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पत्रकार महेश पल्लै इन्दौर शास्त्री ब्रिज के पुनः र्निर्माण पर उठे सवाल अधिकारियों ने किया निरीक्षण,
MAHESH PALLAI Trilok news , सम
पत्रकार महेश पल्लै इन्दौर शास्त्री ब्रिज के पुनः र्निर्माण पर उठे सवाल अधिकारियों ने किया निरीक्षण,
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- जमीनी हकीकत: खराब नहर, चौपट फसल और टूटी किसान की कमर भोपाल/मध्य प्रदेश। प्रदेश के ग्रामीण अंचल से सामने आया एक वीडियो जमीनी सच्चाई की तस्वीर पेश करता है। खेत में खड़ा किसान अपनी बर्बाद हुई फसल दिखाते हुए कहता है—“मेहनत हमारी, नुकसान हमारा, जिम्मेदारी किसी की नहीं।” नहर के ओवरफ्लो से खेत जलमग्न हो गया और चने की पूरी फसल खराब हो गई। नहर व्यवस्था पर सवाल स्थानीय किसानों का आरोप है कि नहरों की समय पर सफाई और मरम्मत नहीं की गई। कहीं पानी नहीं पहुंचता, तो कहीं अचानक इतना अधिक छोड़ दिया जाता है कि फसल डूब जाती है। जल प्रबंधन की इस लापरवाही ने खेतों को तबाह कर दिया। अधिकारियों का रवैया किसानों का कहना है कि शिकायत करने पर अधिकारी मौके पर पहुंचने में देरी करते हैं या औपचारिक कार्रवाई कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। नुकसान का सर्वे समय पर नहीं होता, मुआवजा प्रक्रिया जटिल है और पारदर्शिता की कमी साफ दिखाई देती है। खराब नियम और नीतियां सरकारी योजनाओं और राहत पैकेज की घोषणाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं। जमीनी स्तर पर नियम इतने पेचीदा हैं कि किसान को लाभ लेने के लिए बार-बार दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। नीति और क्रियान्वयन के बीच का अंतर साफ नजर आता है। बिगड़ती आर्थिक स्थिति एक ओर बीज, खाद और मजदूरी की लागत बढ़ती जा रही है, दूसरी ओर फसल चौपट होने से किसान कर्ज के बोझ तले दब रहा है। घर की जरूरतें, बच्चों की पढ़ाई और बैंक की किस्तें—सब पर संकट गहराता जा रहा है। सवाल जो जवाब मांगते हैं नहर प्रबंधन की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं? फसल नुकसान का त्वरित सर्वे और मुआवजा कब? क्या नियमों को सरल और पारदर्शी बनाया जाएगा? यह खबर केवल एक खेत की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यापक संकट की झलक है जिससे प्रदेश का किसान जूझ रहा है। जमीनी हकीकत यही कहती है—जब तक व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक अन्नदाता की मेहनत यूं ही पानी में बहती रहेगी।1
- Post by Vishal Jadhav1
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