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एक के साथ एक पार्षद मुफ्त -------------------- नगरीय निकायों में चुनी गई महिला पार्षदों के पति,पिता ससुर या अन्य पुरूष परिजन संभालते हैं उनका कामकाज। एक के साथ एक पार्षद मुफ्त -------------------- नगरीय निकायों में चुनी गई महिला पार्षदों के पति,पिता ससुर या अन्य पुरूष परिजन संभालते हैं उनका कामकाज। ----------------- *मोहम्मद सादिक* ---------------- अगर आपका वार्ड किसी भी श्रेणी की महिला के लिए आरक्षित है,तो फिर आप बहुत किस्मत वाले नागरिक हो। क्योंकि आपको एक महिला पार्षद चुनने पर उसके साथ एक बिना चुना हुआ पार्षद मुफ्त मिलेगा। चौंक गए ना,ये ऑफर सुनकर। लेकिन यह हकीकत है, क्योंकि अगर आपके वार्ड से महिला पार्षद बनी और अगर वह विवाहित हैं,तो उसका पति और अगर वह अविवाहित हुई,तो उसके पिता भी पार्षद की भूमिका में रहेंगे। फिर कई शहरी निकायों की किस्मत तो और भी बुलंद हैं। वहां निकाय प्रमुख यानी अध्यक्ष,सभापति और मेयर भी महिलाएं बनेंगी यानि एक के साथ एक फ्री। अपने अजमेर को तो लगातार दूसरी बार मेयर एक के साथ फ्री मिलेगा। मेयर सीट सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित जो है। पिछली बार मेयर ब्रजलता हाड़ा के साथ उनके पति प्रियशील हाडा भी नगर निगम में उनके दफ्तर में ही पाए जाते थे। निगम के कामकाज में पूरे हस्तक्षेप के साथ। देखना है इस बार दूसरा मेयर कौन बनता है। वैसे,पति के अलावा विवाहित पार्षद के ससुर और देवर तथा अविवाहित महिला पार्षद के भाई भी पार्षद की जिम्मेदारी निभाते हैं। -------------------- नाम की ही पार्षद होती हैं महिलाएं ------------------ नगर निगम के पिछले कार्यकाल में ऐसी ही कितनी ही महिला पार्षद थी,जो केवल साधारण सभा में नजर आती थी और चुपचाप बैठी रहती थी। बाकी पूरे साल उनके पति,ससुर,पिता या भाई ही निगम में मंडराते रहते थे। वार्ड के लोग भी असली पार्षद की जगह इनसे ही कोई काम हो,तो संपर्क करते थे। इतना ही नहीं नगर निगम के अधिकारी भी इन्हें ही पार्षद मानकर उनके बताएं काम कर दिया करते थे। कोई सौदेबाजी करनी हो,तब भी महिला पार्षद के यही खून के रिश्तेदार सामने वाले का खून चूसते थे। पार्टियों की बैठक में तो कोई महिला पार्षद ही जाती होगी। बाकी सब के यही रिश्तेदार शामिल होते हैं। भाजपा -कांग्रेस दोनों ही पति,पिता ससुर,भाई को भी पार्षद मानते हैं, इसलिए इनके बैठक में आने पर आपत्ति भी नहीं करते हैं। --------------- रिश्तों का नया नामकरण ------------------ सामाजिक रिश्तों के नामकरण में पार्षद पति, पार्षद पिता या पार्षद ससुर जैसे नए शब्द इन्हीं महिला पार्षदों की वजह से शामिल हुए हैं। कई महिला पार्षदों के पतियों ने उनके पिछले कार्यकाल में शहर में भी जो नामपट्ट लगाए हैं। उनमें पहले पत्नी का नाम और फिर खुद का नाम लिखकर सरनेम लगाया है। उदाहरण के लिए महिमा राकेश सिंह। जबकि ये नाम उनका दस्तावेजों में अधिकृत नाम नहीं होता,तो भी पति बीच में नाम जोड़ देते हैं। संकेत साफ है, पार्षद तो महिमाजी ही हैं, लेकिन अगर कोई काम है। लेनदेन की बात करनी है। किसी बैठक में बुलाना है,तो सम्पर्क राकेशजी से करिए। यानी चुनी हुई नाम की पार्षद तो महिमाजी है लेकिन असली पार्षद राकेशजी हैं। ------------------- आरक्षण महिलाओं के लिए ,मौज पुरूषों की ------------------ सरकार ने तो राजनीति में महिलाओं को बराबर की भूमिका देने और नारी सशक्तिकरण के उद्देश्य से नगरीय निकायों में उन्हें 33 फीसदी आरक्षण दिया था। लेकिन इस आरक्षण का लाभ महिलाओं के बजाय उनके परिवार के पुरुष रिश्तेदार उठा रहे हैं। इस बार भी अजमेर सहित हर जगह हालत यही है। जिन नेताओं के वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हो गए हैं। वह अब अपनी राजनीति के लिए परिवार की महिलाओं को मैदान में उतारने के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं। जिन महिलाओं को कभी राजनीति में देखा नहीं गया। जो घर से बाहर ही कम निकलती हैं,उनके लिए दोनों पार्टियों के नेता टिकट मांग रहे हैं। कोई अपनी बेटी के लिए,कोई बहू के लिए, तो कोई पत्नी के लिए। यानी अगर खुद किसी कारण से अपने वार्ड में खड़े नहीं हो सकते हैं, तो पत्नी, बेटी,बहू किसी को भी टिकट दे दो, लेकिन टिकट परिवार में ही दो। ताकि इनकी आड़ में ही सही, खुद की राजनीति का धंधा चलता रहे। जबकि यह हकीकत है कि इन महिला दावेदारों को खुद अपने वार्ड के बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी। कई महिला दावेदारों को पार्टी नेता ही नहीं पहचानते। पति या पिता के नाम से पता चलता है,वो कौन है। क्योंकि उन्हें भी तो बस अपने पति,पिता या दूसरे पुरुष परिजन की इच्छा पूरी करने के लिए मैदान में उतरना है। जीत गई तो बाकी काम तो वो संभाल ही लेंगे। ------------------- कामकाज में करते हैं हस्तक्षेप ------------------ सरकार ने तो 33 आरक्षण दिया है,लेकिन हकीकत में ये बढ़कर 2 गुना हो गया है। सरकार को भी पता है कि नगरीय निकायों में महिला पार्षदों के परिवार के लोगों कितना हस्तक्षेप करते हैं। कई जगह तो निकाय प्रमुख बनी महिलाओं के पति, ससुर और पिता खुलकर कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं। अधिकारियों की बैठक लेते हैं, निर्देश देते हैं। ऐसे कुछ मामलों में पिछली बार राज्य सरकार ने कार्यवाही भी की थी। लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे जितनी थी। दरअसल,दोनों पार्टियों के महिला पार्षदों के परिजन कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं। इसलिए कोई भी किसी की शिकायत नहीं करता। यानी राजनीति में महिला सशक्तिकरण की जगह पुरुषों का दोहरा सशक्तिकरण हो रहा है।

4 hrs ago
user_Dainik  news ajmer
Dainik news ajmer
Local News Reporter अजमेर, अजमेर, राजस्थान•
4 hrs ago

एक के साथ एक पार्षद मुफ्त -------------------- नगरीय निकायों में चुनी गई महिला पार्षदों के पति,पिता ससुर या अन्य पुरूष परिजन संभालते हैं उनका कामकाज। एक के साथ एक पार्षद मुफ्त -------------------- नगरीय निकायों में चुनी गई महिला पार्षदों के पति,पिता ससुर या अन्य पुरूष परिजन संभालते हैं उनका कामकाज। ----------------- *मोहम्मद सादिक* ---------------- अगर आपका वार्ड किसी भी श्रेणी की महिला के लिए आरक्षित है,तो फिर आप बहुत किस्मत वाले नागरिक हो। क्योंकि आपको एक महिला पार्षद चुनने पर उसके साथ एक बिना चुना हुआ पार्षद मुफ्त मिलेगा। चौंक गए ना,ये ऑफर सुनकर। लेकिन यह हकीकत है, क्योंकि अगर आपके वार्ड से महिला पार्षद बनी और अगर वह विवाहित हैं,तो उसका पति और अगर वह अविवाहित हुई,तो उसके पिता भी पार्षद की भूमिका में रहेंगे। फिर कई शहरी निकायों की किस्मत तो और भी बुलंद हैं। वहां निकाय प्रमुख यानी अध्यक्ष,सभापति और मेयर भी महिलाएं बनेंगी यानि एक के साथ एक फ्री। अपने अजमेर को तो लगातार दूसरी बार मेयर एक के साथ फ्री मिलेगा। मेयर सीट सामान्य महिला वर्ग के लिए आरक्षित जो है। पिछली बार मेयर ब्रजलता हाड़ा के साथ उनके पति प्रियशील हाडा भी नगर निगम में उनके दफ्तर में ही पाए जाते थे। निगम के कामकाज में पूरे हस्तक्षेप के साथ। देखना है इस बार दूसरा मेयर कौन बनता है। वैसे,पति के अलावा विवाहित पार्षद के ससुर और देवर तथा अविवाहित महिला पार्षद के भाई भी पार्षद की जिम्मेदारी निभाते हैं। -------------------- नाम की ही पार्षद होती हैं महिलाएं ------------------ नगर निगम के पिछले कार्यकाल में ऐसी ही कितनी ही महिला पार्षद थी,जो केवल साधारण सभा में नजर आती थी और चुपचाप बैठी रहती थी। बाकी पूरे साल उनके पति,ससुर,पिता या भाई ही निगम में मंडराते रहते थे। वार्ड के लोग भी असली पार्षद की जगह इनसे ही कोई काम हो,तो संपर्क करते थे। इतना ही नहीं नगर निगम के अधिकारी भी इन्हें ही पार्षद मानकर उनके बताएं काम कर दिया करते थे। कोई सौदेबाजी करनी हो,तब भी महिला पार्षद के यही खून के रिश्तेदार सामने वाले का खून चूसते थे। पार्टियों की बैठक में तो कोई महिला पार्षद ही जाती होगी। बाकी सब के यही रिश्तेदार शामिल होते हैं। भाजपा -कांग्रेस दोनों ही पति,पिता ससुर,भाई को भी पार्षद मानते हैं, इसलिए इनके बैठक में आने पर आपत्ति भी नहीं करते हैं। --------------- रिश्तों का नया नामकरण ------------------ सामाजिक रिश्तों के नामकरण में पार्षद पति, पार्षद पिता या पार्षद ससुर जैसे नए शब्द इन्हीं महिला पार्षदों की वजह से शामिल हुए हैं। कई महिला पार्षदों के पतियों ने उनके पिछले कार्यकाल में शहर में भी जो नामपट्ट लगाए हैं। उनमें पहले पत्नी का नाम और फिर खुद का नाम लिखकर सरनेम लगाया है। उदाहरण के लिए महिमा राकेश सिंह। जबकि ये नाम उनका दस्तावेजों में अधिकृत नाम नहीं होता,तो भी पति बीच में नाम जोड़ देते हैं। संकेत साफ है, पार्षद तो महिमाजी ही हैं, लेकिन अगर कोई काम है। लेनदेन की बात करनी है। किसी बैठक में बुलाना है,तो सम्पर्क राकेशजी से करिए। यानी चुनी हुई नाम की पार्षद तो महिमाजी है लेकिन असली पार्षद राकेशजी हैं। ------------------- आरक्षण महिलाओं के लिए ,मौज पुरूषों की ------------------ सरकार ने तो राजनीति में महिलाओं को बराबर की भूमिका देने और नारी सशक्तिकरण के उद्देश्य से नगरीय निकायों में उन्हें 33 फीसदी आरक्षण दिया था। लेकिन इस आरक्षण का लाभ महिलाओं के बजाय उनके परिवार के पुरुष रिश्तेदार उठा रहे हैं। इस बार भी अजमेर सहित हर जगह हालत यही है। जिन नेताओं के वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हो गए हैं। वह अब अपनी राजनीति के लिए परिवार की महिलाओं को मैदान में उतारने के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं। जिन महिलाओं को कभी राजनीति में देखा नहीं गया। जो घर से बाहर ही कम निकलती हैं,उनके लिए दोनों पार्टियों के नेता टिकट मांग रहे हैं। कोई अपनी बेटी के लिए,कोई बहू के लिए, तो कोई पत्नी के लिए। यानी अगर खुद किसी कारण से अपने वार्ड में खड़े नहीं हो सकते हैं, तो पत्नी, बेटी,बहू किसी को भी टिकट दे दो, लेकिन टिकट परिवार में ही दो। ताकि इनकी आड़ में ही सही, खुद की राजनीति का धंधा चलता रहे। जबकि यह हकीकत है कि इन महिला दावेदारों को खुद अपने वार्ड के बारे में पूरी जानकारी नहीं होगी। कई महिला दावेदारों को पार्टी नेता ही नहीं पहचानते। पति या पिता के नाम से पता चलता है,वो कौन है। क्योंकि उन्हें भी तो बस अपने पति,पिता या दूसरे पुरुष परिजन की इच्छा पूरी करने के लिए मैदान में उतरना है। जीत गई तो बाकी काम तो वो संभाल ही लेंगे। ------------------- कामकाज में करते हैं हस्तक्षेप ------------------ सरकार ने तो 33 आरक्षण दिया है,लेकिन हकीकत में ये बढ़कर 2 गुना हो गया है। सरकार को भी पता है कि नगरीय निकायों में महिला पार्षदों के परिवार के लोगों कितना हस्तक्षेप करते हैं। कई जगह तो निकाय प्रमुख बनी महिलाओं के पति, ससुर और पिता खुलकर कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं। अधिकारियों की बैठक लेते हैं, निर्देश देते हैं। ऐसे कुछ मामलों में पिछली बार राज्य सरकार ने कार्यवाही भी की थी। लेकिन यह ऊंट के मुंह में जीरे जितनी थी। दरअसल,दोनों पार्टियों के महिला पार्षदों के परिजन कामकाज में हस्तक्षेप करते हैं। इसलिए कोई भी किसी की शिकायत नहीं करता। यानी राजनीति में महिला सशक्तिकरण की जगह पुरुषों का दोहरा सशक्तिकरण हो रहा है।

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    खबरों का सफर न्यूज़
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  • अजमेर में Fake iPhone का सबसे बड़ा खेल? आधी रात तक छापा, 27+18 डुप्लीकेट iPhone बॉक्स बरामद अजमेर के पड़ाव प्लाजा मोबाइल मार्केट में कॉपीराइट उल्लंघन के मामले में पुलिस और कंपनी अधिकारियों ने करीब 10 घंटे तक कार्रवाई की। क्लॉक टावर और कोतवाली थाना क्षेत्र की दो दुकानों पर डुप्लीकेट iPhone बॉक्स और एसेसरीज जब्त की गईं। पुलिस ने दोनों मामलों में FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
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  • अजमेर शरीफ में जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी का ऐतिहासिक जुलूस | दरगाह से आनासागर तक उमड़ा अकीदत का समंदर अजमेर। जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी के मुबारक मौके पर अजमेर शरीफ में मुस्लिम समुदाय ने पूरे जोश-ओ-खरोश और अकीदत के साथ त्योहार मनाया। शहर की सड़कों पर हजारों अकीदतमंदों का जनसैलाब देखने को मिला, जिसमें मर्द, औरतें और बच्चे बड़ी संख्या में शामिल हुए। लौंगिया मोहल्ला स्थित मदीना मस्जिद, अंदरकोट, खादिम मोहल्ला समेत विभिन्न इलाकों से भव्य जुलूस निकाले गए। सभी जुलूस दरगाह बाजार और दिल्ली गेट से होते हुए बारादरी, आनासागर पहुंचे, जहां उनका समापन हुआ।
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    अजमेर शरीफ में जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी का ऐतिहासिक जुलूस | दरगाह से आनासागर तक उमड़ा अकीदत का समंदर
अजमेर। जश्न-ए-ईद मिलादुन्नबी के मुबारक मौके पर अजमेर शरीफ में मुस्लिम समुदाय ने पूरे जोश-ओ-खरोश और अकीदत के साथ त्योहार मनाया। शहर की सड़कों पर हजारों अकीदतमंदों का जनसैलाब देखने को मिला, जिसमें मर्द, औरतें और बच्चे बड़ी संख्या में शामिल हुए।
लौंगिया मोहल्ला स्थित मदीना मस्जिद, अंदरकोट, खादिम मोहल्ला समेत विभिन्न इलाकों से भव्य जुलूस निकाले गए। सभी जुलूस दरगाह बाजार और दिल्ली गेट से होते हुए बारादरी, आनासागर पहुंचे, जहां उनका समापन हुआ।
    user_News Daily Hindi
    News Daily Hindi
    Local News Reporter अजमेर, अजमेर, राजस्थान•
    15 hrs ago
  • नेपाल में तबाही का सैलाब 🚨 सैकड़ों लोगों की मौत ओर कही लोग घायल 🚨
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सैकड़ों लोगों की मौत ओर कही लोग घायल 🚨
    user_Sagar bwr
    Sagar bwr
    अजमेर, अजमेर, राजस्थान•
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  • *नेपाल में बाढ़ ने लापता किए 32 पुलिसकर्मी, कई लोग बहे* अपने क्षेत्र की सभी खबरें देखने और *खबरें शेयर करके कमाई करने के लिए शुरू ऐप (Shuru App) डाउनलोड करें* 👇🏻
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    *नेपाल में बाढ़ ने लापता किए 32 पुलिसकर्मी, कई लोग बहे*

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    user_Sagar bwr
    Sagar bwr
    अजमेर, अजमेर, राजस्थान•
    1 hr ago
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