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ओल्ड सिलमपुर अग्निकांड 22 फरवरी की शाम से 23 फरवरी की शाम तक कड़ी मशक्कत चलती रही,, दिल्ली : ओल्ड सीलमपुर में लगी भीषण आग पर 24 घंट े बाद भी पूरी तरह काब ू नहीं। मौके पर फायर ब्रिगेड की टीमे ं लगातार राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं। इलाके मे ं दहशत का माहौल, प्रशासन हालात पर बनाए हुए ह ै नजर ।
TIME NEWS 9 INDIA
ओल्ड सिलमपुर अग्निकांड 22 फरवरी की शाम से 23 फरवरी की शाम तक कड़ी मशक्कत चलती रही,, दिल्ली : ओल्ड सीलमपुर में लगी भीषण आग पर 24 घंट े बाद भी पूरी तरह काब ू नहीं। मौके पर फायर ब्रिगेड की टीमे ं लगातार राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं। इलाके मे ं दहशत का माहौल, प्रशासन हालात पर बनाए हुए ह ै नजर ।
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- #News #Reporter1
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- अज्ञात चोरों ने नगदी व चांदी सोने के जेवरात किए चोरी पुलिस से की गई शिकायत मल्लावां थाना क्षेत्र के भूड मडेया मजरा बाबटमऊ थाना मल्लावां निवासी शिवराज पुत्र रूपलाल ने पुलिस को दी तहरी में बताया कि उनके घर पर छत नहीं पड़ी है दीवार के साथ छप्पर पड़ा हुआ है छप्पर के अंदर रखा बक्सा जिसमें अज्ञात चोर ने बक्शा उठाकर उसमें लकी नगदी व सोने चांदी के जेवरात चोरी कर लिए हैं इस संबंध में पीड़ित ने पुलिस से शिकायत की है पुलिस पूरे मामले की जांच पड़ताल कर रही है। यह घटना 1 अप्रैल की रात की बताई जा रही है।3
- Post by न्यूज़ आइकॉन 241
- Post by Bharatiya Jan KRANTI SENA1
- नई दिल्ली: कहते हैं कि जब घर पर आंच आती है, तो दीवारें भी बोलने लगती हैं। कुछ ऐसा ही मंजर दिल्ली के ऐतिहासिक शालीमार गांव में पिछले एक महीने से देखने को मिल रहा है। यहाँ की गलियों में अब सन्नाटा नहीं, बल्कि अपने हकों के लिए लड़ते लोगों की आवाज़ें गूंज रही हैं। 7 फरवरी 2026 से शुरू हुआ यह 'घर बचाओ आंदोलन' आज एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। संघर्ष का आगाज़ और सामूहिक शक्ति यह आंदोलन केवल विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उस जज़्बे की कहानी है जहाँ पूरा गांव एक परिवार बन गया है। इस आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति यहाँ की महिलाएं हैं। वीडियो और ज़मीनी रिपोर्टों से साफ़ झलकता है कि कैसे गांव की माताएं और बहनें अपने घरों के काम छोड़कर सड़कों और चौपालों पर डटी हुई हैं। सांझी रसोई: एकता का प्रतीक आंदोलन के दौरान एक बहुत ही भावुक कर देने वाला दृश्य सामने आया है—सामूहिक रसोई। यहाँ कोई अमीर या गरीब नहीं है। गांव की महिलाएं अपने घरों से खुद आटा, सब्जियां और अन्य राशन लेकर आ रही हैं। निस्वार्थ सेवा: पुरुष और महिलाएं मिलकर पूड़ियाँ बेल रहे हैं, सब्ज़ियां बना रहे हैं और आंदोलनकारियों के लिए भोजन तैयार कर रहे हैं। अनुदान: आलू से लेकर अनाज तक, सब कुछ गांव के लोगों द्वारा स्वेच्छा से दान किया गया है, जो यह दर्शाता है कि यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि समूचे अस्तित्व की है। आमरण अनशन और प्रशासन की चुप्पी आंदोलन स्थल पर लगे बैनरों पर साफ़ लिखा है—"घर बचाओ आंदोलन, आमरण अनशन"। फरवरी की सर्द रातों से लेकर मार्च की तपिश तक, ये ग्रामीण अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। उनकी मांग स्पष्ट है: उनके पुरखों की ज़मीन और उनके आशियानों को किसी भी तरह की विकास परियोजनाओं या अतिक्रमण की कार्रवाई के नाम पर उजाड़ा न जाए। "जिन हाथों में शक्ति भरी है, राज मुकुट पहनाने की, उन हाथों में ताकत भी है, सर से ताज हटाने की।" — आंदोलन स्थल पर गूंजते नारे। निष्कर्ष शालीमार गांव का यह आंदोलन प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। 'भारत माता की जय' के नारों और एकता की इस गूँज ने यह साबित कर दिया है कि जब समुदाय एकजुट होता है, तो वह किसी भी मुश्किल का सामना कर सकता है। 2026 का यह 'घर बचाओ आंदोलन' दिल्ली के नागरिक अधिकारों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।1
- Post by Raj Kumar1
- #news #reporter1