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4 hrs ago
user_एनामुल हक
एनामुल हक
Journalist छपरा, सारण, बिहार•
4 hrs ago
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More news from Bhojpur and nearby areas
  • रामनवमी की पहली बैठक पिरौटा में संपन्न। गुड्डू सिंह बबुआन ने गरीबों में बांटा कंबल।। खास वीडियो हुआ
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    रामनवमी की पहली बैठक पिरौटा में संपन्न। गुड्डू सिंह बबुआन ने गरीबों में बांटा कंबल।। खास वीडियो हुआ
    user_जनता की आवाज
    जनता की आवाज
    Arrah, Bhojpur•
    16 hrs ago
  • MrX janmdin manate hue
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    MrX janmdin manate hue
    user_MrX
    MrX
    Salesperson दीनापुर-कम-खगौल, पटना, बिहार•
    8 hrs ago
  • लोहड़ी त्यौहार मनाने का मुख्य उद्देश्य जानकारों ने अलग-अलग उद्देश्यों से दर्शाया है प्रस्तुत हैं पुराणों के अनुसार कुछ मुख्य अंश ज्योतिष के अनुसार 13 जनवरी 2026 को लोहड़ी पर्व मनाया जा रहा है दिन मंगलवार दोपहर 3:13 बजे भद्रा तिथि होगी मकर संक्रांति स्नान सुबह 9:03 से 10:48 तक रहेगा 14 जनवरी 2026 को सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे इस दिन मकर संक्रांति मनाई जाएगी लोहड़ी पर्व हर वर्ष मकर संक्रांति से 1 दिन पहले मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी 2026 के दिन बुधवार को मनाया जाएगा 13 जनवरी को लोहड़ी मनाने की बहुत सारी खास वजह होती हैं इस अवसर पर नई फसल की पूजा की जाती है लोहड़ी माता की पूजा होती है मुख्य रुप से सिक्स समुदाय लोहड़ी पर्व मनाते हैं मकर संक्रांति से पहली वाली रात को सूर्यास्त के बाद मनाया जाने वाला पर्व लोहाडी का अर्थ -ल( लकड़ी )+ओह (सूखे उपले)+ डी (रेवड़ी) इस पर्व के 20- 25 दिन पहले ही लोग लोहडी के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं फिर एकत्रित की गई सामग्री को चौराहे- मोहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाते हैं इस उत्सव को सिख समाज बहुत ही जोश खरोश से मनाते हैं गोबर के उपलों की माला बनाकर मन्नत पूरी होने की खुशी में लोहड़ी के समय जलती हुई अग्नि में उन्हें भेंट किया जाता है इसे चरखा चढ़ाना कहते हैं वैसे तो पूरे भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है लेकिन लोहड़ी उत्तर भारत का एक लोकप्रिय त्योहार है. इसे खास तौर पर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर मुख्य रूप से फसल की कटाई व बुवाई के रूप में मनाया जाता है लोहड़ी . खुशियों की सौगात देने वाला ये त्योहार हर किसी को बहुत पसंद होता है. लोहड़ी मनाने वाले किसान इस दिन को अपने लिए नए साल की शुरुआत मानते हैं. बहुत से लोग लोहड़ी को साल का सबसे छोटा दिन और रात सबसे लंबी के तौर पर मनाते हैं. लोहड़ी के दिन खासतौर पर सुना जाता है जैसे दुल्ला भट्टी , होलिका और लोहड़ी की कहानी आदि लेखों में पौराणिक इतिहास के पन्नों में दर्ज है इन दिनों पुरे देश में पतंगों का ताता लगा रहता हैं. लोहड़ी की संध्या पर सभी एक साथ त्योहार को मनाते हैं. इस दौरान सभी जमकर लोहड़ी के गीत गाकर खुशियां मनाते हैं. लोहड़ी की रात खुली जगह पर आग जलाई जाती है. लोग लोकगीत गाते हुए नए धान के लावे के साथ खील, मक्का, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली आदि उस आग को अर्पित कर परिक्रमा करते हैं. लोहड़ी मनाने वाले किसान इस मौके पर फसल की पूजा भी करते हैं. गन्ने की कटाई के बाद उससे बने गुड़ को इस त्योहार में इस्तेमाल किया जाता है पंजाबी समाज में इस पर्व की तैयारी कई दिनों पहले ही शुरू हो जाती है. इसका संबंध मन्नत से जोड़ा गया है अर्थात जिस घर में नई बहू आई होती है या घर में संतान का जन्म हुआ होता है, तो उस परिवार की ओर से खुशी बांटते हुए लोहड़ी मनाई जाती है. सगे-संबंधी और रिश्तेदार उन्हें इस दिन विशेष सौगात के साथ बधाइयां देते हैं पुराणों के अनुसार लोहड़ी को सती के त्याग के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता हैं. कथानुसार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती के पति महादेव शिव का तिरस्कार किया था और अपने जामाता को यज्ञ में शामिल ना करने से उनकी पुत्री ने अपनी आपको को अग्नि में समर्पित कर दिया था. उसी दिन को एक पश्चाताप के रूप में प्रति वर्ष लोहड़ी पर्व मनाया जाता हैं और इसी कारण घर की विवाहित बेटी को इस दिन तोहफे दिये जाते हैं और भोजन पर आमंत्रित कर उसका मान सम्मान किया जाता हैं. इसी ख़ुशी में श्रृंगार का सामान सभी विवाहित महिलाओ को बाँटा जाता हैं लोहड़ी त्यौहार मनाने के पीछे एक और एतिहासिक कथा भी हैं जिसे दुल्ला भट्टी के नाम से जाना जाता हैं. यह कथा अकबर के शासनकाल की हैं उन दिनों दुल्ला भट्टी पंजाब प्रान्त का सरदार था, इसे पंजाब का नायक कहा जाता था. उन दिनों संदलबार नामक एक जगह थी, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं. वहाँ लड़कियों की बाजारों में बोली लगा कर बेचा जाता था तब दुल्ला भट्टी ने इस का विरोध किया और लड़कियों को सम्मानपूर्वक इस दुष्कर्म से बचाया और सामाजिक तथा उनकी इच्छा अनुसार शादी करवाकर उन्हें सम्मानित जीवन दिया. इस विजय के दिन को लोहड़ी के गीतों में गाया जाता हैं और दुल्ला भट्टी को याद किया जाता हैं. फसल काटने के बाद किसानों की जो आमदनी होती है और इनके घर में खुशियां आती हैं. पारंपरिक मान्यता के अनुसार, लोहड़ी फसल की कटाई और बुआई के तौर पर मनाई जाती है. लोहड़ी को लेकर एक मान्यता ये भी है कि इस दिन लोहड़ी का जन्म होलिका की बहन के रूप में हुआ था. बेशक होलिका का दहन हो गया था. किसान लोहड़ी के दिन को नए साल की आर्थिक शुरुआत के रूप में भी मनाते पंजाबियों के विशेष त्यौहार हैं लोहड़ी जिसे वे धूमधाम से मनाते हैं. नाच, गाना और ढोल तो पंजाबियों की शान होते हैं और इसके बिना इनके त्यौहार अधूरे हैं. लोहड़ी मनाने के लिए लकड़ियों की ढेरी पर सूखे उपले भी रखे जाते हैं. समूह के साथ लोहड़ी पूजन करने के बाद उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी एवं मूंगफली का भोग लगाया जाता है. इस अवसर पर ढोल की थाप के साथ गिद्दा और भांगड़ा नृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं. लोहड़ी आने के कई दिनों पहले ही युवा एवम बच्चे लोहड़ी के गीत गाते हैं. पन्द्रह दिनों पहले गीत गाना शुरू कर दिया जाता हैं जिन्हें घर-घर जाकर गया जाता हैं. इन गीतों में वीर शहीदों को याद किया जाता हैं जिनमे दुल्ला भट्टी के नाम विशेष रूप से लिया जाता है लोहड़ी त्योहार के पीछे धार्मिक आस्थाएं भी जुड़ी हुई हैं. लोहड़ी पर आग जलाने को लेकर मान्यता है कि यह आग राजा दक्ष की पुत्री सती की याद में जलाई जाती है. बहुत से लोगों का मानना है कि लोहड़ी का नाम संत कबीर की पत्नी लोही के नाम पर पड़ा. पंजाब के कुछ ग्रामीण इलाकों में इसे लोई भी कहा जाता है. लोहड़ी को पहले कई जगहों पर लोह भी बोला जाता था. लोह का मतलब होता है लोहा. इसे त्योहार से जोड़ने के पीछे बताया जाता है कि फसल कटने के बाद उससे मिले अनाज की रोटियां तवे पर सेकी जाती हैं. तवा लोहे का होता है. इस तरह फसल के उत्सव के रूप में मनाई जाने वाली लोहड़ी का नाम लोहे से पड़ा. पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि लोहड़ी होलिका की बहन थीं. लोहड़ी अच्छी प्रवृत्ति वाली थीं. इसलिए उनकी पूजा होती है और उन्हीं के नाम पर त्योहार मनाया जाता है. कई स्थानों पर लोहड़ी को तिलोड़ी के तौर पर भी जाना जाता था. यह शब्द तिल और रोड़ी यानी गुड़ से मिलकर बना है. बाद में तिलोड़ी को ही लोहड़ी कहा जाने लगा. लोहड़ी के त्यौहार को वसंत ऋतु के आगमन के तौर पर भी मनाया जाता है. इसलिए रबी की फसलों से उपजे अन्न को अग्नि में समर्पित करते हैं, नई फसलों का भोग लगाकर देवताओं से धन और संपन्नता की प्रार्थना करते है सभी देशवासियों को हृदय की गहराइयों से लोहड़ी पर्व व मकर संक्रांति पवित्र त्योहार के उपलक्ष में हृदय की गहराइयों से हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं चौ0 शौकत अली चेची राष्ट्रीय उपाध्यक्ष किसान एकता (संघ) एवं पिछड़ा वर्ग उ0 प्र0 सचिव (सपा)
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    लोहड़ी त्यौहार मनाने का मुख्य उद्देश्य जानकारों ने अलग-अलग उद्देश्यों से दर्शाया है  प्रस्तुत हैं पुराणों के अनुसार  कुछ मुख्य अंश
ज्योतिष के अनुसार 13 जनवरी 2026 को लोहड़ी पर्व मनाया जा रहा है  दिन मंगलवार दोपहर 3:13 बजे भद्रा तिथि होगी मकर संक्रांति स्नान सुबह 9:03 से 10:48 तक रहेगा 14 जनवरी 2026 को सूर्य देव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे इस दिन मकर संक्रांति मनाई जाएगी लोहड़ी पर्व हर वर्ष मकर संक्रांति से 1 दिन पहले मनाया जाता है मकर संक्रांति का त्योहार 14 जनवरी 2026 के दिन बुधवार को मनाया जाएगा 
13 जनवरी को 
लोहड़ी मनाने की बहुत सारी खास वजह होती हैं इस अवसर पर नई फसल की पूजा की जाती है लोहड़ी माता की पूजा होती है मुख्य रुप से सिक्स समुदाय लोहड़ी पर्व मनाते हैं 
मकर संक्रांति से पहली वाली रात को सूर्यास्त के बाद मनाया जाने वाला पर्व लोहाडी का अर्थ -ल( लकड़ी )+ओह (सूखे उपले)+ डी (रेवड़ी) इस पर्व के 20- 25 दिन पहले ही लोग लोहडी के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे  करते हैं फिर एकत्रित की गई सामग्री को चौराहे- मोहल्ले के किसी खुले स्थान पर आग जलाते हैं
इस उत्सव को सिख  समाज बहुत ही जोश खरोश से मनाते हैं गोबर के उपलों की माला बनाकर मन्नत पूरी होने की खुशी में लोहड़ी के समय जलती हुई अग्नि में उन्हें भेंट किया जाता है इसे चरखा चढ़ाना कहते हैं
वैसे तो पूरे भारत में हर्षोल्लास से मनाया जाता है लेकिन लोहड़ी उत्तर भारत का एक लोकप्रिय त्योहार है. इसे खास तौर पर पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर मुख्य रूप से फसल की कटाई व बुवाई के  रूप में मनाया जाता है
लोहड़ी . खुशियों की सौगात देने वाला ये त्योहार हर किसी को बहुत पसंद होता है.  लोहड़ी मनाने वाले किसान इस दिन को अपने लिए नए साल की शुरुआत मानते हैं.
बहुत से लोग लोहड़ी को साल का सबसे छोटा दिन और रात सबसे लंबी के तौर पर मनाते हैं.  लोहड़ी के दिन खासतौर पर सुना जाता है जैसे दुल्ला भट्टी , होलिका और लोहड़ी की कहानी आदि लेखों में पौराणिक इतिहास के पन्नों में दर्ज है
इन दिनों पुरे देश में पतंगों का ताता लगा रहता हैं. लोहड़ी की संध्या पर सभी एक साथ त्योहार को मनाते हैं. इस दौरान सभी जमकर लोहड़ी के गीत गाकर खुशियां मनाते हैं. लोहड़ी की रात खुली जगह पर आग जलाई जाती है. लोग लोकगीत गाते हुए नए धान के लावे के साथ खील, मक्का, गुड़, रेवड़ी, मूंगफली आदि उस आग को अर्पित कर परिक्रमा करते हैं. लोहड़ी मनाने वाले  किसान इस मौके पर फसल की पूजा भी करते हैं. गन्ने की कटाई के बाद उससे बने गुड़ को इस त्योहार में इस्तेमाल किया जाता है
पंजाबी समाज में इस पर्व की तैयारी कई दिनों पहले ही शुरू हो जाती है. इसका संबंध मन्नत से जोड़ा गया है अर्थात जिस घर में नई बहू आई होती है या घर में संतान का जन्म हुआ होता है, तो उस परिवार की ओर से खुशी बांटते हुए लोहड़ी मनाई जाती है. सगे-संबंधी और रिश्तेदार उन्हें इस दिन विशेष सौगात के साथ बधाइयां  देते हैं
पुराणों के अनुसार लोहड़ी को सती के त्याग के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता हैं. कथानुसार जब प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती के पति महादेव शिव का तिरस्कार किया था और अपने जामाता को यज्ञ में शामिल ना करने से उनकी पुत्री ने अपनी आपको को अग्नि में समर्पित कर दिया था. उसी दिन को एक पश्चाताप के रूप में प्रति वर्ष लोहड़ी पर्व मनाया जाता हैं और इसी कारण घर की विवाहित बेटी को इस दिन तोहफे दिये जाते हैं और भोजन पर आमंत्रित कर उसका मान सम्मान किया जाता हैं. इसी ख़ुशी में श्रृंगार का सामान सभी विवाहित महिलाओ को बाँटा जाता हैं
लोहड़ी त्यौहार मनाने के पीछे एक और एतिहासिक कथा भी हैं जिसे दुल्ला भट्टी के नाम से जाना जाता हैं. यह कथा अकबर के शासनकाल की हैं उन दिनों दुल्ला भट्टी पंजाब प्रान्त का सरदार था, इसे पंजाब का नायक कहा जाता था. उन दिनों संदलबार नामक एक जगह थी, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा हैं. वहाँ लड़कियों की बाजारों में बोली लगा कर बेचा जाता था तब दुल्ला भट्टी ने इस का विरोध किया और लड़कियों को सम्मानपूर्वक इस दुष्कर्म से बचाया और सामाजिक तथा उनकी इच्छा अनुसार  शादी करवाकर उन्हें सम्मानित जीवन दिया. इस विजय के दिन को लोहड़ी के गीतों में गाया जाता हैं और दुल्ला भट्टी को याद किया जाता हैं.
फसल काटने के बाद किसानों की जो आमदनी होती है और इनके घर में खुशियां आती हैं. पारंपरिक मान्यता के अनुसार, लोहड़ी फसल की कटाई और बुआई के तौर पर मनाई जाती है. लोहड़ी को लेकर एक मान्यता ये भी है कि इस दिन लोहड़ी का जन्म होलिका की बहन के रूप में हुआ था. बेशक होलिका का दहन हो गया था. किसान लोहड़ी के दिन को नए साल की आर्थिक शुरुआत के रूप में भी मनाते
पंजाबियों के विशेष त्यौहार हैं लोहड़ी जिसे वे धूमधाम से मनाते हैं. नाच, गाना और ढोल तो पंजाबियों की शान होते हैं और इसके बिना इनके त्यौहार अधूरे हैं. लोहड़ी मनाने के लिए लकड़ियों की ढेरी पर सूखे उपले भी रखे जाते हैं. समूह के साथ लोहड़ी पूजन करने के बाद उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी एवं मूंगफली का भोग लगाया जाता है. इस अवसर पर ढोल की थाप के साथ गिद्दा और भांगड़ा नृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं.
लोहड़ी आने के कई दिनों पहले ही युवा एवम बच्चे लोहड़ी के गीत गाते हैं. पन्द्रह दिनों पहले  गीत गाना शुरू कर दिया जाता हैं जिन्हें घर-घर जाकर गया जाता हैं. इन गीतों में वीर शहीदों को याद किया जाता हैं जिनमे दुल्ला भट्टी के नाम विशेष रूप से लिया जाता है
लोहड़ी त्योहार के पीछे धार्मिक आस्थाएं भी जुड़ी हुई हैं. लोहड़ी पर आग जलाने को लेकर मान्यता है कि यह आग राजा दक्ष की पुत्री सती की याद में जलाई जाती है.
बहुत से लोगों का मानना है कि लोहड़ी का नाम संत कबीर की पत्नी लोही के नाम पर पड़ा. पंजाब के कुछ ग्रामीण इलाकों में इसे लोई भी कहा जाता है.
लोहड़ी को पहले कई जगहों पर लोह भी बोला जाता था. लोह का मतलब होता है लोहा. इसे त्योहार से जोड़ने के पीछे बताया जाता है कि फसल कटने के बाद उससे मिले अनाज की रोटियां तवे पर सेकी जाती हैं. तवा लोहे का होता है. इस तरह फसल के उत्सव के रूप में मनाई जाने वाली लोहड़ी का नाम लोहे से पड़ा.
पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि लोहड़ी होलिका की बहन थीं. लोहड़ी अच्छी प्रवृत्ति वाली थीं. इसलिए उनकी पूजा होती है और उन्हीं के नाम पर त्योहार मनाया जाता है.
कई स्थानों पर लोहड़ी को तिलोड़ी के तौर पर भी जाना जाता था. यह शब्द तिल और रोड़ी यानी गुड़ से मिलकर बना है. बाद में तिलोड़ी को ही लोहड़ी कहा जाने लगा.
लोहड़ी के त्यौहार को वसंत ऋतु के आगमन के तौर पर भी मनाया जाता है. इसलिए रबी की फसलों से उपजे अन्न को अग्नि में समर्पित करते हैं, नई फसलों का भोग लगाकर देवताओं से धन और संपन्नता की प्रार्थना करते है
सभी देशवासियों को हृदय की गहराइयों से  लोहड़ी पर्व व मकर संक्रांति  पवित्र त्योहार के उपलक्ष में  हृदय की गहराइयों से हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं
चौ0 शौकत अली चेची 
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
किसान एकता (संघ) एवं
पिछड़ा वर्ग उ0 प्र0 सचिव (सपा)
    user_JHVP BHARAT NEWS
    JHVP BHARAT NEWS
    Journalist महाराजगंज, सीवान, बिहार•
    7 hrs ago
  • #पटना_सिटी_चौक थाना क्षेत्र में दो पछो मे हुई मारपीट में एक युवक की मौत पुलिस जुटी जांच मे #PatnaCity #ApnaCityTakNews #ChokThana #PatnaPolice #City #VairlNews #News
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    #पटना_सिटी_चौक थाना क्षेत्र में दो पछो मे हुई मारपीट में एक युवक की मौत पुलिस जुटी जांच मे 
#PatnaCity #ApnaCityTakNews #ChokThana #PatnaPolice #City #VairlNews #News
    user_APNA CITY TAK NEWS
    APNA CITY TAK NEWS
    Reporter Patna Rural, Bihar•
    8 hrs ago
  • परिवारवाद की सबसे घटिया राजनीति का सबसे जीता जागता उदाहरण है बिहार।
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    परिवारवाद की सबसे घटिया राजनीति का सबसे जीता जागता उदाहरण है बिहार।
    user_जनसत्ता NEWS@
    जनसत्ता NEWS@
    Journalist Daraundha, Siwan•
    13 hrs ago
  • इतने मीडिय बंधु बस एक जवाब के लिए आतुर दिखते,लेकिन प्रशांत किशोर जनता के ऊपर और जनता के लिए ही सब जगह बोलते है और बिहार के लिए हमेशा चिंतित दिखते हैं,! #vidio #trending #bihar #jansuraaj #shorts
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    इतने मीडिय बंधु बस एक जवाब के लिए आतुर दिखते,लेकिन प्रशांत किशोर जनता के ऊपर और जनता के लिए ही सब जगह बोलते है और बिहार के लिए हमेशा चिंतित दिखते हैं,! #vidio #trending #bihar #jansuraaj #shorts
    user_बात बिहार की जगदीशपुर भोजपुर
    बात बिहार की जगदीशपुर भोजपुर
    Reporter Jagdishpur, Bhojpur•
    17 hrs ago
  • लोकतंत्र में लोक हारा है, तंत्र जीता है… पटना पहुंचते ही गरजे Tejashwi Yadav । #biharelection2025​ #TejashwiYadav​ #BJP​ #NitishKumar​ #samratchoudhary​ #BiharPolitics​
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    लोकतंत्र में लोक हारा है, तंत्र जीता है… पटना पहुंचते ही गरजे Tejashwi Yadav । #biharelection2025​ #TejashwiYadav​ #BJP​ #NitishKumar​ #samratchoudhary​ #BiharPolitics​
    user_Patna darpan
    Patna darpan
    Journalist Patna Rural, Bihar•
    22 hrs ago
  • happy birthday MrX 12/1
    1
    happy birthday MrX 12/1
    user_MrX
    MrX
    Salesperson दीनापुर-कम-खगौल, पटना, बिहार•
    12 hrs ago
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