाद,राजन पासवान,राजकरन पासवान रामधारी , रामचंद्र ,बजरंग प्रसाद सहित सैकड़ों लोग मौजूद रहे।1
- *कैबिनेट मंत्री ए. के. शर्मा के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी पर भाजपा नेताओं ने एसपी से की शिकायत, सौंपा प्रार्थना पत्र* ✍️ #आशुसिंह उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ए. के. शर्मा जी के विरुद्ध अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की मांग को लेकर भाजपा जिला उपाध्यक्ष अमर राय के नेतृत्व में भाजपा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने आज पुलिस अधीक्षक से शिष्टाचार भेंट कर लिखित प्रार्थना पत्र सौंपा। इस अवसर पर *बनर्जी लाल अग्रहरि,ओम प्रकाश राय, शुभम राय कुलदीप पांडे गिरजेश राय, डिंपल राय, विजय जायसवाल, कन्हैया वर्मा, विनोद अग्रहरि, मुरली जायसवाल, आलोक राय सुरेन्द्र पाठक,कपीश अग्रहरि, प्रवीण* सहित सभी नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने एक स्वर में कहा कि सार्वजनिक जीवन में मर्यादा भंग करने वालों के विरुद्ध त्वरित एवं सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि समाज में किसी भी प्रकार का गलत संदेश न जाए और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा हो सके। मर्यादा, सम्मान और कानून — यही एक सशक्त एवं संस्कारित समाज की पहचान है।1
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