एक अंग्रेजी अखबार के ऑप-एड में छपी टिप्पणी से प्रेरित यह लेख, भारत के आर्थिक विकास की वर्तमान चर्चाओं को गहराई से परखता है, विशेषकर चीन की तुलना में। यह तर्क देता है कि आर्थिक प्रगति का निर्धारण व्यक्तियों या सभ्यताओं से नहीं, बल्कि नीतियों और सिस्टम की एकाग्रता से होता है। भारत की अर्थव्यवस्था के डगमगाने और गंभीर आर्थिक संकट के मंडराने के साथ, मीडिया और आम बहसों में चीन के विकास मॉडल के उदाहरणों का उल्लेख काफी बढ़ गया है, जबकि कुछ साल पहले तक ऐसी चर्चाओं को चीन का एजेंट माना जाता था। अब भारत में "हम पिछड़ गए हैं" का अहसास गहरा रहा है। लेख उन भ्रामक निष्कर्षों को खारिज करता है जो चीन की प्रगति को उसकी सभ्यता के तत्वों या देंग श्याओपिंग जैसे करिश्माई नेता की देन मानते हैं। यह बताता है कि 1839-42 के अफीम युद्ध में चीन की पराजय ने "अपमान की शताब्दी" की शुरुआत की थी, यह दर्शाता है कि सभ्यता अपने आप में विकास की गारंटी नहीं है। देंग के योगदान को भी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। विश्व बैंक की 1981 की रिपोर्ट "चाइना: सोशलिस्ट इकोनॉमिक डेवलपमेंट" के अनुसार, देंग के कमान संभालने से पहले ही माओ जेदुंग के दौर में चीन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा जैसे सामाजिक संकेतकों में उल्लेखनीय प्रगति की थी। इसमें प्राथमिक शिक्षा का व्यापक प्रसार, साक्षरता दर में वृद्धि, 'बेयरफुट डॉक्टर' कार्यक्रम, संक्रामक रोगों पर नियंत्रण और महिलाओं के अधिकारों में सुधार शामिल थे। माओ युग में बनी इसी मजबूत सामाजिक नींव पर देंग श्याओपिंग ने 'सुधार और दरवाजा खोलने' की नीति को आगे बढ़ाया, जिससे कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में आर्थिक विकास संभव हो सका। भारत ने स्वतंत्रता के बाद विकास का अपना अलग रास्ता चुना, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1955 में चीनी अर्थशास्त्री चेन हानसेंग से चीन की नीतियों पर लंबी बातचीत कर उसकी प्रगति में गहरी दिलचस्पी दिखाई और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता महसूस की थी। हालांकि, लेखक का मानना है कि वह "भविष्य" आ चुका है और उसने अपना फैसला सुना दिया है, जिसमें भारत पिछड़ गया है। लेख इस मायूसी में चीन के अनावश्यक महिमामंडन या आत्म-हीनता के बजाय उन नीतियों और पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह करता है जिन्होंने विकास को सुनिश्चित किया। यह तर्क देता है कि अमेरिका (द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से 1980 तक), जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और यहां तक कि भारत के 1950 से 1990 तक के अनुभव से पता चलता है कि आर्थिक विकास का सबसे अच्छा दौर तब आया जब राज्य ने अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेपकारी भूमिका निभाई, पूंजी प्रवाह को निर्देशित किया और संसाधनों के वितरण में सक्रिय रहा। महत्वपूर्ण यह है कि राज्य पूंजी को निर्देशित करे, न कि पूंजी राजकीय ढांचे पर अपना नियंत्रण बना ले। आज भारत के पास उद्यमी, बाजार और तकनीकी कौशल की कमी नहीं है, जो नेहरूवादी नीतियों के तहत राज्य की पूंजी प्रवाह को प्रभावित करने की क्षमता का परिणाम था। इसके बावजूद, देश में गहरा आर्थिक संकट और निराशा छाई है, जिसका कारण 1991 के बाद पूंजी के सामने राज्य का पूर्ण समर्पण है। भारत में सामाजिक क्रांति का अभाव, भूमि सुधारों की विफलता, निहित स्वार्थों का निर्णायक प्रभाव, पारंपरिक शक्ति केंद्रों का कायम रहना, जातीय ऊंच-नीच और लैंगिक असमानता जैसे ऐतिहासिक कारण रहे, जिसके चलते निजी पूंजी ताकतवर परिवारों के हाथ में बनी रही और नवोदित राज्य उसे निर्देशित करने में अक्षम साबित हुआ। चीन के विपरीत, भारत उत्पादक शक्तियों के विकसित होने से पहले ही नव-उदारवाद के शिकंजे में फंस गया। इसलिए, चीन से तुलना एक निरर्थक प्रयास है, क्योंकि चीन पूंजी को कार्य-कुशलता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित करने की भूमिका निभाने देता है, लेकिन उसे ऐसी उच्चतम शक्ति नहीं बनने देता जो समाज को संगठित करे, राष्ट्रीय विकास की दिशा तय करे या राजनीतिक व्यवस्था को ही बदल दे।
एक अंग्रेजी अखबार के ऑप-एड में छपी टिप्पणी से प्रेरित यह लेख, भारत के आर्थिक विकास की वर्तमान चर्चाओं को गहराई से परखता है, विशेषकर चीन की तुलना में। यह तर्क देता है कि आर्थिक प्रगति का निर्धारण व्यक्तियों या सभ्यताओं से नहीं, बल्कि नीतियों और सिस्टम की एकाग्रता से होता है। भारत की अर्थव्यवस्था के डगमगाने और गंभीर आर्थिक संकट के मंडराने के साथ, मीडिया और आम बहसों में चीन के विकास मॉडल के उदाहरणों का उल्लेख काफी बढ़ गया है, जबकि कुछ साल पहले तक ऐसी चर्चाओं को चीन का एजेंट माना जाता था। अब भारत में "हम पिछड़ गए हैं" का अहसास गहरा रहा है। लेख उन भ्रामक निष्कर्षों को खारिज करता है जो चीन की प्रगति को उसकी सभ्यता के तत्वों या देंग श्याओपिंग जैसे करिश्माई नेता की देन मानते हैं। यह बताता है कि 1839-42 के अफीम युद्ध में चीन की पराजय ने "अपमान की शताब्दी" की शुरुआत की थी, यह दर्शाता है कि सभ्यता अपने आप में विकास की गारंटी नहीं है। देंग के योगदान को भी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। विश्व बैंक की 1981 की रिपोर्ट "चाइना: सोशलिस्ट इकोनॉमिक डेवलपमेंट" के अनुसार, देंग के कमान संभालने से पहले ही माओ जेदुंग के दौर में चीन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा जैसे सामाजिक संकेतकों में उल्लेखनीय प्रगति की थी। इसमें प्राथमिक शिक्षा का व्यापक प्रसार, साक्षरता दर में वृद्धि, 'बेयरफुट डॉक्टर' कार्यक्रम, संक्रामक रोगों पर नियंत्रण और महिलाओं के अधिकारों में सुधार शामिल थे। माओ युग में बनी इसी मजबूत सामाजिक नींव पर देंग श्याओपिंग ने 'सुधार और दरवाजा खोलने' की नीति को आगे बढ़ाया, जिससे कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में आर्थिक विकास संभव हो सका। भारत ने स्वतंत्रता के बाद विकास का अपना अलग रास्ता चुना, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1955 में चीनी अर्थशास्त्री चेन हानसेंग से चीन की नीतियों पर लंबी बातचीत कर उसकी प्रगति में गहरी दिलचस्पी दिखाई और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता महसूस की थी। हालांकि, लेखक का मानना है कि वह "भविष्य" आ चुका है और उसने अपना फैसला सुना दिया है, जिसमें भारत पिछड़ गया है। लेख इस मायूसी में चीन के अनावश्यक महिमामंडन या आत्म-हीनता के बजाय उन नीतियों और पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह करता है जिन्होंने विकास को सुनिश्चित किया। यह तर्क देता है कि अमेरिका (द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से 1980 तक), जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान और यहां तक कि भारत के 1950 से 1990 तक के अनुभव से पता चलता है कि आर्थिक विकास का सबसे अच्छा दौर तब आया जब राज्य ने अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेपकारी भूमिका निभाई, पूंजी प्रवाह को निर्देशित किया और संसाधनों के वितरण में सक्रिय रहा। महत्वपूर्ण यह है कि राज्य पूंजी को निर्देशित करे, न कि पूंजी राजकीय ढांचे पर अपना नियंत्रण बना ले। आज भारत के पास उद्यमी, बाजार और तकनीकी कौशल की कमी नहीं है, जो नेहरूवादी नीतियों के तहत राज्य की पूंजी प्रवाह को प्रभावित करने की क्षमता का परिणाम था। इसके बावजूद, देश में गहरा आर्थिक संकट और निराशा छाई है, जिसका कारण 1991 के बाद पूंजी के सामने राज्य का पूर्ण समर्पण है। भारत में सामाजिक क्रांति का अभाव, भूमि सुधारों की विफलता, निहित स्वार्थों का निर्णायक प्रभाव, पारंपरिक शक्ति केंद्रों का कायम रहना, जातीय ऊंच-नीच और लैंगिक असमानता जैसे ऐतिहासिक कारण रहे, जिसके चलते निजी पूंजी ताकतवर परिवारों के हाथ में बनी रही और नवोदित राज्य उसे निर्देशित करने में अक्षम साबित हुआ। चीन के विपरीत, भारत उत्पादक शक्तियों के विकसित होने से पहले ही नव-उदारवाद के शिकंजे में फंस गया। इसलिए, चीन से तुलना एक निरर्थक प्रयास है, क्योंकि चीन पूंजी को कार्य-कुशलता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित करने की भूमिका निभाने देता है, लेकिन उसे ऐसी उच्चतम शक्ति नहीं बनने देता जो समाज को संगठित करे, राष्ट्रीय विकास की दिशा तय करे या राजनीतिक व्यवस्था को ही बदल दे।
- पटना में '10 सर्कुलर रोड' बंगले को खाली कराने के सरकारी आदेश के बाद प्रशासनिक हलचल बेहद तेज हो गई है। सचिवालय एसडीपीओ अनु कुमारी, पटना के एडीएम (लॉ एंड ऑर्डर) के साथ भारी पुलिस बल लेकर बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी के आवास पर पहुँचे। अधिकारियों ने बंगले के भीतर जाकर राबड़ी देवी को भवन निर्माण विभाग द्वारा जारी नोटिस और आवास खाली करने के कानूनी आदेशों की विस्तार से जानकारी दी, हालाँकि बाद में एसडीपीओ अनु कुमारी मीडिया से बिना कोई बातचीत किए ही रवाना हो गईं। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, राबड़ी देवी ने फिलहाल सरकारी आवास खाली करने से साफ इनकार कर दिया है, यह कहते हुए कि वह किसी भी जल्दबाजी में इस आवास को खाली करने वाली नहीं हैं। बताया गया है कि आवास खाली करने की तय समय सीमा खत्म होने के बाद भवन निर्माण विभाग की तरफ से अब तक दो नोटिस भेजे जा चुके हैं, और विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि तीसरे नोटिस के बाद भी बंगला खाली नहीं किया गया, तो प्रशासन कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस बल की मदद से बेदखली की कार्रवाई कर सकता है। अपने पोते इराज का जन्मदिन मनाकर दिल्ली से पटना एयरपोर्ट लौटीं राबड़ी देवी ने पत्रकारों के सवालों पर अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए बिहार सरकार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को सीधे तौर पर खुली चुनौती दी। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी ने दृढ़ता से कहा, "सम्राट चौधरी जितना भी फोर्स बुलाकर मकान खाली करवाना चाहें, मैं मकान नहीं खाली करूंगी। हम किसी भी कीमत पर अपना आवास खाली नहीं करेंगे।" राबड़ी देवी के इस बागी रुख और सम्राट चौधरी को दिए चैलेंज के बाद, बिहार की सत्ताधारी एनडीए (NDA) के नेताओं ने लालू परिवार पर चौतरफा हमला बोला है। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि यह कोई जंगलराज नहीं है और कानून का पालन करना ही होगा। उन्होंने लालू परिवार पर लूटने का आरोप लगाते हुए पूछा कि '10 सर्कुलर रोड' में ऐसा कौन सा खजाना छुपाकर रखा है, जिसे पुलिस खोज निकालेगी। जदयू नेता विजय कुमार चौधरी ने कहा कि सरकारी आवासों को लेकर जो भी नियम-कानून तय हैं, उनका पालन सबको करना ही होगा। भाजपा से राज्यसभा सांसद भीम सिंह ने राबड़ी देवी के बयान को सरकार के साथ सीधे तौर पर टकराव पैदा करने वाला बताया और कहा कि इस बंगले को खाली कराने के लिए बिहार की पूरी पुलिस की जरूरत नहीं है, बल्कि एक दरोगा ही यह आवास खाली करा देगा। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब नीतीश-सम्राट सरकार के भवन निर्माण विभाग ने '10 सर्कुलर रोड' वाले बंगले को भाजपा कोटे के नए मंत्री नंदकिशोर राम को आवंटित कर दिया, जबकि विभाग का तर्क है कि राबड़ी देवी को वर्ष 2025 के आखिर में ही '39, हार्डिंग रोड' स्थित एक अन्य सरकारी आवास आवंटित किया जा चुका है, जिसे विभाग ने पूरी तरह तैयार और सुसज्जित भी कर दिया है। लालू परिवार द्वारा पुराना बंगला खाली न किए जाने के कारण अब यह मामला कानूनी और सियासी जंग का मैदान बन चुका है।2
- सहरसा पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए ₹10 हजार के इनामी अपराधी को गिरफ्तार कर लिया है।1
- युवा नेता राकेश रौशन, जो 'नया सोच' के साथ अपनी पहचान बना रहे हैं, आगामी चुनावों के लिए जिला परिषद के भावी उम्मीदवार के रूप में सामने आए हैं। इससे पहले वे पिपरा विधानसभा क्षेत्र संख्या 42 से पूर्व प्रत्याशी भी रह चुके हैं।1
- मधेपुरा में जिला बैडमिंटन संघ के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय जिला स्तरीय बैडमिंटन प्रतियोगिता का शनिवार को भव्य उद्घाटन किया गया। जिलाधिकारी अभिषेक रंजन, उप विकास आयुक्त अनिल बसाक, अनुमंडल पदाधिकारी संतोष कुमार, जिला परिवहन पदाधिकारी संतोष कुमार और उपाधीक्षक शारीरिक शिक्षा सुश्री आम्रपाली कुमारी ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर इसका शुभारंभ किया। उद्घाटन समारोह के बाद, अतिथियों ने खिलाड़ियों से परिचय प्राप्त कर प्रतियोगिता का विधिवत आगाज किया, जहाँ जिलाधिकारी अभिषेक रंजन और उप विकास आयुक्त अनिल बसाक ने स्वयं बैडमिंटन कोर्ट पर पहुँचकर खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन किया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इस अवसर पर जिलाधिकारी अभिषेक रंजन ने कहा कि मधेपुरा में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है, उन्हें केवल सही मंच और उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है। उन्होंने बैडमिंटन संघ से विशेष रूप से उदाकिशुनगंज अनुमंडल से भी खिलाड़ियों की अधिकाधिक भागीदारी सुनिश्चित करने का आग्रह किया। कार्यक्रम का संचालन कर रहे शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य अनुदेशक अरुण कुमार ने जानकारी दी कि इस प्रतियोगिता में जिले भर से करीब 40 टीमें हिस्सा ले रही हैं। उन्होंने मधेपुरा में खेल प्रतिभाओं की अपार संभावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि ऐसी प्रतियोगिताएं खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा निखारने का अवसर देती हैं, जिससे जिले में खेल संस्कृति को और अधिक मजबूती मिलेगी।4
- बिहार के सौर बाजार नगर पंचायत में विकास कार्यों को केवल खानापूर्ति के तौर पर अंजाम दिया जा रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि क्षेत्र में वास्तविक विकास की कमी है और जो भी कार्य हो रहे हैं, वे मात्र दिखावे के लिए हैं।1
- आम लोगों को जहाँ भीषण गर्मी से कुछ राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर मक्का की फसल को भारी क्षति होने की आशंका जताई जा रही है।1
- मधेपुरा जिले के शंकरपुर प्रखंड क्षेत्र स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय, मौजमा में शनिवार को आयोजित अभिभावक-शिक्षक बैठक (PTM) के दौरान जमकर हंगामा हुआ। विद्यालय की प्रभारी प्रधानाध्यापिका प्रेमा कुमारी ने सहायक शिक्षिका और पूर्व प्रधानाध्यापिका बबीता कुमारी तथा उनके पति बिमलेश कुमार बिमल पर गंभीर आरोप लगाते हुए मारपीट, गाली-गलौज और प्रताड़ित करने की बात कही है। इस मामले में प्रेमा कुमारी ने शंकरपुर थाना में लिखित आवेदन देकर कानूनी कार्रवाई की मांग की है। प्रभारी प्रधानाध्यापिका ने बताया कि शनिवार सुबह करीब 10 बजे गर्मी की छुट्टी से पहले विद्यालय परिसर में पीटीएम आयोजित की जा रही थी, तभी बबीता कुमारी अपने पति के साथ विद्यालय पहुंचीं और बैठक में मौजूद अभिभावकों के साथ अभद्र व्यवहार व गाली-गलौज करने लगीं, जिससे बैठक का माहौल बिगड़ गया और पीटीएम बाधित हो गई। प्रेमा कुमारी के अनुसार, जब उन्होंने सवाल किया कि यदि ग्रामीण और अभिभावक बैठक में नहीं आएंगे तो कौन आएगा, तो इस बात पर बबीता कुमारी भड़क गईं और उन्हें थप्पड़ मार दिया। प्रेमा कुमारी का यह भी आरोप है कि विद्यालय में विवाद काफी पुराना है और 2 मई को प्रभार मिलने के बाद से ही उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इससे पहले भी एक बार कक्षा में बच्चों के सामने उनके साथ मारपीट की गई थी, जिसकी शिकायत उन्होंने पूर्व में भी शंकरपुर थाना में की थी। प्रभारी प्रधानाध्यापिका ने अपने आवेदन में यह भी आरोप लगाया है कि उन्हें मिड-डे मील के भोजन में जहर देकर फंसाने और झूठे मुकदमे में उलझाने की धमकी भी दी जाती रही है। घटना के बाद विद्यालय परिसर में तनाव का माहौल बन गया और सूचना मिलने पर शंकरपुर पुलिस, अपर थानाध्यक्ष महितोष परासर तथा प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी विजय कुमार की टीम मौके पर पहुंची। विद्यालय में मौजूद ग्रामीणों ने भी घटना की निंदा करते हुए आरोपी शिक्षिका और उनके पति के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। विवाद बढ़ने पर बड़ी संख्या में ग्रामीण विद्यालय पहुंच गए थे और कुछ समय के लिए विद्यालय में तालाबंदी भी कर दी गई। कई स्कूली बच्चों ने प्रशासन को बताया कि प्रेमा कुमारी के आने के बाद विद्यालय में नियमित पढ़ाई होने लगी है और मध्यान्ह भोजन भी समय पर मिल रहा है, जो पहले नियमित नहीं था। पुलिस प्रशासन ने बताया है कि प्रभारी प्रधानाध्यापिका की लिखित शिकायत प्राप्त हो गई है और मामले की जांच शुरू कर दी गई है। इस संबंध में जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) मधेपुरा संजय कुमार ने कहा कि मामले की जांच कराई जाएगी और जांच रिपोर्ट के आधार पर उचित कार्रवाई की जाएगी।4
- झंझारपुर अनुमंडल में पिछले कुछ दिनों से घरेलू विवाद अब सड़क पर कुश्ती का रूप ले रहे हैं। इसी क्रम में अररिया से नवानी तक मामूली कहासुनी एक बड़े सार्वजनिक दंगल में बदल गई। इस दौरान, झंझारपुर के अररिया से नवानी तक सड़क के बीचो-बीच कहीं हाथापाई हुई तो कहीं पत्थरबाजी की घटनाएँ भी देखने को मिलीं।2