आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय : राष्ट्रभाषा आंदोलन का नायक, जिसका एक पैम्फलेट भी 'डॉक्टरेट उपाधि' के लिए पर्याप्त था.. माटी के लाल आजमगढियों की तलाश में.. आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय : राष्ट्रभाषा आंदोलन का नायक, जिसका एक पैम्फलेट भी 'डॉक्टरेट उपाधि' के लिए पर्याप्त था.. ० प्रख्यात साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी और केशव प्रसाद मिश्र की निष्पत्तियों पर भी सवाल खड़ा कर देनें की अदभुत क्षमता थी. ० प्रख्यात आलोचनक और युगप्रवर्तक रामचंद्र शुक्ल के प्रिय शिष्य थे आचार्य चन्द्रबली पांडेय. ०'तसव्वुफ़ अथवा सूफ़ीमत' नामक उनकी पुस्तक हिंदी में सूफ़ीमत का पहला क्रमबद्ध अध्ययन है. @ डा०अरविंद सिंह #साहित्य क्षेत्र #चन्द्रबली पांडेय आजमगढ़ से पक्की सड़क जो बलिया को जाती है, उसी पर कोई 12 किसी चलने पर सठियांव ब्लॉक मुख्यालय पड़ता है. यहीं से एक सड़क जहानागंज के लिए फूटती है. इसी संपर्क मार्ग पर कोई डेढ-दो किमी चलने पर सड़क पर ही एक गाँव नासिरुद्दीन पड़ता है. ठीक वैसे ही जैसे भारत के अन्य गाँव हैं. लेकिन कुछ मामलों में यह गाँव विशिष्ट हो जाता है. क्योंकि इस गाँव ने उस हिंदी के अमर सिपाही को जना है, जिसने आजीवन अविवाहित रहकर हिंदी के लिए संघर्ष किया. भाषा को लेकर जिस समय देश में बवाल मचा हुआ था. हिंदी और उर्दू के समर्थक आमने- सामने संघर्षरत थे, उस समय यह गाँव इस लिए भी बड़ा बन गया क्योंकि इसी माटी के लाल ने अपने अदभुत शोधों, आलोचनाओं और तार्किक विमर्शों से देश के सामने राष्ट्र भाषा के सवालों पर हिंदी के अतिरिक्त अन्य विकल्पों को जैसे खारिज सा कर दिया था. इस हिंदी मनीषी की शोध और आलोचना दृष्टि पर प्रख्यात भाषाशास्त्री सुनीत कुमार चटर्जी कहते हैं- "पाण्डेय जी के एक-एक पैंफलेट भी डॉक्टरेट के लिए पर्याप्त हैं।' उन्होंने राष्ट्रभाषा के संग्राम में 1932 से लेकर 1949 तक हिन्दी-अंग्रेजी और उर्दू में लगभग दो दर्जन पैम्पलेटों की रचना की थी. हम बात कर रहें हैं महान हिंदी साधक आचार्य चन्द्रबली पांडेय की जिनको लेकर राहुल सांकृत्यायन जैसा महापंडित, उदभट्ट विद्वान अपनी जीवन-यात्रा में आजमगढ़ के जिन बड़े और व्यापक दृष्टिकोण वाले विद्वानों का उल्लेख करते हैं उसमें से एक नाम चन्द्रबली पांडेय का भी हैं. महान आलोचक, निबंधकार तथा हिंदी साहित्य का सबसे प्रमाणित इतिहास लिखने वाले, युग प्रवर्तक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बेहद प्रिय शिष्यों में से एक चन्द्रबली पांडेय का जन्म 25 अप्रैल 1904 को एक किसान परिवार में हुआ था. प्राथमिक शिक्षा गांव की पाठशाला से ग्रहण करते हुए उच्च शिक्षा के लिए बीएचयू पहुंचे, जहां वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतने नजदीक पहुंच गये कि उनके प्रिय शिष्यों में शुमार हो गयें. उनकी दृष्टि और तार्किक क्षमता बेहद गहरी थी. विश्वविद्यालय की परिधि से बाहर रहकर हिन्दी में शोध कार्य करने वालों में चन्द्रबली पांडेय का नाम प्रमुख है.काशी की प्रसिद्ध विद्या-विभूति पं. चंद्रबली पाण्डेय यद्यपि विश्वविद्यालय सेवा से नहीं जुड़े थे, पर विश्वविद्यालय परिसर में ही अपने मित्र मौलवी महेश प्रसाद के साथ रहते थे.बाद में वे डॉ. ज्ञानवती त्रिवेदी के बँगले पर चले गए. हिन्दी के साथ अंग्रेज़ी, उर्दू, फ़ारसी, अरबी तथा प्राकृत भाषाओं के ज्ञाता चन्द्रबली पाण्डेय दूरदर्शी हिंदी चिंतक थे. उन्होंने छोटे- बड़े मिला कर कुल 34 ग्रंथों की रचना की.हिन्दी भाषा और साहित्य के उन्नयन, संवर्धन और संरक्षण के लिए आजीवन समर्पित थे.हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति(1949) रहने के अतिरिक्त नागरी प्रचारिणी सभा के भी सभापति रहे. इन्होंने अपना पूरा जीवन अध्ययन और हिंदी प्रचार में लगा दिया.हिंदी उर्दू समस्या तथा सूफ़ी साहित्य और दर्शन से सम्बद्ध इनके विचार ऐतिहासिक महत्त्व के हैं. हैदराबाद के हिंदी साहित्य सम्मेलन के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष पं. चंद्रबली पाण्डेय ही थे. आचार्य चन्द्रबली पांडेय के भतीजे और हमारे समय में आलोचना के अच्छे साहित्यकार स्मृतिशेष पारस नाथ 'गोवर्धन' ने इस कलमकार से एक भेंटवार्ता में कहा था कि- 'आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को उनकी शिष्यों ने कंधों पर उठाकर ढोया है, जिसके कारण इतनी ऊंचाई मिली, लेकिन आचार्य चन्द्रबली पांडेय के जीवन में इसका गहरा अभाव दिखता है, जबकि विद्ववता में चाचा जी, बहुतों से बहुत आगे थें". गोवर्धन जी की बातें इस लिए तथ्यात्मक प्रतीत होती हैं कि- आचार्य चन्द्रबली पांडेय का निकष (कसौटी पर चढ़ाने की प्रक्रिया) बड़ा कठोर था. इसलिए अपने समय के बड़े साहित्यकार केशव प्रसाद मिश्र और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे पण्डितों की निष्पत्तियों पर भी, विवेक के आग्रह से, प्राय: प्रश्नचिह्न खड़ा करते रहते थे. प्रमुख रचनाएँ :- आचार्य चंद्रबली पाण्डेय ने 'तसव्वुफ़ अथवा सूफ़ीमत' नामक पुस्तक लिखी, जो हिंदी में सूफ़ीमत का पहला क्रमबद्ध अध्ययन है. इस ग्रंथ में सूफ़ीमत का उद्भव, विकास, आस्था, प्रतीक, अध्यात्म साहित्य आदि विषयों पर विस्तार से विचार किया गया है.परिशिष्ट में तसव्वुफ़ का प्रभाव तथा तसव्वुफ़ पर भारत का प्रभाव, विषयों पर भी अध्ययन किया गया है.किंतु इसमें ईरान और अरब के सूफ़ीमत पर जितना विस्तार से विचार किया गया है. शायद उतना भारतीय सूफ़ीमतवाद पर नहीं.मलिक मुहम्मद जायसी तथा अन्य कवियों पर पाण्डेय जी के अन्य लेख भी नागरी प्रचारिणी पत्रिका में तथा अन्यत्र प्रकाशित हो चुके हैं. नूरमुहम्मद कृत 'अनुराग बांसुरी' में उन्होंने एक भूमिका दी है, जिसमें सूफ़ी कवियों की कुछ विशेषताएँ स्पष्ट की गई हैं. इसके अतिरिक्त पाण्डेय जी की प्रमुख रचनाएँ हैं:- 'उर्दू का रहस्य', 'तसव्वुफ़ अथवा सूफ़ीमत', 'भाषा का प्रश्न', 'राष्ट्रभाषा पर विचार', 'कालिदास', 'केशवदास', 'तुलसीदास', 'हिन्दी कवि चर्चा', 'शूद्रक', 'हिन्दी गद्य का निर्माण' फक्कड़पन में जीवन बिताया :- चंद्रबली पाण्डेय आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बेहद प्रिय शिष्य थे.इस ब्रह्मचारी शिष्य को शुक्लजी अपने साथ ही रखते थे.पुत्रवत वात्सल्य पोषण और अंतरंग निकटता से शुक्लजी ने पाण्डेय जी के विद्या-व्यक्त्तित्व का आधार रचा था.पाण्डेय जी की हिंदी निष्ठा, लोगों की नज़र, दुराग्रह की सीमा को स्पर्श करती थी. हिंदी के पक्ष में वे कभी भी किसी से भी लोहा लेने को तैयार रहते थे.उनमें न तो लोकप्रियता की भूख थी और न पद प्रभुता की चाह. इसलिये कबीरी अंदाज़ में किसी अनौचित्य और स्खलन पर तीखी टिप्पणी करते उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता था. विद्या व्यापार को किसी प्रकार की छूट देना उन्हें क़तई मंजूर नहीं था.शुक्लजी उनके ज्ञान के प्रतिमान थे. शुक्लजी के चरित्र और उसके अंतरंग नैकट्य में रहकर कठोर परिश्रम से उन्होंने विद्या-संस्कार अर्जित किया था. हिंदी के अप्रतिम योद्धा थे :- हिंदी के अप्रतिम योद्धा ने हिंदी-विरोधियों से उस समय लोहा लिया, जब हिंदी का सघर्ष उर्दू और हिंदुस्तानी से था.भाषा का प्रश्न राष्ट्रभाषा का प्रश्न था।श्री.भाषा विवाद ने इस प्रश्न को जटिल बनाकर उलझा दिया था. उर्दू भक्त हिंदी को 'हिंदुई' बताकर 'उर्दू' को हिंदुस्तानी बताकर देश में उर्दू का जाल फैला रहे थे.उर्दू समर्थकों की हिंदी-विरोधी नीतियों ने ऐसा वातावरण बुन दिया था, जिसमें अन्य भाषा-भाषी हिंदी को सशंकित दृष्टि से देखने लगे.स्वयं चंद्रबली पाण्डेय के शब्दों में उर्दू के बोलबाले का स्वरूप यों था- ''उर्दू का इतिहास मुँह खोलकर कहता है, हिंदी को उर्दू आती ही नहीं और उर्दू के लोग, उनकी कुछ न पूछिये.उर्दू के विषय में उन्होंने ऐसा जाल फैला रखा है कि बेचारी उर्दू को भी उसका पता नहीं. घर की बोली से लेकर राष्ट्र बोली तक जहाँ देखिये वहाँ उर्दू का नाम लिया जाता है।... उर्दू का कुछ भेद खुला तो हिंदुस्तानी सामने आयी." भाषा विवाद के चलते हिंदी पर बराबर प्रहार हो रहे थे.हिंदी के विकास में उर्दू के हिमायतियों द्वारा तरह-तरह के अवरोध खड़े किये जा रहे थे, तब हिंदी की राह में पड़ने वाले अवरोधों को काटकर हिंदी की उन्नति और हिंदी के विकास का मार्ग प्रशस्त किया चंद्रबली पाण्डेय ने. उनके प्रखर विचारों ने भाषा संबंधी उलझनों को दूर कर हिंदी क्षेत्र को नई स्फूर्ति दी.उनके गम्भीर चिंतन, प्रखर आलोचकीय दृष्टि और आचार्यत्व ने हिंदी और हिंदी साहित्य को अपने ही ढंग से समृद्ध किया. निधन :- हिंदी का यह महान सेवी हिंदी सेवा करते हुए 24 जनवरी, 1958 ई. को हिंदी साहित्याकाश में हमेशा हमेशा के लिए शिनाख्त हो गया था. और उसी के साथ आजमगढ़ का नासिरुद्दीन गाँव भी इतिहास में जुड़ गया. (संदर्भस्रोत- विकी पीडिया, लोक संवाद और स्वध्ययन)
आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय : राष्ट्रभाषा आंदोलन का नायक, जिसका एक पैम्फलेट भी 'डॉक्टरेट उपाधि' के लिए पर्याप्त था.. माटी के लाल आजमगढियों की तलाश में.. आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय : राष्ट्रभाषा आंदोलन का नायक, जिसका एक पैम्फलेट भी 'डॉक्टरेट उपाधि' के लिए पर्याप्त था.. ० प्रख्यात साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी और केशव प्रसाद मिश्र की निष्पत्तियों पर भी सवाल खड़ा कर देनें की अदभुत क्षमता थी. ० प्रख्यात आलोचनक और युगप्रवर्तक रामचंद्र शुक्ल के प्रिय शिष्य थे आचार्य चन्द्रबली पांडेय. ०'तसव्वुफ़ अथवा सूफ़ीमत' नामक उनकी पुस्तक हिंदी में सूफ़ीमत का पहला क्रमबद्ध अध्ययन है. @ डा०अरविंद सिंह #साहित्य क्षेत्र #चन्द्रबली पांडेय आजमगढ़ से पक्की सड़क जो बलिया को जाती है, उसी पर कोई 12 किसी चलने पर सठियांव ब्लॉक मुख्यालय पड़ता है. यहीं से एक सड़क जहानागंज के लिए फूटती है. इसी संपर्क मार्ग पर कोई डेढ-दो किमी चलने पर सड़क पर ही एक गाँव नासिरुद्दीन पड़ता है. ठीक वैसे ही जैसे भारत के अन्य गाँव हैं. लेकिन कुछ मामलों में यह गाँव विशिष्ट हो जाता है. क्योंकि इस गाँव ने उस हिंदी के अमर सिपाही को जना है, जिसने आजीवन अविवाहित रहकर हिंदी के लिए संघर्ष किया. भाषा को लेकर जिस समय देश में बवाल मचा हुआ था. हिंदी और उर्दू के समर्थक आमने- सामने संघर्षरत थे, उस समय यह गाँव इस लिए भी बड़ा बन गया क्योंकि इसी माटी के लाल ने अपने अदभुत शोधों, आलोचनाओं और तार्किक विमर्शों से देश के सामने राष्ट्र भाषा के सवालों पर हिंदी के अतिरिक्त अन्य विकल्पों को जैसे खारिज सा कर दिया था. इस हिंदी मनीषी की शोध और आलोचना दृष्टि पर प्रख्यात भाषाशास्त्री सुनीत कुमार चटर्जी कहते हैं- "पाण्डेय जी के एक-एक पैंफलेट भी डॉक्टरेट के लिए पर्याप्त हैं।' उन्होंने राष्ट्रभाषा के संग्राम में 1932 से लेकर 1949 तक हिन्दी-अंग्रेजी और उर्दू में लगभग दो दर्जन पैम्पलेटों की रचना की थी. हम बात कर रहें हैं महान हिंदी साधक आचार्य चन्द्रबली पांडेय की जिनको लेकर राहुल सांकृत्यायन जैसा महापंडित, उदभट्ट विद्वान अपनी जीवन-यात्रा में आजमगढ़ के जिन बड़े और व्यापक दृष्टिकोण वाले विद्वानों का उल्लेख करते हैं उसमें से एक नाम चन्द्रबली पांडेय का भी हैं. महान आलोचक, निबंधकार तथा हिंदी साहित्य का सबसे प्रमाणित इतिहास लिखने वाले, युग प्रवर्तक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बेहद प्रिय शिष्यों में से एक चन्द्रबली पांडेय का जन्म 25 अप्रैल 1904 को एक किसान परिवार में हुआ था. प्राथमिक शिक्षा गांव की पाठशाला से ग्रहण करते हुए उच्च शिक्षा के लिए बीएचयू पहुंचे, जहां वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतने नजदीक पहुंच गये कि उनके प्रिय शिष्यों में शुमार हो गयें. उनकी दृष्टि और तार्किक क्षमता बेहद गहरी थी. विश्वविद्यालय की परिधि से बाहर रहकर हिन्दी में शोध कार्य करने वालों में चन्द्रबली पांडेय का नाम प्रमुख है.काशी की प्रसिद्ध विद्या-विभूति पं. चंद्रबली पाण्डेय यद्यपि विश्वविद्यालय सेवा से नहीं जुड़े थे, पर विश्वविद्यालय परिसर में ही अपने मित्र मौलवी महेश प्रसाद के साथ रहते थे.बाद में वे डॉ. ज्ञानवती त्रिवेदी के बँगले पर चले गए. हिन्दी के साथ अंग्रेज़ी, उर्दू, फ़ारसी, अरबी तथा प्राकृत भाषाओं के ज्ञाता चन्द्रबली पाण्डेय दूरदर्शी हिंदी चिंतक थे. उन्होंने छोटे- बड़े मिला कर कुल 34 ग्रंथों की रचना की.हिन्दी भाषा और साहित्य के उन्नयन, संवर्धन और संरक्षण के लिए आजीवन समर्पित थे.हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति(1949) रहने के अतिरिक्त नागरी प्रचारिणी सभा के भी सभापति रहे. इन्होंने अपना पूरा जीवन अध्ययन और हिंदी प्रचार में लगा दिया.हिंदी उर्दू समस्या तथा सूफ़ी साहित्य और दर्शन से सम्बद्ध इनके विचार ऐतिहासिक महत्त्व के हैं. हैदराबाद के हिंदी साहित्य सम्मेलन के विशेष अधिवेशन के अध्यक्ष पं. चंद्रबली पाण्डेय ही थे. आचार्य चन्द्रबली पांडेय के भतीजे और हमारे समय में आलोचना के अच्छे साहित्यकार स्मृतिशेष पारस नाथ 'गोवर्धन' ने इस कलमकार से एक भेंटवार्ता में कहा था कि- 'आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को उनकी शिष्यों ने कंधों पर उठाकर ढोया है, जिसके कारण इतनी ऊंचाई मिली, लेकिन आचार्य चन्द्रबली पांडेय के जीवन में इसका गहरा अभाव दिखता है, जबकि विद्ववता में चाचा जी, बहुतों से बहुत आगे थें". गोवर्धन जी की बातें इस लिए तथ्यात्मक प्रतीत होती हैं कि- आचार्य चन्द्रबली पांडेय का निकष (कसौटी पर चढ़ाने की प्रक्रिया) बड़ा कठोर था. इसलिए अपने समय के बड़े साहित्यकार केशव प्रसाद मिश्र और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे पण्डितों की निष्पत्तियों पर भी, विवेक के आग्रह से, प्राय: प्रश्नचिह्न खड़ा करते रहते थे. प्रमुख रचनाएँ :- आचार्य चंद्रबली पाण्डेय ने 'तसव्वुफ़ अथवा सूफ़ीमत' नामक पुस्तक लिखी, जो हिंदी में सूफ़ीमत का पहला क्रमबद्ध अध्ययन है. इस ग्रंथ में सूफ़ीमत का उद्भव, विकास, आस्था, प्रतीक, अध्यात्म साहित्य आदि विषयों पर विस्तार से विचार किया गया है.परिशिष्ट में तसव्वुफ़ का प्रभाव तथा तसव्वुफ़ पर भारत का प्रभाव, विषयों पर भी अध्ययन किया गया है.किंतु इसमें ईरान और अरब के सूफ़ीमत पर जितना विस्तार से विचार किया गया है. शायद उतना भारतीय सूफ़ीमतवाद पर नहीं.मलिक मुहम्मद जायसी तथा अन्य कवियों पर पाण्डेय जी के अन्य लेख भी नागरी प्रचारिणी पत्रिका में तथा अन्यत्र प्रकाशित हो चुके हैं. नूरमुहम्मद कृत 'अनुराग बांसुरी' में उन्होंने एक भूमिका दी है, जिसमें सूफ़ी कवियों की कुछ विशेषताएँ स्पष्ट की गई हैं. इसके अतिरिक्त पाण्डेय जी की प्रमुख रचनाएँ हैं:- 'उर्दू का रहस्य', 'तसव्वुफ़ अथवा सूफ़ीमत', 'भाषा का प्रश्न', 'राष्ट्रभाषा पर विचार', 'कालिदास', 'केशवदास', 'तुलसीदास', 'हिन्दी कवि चर्चा', 'शूद्रक', 'हिन्दी गद्य का निर्माण' फक्कड़पन में जीवन बिताया :- चंद्रबली पाण्डेय आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बेहद प्रिय शिष्य थे.इस ब्रह्मचारी शिष्य को शुक्लजी अपने साथ ही रखते थे.पुत्रवत वात्सल्य पोषण और अंतरंग निकटता से शुक्लजी ने पाण्डेय जी के विद्या-व्यक्त्तित्व का आधार रचा था.पाण्डेय जी की हिंदी निष्ठा, लोगों की नज़र, दुराग्रह की सीमा को स्पर्श करती थी. हिंदी के पक्ष में वे कभी भी किसी से भी लोहा लेने को तैयार रहते थे.उनमें न तो लोकप्रियता की भूख थी और न पद प्रभुता की चाह. इसलिये कबीरी अंदाज़ में किसी अनौचित्य और स्खलन पर तीखी टिप्पणी करते उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता था. विद्या व्यापार को किसी प्रकार की छूट देना उन्हें क़तई मंजूर नहीं था.शुक्लजी उनके ज्ञान के प्रतिमान थे. शुक्लजी के चरित्र और उसके अंतरंग नैकट्य में रहकर कठोर परिश्रम से उन्होंने विद्या-संस्कार अर्जित किया था. हिंदी के अप्रतिम योद्धा थे :- हिंदी के अप्रतिम योद्धा ने हिंदी-विरोधियों से उस समय लोहा लिया, जब हिंदी का सघर्ष उर्दू और हिंदुस्तानी से था.भाषा का प्रश्न राष्ट्रभाषा का प्रश्न था।श्री.भाषा विवाद ने इस प्रश्न को जटिल बनाकर उलझा दिया था. उर्दू भक्त हिंदी को 'हिंदुई' बताकर 'उर्दू' को हिंदुस्तानी बताकर देश में उर्दू का जाल फैला रहे थे.उर्दू समर्थकों की हिंदी-विरोधी नीतियों ने ऐसा वातावरण बुन दिया था, जिसमें अन्य भाषा-भाषी हिंदी को सशंकित दृष्टि से देखने लगे.स्वयं चंद्रबली पाण्डेय के शब्दों में उर्दू के बोलबाले का स्वरूप यों था- ''उर्दू का इतिहास मुँह खोलकर कहता है, हिंदी को उर्दू आती ही नहीं और उर्दू के लोग, उनकी कुछ न पूछिये.उर्दू के विषय में उन्होंने ऐसा जाल फैला रखा है कि बेचारी उर्दू को भी उसका पता नहीं. घर की बोली से लेकर राष्ट्र बोली तक जहाँ देखिये वहाँ उर्दू का नाम लिया जाता है।... उर्दू का कुछ भेद खुला तो हिंदुस्तानी सामने आयी." भाषा विवाद के चलते हिंदी पर बराबर प्रहार हो रहे थे.हिंदी के विकास में उर्दू के हिमायतियों द्वारा तरह-तरह के अवरोध खड़े किये जा रहे थे, तब हिंदी की राह में पड़ने वाले अवरोधों को काटकर हिंदी की उन्नति और हिंदी के विकास का मार्ग प्रशस्त किया चंद्रबली पाण्डेय ने. उनके प्रखर विचारों ने भाषा संबंधी उलझनों को दूर कर हिंदी क्षेत्र को नई स्फूर्ति दी.उनके गम्भीर चिंतन, प्रखर आलोचकीय दृष्टि और आचार्यत्व ने हिंदी और हिंदी साहित्य को अपने ही ढंग से समृद्ध किया. निधन :- हिंदी का यह महान सेवी हिंदी सेवा करते हुए 24 जनवरी, 1958 ई. को हिंदी साहित्याकाश में हमेशा हमेशा के लिए शिनाख्त हो गया था. और उसी के साथ आजमगढ़ का नासिरुद्दीन गाँव भी इतिहास में जुड़ गया. (संदर्भस्रोत- विकी पीडिया, लोक संवाद और स्वध्ययन)
- आरोप : घर में घुसकर युवती व परिवार पर हमला, दबंगों ने दी जान से मारने की धमकी उच्चाधिकारियों के यहां लगाई न्याय की गुहार झांसी। थाना कोतवाली क्षेत्र के ओरछा गेट अंदर मोहल्ले में दबंगों द्वारा एक युवती के घर में घुसकर मारपीट, अभद्रता और जान से मारने की धमकी देने का मामला सामने आया है। पीड़िता सायना पुत्री मंजूर ने डीआईजी झांसी परिक्षेत्र से शिकायत कर आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, 31 मार्च की रात करीब 10 बजे सायना अपने घर के बाहर निकली थी। तभी वहां पहले से मौजूद दबंग युवक लोग खड़े थे। आरोप है कि सभी ने अश्लील हरकतें करते हुए अभद्र टिप्पणियां कीं। भयभीत होकर पीड़िता घर के अंदर चली गई, लेकिन आरोपी जबरन घर में घुस आए और विरोध करने पर गाली-गलौज करते हुए मारपीट शुरू कर दी। शोर सुनकर मौके पर पहुंचे पीड़िता के भाई आसिफ, पिता और माता ने बीच-बचाव किया, लेकिन आरोपियों ने डंडों से उन पर भी हमला कर दिया, जिससे भाई और पिता को गंभीर चोटें आई हैं। हंगामा सुनकर मोहल्ले के लोग एकत्रित हुए, जिसके बाद आरोपी शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी देते हुए फरार हो गए। पीड़िता का आरोप है कि घटना की सूचना तत्काल 112 नंबर पर दी गई थी, लेकिन पुलिस के पहुंचने से पहले ही आरोपी फरार हो गए। वहीं, थाने में शिकायत करने के बाद जब वह वापस घर लौटी, तो आरोपी दोबारा आ गए और पत्थरबाजी कर दी। किसी तरह परिवार ने घर के अंदर घुसकर अपनी जान बचाई। पीड़िता ने बताया कि आरोपी क्षेत्र के दबंग और आपराधिक प्रवृत्ति के हैं, जिनके खिलाफ पहले भी शिकायतें की जा चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। घटना के बाद से परिवार दहशत में है। पीड़िता ने उच्चाधिकारियों से मामले में रिपोर्ट दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई किए जाने की मांग की है2
- Post by SONI DEVI1
- मऊ । पुलिस अधीक्षक मऊ कमलेश बहादुर द्वारा पुलिस लाइन मऊ में डायल 112 के समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों के साथ बैठक आयोजित की गई। बैठक के दौरान पुलिस अधीक्षक द्वारा डायल 112 की कार्यप्रणाली की समीक्षा की गई तथा प्राप्त होने वाली सूचनाओं पर त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। उन्होंने कहा कि आमजन की सुरक्षा एवं सहायता हेतु डायल 112 एक महत्वपूर्ण सेवा है, अतः प्रत्येक कॉल को गंभीरता से लेते हुए समयबद्ध रिस्पॉन्स देना सुनिश्चित किया जाए। पुलिस अधीक्षक महोदय द्वारा कर्मचारियों को अनुशासन, बेहतर समन्वय एवं व्यवहार कुशलता बनाए रखने के निर्देश दिए गए। साथ ही, फील्ड में तैनात पीआरवी कर्मियों को घटनास्थल पर शीघ्र पहुंचकर पीड़ितों को तत्काल सहायता उपलब्ध कराने हेतु प्रेरित किया गया। इस दौरान अपर पुलिस अधीक्षक मऊ अनूप कुमार, प्रतिसार निरीक्षक अरूण कुमार सिंह, सहित अन्य संबंधित अधिकारीगण उपस्थित रहे।4
- Post by रिपोर्टरआलापुर अंबेडकरनगर1
- Admission open1
- बसखारी थाना क्षेत्र में बाइक पर सवार दो लुटेरों ने एक ज्वेलर्स को अपना निशाना बनाया और कनपटी पर पिस्टल लगाते हुए 10 लाख से अधिक का जेवर लूट लिया। सूचना पर पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया। पुलिस जांच करते हुए नजर आ रही है।1
- Post by विनोद मौर्य BRP गोरखपुर1
- मऊ। पुलिस अधीक्षक कमलेश बहादुर के आदेश के अनुपालन में वांछित/सदिंग्ध व्यक्ति ,जिलाबदर तथा इनामिया अपराधियों व जनपद मे हो रही लूट हत्या तथा चोरी से सम्बन्धित अपराधियों के विरुद्ध चलाये जा रहे अभियान के क्रम मे, अपर पुलिस अधीक्षक मऊ अनुप कुमार, क्षेत्राधिकारी घोसी जितेन्द्र सिंह के कुशल निर्देशन में प्रभारी निरीक्षक प्रमेन्द्र कुमार सिंह द्वारा थाना घोसी पुलिस टीम के साथ मुखबिर की सूचना पर दिनांक 02 अप्रैल 2026 को समय करीब 19.10 बजे सायंकाल पी.एम.डी महाविद्यालय के पास से मु0अ0सं0 129/26 धारा 103(1) बी.एन.एस. में वाछित अभियुक्त हरिकेश हरिजन पुत्र स्व0 बसाऊ निवासी इन्द्रपुर थाना घोसी जनपद मऊ उम्र करीब 29 वर्ष को मय उस लोहे की राड(आला कत्ल के साथ) जिसमें खून लगा था के साथ गिरफ्तार किया गया जिससे कि अभियुक्त हरिकेश द्वारा अपने पिता स्व0 बसाऊ की दिनांक 02 अप्रैल 2026 की सुबह करीब 4 बजे घर के बाहर चारपाई पर सोते समय हत्या की थी। विस्तृत विवरण इस प्रकार है दिनांक 02 अप्रैल 2026 को प्रार्थिनी चन्दा देवी पत्नी स्व0 बसाऊ निवासी इन्द्रपुर पो0 भोपौरा थाना घोसी जनपद मऊ द्वारा अपने बडे पुत्र हरिकेश द्वारा उक्त दिनांक को ही सुबह 4 बजे के करीब उनके पति बसाऊ की सोते समय लोहे के राड से मार कर हत्या करने के सम्बन्ध में दी गयी तहरीर पर थाना घोसी पर मु0अ0सं0 129/2026 धारा 103(1) बी.एन.एस. बनाम हरिकेश हरिजन पुत्र स्व0 बसाऊ निवासी इन्द्रपुर थाना घोसी जनपद मऊ के दिनांक घटना 02 अप्रैल 2026 समय 08.13 बजे पंजीकृत किया गया था। जिसकी विवेचना प्रभारी निरीक्षक घोसी द्वारा की जा रही है। मुकदमा उपरोक्त में मृतक का सगा लड़का हरिकेश उक्त फरार चल रहा था जिसे दिनांक 02 अप्रैल 2026 को घोसी पुलिस टीम द्वारा मुखबिर की सूचना पर उक्त अभियुक्त को नियमानुसार गिरफ्तार किया गया था। पूछताछ में अभियुक्त ने बताया कि उसके पिता बार बार उसे इलाज हेतु दिमागी अस्पताल भेंजने की बात कर रहे थे जिस कारण से गुस्सा और आवेश मे आकर उसने अपने पिता की लोहे की राड से प्रहार कर सोते समय सुबह करीब 4 बजे हत्या की है। अभियुक्त को नियमानुसार गिरफ्तारी व बरामदगी के आधार पर विधिक कार्यवाही अमल मे लाते हुए मा0 न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।2