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डोरंडा में चल रहा बुलडोजर, लोगों में मचा अफरा तफरी निगम के द्वारा 2 महीने पहले ही दिया गया था निर्देश और आखिरकार आज हटा दिया गया अतिक्रमण।
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डोरंडा में चल रहा बुलडोजर, लोगों में मचा अफरा तफरी निगम के द्वारा 2 महीने पहले ही दिया गया था निर्देश और आखिरकार आज हटा दिया गया अतिक्रमण।
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- गहलौर घाटी की तस्वीर बनी संघर्ष और संकल्प की जीवंत मिसाल संजय वर्मा गहलौर (गया)। गहलौर घाटी की पहाड़ को हथौड़े से तोड़ते बाबा दशरथ मांझी की ऐतिहासिक तस्वीर आज भी संघर्ष, प्रेम और अटूट संकल्प की पहचान बनी हुई है। इस तस्वीर में बाबा दशरथ मांझी साधारण धोती-कुर्ता में, नंगे पांव या साधारण चप्पल पहने, हाथ में हथौड़ा लिए कठोर चट्टान पर वार करते दिखाई देते हैं। चेहरे पर थकान साफ झलकती है, लेकिन आंखों में जिद, दर्द और लक्ष्य को पाने की अद्भुत चमक नजर आती है। चारों ओर फैला ऊँचा और बेरहम पहाड़ तथा सन्नाटा उनके अकेले संघर्ष की गवाही देता है। यह ऐतिहासिक तस्वीर बिहार के गया जिले के गहलौर गांव की है। दशरथ मांझी ने यह संघर्ष अपनी पत्नी फगुनी देवी की असमय मृत्यु के बाद शुरू किया। पहाड़ पार करते समय इलाज न मिल पाने के कारण उनकी पत्नी की मौत हो गई थी। उसी क्षण उन्होंने संकल्प लिया कि वे पहाड़ को काटकर ऐसा रास्ता बनाएंगे, जिससे भविष्य में किसी को इस तरह की पीड़ा न सहनी पड़े। करीब 22 वर्षों (1960 से 1982) तक उन्होंने अकेले हथौड़ा-छेनी से पहाड़ काटकर लगभग 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट गहरा रास्ता बना दिया। इस रास्ते से गहलौर गांव की दूरी अस्पताल और शहर से काफी कम हो गई। इस अवसर पर पूर्व मुखिया अरविंद मांझी एवं वर्तमान मुखिया मदन मांझी ने बाबा दशरथ मांझी की जीवनी पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि उनका जीवन पूरे समाज के लिए प्रेरणा है। दोनों ने संयुक्त रूप से यह निर्णय लिया कि बाबा मांझी के संघर्ष और विचारों को जन-जन तक पहुंचाकर समाज को जागरूक किया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी संकल्प और मेहनत का महत्व समझ सके।3
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