पहलवान के अवैध खनन का अखाड़ा बनी मर्का खदान: सिस्टम के मौन ने बढ़ाए मोरम माफिया के हौसले, सवालों के घेरे में प्रशासन फतेहपुर/बांदा। यमुना की लहरों से निकलने वाला 'लाल सोना' इन दिनों माफिया की तिजोरियां भरने और सरकारी तंत्र के इकबाल को चुनौती देने का सबसे बड़ा जरिया बन गया है। जनपद फतेहपुर और बांदा के सीमावर्ती इलाकों में वैध पट्टे की आड़ में चल रहा अवैध खनन अब कोई छिपी हुई बात नहीं रह गई है, बल्कि यह एक संगठित अपराध का रूप ले चुका है। स्थानीय गलियारों में चर्चा है कि महेश सिंह गौतम और बब्लू सिंह की जोड़ी ने इस पूरे क्षेत्र में अपना एक अभेद्य 'भौकाल' कायम कर रखा है, जिसमें एक सिंडिकेट लखनऊ से संचालित होता है तो दूसरा जमीन पर मोर्चे संभालता है। मर्का (बांदा) घाट के खंड संख्या-3 से शुरू होने वाला यह खेल एनजीटी के नियमों को दरकिनार कर रात के सन्नाटे में मशीनों की गूंज के साथ परवान चढ़ता है। आश्चर्य की बात यह है कि मर्का, असोथर और थरियाव जैसे थानों के ठीक सामने से बिना नंबर प्लेट वाले ओवरलोड ट्रक और डंपर बेखौफ होकर गुजर रहे हैं, लेकिन प्रशासन की खामोशी कई गहरे संदेह पैदा कर रही है। इस पूरे काले कारोबार की रीढ़ 'लोकेटर' बने हुए हैं, जो पुलिस की आवाजाही की सटीक सूचना माफिया तक पहुँचाते हैं, जिससे कानून की पकड़ इन तक कभी नहीं पहुँच पाती। सड़कों पर दौड़ते ये बिना नंबर वाले वाहन न केवल राजस्व की चोरी कर रहे हैं, बल्कि आम राहगीरों के लिए मौत का पैगाम भी बने हुए हैं। यदि ये अनियंत्रित वाहन किसी को अपनी चपेट में ले लें, तो बिना नंबर के इनकी पहचान करना नामुमकिन है, जो सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। भारी-भरकम मशीनों से यमुना की कोख को छलनी किया जा रहा है, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है। यमुना पुल, जो कभी क्षेत्र की जीवनरेखा था, अब इन ओवरलोड वाहनों के दबाव में जर्जर हो चुका है और धूल व जाम का ऐसा केंद्र बन गया है जहाँ से गुजरना आम जनता के लिए किसी सजा से कम नहीं है। राजस्व को करोड़ों की चपत लगाने वाले इस सिंडिकेट को आखिर किसका 'अभयदान' प्राप्त है, यह सवाल आज फतेहपुर की जनता के जेहन में कौंध रहा है। करोड़ों की लागत से बनी सड़कों को ये भारी वाहन नेस्तनाबूद कर रहे हैं, जिसका आर्थिक बोझ अंततः करदाताओं पर ही आता है। क्या जिला प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है या फिर लाल सोने की इस बहती गंगा में जिम्मेदार भी हाथ धोने में मशगूल हैं? वर्तमान स्थिति यह है कि माफिया को न कानून का खौफ है और न ही प्रशासन का डर। अब समय आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी इस सिंडिकेट को तोड़ने का साहस दिखाएं और यमुना की अस्मिता को बचाने के साथ-साथ सरकारी खजाने की लूट को रोकें। जनता की निगाहें अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि क्या यह अखाड़ा बंद होगा या फिर भ्रष्टाचार का यह खेल इसी तरह निर्बाध चलता रहेगा।
पहलवान के अवैध खनन का अखाड़ा बनी मर्का खदान: सिस्टम के मौन ने बढ़ाए मोरम माफिया के हौसले, सवालों के घेरे में प्रशासन फतेहपुर/बांदा। यमुना की लहरों से निकलने वाला 'लाल सोना' इन दिनों माफिया की तिजोरियां भरने और सरकारी तंत्र के इकबाल को चुनौती देने का सबसे बड़ा जरिया बन गया है। जनपद फतेहपुर और बांदा के सीमावर्ती इलाकों में वैध पट्टे की आड़ में चल रहा अवैध खनन अब कोई छिपी हुई बात नहीं रह गई है, बल्कि यह एक संगठित अपराध का रूप ले चुका है। स्थानीय गलियारों में चर्चा है कि महेश सिंह गौतम और बब्लू सिंह की जोड़ी ने इस पूरे क्षेत्र में अपना एक अभेद्य 'भौकाल' कायम कर रखा है, जिसमें एक सिंडिकेट लखनऊ से संचालित होता है तो दूसरा जमीन पर मोर्चे संभालता है। मर्का (बांदा) घाट के खंड संख्या-3 से शुरू होने वाला यह खेल एनजीटी के नियमों को दरकिनार कर रात के सन्नाटे में मशीनों की गूंज के साथ परवान चढ़ता है। आश्चर्य की बात यह है कि मर्का, असोथर और थरियाव जैसे थानों के ठीक सामने से बिना नंबर प्लेट वाले ओवरलोड ट्रक और डंपर बेखौफ होकर गुजर रहे हैं, लेकिन प्रशासन की खामोशी कई गहरे संदेह पैदा कर रही है। इस पूरे काले कारोबार की रीढ़ 'लोकेटर' बने हुए हैं, जो पुलिस की आवाजाही की सटीक सूचना माफिया तक पहुँचाते हैं, जिससे कानून की पकड़ इन तक कभी नहीं पहुँच पाती। सड़कों पर दौड़ते ये बिना नंबर वाले वाहन न केवल राजस्व की चोरी कर रहे हैं, बल्कि आम राहगीरों के लिए मौत का पैगाम भी बने हुए हैं। यदि ये अनियंत्रित वाहन किसी को अपनी चपेट में ले लें, तो बिना नंबर के इनकी पहचान करना नामुमकिन है, जो सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है। भारी-भरकम मशीनों से यमुना की कोख को छलनी किया जा रहा है, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है। यमुना पुल, जो कभी क्षेत्र की जीवनरेखा था, अब इन ओवरलोड वाहनों के दबाव में जर्जर हो चुका है और धूल व जाम का ऐसा केंद्र बन गया है जहाँ से गुजरना आम जनता के लिए किसी सजा से कम नहीं है। राजस्व को करोड़ों की चपत लगाने वाले इस सिंडिकेट को आखिर किसका 'अभयदान' प्राप्त है, यह सवाल आज फतेहपुर की जनता के जेहन में कौंध रहा है। करोड़ों की लागत से बनी सड़कों को ये भारी वाहन नेस्तनाबूद कर रहे हैं, जिसका आर्थिक बोझ अंततः करदाताओं पर ही आता है। क्या जिला प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है या फिर लाल सोने की इस बहती गंगा में जिम्मेदार भी हाथ धोने में मशगूल हैं? वर्तमान स्थिति यह है कि माफिया को न कानून का खौफ है और न ही प्रशासन का डर। अब समय आ गया है कि जिम्मेदार अधिकारी इस सिंडिकेट को तोड़ने का साहस दिखाएं और यमुना की अस्मिता को बचाने के साथ-साथ सरकारी खजाने की लूट को रोकें। जनता की निगाहें अब प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि क्या यह अखाड़ा बंद होगा या फिर भ्रष्टाचार का यह खेल इसी तरह निर्बाध चलता रहेगा।
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- Post by D.D.NEWS UTTER PRADESH1
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- Post by ललित अपराध लाइव न्यूज़ चैनल उत्तर प्रदेश1
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- Post by प्रदुम कुमार मीडिया कौशाम्बी1
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