सेवानिवृत्त हुए 100 दिन भी नहीं — फिर उसी कुर्सी पर वापसी: बिहार में संविदा नियुक्ति का खेल, गृह विभाग का आदेश उठाता है गंभीर सवाल — बेरोजगार युवाओं की उपेक्षा और 'चहेते अफसर' की वापसी? विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार बिहार सरकार के गृह विभाग (आरक्षी शाखा) ने 10 अप्रैल 2026 को एक ऐसा आदेश जारी किया जो बिहार की प्रशासनिक संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आदेश संख्या 4626 के तहत श्री काशी नाथ माँझी — जो बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग (BPSSC), पटना में पुलिस उपाधीक्षक के पद से महज 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हुए थे — उन्हें संविदा के आधार पर उसी पद पर, उसी कार्यालय में पुनः नियोजित कर दिया गया। सेवानिवृत्ति के सिर्फ 100 दिन बाद — वही कुर्सी, वही कार्यालय, वही पद। आदेश क्या कहता है? सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार के संकल्प ज्ञापांक-10000, दिनांक 10.07.2015 के अंतर्गत बनाई गई राज्यस्तरीय चयन समिति की 16 मार्च 2026 को आयोजित बैठक में लिए गए निर्णय के आधार पर यह नियोजन किया गया है। यह संविदा दो वर्ष के लिए है — अथवा उस पद पर नियमित नियुक्ति/प्रोन्नति होने तक। आदेश की शर्तें यह भी कहती हैं कि यदि श्री माँझी के विरुद्ध किसी प्रकार का आरोप प्रमाणित होता है, या उनका कार्य संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो संविदा रद्द हो सकती है। चार तीखे सवाल 1. क्या 2015 का संकल्प इसी काम के लिए बना था? वर्ष 2015 में सामान्य प्रशासन विभाग का यह संकल्प वास्तविक रिक्तता और संस्थागत संकट की स्थिति में सेवानिवृत्त अनुभवी अधिकारियों की अस्थायी सेवा लेने के लिए बना था। लेकिन जब BPSSC जैसे आयोग में — जो स्वयं हज़ारों पुलिस पदों पर भर्ती करता है — पुलिस उपाधीक्षक का पद भरने के लिए कोई योग्य अधिकारी उपलब्ध नहीं है, तो यह बिहार पुलिस व्यवस्था की दयनीय स्थिति को दर्शाता है — या फिर किसी 'चहेते अधिकारी' को बचाए रखने की कोशिश। 2. वही कार्यालय, वही पद — पर नियमित नियुक्ति क्यों नहीं? बिहार में पुलिस अधिकारियों की प्रोन्नति वर्षों से लंबित है। सैकड़ों इंस्पेक्टर DSP पद पाने की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे में एक सेवानिवृत्त DSP को संविदा पर रखना — बजाय किसी पात्र सेवारत अधिकारी को प्रोन्नत करने के — प्रशासनिक तर्क से परे लगता है। क्या 16 मार्च 2026 को चयन समिति की बैठक में यह विकल्प विचारा गया? 3. BPSSC में यह संविदा नियुक्ति — विडंबना नहीं? BPSSC वह आयोग है जो बिहार में दारोगा (SI), सार्जेंट जैसे पुलिस पदों पर भर्ती करता है। हज़ारों युवा इस आयोग की परीक्षाओं के नतीजे और नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे हैं। जिस संस्था से बेरोजगार युवाओं को नौकरी की उम्मीद है — उसी में एक सेवानिवृत्त अधिकारी को 2 साल के लिए वापस बैठा देना — यह संदेश क्या देता है? 4. पारदर्शिता कहाँ है? आदेश में यह नहीं बताया गया कि इस पद के लिए और कितने उम्मीदवार विचारे गए? चयन समिति ने क्या मानदंड अपनाए? क्या किसी सेवारत अधिकारी की प्रोन्नति की संभावना खोजी गई? 2015 का संकल्प कहता है कि संविदा नियोजन "अंतिम विकल्प" होना चाहिए — क्या यहाँ अन्य विकल्प आज़माए गए? निष्कर्ष श्री काशी नाथ माँझी की व्यक्तिगत योग्यता पर कोई प्रश्न नहीं है। सवाल प्रक्रिया की पारदर्शिता पर है, व्यवस्था की प्राथमिकता पर है। जब बिहार में लाखों शिक्षित युवा पुलिस की वर्दी के लिए दशकों इंतज़ार करते हैं — और जब उसी भर्ती करने वाले आयोग में एक सेवानिवृत्त अफसर को 100 दिन में वापस बैठा दिया जाता है — तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है: क्या बिहार में "संविदा नीति" वास्तव में संस्थागत ज़रूरत के लिए है — या चुनिंदा अफसरों की सेवा-विस्तार का एक सुविधाजनक रास्ता बन गई है? यह प्रश्न गृह विभाग, मुख्यमंत्री कार्यालय और जनता — तीनों को जवाब माँगता है।
सेवानिवृत्त हुए 100 दिन भी नहीं — फिर उसी कुर्सी पर वापसी: बिहार में संविदा नियुक्ति का खेल, गृह विभाग का आदेश उठाता है गंभीर सवाल — बेरोजगार युवाओं की उपेक्षा और 'चहेते अफसर' की वापसी? विजय कुमार | वरिष्ठ पत्रकार बिहार सरकार के गृह विभाग (आरक्षी शाखा) ने 10 अप्रैल 2026 को एक ऐसा आदेश जारी किया जो बिहार की प्रशासनिक संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आदेश संख्या 4626 के तहत श्री काशी नाथ माँझी — जो बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग (BPSSC), पटना में पुलिस उपाधीक्षक के पद से महज 31 दिसंबर 2025 को सेवानिवृत्त हुए थे — उन्हें संविदा के आधार पर उसी पद पर, उसी कार्यालय में पुनः नियोजित कर दिया गया। सेवानिवृत्ति के सिर्फ 100 दिन बाद — वही कुर्सी, वही कार्यालय, वही पद। आदेश क्या कहता है? सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार के संकल्प ज्ञापांक-10000, दिनांक 10.07.2015 के अंतर्गत बनाई गई राज्यस्तरीय चयन समिति की 16 मार्च 2026 को आयोजित बैठक में लिए गए निर्णय के आधार पर यह नियोजन किया गया है। यह संविदा दो वर्ष के लिए है — अथवा उस पद पर नियमित नियुक्ति/प्रोन्नति होने तक। आदेश की शर्तें यह भी कहती हैं कि यदि श्री माँझी के विरुद्ध किसी प्रकार का आरोप प्रमाणित होता है, या उनका कार्य संतोषजनक नहीं पाया जाता है, तो संविदा रद्द हो सकती है। चार तीखे सवाल 1. क्या 2015 का संकल्प इसी काम के लिए बना था? वर्ष 2015 में सामान्य प्रशासन विभाग का यह संकल्प वास्तविक रिक्तता और संस्थागत संकट की स्थिति में सेवानिवृत्त अनुभवी अधिकारियों की अस्थायी सेवा लेने के लिए बना था। लेकिन जब BPSSC जैसे आयोग में — जो स्वयं हज़ारों पुलिस पदों पर भर्ती करता है — पुलिस उपाधीक्षक का पद भरने के लिए कोई योग्य अधिकारी उपलब्ध नहीं है, तो यह बिहार पुलिस व्यवस्था की दयनीय स्थिति को दर्शाता है — या फिर किसी 'चहेते अधिकारी' को बचाए रखने की कोशिश। 2. वही कार्यालय, वही पद — पर नियमित नियुक्ति क्यों नहीं? बिहार में पुलिस अधिकारियों की प्रोन्नति वर्षों से लंबित है। सैकड़ों इंस्पेक्टर DSP पद पाने की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे में एक सेवानिवृत्त DSP को संविदा पर रखना — बजाय किसी पात्र सेवारत अधिकारी को प्रोन्नत करने के — प्रशासनिक तर्क से परे लगता है। क्या 16 मार्च 2026 को चयन समिति की बैठक में यह विकल्प विचारा गया? 3. BPSSC में यह संविदा नियुक्ति — विडंबना नहीं? BPSSC वह आयोग है जो बिहार में दारोगा (SI), सार्जेंट जैसे पुलिस पदों पर भर्ती करता है। हज़ारों युवा इस आयोग की परीक्षाओं के नतीजे और नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे हैं। जिस संस्था से बेरोजगार युवाओं को नौकरी की उम्मीद है — उसी में एक सेवानिवृत्त अधिकारी को 2 साल के लिए वापस बैठा देना — यह संदेश क्या देता है? 4. पारदर्शिता कहाँ है? आदेश में यह नहीं बताया गया कि इस पद के लिए और कितने उम्मीदवार विचारे गए? चयन समिति ने क्या मानदंड अपनाए? क्या किसी सेवारत अधिकारी की प्रोन्नति की संभावना खोजी गई? 2015 का संकल्प कहता है कि संविदा नियोजन "अंतिम विकल्प" होना चाहिए — क्या यहाँ अन्य विकल्प आज़माए गए? निष्कर्ष श्री काशी नाथ माँझी की व्यक्तिगत योग्यता पर कोई प्रश्न नहीं है। सवाल प्रक्रिया की पारदर्शिता पर है, व्यवस्था की प्राथमिकता पर है। जब बिहार में लाखों शिक्षित युवा पुलिस की वर्दी के लिए दशकों इंतज़ार करते हैं — और जब उसी भर्ती करने वाले आयोग में एक सेवानिवृत्त अफसर को 100 दिन में वापस बैठा दिया जाता है — तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है: क्या बिहार में "संविदा नीति" वास्तव में संस्थागत ज़रूरत के लिए है — या चुनिंदा अफसरों की सेवा-विस्तार का एक सुविधाजनक रास्ता बन गई है? यह प्रश्न गृह विभाग, मुख्यमंत्री कार्यालय और जनता — तीनों को जवाब माँगता है।
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- रफीगंज प्रखंड के भाजपा नेता सह भारतीय नगर ग्राम विकास संघ प्रचार के संस्थापक चंदेश्वर भगत का बुधवार को इलाज के दौरान निधन हो गया। वे लगभग एक सप्ताह पूर्व सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद उनका इलाज जमुहार में चल रहा था। प्राप्त जानकारी के अनुसार, कुछ दिन पहले चंदेश्वर भगत चेंव गांव से बाइक पर सवार होकर अपने घर लौट रहे थे। इस दौरान वे बाइक के पीछे बैठे हुए थे, तभी अचानक बाइक अनियंत्रित हो गई और वे गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद उन्हें इलाज के लिए जमुहार में भर्ती कराया गया, जहां बुधवार को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। ग्रामीण प्रमोद कुमार यादव सहित अन्य लोगों ने बताया कि मृतक का अंतिम संस्कार रांची में किया जाएगा। बताया जाता है कि चंदेश्वर भगत के परिवार में एक पुत्र है। उनकी पत्नी का निधन लगभग 15 वर्ष पूर्व ही हो चुका है। उनके निधन से क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है।1
- ye video navichek ke hai aur isliye ye video virel chal raha ki ye log jitana video me ladhka hai jo sab Bihar police me job hai 😃🥰❤️🥰😍2