जौनपुर के कुल्हनामऊ में भगवान परशुराम की प्रतिमा को चौराहे पर स्थापित करना एक ऐसा कृत्य है जिसे भविष्य का इतिहास, ब्राह्मण समाज की आत्मघाती चूक के रूप में दर्ज करेगा। -बाबा दुबे जय परशुराम! सर्वप्रथम यह स्पष्ट रहे कि हमारे आराध्य, नित्य वंदनीय / पूजनीय भगवान परशुराम कोई महापुरुष नहीं बल्कि भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं। साक्षात् भगवान। जौनपुर के कुल्हनामऊ में भगवान परशुराम की प्रतिमा को चौराहे पर स्थापित करना एक ऐसा कृत्य है जिसे भविष्य का इतिहास, ब्राह्मण समाज की आत्मघाती चूक के रूप में दर्ज करेगा। जब हम सनातन धर्म की बात करते हैं, तो वह कोई अराजक व्यवस्था नहीं है जहाँ जिसकी जो मर्जी आए, वह कर दे। धर्म मर्यादा और अनुशासन की धुरी पर टिका है, लेकिन आज दुर्भाग्य से वह भीड़ की भावनाओं और सस्ती लोकप्रियता का बंधक बन गया है। भगवान परशुराम साक्षात विष्णु के अवतार हैं, वे किसी चौराहे की शोभा बढ़ाने वाली वस्तु नहीं हैं। क्या ब्राह्मण समाज का विवेक इतना कुंठित हो गया है कि वह स्मारक और साक्षात देवता के बीच का अंतर भूल गया? शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि अर्चावतार यानी भगवान का साक्षात विग्रह केवल गर्भगृह में, शुद्धता और नित्य सेवा के संकल्प के साथ ही विराजित हो सकता है। जिस प्रतिमा के सम्मुख हमें नतमस्तक होकर ब्रह्मतेज की प्रार्थना करनी चाहिए, उसे हम केवल एक चौराहे की पहचान बनाने जा रहे हैं? एक चौराहे पर आप भगवान की शुचिता को कैसे बचाएंगे? क्या वहां रोज षोडशोपचार पूजन होगा? क्या वहां का वातावरण गर्भगृह की तरह स्पंदित होगा? कभी नहीं। यदि हम अपने देवताओं को मंदिरों से निकालकर चौराहों पर छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां उन्हें केवल पत्थर का पुतला समझेंगी। यदि वास्तव में भगवान परशुराम के प्रति अगाध श्रद्धा थी, तो उनके शौर्य के प्रतीक फरसे को वहां स्थापित किया जाता, जो धर्म की विजय का उद्घोष करता। पर नहीं, यहां दिखावा करना था, यहां यह सिद्ध करना था कि हम संख्याबल में कितने बड़े हैं। यह कृत्य एक अत्यंत गलत परंपरा की नींव रख रहा है। ब्राह्मणत्व का पतन तब होता है जब वह शास्त्र को छोड़कर भीड़ के पीछे चलने लगता है। जो समाज अपने देवत्व की गरिमा की रक्षा नहीं कर सकता, वह अपनी रक्षा की अपेक्षा कैसे कर सकता है? भगवान परशुराम शस्त्र और शास्त्र के संतुलन के प्रतीक हैं, लेकिन यहाँ शस्त्र की उद्दंडता तो दिखी, पर शास्त्र का विवेक खो गया। भगवान परशुराम की मूर्ति भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए अन्यथा चौराहे पर पत्थर की मूर्ति हमारी खंडित होती हुई सांस्कृतिक चेतना का स्मारक बनकर रह जाएगी। धर्म की रक्षा कठोर निर्णयों और स्पष्ट विरोध से होती है, भीड़ के उल्लास से नहीं। #Babadubey #Badlapur #ParshuramJayanti
जौनपुर के कुल्हनामऊ में भगवान परशुराम की प्रतिमा को चौराहे पर स्थापित करना एक ऐसा कृत्य है जिसे भविष्य का इतिहास, ब्राह्मण समाज की आत्मघाती चूक के रूप में दर्ज करेगा। -बाबा दुबे जय परशुराम! सर्वप्रथम यह स्पष्ट रहे कि हमारे आराध्य, नित्य वंदनीय / पूजनीय भगवान परशुराम कोई महापुरुष नहीं बल्कि भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं। साक्षात् भगवान। जौनपुर के कुल्हनामऊ में भगवान परशुराम की प्रतिमा को चौराहे पर स्थापित करना एक ऐसा कृत्य है जिसे भविष्य का इतिहास, ब्राह्मण समाज की आत्मघाती चूक के रूप में दर्ज करेगा। जब हम सनातन धर्म की बात करते हैं, तो वह कोई अराजक व्यवस्था नहीं है जहाँ जिसकी जो मर्जी आए, वह कर दे। धर्म मर्यादा और अनुशासन की धुरी पर टिका है, लेकिन आज दुर्भाग्य से वह भीड़ की भावनाओं और सस्ती लोकप्रियता का बंधक बन गया है। भगवान परशुराम साक्षात विष्णु के अवतार हैं, वे किसी चौराहे की शोभा बढ़ाने वाली वस्तु नहीं हैं। क्या ब्राह्मण समाज का विवेक इतना कुंठित हो गया है कि वह स्मारक और साक्षात देवता के बीच का अंतर भूल गया? शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि अर्चावतार यानी भगवान का साक्षात विग्रह केवल गर्भगृह में, शुद्धता और नित्य सेवा के संकल्प के साथ ही विराजित हो सकता है। जिस प्रतिमा के सम्मुख हमें नतमस्तक होकर ब्रह्मतेज की प्रार्थना करनी चाहिए, उसे हम केवल एक चौराहे की पहचान बनाने जा रहे हैं? एक चौराहे पर आप भगवान की शुचिता को कैसे बचाएंगे? क्या वहां रोज षोडशोपचार पूजन होगा? क्या वहां का वातावरण गर्भगृह की तरह स्पंदित होगा? कभी नहीं। यदि हम अपने देवताओं को मंदिरों से निकालकर चौराहों पर छोड़ देंगे, तो आने वाली पीढ़ियां उन्हें केवल पत्थर का पुतला समझेंगी। यदि वास्तव में भगवान परशुराम के प्रति अगाध श्रद्धा थी, तो उनके शौर्य के प्रतीक फरसे को वहां स्थापित किया जाता, जो धर्म की विजय का उद्घोष करता। पर नहीं, यहां दिखावा करना था, यहां यह सिद्ध करना था कि हम संख्याबल में कितने बड़े हैं। यह कृत्य एक अत्यंत गलत परंपरा की नींव रख रहा है। ब्राह्मणत्व का पतन तब होता है जब वह शास्त्र को छोड़कर भीड़ के पीछे चलने लगता है। जो समाज अपने देवत्व की गरिमा की रक्षा नहीं कर सकता, वह अपनी रक्षा की अपेक्षा कैसे कर सकता है? भगवान परशुराम शस्त्र और शास्त्र के संतुलन के प्रतीक हैं, लेकिन यहाँ शस्त्र की उद्दंडता तो दिखी, पर शास्त्र का विवेक खो गया। भगवान परशुराम की मूर्ति भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए अन्यथा चौराहे पर पत्थर की मूर्ति हमारी खंडित होती हुई सांस्कृतिक चेतना का स्मारक बनकर रह जाएगी। धर्म की रक्षा कठोर निर्णयों और स्पष्ट विरोध से होती है, भीड़ के उल्लास से नहीं। #Babadubey #Badlapur #ParshuramJayanti
- या घर बहुत पुराना है लगभग 100 साल से अभी अधिक पुराना है हाली में जौनपुर में तूफान आने के कारण या घर काफी जगह से गिर चुका है आपकी क्या राय है कि हम लोग अंडर जा कर आप को देखते अपनी राय कमेंट में बताए 🙏🏻1
- Post by Pradeep chauhan1
- डांस सीखना हो या जिम जाना, अब साथ होंगी महिला प्रशिक्षक; यूपी में बदलेंगे नियम उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अब डांस क्लास, जिम, योगा सेंटर, बुटीक और कई अन्य जगहों पर नए नियम लागू किए जा रहे हैं. महिला आयोग ने एक वकील की याचिका पर सुनवाई करते हुए कुल 9 अहम निर्देश जारी किए हैं, जिनका मकसद महिलाओं के लिए माहौल को ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना है. नए निर्देशों के मुताबिक अब लड़कियों को डांस सिखाने के लिए महिला शिक्षक (फीमेल टीचर) रखना जरूरी होगा. महिला आयोग का मानना है कि इससे छात्राओं को ज्यादा सुरक्षित और सहज माहौल मिलेगा.1
- Post by Kr. Suresh1
- Post by Manish Kumar gautam1
- Post by Rahat time's1
- Post by Jitendra bahadur Dubey1
- महिला के शोर मचाने पर मौलाना भाग खड़ा हुआ, मौलाना की अश्लीलता की वारदात गली में लगे CCTV में कैद हो गई, महिला ने किसी तरह अपनी इज्जत बचाई, इस संबंध में थाना मुगलपुरा में मुकदमा पंजीकृत करके मौलाना की सरगर्मी से तलाश की जा रही है।1