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भारत के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबूबक्र अहमद ने आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की. प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, "भारत के ग्रैंड मुफ्ती, शेख अबूबक्र अहमद साहब के साथ बहुत अच्छी बातचीत हुई. हमने विभिन्न मुद्दों पर व्यापक चर्चा की. सामाजिक सद्भाव, भाईचारे को बढ़ावा देने और शिक्षा में सुधार के लिए उनके प्रयास सराहनीय है." #pmmodi #SheikhAbubakrAhmadSahab #GrandMuftiofIndia #abpnews

9 hrs ago
user_RAAM PUR LAHI न्यूज़
RAAM PUR LAHI न्यूज़
Nurse शंकरपुर, मधेपुरा, बिहार•
9 hrs ago
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भारत के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबूबक्र अहमद ने आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की. प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, "भारत के ग्रैंड मुफ्ती, शेख अबूबक्र अहमद साहब के साथ बहुत अच्छी बातचीत हुई. हमने विभिन्न मुद्दों पर व्यापक चर्चा की. सामाजिक सद्भाव, भाईचारे को बढ़ावा देने और शिक्षा में सुधार के लिए उनके प्रयास सराहनीय है." #pmmodi #SheikhAbubakrAhmadSahab #GrandMuftiofIndia #abpnews

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  • बिहार के मधेपुरा से सरकारी लापरवाही की एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां जिंदा लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया, जिसके बाद उनकी वृद्धा पेंशन बंद हो गई। मामला मुरलीगंज प्रखंड का है, जहां बुजुर्ग अब अपने जिंदा होने का सबूत देने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। मामला मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड अंतर्गत पोखराम परमानंदपुर पंचायत के नवटोलिया, वार्ड संख्या–12 का है। सुरेंद्र यादव, सुगिया देवी और जयमंती देवी वर्षों से वृद्धा पेंशन योजना का लाभ ले रहे थे। लेकिन अचानक उनके खाते में पेंशन की राशि आनी बंद हो गई। जब प्रखंड कार्यालय में जानकारी ली गई, तो पता चला कि सरकारी पोर्टल पर उन्हें ‘मृत’ दिखा दिया गया है। बिना किसी भौतिक सत्यापन और जांच के जिंदा लोगों को सिस्टम में मृत घोषित कर देना प्रशासनिक लापरवाही की बड़ी मिसाल माना जा रहा है। बाइट – सुगिया देवी, पीड़ित वृद्धा: “हम जिंदा हैं, फिर भी कागज पर मरा दिया गया… पेंशन बंद हो गया… हम गरीब लोग कहां जाएं?” वृद्धा पेंशन ही इन बुजुर्गों के लिए जीवनयापन का मुख्य सहारा थी। पेंशन बंद होने से दवा, राशन और दैनिक जरूरतों पर संकट गहरा गया है। परिजनों का कहना है कि कई बार कार्यालय का चक्कर लगाने के बाद भी सिर्फ आश्वासन मिला है, समाधान नहीं। बाइट – जयमंती देवी, पीड़ित वृद्धा बाइट – सुरेंद्र यादव, पीड़ित वृद्ध बाइट – रितेश यादव, स्थानीय ग्रामीण स्थानीय ग्रामीणों ने मुरलीगंज प्रखंड कार्यालय पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बिना पैसे के कोई काम नहीं होता। ग्रामीणों का आरोप है कि हर काम के लिए घूस मांगी जाती है और गरीबों की सुनवाई नहीं होती। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसकी लापरवाही से जिंदा लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया? क्या यह महज डेटा एंट्री की गलती है या किसी स्तर पर गंभीर अनियमितता? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी, या फिर मामला जांच के नाम पर ठंडे बस्ते में चला जाएगा? यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि गरीब और बुजुर्ग लाभुकों की संवेदनशील योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी गंभीर चिंता पैदा करती है। अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि कब तक इन ‘जिंदा’ लोगों को उनके जिंदा होने का हक और पेंशन वापस मिलती है।
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    बिहार के मधेपुरा से सरकारी लापरवाही की एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां जिंदा लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में ‘मृत’ घोषित कर दिया गया, जिसके बाद उनकी वृद्धा पेंशन बंद हो गई। मामला मुरलीगंज प्रखंड का है, जहां बुजुर्ग अब अपने जिंदा होने का सबूत देने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
मामला मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड अंतर्गत पोखराम परमानंदपुर पंचायत के नवटोलिया, वार्ड संख्या–12 का है।
सुरेंद्र यादव, सुगिया देवी और जयमंती देवी वर्षों से वृद्धा पेंशन योजना का लाभ ले रहे थे। लेकिन अचानक उनके खाते में पेंशन की राशि आनी बंद हो गई।
जब प्रखंड कार्यालय में जानकारी ली गई, तो पता चला कि सरकारी पोर्टल पर उन्हें ‘मृत’ दिखा दिया गया है।
बिना किसी भौतिक सत्यापन और जांच के जिंदा लोगों को सिस्टम में मृत घोषित कर देना प्रशासनिक लापरवाही की बड़ी मिसाल माना जा रहा है।
बाइट – सुगिया देवी, पीड़ित वृद्धा:
“हम जिंदा हैं, फिर भी कागज पर मरा दिया गया… पेंशन बंद हो गया… हम गरीब लोग कहां जाएं?”
वृद्धा पेंशन ही इन बुजुर्गों के लिए जीवनयापन का मुख्य सहारा थी। पेंशन बंद होने से दवा, राशन और दैनिक जरूरतों पर संकट गहरा गया है।
परिजनों का कहना है कि कई बार कार्यालय का चक्कर लगाने के बाद भी सिर्फ आश्वासन मिला है, समाधान नहीं।
बाइट – जयमंती देवी, पीड़ित वृद्धा
बाइट – सुरेंद्र यादव, पीड़ित वृद्ध
बाइट – रितेश यादव, स्थानीय ग्रामीण
स्थानीय ग्रामीणों ने मुरलीगंज प्रखंड कार्यालय पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बिना पैसे के कोई काम नहीं होता।
ग्रामीणों का आरोप है कि हर काम के लिए घूस मांगी जाती है और गरीबों की सुनवाई नहीं होती।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसकी लापरवाही से जिंदा लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया? क्या यह महज डेटा एंट्री की गलती है या किसी स्तर पर गंभीर अनियमितता?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी, या फिर मामला जांच के नाम पर ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
यह घटना न सिर्फ प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि गरीब और बुजुर्ग लाभुकों की संवेदनशील योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी गंभीर चिंता पैदा करती है।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि कब तक इन ‘जिंदा’ लोगों को उनके जिंदा होने का हक और पेंशन वापस मिलती है।
    user_RAMAN KUMAR
    RAMAN KUMAR
    REPORTER मधेपुरा, मधेपुरा, बिहार•
    58 min ago
  • 😢😢😢🤔🤔🤔
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    😢😢😢🤔🤔🤔
    user_Raju yadav
    Raju yadav
    मुरलीगंज, मधेपुरा, बिहार•
    7 hrs ago
  • ye bhabhi ji Kho gaya hai dosto 🥺 please pata jarur karna/ #news #madhepura #kumarkhand #shankarpur #shurulocalapps
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    ye bhabhi ji Kho gaya hai dosto 🥺 please pata jarur karna/ #news #madhepura #kumarkhand #shankarpur #shurulocalapps
    user_Vijay kumar
    Vijay kumar
    Artist कुमारखंड, मधेपुरा, बिहार•
    11 hrs ago
  • मधेपुरा मे कीरीमन का तांडव
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    मधेपुरा मे कीरीमन का तांडव
    user_Pintu Bihari
    Pintu Bihari
    Farmer Madhepura, Bihar•
    21 hrs ago
  • नगर पंचायत सौर बाजार से सहुरिया पुर्वी पंचायत के सोनवर्षा टोला होते हुए दुहबी गांव जाने वाली मुख्य सड़क मार्ग में नदी पर बने पुल के समीप सड़क मार्ग खंडहर में तब्दील कभी भी हो सकता है बड़ी हादसा।
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    नगर पंचायत सौर बाजार से सहुरिया पुर्वी पंचायत के सोनवर्षा टोला होते हुए दुहबी गांव जाने वाली मुख्य सड़क मार्ग में नदी पर बने पुल के समीप सड़क मार्ग खंडहर में तब्दील कभी भी हो सकता है बड़ी हादसा।
    user_मिथिलेश कुमार
    मिथिलेश कुमार
    Teacher सौर बाजार, सहरसा, बिहार•
    44 min ago
  • Post by Vinod Kumar bindas
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    Post by Vinod Kumar bindas
    user_Vinod Kumar bindas
    Vinod Kumar bindas
    छातापुर, सुपौल, बिहार•
    9 hrs ago
  • महाशिवरात्रि पर्व
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    महाशिवरात्रि पर्व
    user_ओम प्रकाश विश्वास युवा नेता पप्पू ब्रिगेड सुपौल
    ओम प्रकाश विश्वास युवा नेता पप्पू ब्रिगेड सुपौल
    Supaul, Bihar•
    9 hrs ago
  • बिहार सरकार भले ही स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन कोसी प्रमंडल से जो तस्वीर सामने आई है, वह इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। मधेपुरा स्थित जननायक कर्पूरी ठाकुर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, जिसे 800 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया, आज खुद संसाधनों और डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहा है। हालात ऐसे हैं कि यह मेडिकल कॉलेज खुद ‘आईसीयू’ में नजर आ रहा है। 232 स्वीकृत चिकित्सकों के पदों वाले इस मेडिकल कॉलेज में फिलहाल सिर्फ 51 डॉक्टर कार्यरत हैं। यानी करीब 78 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। 23 विभागों वाले इस संस्थान में प्रोफेसर के 23 पदों में से मात्र 3, एसोसिएट प्रोफेसर के 43 में से 7, असिस्टेंट प्रोफेसर के 76 में से 10 और सीनियर रेजिडेंट व ट्यूटर के 90 में से केवल 31 पद ही भरे हुए हैं। इन 51 डॉक्टरों पर इलाज, इमरजेंसी ड्यूटी और मेडिकल छात्रों को पढ़ाने की तिहरी जिम्मेदारी है। नतीजा—मरीजों को समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा और छात्रों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। स्थिति सिर्फ स्टाफ की कमी तक सीमित नहीं है। अस्पताल में एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं। दूर-दराज से आने वाले मरीजों को हल्के से गंभीर मामलों तक में रेफर कर दिया जाता है। मजबूरी में लोगों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जिससे उन पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है। मंगलवार को कोसी प्रमंडल के आयुक्त राजेश कुमार ने मेडिकल कॉलेज का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने डॉक्टरों की भारी कमी और साफ-सफाई की बदहाल स्थिति पर नाराजगी जताई। सवाल यह है कि जब उच्च अधिकारी खुद खामियों को स्वीकार कर रहे हैं, तो समाधान अब तक क्यों नहीं निकला? यह मुद्दा विधानसभा और विधान परिषद में भी उठ चुका है, लेकिन सुधार की बजाय हालात और बिगड़े हैं। पहले 62 डॉक्टर कार्यरत थे, जो अब घटकर 51 रह गए हैं। मेडिकल कॉलेज सिर्फ इलाज का केंद्र नहीं होता, बल्कि यह भविष्य के डॉक्टर तैयार करने की प्रयोगशाला भी होता है। यदि फैकल्टी की इतनी भारी कमी रहेगी, तो इसका असर आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था पर दिखेगा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सुविधाएँ रेफरल अस्पताल जैसी हों, तो 800 करोड़ की इस परियोजना का औचित्य क्या है? क्या यह संस्थान सिर्फ भवन तक सीमित रह गया है? कोसी क्षेत्र के लाखों लोगों की उम्मीदें इस मेडिकल कॉलेज से जुड़ी हैं। अब देखना होगा कि आयुक्त के निरीक्षण के बाद क्या सरकार ठोस कदम उठाती है? क्या रिक्त पदों पर नियुक्ति होगी? क्या बुनियादी जांच सुविधाएँ बहाल होंगी? या फिर यूँ ही बदहाल रहेगा मधेपुरा का स्वास्थ्य तंत्र? बाइट --- राजेश कुमार ,कोसी प्रमंडल के आयुक्त
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    बिहार सरकार भले ही स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन कोसी प्रमंडल से जो तस्वीर सामने आई है, वह इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। मधेपुरा स्थित जननायक कर्पूरी ठाकुर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, जिसे 800 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया गया, आज खुद संसाधनों और डॉक्टरों की भारी कमी से जूझ रहा है। हालात ऐसे हैं कि यह मेडिकल कॉलेज खुद ‘आईसीयू’ में नजर आ रहा है।
232 स्वीकृत चिकित्सकों के पदों वाले इस मेडिकल कॉलेज में फिलहाल सिर्फ 51 डॉक्टर कार्यरत हैं। यानी करीब 78 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं।
23 विभागों वाले इस संस्थान में प्रोफेसर के 23 पदों में से मात्र 3, एसोसिएट प्रोफेसर के 43 में से 7, असिस्टेंट प्रोफेसर के 76 में से 10 और सीनियर रेजिडेंट व ट्यूटर के 90 में से केवल 31 पद ही भरे हुए हैं।
इन 51 डॉक्टरों पर इलाज, इमरजेंसी ड्यूटी और मेडिकल छात्रों को पढ़ाने की तिहरी जिम्मेदारी है। नतीजा—मरीजों को समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा और छात्रों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है।
स्थिति सिर्फ स्टाफ की कमी तक सीमित नहीं है। अस्पताल में एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं। दूर-दराज से आने वाले मरीजों को हल्के से गंभीर मामलों तक में रेफर कर दिया जाता है।
मजबूरी में लोगों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जिससे उन पर आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है।
मंगलवार को कोसी प्रमंडल के आयुक्त राजेश कुमार ने मेडिकल कॉलेज का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने डॉक्टरों की भारी कमी और साफ-सफाई की बदहाल स्थिति पर नाराजगी जताई।
सवाल यह है कि जब उच्च अधिकारी खुद खामियों को स्वीकार कर रहे हैं, तो समाधान अब तक क्यों नहीं निकला?
यह मुद्दा विधानसभा और विधान परिषद में भी उठ चुका है, लेकिन सुधार की बजाय हालात और बिगड़े हैं। पहले 62 डॉक्टर कार्यरत थे, जो अब घटकर 51 रह गए हैं।
मेडिकल कॉलेज सिर्फ इलाज का केंद्र नहीं होता, बल्कि यह भविष्य के डॉक्टर तैयार करने की प्रयोगशाला भी होता है। यदि फैकल्टी की इतनी भारी कमी रहेगी, तो इसका असर आने वाले वर्षों में पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था पर दिखेगा।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सुविधाएँ रेफरल अस्पताल जैसी हों, तो 800 करोड़ की इस परियोजना का औचित्य क्या है? क्या यह संस्थान सिर्फ भवन तक सीमित रह गया है?
कोसी क्षेत्र के लाखों लोगों की उम्मीदें इस मेडिकल कॉलेज से जुड़ी हैं। अब देखना होगा कि आयुक्त के निरीक्षण के बाद क्या सरकार ठोस कदम उठाती है? क्या रिक्त पदों पर नियुक्ति होगी? क्या बुनियादी जांच सुविधाएँ बहाल होंगी?
या फिर यूँ ही बदहाल रहेगा मधेपुरा का स्वास्थ्य तंत्र?
बाइट --- राजेश कुमार ,कोसी प्रमंडल के आयुक्त
    user_RAMAN KUMAR
    RAMAN KUMAR
    REPORTER मधेपुरा, मधेपुरा, बिहार•
    1 hr ago
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