logo
Shuru
Apke Nagar Ki App…
  • Latest News
  • News
  • Politics
  • Elections
  • Viral
  • Astrology
  • Horoscope in Hindi
  • Horoscope in English
  • Latest Political News
logo
Shuru
Apke Nagar Ki App…

*गुफा मंदिर-बरेला गांव का रास्ता बंद, गुस्साए ग्रामीणों ने भोपाल कलेक्ट्रेट में किया प्रदर्शन* गुफा मंदिर से बरेला गांव जाने वाला रास्ता बंद होने से ग्रामीणों में आक्रोश महिलाओं ने भोपाल कलेक्ट्रेट पहुंचकर सीडीओ पर बैठकर जताया विरोध रास्ता बंद होने से गांव में शव यात्रा निकालने में भी हुई परेशानी ग्रामीणों ने रास्ता खुलवाने की मांग को लेकर प्रशासन के सामने रखा पक्ष

14 hrs ago
user_Naved khan
Naved khan
हुजूर, भोपाल, मध्य प्रदेश•
14 hrs ago

*गुफा मंदिर-बरेला गांव का रास्ता बंद, गुस्साए ग्रामीणों ने भोपाल कलेक्ट्रेट में किया प्रदर्शन* गुफा मंदिर से बरेला गांव जाने वाला रास्ता बंद होने से ग्रामीणों में आक्रोश महिलाओं ने भोपाल कलेक्ट्रेट पहुंचकर सीडीओ पर बैठकर जताया विरोध रास्ता बंद होने से गांव में शव यात्रा निकालने में भी हुई परेशानी ग्रामीणों ने रास्ता खुलवाने की मांग को लेकर प्रशासन के सामने रखा पक्ष

More news from मध्य प्रदेश and nearby areas
  • मोहन राज में शिक्षा के मंदिर में मासूम बच्चों का अपमान क्यों? जिस जगह बच्चों को किताबों के साथ सपने दिए जाने चाहिए, जिस विद्यालय में उन्हें अपने भविष्य की नई इबारत लिखना सीखना चाहिए, अगर उसी जगह उन्हें “कीड़ा”, “गंवार”, “गरीब” और अनपढ़ कहकर अपमानित किया जाए तो सवाल केवल शिक्षकों की भाषा का नहीं रह जाता, सवाल पूरी शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता पर खड़ा हो जाता है। बड़वानी के एकलव्य आवासीय विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने शिक्षकों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बच्चों का आरोप है कि उन्हें अपमानजनक शब्द कहे गए और यहां तक कहा गया कि पढ़-लिखकर भी उन्हें आखिर शादी करके बच्चे ही पैदा करने हैं। यदि बच्चों द्वारा लगाए गए ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह केवल अनुशासनहीनता या गलत शब्दों का मामला नहीं होगा, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रमाण होगा जो शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही समझने में असफल है। एक आदिवासी बच्चा जब अपने गांव, परिवार और सामाजिक परिस्थितियों से निकलकर आवासीय विद्यालय में पहुंचता है तो उसके साथ किताबें ही नहीं आतीं, उसके साथ उम्मीदें भी आती हैं। उसके माता-पिता अपने सीमित साधनों के बावजूद यह सपना देखते हैं कि उनका बच्चा पढ़ेगा, आगे बढ़ेगा, अधिकारी बनेगा, डॉक्टर बनेगा, इंजीनियर बनेगा, शिक्षक बनेगा या अपनी पसंद का कोई भी सम्मानजनक जीवन चुनेगा। ऐसे में यदि विद्यालय में ही उसके सपनों का मजाक बनाया जाए तो उससे बड़ा अन्याय क्या हो सकता है? शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता। शिक्षक बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण करता है। उसके एक वाक्य से बच्चा जीवन भर के लिए आत्मविश्वासी भी बन सकता है और उसी एक वाक्य से उसके भीतर हीनभावना भी पैदा हो सकती है। इसलिए शिक्षक के शब्दों की जिम्मेदारी सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक होती है। आदिवासी बच्चों को “गरीब” कहकर उनकी आर्थिक स्थिति का मजाक उड़ाना, “गंवार” कहकर उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को नीचा दिखाना और उनके भविष्य को केवल शादी तथा बच्चे पैदा करने तक सीमित कर देना उस सोच को दर्शाता है जिसमें शिक्षा का अर्थ ही शायद केवल किताबें पढ़ाना रह गया है। शिक्षा तो वह है जो बच्चे को यह विश्वास दे कि उसकी वर्तमान परिस्थितियां उसके भविष्य की सीमा नहीं हैं। सवाल यह भी है कि अगर आदिवासी बच्चे ही अपने विद्यालय में सम्मान और सुरक्षा के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हो रहे हैं तो आखिर हमारी आवासीय विद्यालय व्यवस्था किसके लिए है? एकलव्य विद्यालयों की स्थापना का उद्देश्य ही वंचित और आदिवासी समाज के बच्चों को बेहतर शिक्षा और अवसर उपलब्ध कराना है। इन विद्यालयों में पढ़ने वाला प्रत्येक बच्चा देश की संपत्ति है। उसके साथ किसी भी प्रकार का जातीय, सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक भेदभाव केवल उस बच्चे का अपमान नहीं, बल्कि संविधान की उस भावना का भी अपमान है जो हर नागरिक को समानता और सम्मान का अधिकार देती है। यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों के आरोपों को न तो बिना जांच के अंतिम सत्य मान लेना चाहिए और न ही उन्हें महज बच्चों की शिकायत कहकर दबा देना चाहिए। निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। बच्चों के बयान स्वतंत्र वातावरण में लिए जाने चाहिए। विद्यालय प्रशासन की भूमिका की जांच होनी चाहिए और यदि किसी शिक्षक या अधिकारी की गलती सामने आती है तो कार्रवाई भी ऐसी होनी चाहिए जिससे भविष्य में किसी बच्चे को अपनी पहचान, गरीबी या आदिवासी पृष्ठभूमि के कारण अपमानित न होना पड़े। मुख्यमंत्री से सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सरकार केवल भवन, छात्रावास, भोजन और किताबें उपलब्ध कराने से अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकती। सरकार की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना भी है कि इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों को सम्मानजनक वातावरण मिले। किसी बच्चे को यह बताने का अधिकार किसी शिक्षक को नहीं है कि उसकी जिंदगी की सीमा क्या होगी। बच्चा चाहे आदिवासी परिवार से आता हो, दलित परिवार से, किसान परिवार से, मजदूर परिवार से या किसी गरीब परिवार से उसके सपनों की कोई जाति नहीं होती और उसके भविष्य की कोई सामाजिक सीमा नहीं होनी चाहिए। आज आवश्यकता केवल दोषी की तलाश करने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की पहचान करने की है जो बच्चों को उनकी सामाजिक पहचान से आंकती है। यदि शिक्षा के मंदिर में ही बच्चे अपनी पहचान को लेकर शर्म महसूस करने लगें तो फिर हम उनसे आत्मविश्वास, नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? आदिवासी बच्चे किसी पर एहसान नहीं मांग रहे। वे अपने अधिकार की शिक्षा मांग रहे हैं। वे सम्मान चाहते हैं। वे सुरक्षित वातावरण चाहते हैं। वे अपने सपनों को उड़ान देना चाहते हैं। उनके सपनों पर किसी शिक्षक की व्यक्तिगत मानसिकता का पहरा नहीं लगाया जा सकता। सरकार जांच करे, दोषी मिले तो कार्रवाई करे और सबसे बढ़कर यह सुनिश्चित करे कि प्रदेश के किसी भी विद्यालय में किसी बच्चे को उसकी जाति, गरीबी, भाषा, संस्कृति या पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण अपमानित न होना पड़े। क्योंकि शिक्षा का मंदिर वह जगह है जहां बच्चों को झुकना नहीं, उठना सिखाया जाना चाहिए। और आदिवासी बच्चों का भविष्य किसी की मानसिकता का शिकार नहीं हो सकता।
    1
    मोहन राज में शिक्षा के मंदिर में मासूम बच्चों का अपमान क्यों?

जिस जगह बच्चों को किताबों के साथ सपने दिए जाने चाहिए, जिस विद्यालय में उन्हें अपने भविष्य की नई इबारत लिखना सीखना चाहिए, अगर उसी जगह उन्हें “कीड़ा”, “गंवार”, “गरीब” और अनपढ़ कहकर अपमानित किया जाए तो सवाल केवल शिक्षकों की भाषा का नहीं रह जाता, सवाल पूरी शिक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता पर खड़ा हो जाता है।

बड़वानी के एकलव्य आवासीय विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने शिक्षकों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बच्चों का आरोप है कि उन्हें अपमानजनक शब्द कहे गए और यहां तक कहा गया कि पढ़-लिखकर भी उन्हें आखिर शादी करके बच्चे ही पैदा करने हैं। यदि बच्चों द्वारा लगाए गए ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह केवल अनुशासनहीनता या गलत शब्दों का मामला नहीं होगा, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रमाण होगा जो शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही समझने में असफल है।

एक आदिवासी बच्चा जब अपने गांव, परिवार और सामाजिक परिस्थितियों से निकलकर आवासीय विद्यालय में पहुंचता है तो उसके साथ किताबें ही नहीं आतीं, उसके साथ उम्मीदें भी आती हैं। उसके माता-पिता अपने सीमित साधनों के बावजूद यह सपना देखते हैं कि उनका बच्चा पढ़ेगा, आगे बढ़ेगा, अधिकारी बनेगा, डॉक्टर बनेगा, इंजीनियर बनेगा, शिक्षक बनेगा या अपनी पसंद का कोई भी सम्मानजनक जीवन चुनेगा। ऐसे में यदि विद्यालय में ही उसके सपनों का मजाक बनाया जाए तो उससे बड़ा अन्याय क्या हो सकता है?

शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता। शिक्षक बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण करता है। उसके एक वाक्य से बच्चा जीवन भर के लिए आत्मविश्वासी भी बन सकता है और उसी एक वाक्य से उसके भीतर हीनभावना भी पैदा हो सकती है। इसलिए शिक्षक के शब्दों की जिम्मेदारी सामान्य व्यक्ति से कहीं अधिक होती है।

आदिवासी बच्चों को “गरीब” कहकर उनकी आर्थिक स्थिति का मजाक उड़ाना, “गंवार” कहकर उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को नीचा दिखाना और उनके भविष्य को केवल शादी तथा बच्चे पैदा करने तक सीमित कर देना उस सोच को दर्शाता है जिसमें शिक्षा का अर्थ ही शायद केवल किताबें पढ़ाना रह गया है। शिक्षा तो वह है जो बच्चे को यह विश्वास दे कि उसकी वर्तमान परिस्थितियां उसके भविष्य की सीमा नहीं हैं।

सवाल यह भी है कि अगर आदिवासी बच्चे ही अपने विद्यालय में सम्मान और सुरक्षा के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर हो रहे हैं तो आखिर हमारी आवासीय विद्यालय व्यवस्था किसके लिए है?

एकलव्य विद्यालयों की स्थापना का उद्देश्य ही वंचित और आदिवासी समाज के बच्चों को बेहतर शिक्षा और अवसर उपलब्ध कराना है। इन विद्यालयों में पढ़ने वाला प्रत्येक बच्चा देश की संपत्ति है। उसके साथ किसी भी प्रकार का जातीय, सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक भेदभाव केवल उस बच्चे का अपमान नहीं, बल्कि संविधान की उस भावना का भी अपमान है जो हर नागरिक को समानता और सम्मान का अधिकार देती है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों के आरोपों को न तो बिना जांच के अंतिम सत्य मान लेना चाहिए और न ही उन्हें महज बच्चों की शिकायत कहकर दबा देना चाहिए। निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। बच्चों के बयान स्वतंत्र वातावरण में लिए जाने चाहिए। विद्यालय प्रशासन की भूमिका की जांच होनी चाहिए और यदि किसी शिक्षक या अधिकारी की गलती सामने आती है तो कार्रवाई भी ऐसी होनी चाहिए जिससे भविष्य में किसी बच्चे को अपनी पहचान, गरीबी या आदिवासी पृष्ठभूमि के कारण अपमानित न होना पड़े।

मुख्यमंत्री से सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सरकार केवल भवन, छात्रावास, भोजन और किताबें उपलब्ध कराने से अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकती। सरकार की जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना भी है कि इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों को सम्मानजनक वातावरण मिले।

किसी बच्चे को यह बताने का अधिकार किसी शिक्षक को नहीं है कि उसकी जिंदगी की सीमा क्या होगी। बच्चा चाहे आदिवासी परिवार से आता हो, दलित परिवार से, किसान परिवार से, मजदूर परिवार से या किसी गरीब परिवार से उसके सपनों की कोई जाति नहीं होती और उसके भविष्य की कोई सामाजिक सीमा नहीं होनी चाहिए।

आज आवश्यकता केवल दोषी की तलाश करने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की पहचान करने की है जो बच्चों को उनकी सामाजिक पहचान से आंकती है। यदि शिक्षा के मंदिर में ही बच्चे अपनी पहचान को लेकर शर्म महसूस करने लगें तो फिर हम उनसे आत्मविश्वास, नेतृत्व और राष्ट्र निर्माण की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?

आदिवासी बच्चे किसी पर एहसान नहीं मांग रहे। वे अपने अधिकार की शिक्षा मांग रहे हैं। वे सम्मान चाहते हैं। वे सुरक्षित वातावरण चाहते हैं। वे अपने सपनों को उड़ान देना चाहते हैं।

उनके सपनों पर किसी शिक्षक की व्यक्तिगत मानसिकता का पहरा नहीं लगाया जा सकता।

सरकार जांच करे, दोषी मिले तो कार्रवाई करे और सबसे बढ़कर यह सुनिश्चित करे कि प्रदेश के किसी भी विद्यालय में किसी बच्चे को उसकी जाति, गरीबी, भाषा, संस्कृति या पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण अपमानित न होना पड़े।

क्योंकि शिक्षा का मंदिर वह जगह है जहां बच्चों को झुकना नहीं, उठना सिखाया जाना चाहिए। और आदिवासी बच्चों का भविष्य किसी की मानसिकता का शिकार नहीं हो सकता।
    user_Naved khan
    Naved khan
    हुजूर, भोपाल, मध्य प्रदेश•
    9 min ago
  • सा रे गा मा म्यूजिकल ग्रुप द्वारा संगीत संध्या का भव्य आयोजन किया गया सा रे गा मा म्यूजिकल ग्रुप द्वारा संगीत संध्या का आयोजन हथ करघा एवं हस्त शिल्प विकास निगम द्वारा आयोजित सावन मेले में किया गया। सावन मेले का आयोजन गौहर महल भोपाल में किया जा रहा है। सा रे गा मा म्यूजिकल ग्रुप के आर्गेनाइजर दिनेश कुमार गौर, सलाहकार वरिष्ठ सिंगर सुनीता जी, एंकर एवं सिंगर आनद शर्मा, कविता सक्सेना तनु स्वामी रितेश पाठक कमोद सक्सेना, प्रदीप सक्सेना, आशा अजय,स्तुति भार्गव, द्वारा संगीत संध्या में एक से बढ़कर एक सुमधुर सदावहर गीतों की प्रस्तुति दी गई
    4
    सा रे गा मा म्यूजिकल ग्रुप द्वारा संगीत संध्या का भव्य आयोजन किया गया 
सा रे गा मा म्यूजिकल ग्रुप द्वारा संगीत संध्या का आयोजन हथ करघा एवं हस्त शिल्प विकास निगम द्वारा आयोजित सावन मेले में किया गया। सावन मेले का आयोजन गौहर महल भोपाल में किया जा रहा है। सा रे गा मा म्यूजिकल ग्रुप के आर्गेनाइजर दिनेश कुमार गौर, सलाहकार वरिष्ठ सिंगर सुनीता जी, एंकर एवं सिंगर आनद शर्मा, कविता सक्सेना तनु स्वामी रितेश पाठक कमोद सक्सेना, प्रदीप सक्सेना, आशा अजय,स्तुति भार्गव, द्वारा संगीत संध्या में एक से बढ़कर एक सुमधुर सदावहर गीतों की प्रस्तुति दी गई
    user_Pradesh Prasar
    Pradesh Prasar
    Media house हुजूर, भोपाल, मध्य प्रदेश•
    3 hrs ago
  • त्योहारों को लेकर भोपाल पुलिस अलर्ट, पुराने भोपाल में निगरानी बदमाशों पर कड़ी नजर भोपाल में आगामी त्योहारों को देखते हुए पुलिस लगातार सक्रिय है। इसी क्रम में जोन-3 के कोतवाली संभाग में एसीपी संतोष पटेल के नेतृत्व में तलैया, कोतवाली और श्यामला हिल्स थाना पुलिस की टीमें लगातार क्षेत्र में भ्रमण कर रही हैं। पुलिस का मुख्य उद्देश्य चाकूबाजी और अन्य आपराधिक गतिविधियों में शामिल बदमाशों पर नजर रखना और शहर में शांति एवं कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। एसीपी संतोष पटेल के नेतृत्व में पुलिसकर्मी पुराने भोपाल के संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार गश्त कर रहे हैं। पुलिस द्वारा निगरानीशुदा बदमाशों और पूर्व में गंभीर धाराओं में अपराध करने वाले आरोपियों की गतिविधियों की भी जानकारी जुटाई जा रही है। साथ ही संदिग्ध व्यक्तियों की जांच कर उन्हें अपराध से दूर रहने की समझाइश दी जा रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि त्योहारों के दौरान किसी भी तरह की असामाजिक गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की निगरानी और गश्त लगातार जारी रहेगी।
    1
    त्योहारों को लेकर भोपाल पुलिस अलर्ट, पुराने भोपाल में निगरानी बदमाशों पर कड़ी नजर

भोपाल में आगामी त्योहारों को देखते हुए पुलिस लगातार सक्रिय है। इसी क्रम में जोन-3 के कोतवाली संभाग में एसीपी संतोष पटेल के नेतृत्व में तलैया, कोतवाली और श्यामला हिल्स थाना पुलिस की टीमें लगातार क्षेत्र में भ्रमण कर रही हैं। पुलिस का मुख्य उद्देश्य चाकूबाजी और अन्य आपराधिक गतिविधियों में शामिल बदमाशों पर नजर रखना और शहर में शांति एवं कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।

एसीपी संतोष पटेल के नेतृत्व में पुलिसकर्मी पुराने भोपाल के संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार गश्त कर रहे हैं। पुलिस द्वारा निगरानीशुदा बदमाशों और पूर्व में गंभीर धाराओं में अपराध करने वाले आरोपियों की गतिविधियों की भी जानकारी जुटाई जा रही है। साथ ही संदिग्ध व्यक्तियों की जांच कर उन्हें अपराध से दूर रहने की समझाइश दी जा रही है।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि त्योहारों के दौरान किसी भी तरह की असामाजिक गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की निगरानी और गश्त लगातार जारी रहेगी।
    user_K K D NEWS MP/CG
    K K D NEWS MP/CG
    TV News Anchor हुजूर, भोपाल, मध्य प्रदेश•
    9 hrs ago
  • ग्वालियर ब्रेकिंग, ग्वालियर में किसिंग कार पर धमाल, अब आया कार पर किस करते हुए गर्लफ्रेंड का वीडियो सामने, 11 सैकेंड के वीडियो में कार को किस करते हुए एक लड़की आ रही है नजर, वीडियो में दिखाई गई है लिप मार्क कार, बता दें बीते रोज ट्रैफिक पुलिस ने पकड़ी थी अजब- गजब किसिंग कार’, कार चालक से वसूला था पांच हजार पांच सौ रुपए का चालान, ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने पर की गई थी कार्रवाई, कार बताई गई थी आदित्य सिकरवार निवासी थाटीपुर की, आदित्य ने किया था दावा, बिना जानकारी के गर्लफ्रेंड ने बना दिए थे कार पर 3400 किस के निशान, आठ सौ से नौ सौ रुपए का आया था खर्च, रील के विदेशी ट्रेंड से प्रभावित होकर गर्लफ्रेंड ने बनाया था कार पर अनोखा डिजाइन,
    1
    ग्वालियर ब्रेकिंग,

ग्वालियर में किसिंग कार पर धमाल,
अब आया कार पर किस करते हुए गर्लफ्रेंड का वीडियो सामने,
11 सैकेंड के वीडियो में कार को किस करते हुए एक लड़की आ रही है नजर,
वीडियो में दिखाई गई है लिप मार्क कार,
बता दें बीते रोज ट्रैफिक पुलिस ने पकड़ी थी अजब- गजब किसिंग कार’,
कार चालक से वसूला था पांच हजार पांच सौ रुपए का चालान,
ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने पर की गई थी कार्रवाई,
कार बताई गई थी आदित्य सिकरवार निवासी थाटीपुर की,
आदित्य ने किया था दावा,
बिना जानकारी के गर्लफ्रेंड ने बना दिए थे कार पर 3400 किस के निशान, 
आठ सौ से नौ सौ रुपए का आया था खर्च,
रील के विदेशी ट्रेंड से प्रभावित होकर गर्लफ्रेंड ने बनाया था कार पर अनोखा डिजाइन,
    user_Gulfam khan
    Gulfam khan
    हुजूर, भोपाल, मध्य प्रदेश•
    9 hrs ago
  • रीवा में बारिश का शैलाव ! द्वारिका नगर के घरों में घुसा पानी, छतों रहने को मजबूर हुए लोग बारिश के बाद रीवा के द्वारिका नगर में एक बार फिर जलभराव से हालात बिगड़ गए। घरों में पानी भरने से लोग परेशान हैं और कई परिवारों को मजबूरी में छतों पर रहना पड़ा। वहीं सड़कों पर पानी भरने से यातायात भी प्रभावित रहा। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से जल्द स्थायी समाधान की मांग की है।
    1
    रीवा में बारिश का शैलाव ! द्वारिका नगर के घरों में घुसा पानी, छतों रहने को मजबूर हुए लोग
बारिश के बाद रीवा के द्वारिका नगर में एक बार फिर जलभराव से हालात बिगड़ गए। घरों में पानी भरने से लोग परेशान हैं और कई परिवारों को मजबूरी में छतों पर रहना पड़ा। वहीं सड़कों पर पानी भरने से यातायात भी प्रभावित रहा। स्थानीय लोगों ने प्रशासन से जल्द स्थायी समाधान की मांग की है।
    user_HIGH NEWS LIVE
    HIGH NEWS LIVE
    Media house हुजूर, भोपाल, मध्य प्रदेश•
    12 hrs ago
  • में शिक्षक भर्ती में पद-वृद्धि जैसी अन्य मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों से आज वीडियो कॉल पर बात की! उनकी पूरी बात/मुद्दे को ध्यान से सुना! उनकी पीड़ा, चिंता और भविष्य को लेकर उनकी बेचैनी और अनिश्चितता को भी समझा! मैं सभी मांग का पूरी तरह समर्थन करता हूं! इस पूरे संघर्ष में उनके साथ खड़ा हूं!
    1
    में शिक्षक भर्ती में पद-वृद्धि जैसी अन्य मांगों को लेकर संघर्ष कर रहे अभ्यर्थियों से आज वीडियो कॉल पर बात की! 

उनकी पूरी बात/मुद्दे को ध्यान से सुना! उनकी पीड़ा, चिंता और भविष्य को लेकर उनकी बेचैनी और अनिश्चितता को भी समझा!

मैं सभी मांग का पूरी तरह समर्थन करता हूं!
इस पूरे संघर्ष में उनके साथ खड़ा हूं!
    user_भोपाल टुडे न्यूज़ मुंसिफ खान
    भोपाल टुडे न्यूज़ मुंसिफ खान
    Police Officer हुजूर, भोपाल, मध्य प्रदेश•
    15 hrs ago
  • *गुफा मंदिर-बरेला गांव का रास्ता बंद, गुस्साए ग्रामीणों ने भोपाल कलेक्ट्रेट में किया प्रदर्शन* गुफा मंदिर से बरेला गांव जाने वाला रास्ता बंद *गुफा मंदिर-बरेला गांव का रास्ता बंद, गुस्साए ग्रामीणों ने भोपाल कलेक्ट्रेट में किया प्रदर्शन* गुफा मंदिर से बरेला गांव जाने वाला रास्ता बंद होने से ग्रामीणों में आक्रोश महिलाओं ने भोपाल कलेक्ट्रेट के8 सीढ़ियों पर बैठकर जताया विरोध रास्ता बंद होने से गांव में शव यात्रा निकालने में भी हुई परेशानी खुदे पड़े उबड़ खाबड़ पत्थरो के बीच से रखवासियो की मद्दत से निकाला शव ग्रामीणों ने रास्ता खुलवाने की मांग को लेकर प्रशासन के सामने रखा पक्ष
    1
    *गुफा मंदिर-बरेला गांव का रास्ता बंद, गुस्साए ग्रामीणों ने भोपाल कलेक्ट्रेट में किया प्रदर्शन*

गुफा मंदिर से बरेला गांव जाने वाला रास्ता बंद
*गुफा मंदिर-बरेला गांव का रास्ता बंद, गुस्साए ग्रामीणों ने भोपाल कलेक्ट्रेट में किया प्रदर्शन*
गुफा मंदिर से बरेला गांव जाने वाला रास्ता बंद होने से ग्रामीणों में आक्रोश
महिलाओं ने भोपाल कलेक्ट्रेट   के8 सीढ़ियों  पर बैठकर जताया विरोध
रास्ता बंद होने से गांव में शव यात्रा निकालने में भी हुई परेशानी
खुदे पड़े उबड़ खाबड़ पत्थरो के बीच से रखवासियो की मद्दत से निकाला शव
ग्रामीणों ने रास्ता खुलवाने की मांग को लेकर प्रशासन के सामने रखा पक्ष
    user_Shafiq Khan
    Shafiq Khan
    Huzur, Bhopal•
    15 hrs ago
  • *गंगाजल हाथ में, निगम की कमाई 60 हिस्सों में बांटने की शपथ...? शाहजहांपुर के वायरल वीडियो ने खड़े किए बड़े सवाल?* राजेन्द्र सिंह जादौन उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से सामने आया एक वायरल वीडियो इन दिनों नगर निगम की राजनीति और कथित पारदर्शिता पर ऐसे सवाल खड़े कर रहा है, जिनका जवाब अब सोशल मीडिया नहीं बल्कि जांच एजेंसियों और नगर निगम प्रशासन को देना होगा। वीडियो में कुछ लोग हाथ में जल लेकर शपथ लेते दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि ये शाहजहांपुर नगर निगम के पार्षद हैं और शपथ इस बात की ली जा रही है कि निगम से होने वाली आमदनी सभी 60 पार्षदों में बराबर बांटी जाएगी। वीडियो इतना विचित्र है कि पहली नजर में भरोसा करना मुश्किल होता है। लेकिन वीडियो सामने आने के बाद मामला सिर्फ सोशल मीडिया की चर्चा तक सीमित नहीं रहा। समाचार एजेंसी PTI ने भी इस वायरल वीडियो को लेकर खबर प्रकाशित की है और बताया है कि शाहजहांपुर नगर निगम ने मामले में जांच के आदेश दिए हैं। नगर आयुक्त सौम्या गुरुरानी के अनुसार वीडियो कथित तौर पर नवंबर 2025 का बताया जा रहा है, जब नगर निगम में कोई दूसरा नगर आयुक्त पदस्थ था। इसके बावजूद वर्तमान प्रशासन ने जांच के आदेश दिए हैं। अब सवाल यह है कि आखिर उस कमरे में हो क्या रहा था? वायरल वीडियो में एक व्यक्ति हाथ में पानी लेकर शपथ दिलाता दिखाई देता है और बाकी लोग उसके पीछे कथित तौर पर शपथ दोहराते हैं। वीडियो में निगम की आमदनी को 60 लोगों में बराबर बांटने और किसी एक सदस्य पर संकट आने पर पूरा समूह उसके साथ खड़े रहने जैसी बातें सुनाई देती हैं। वीडियो में गद्दारी करने वाले के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल भी बताया गया है। सोशल मीडिया ने इस वीडियो को सीधे भ्रष्टाचार की कमाई के बंटवारे की शपथ घोषित कर दिया। कुछ रिपोर्टों में भी इसे इसी अंदाज में पेश किया गया है। लेकिन पत्रकारिता का पहला सिद्धांत यही कहता है कि वीडियो में दिखाई और सुनाई देने वाली बात तथा उसके पीछे की वास्तविक परिस्थिति में अंतर हो सकता है। इसलिए जब तक जांच पूरी नहीं होती, इसे भ्रष्टाचार का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर है कि वीडियो ने गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं। और यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा व्यंग्य है। अगर कोई व्यक्ति गंगाजल हाथ में लेकर यह कहे कि नगर निगम की आमदनी सभी में बराबर बांटी जाएगी तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि गंगाजल कितना पवित्र था। सवाल यह होना चाहिए कि आखिर किस आमदनी की बात हो रही थी? निगम की वैधानिक आमदनी? विकास कार्यों से जुड़ी रकम? ठेके और भुगतान? या सोशल मीडिया जिस तरह दावा कर रहा है, वैसी कोई कथित अवैध कमाई? अगर बात नगर निगम की वैधानिक आय की थी तो उसे 60 पार्षदों में बांटने का अधिकार किसके पास है? और अगर बात किसी अवैध रकम की थी तो फिर यह मामला और भी गंभीर हो जाता है। यही वह सवाल है जिसका जवाब जांच में सामने आना चाहिए। शाहजहांपुर नगर निगम में 60 पार्षद हैं या नहीं, वीडियो में दिखाई देने वाले सभी लोग वास्तव में निर्वाचित पार्षद हैं या नहीं, वीडियो कब और कहां बनाया गया, इसे किसने रिकॉर्ड किया और वीडियो का पूरा संदर्भ क्या है इन तमाम सवालों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जरूरी है। हालांकि वीडियो की प्रामाणिकता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यानी पत्रकारिता की भाषा में फिलहाल सबसे सही शब्द है“कथित”। लेकिन इस कथित वीडियो की गंभीरता कम नहीं हो जाती। क्योंकि यदि जांच में यह साबित होता है कि नगर निगम के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने वास्तव में निगम की आय या किसी कथित कमीशन को आपस में बांटने जैसी कोई शपथ ली थी, तो यह केवल राजनीतिक नैतिकता का सवाल नहीं रहेगा। फिर यह पूछा जाना चाहिए कि नगर निगम की आर्थिक व्यवस्था किस तरह चल रही थी और जनप्रतिनिधियों की भूमिका उसमें क्या थी। दूसरी तरफ यदि जांच में यह साबित होता है कि वीडियो को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया, उसमें दिखाई देने वाले लोग पार्षद नहीं थे या वीडियो का संबंध निगम की कथित कमाई से नहीं था, तो सोशल मीडिया पर इस दावे को फैलाने वालों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। यही फर्क है वायरल कंटेंट और पत्रकारिता में। वायरल वीडियो कहता है “देखो, भ्रष्टाचार की शपथ हो रही है।” जांच कहती है “पहले यह साबित करो कि वीडियो में कौन है, कब का है और किस परिस्थिति का है।” और लोकतंत्र कहता है “जनता को दोनों बातें बताओ।” इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प बात यह भी है कि जिस चीज को सामान्य तौर पर सार्वजनिक धन की निगरानी और जनता के विकास के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, वही धन अगर किसी समूह के बीच बांटने की बात के साथ जुड़ जाए तो स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होंगे। नगर निगम जनता के टैक्स, शुल्क और सरकारी संसाधनों से चलता है। सड़क, नाली, सफाई, पानी, स्ट्रीट लाइट, कचरा प्रबंधन और शहर के विकास से लेकर तमाम जिम्मेदारियां नगर निगम के पास होती हैं। जनता यह उम्मीद करती है कि उसके पैसे का इस्तेमाल जनता के लिए होगा। जनता यह नहीं चाहती कि उसके पैसे की कोई ऐसी “साझेदारी” बने, जिसका हिसाब जनता को दिखाई ही न दे। इसलिए इस वीडियो का असली सवाल गंगाजल नहीं है। असली सवाल हिसाब है। अगर सब कुछ साफ है तो हिसाब सामने आना चाहिए। अगर वीडियो पुराना है तो उसकी तारीख सामने आनी चाहिए। अगर वीडियो में दिखने वाले लोग पार्षद नहीं हैं तो उनकी पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। अगर वे पार्षद हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि वे किस बात की शपथ ले रहे थे। और अगर “निगम की आमदनी” का मतलब कुछ और था तो उसका अर्थ भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। नगर आयुक्त ने जांच के आदेश देकर कम से कम यह संकेत दिया है कि प्रशासन ने वीडियो को नजरअंदाज नहीं किया है। अब जनता की निगाह जांच पर है। क्योंकि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को जनता ने शपथ इसलिए नहीं दिलाई कि वे एक-दूसरे की मुसीबत में सामूहिक रूप से खड़े रहें; उनसे अपेक्षा यह है कि वे जनता के पैसे, जनता के अधिकार और जनता के भरोसे के साथ खड़े रहें। और अगर गंगाजल हाथ में लेकर कोई शपथ ली भी गई है तो सबसे बड़ी शपथ जनता के प्रति होनी चाहिए न पैसा छिपेगा, न हिसाब छिपेगा और न जनता से कोई बात छिपाई जाएगी। शाहजहांपुर का यह वीडियो फिलहाल जांच का विषय है, फैसला नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि इसने नगर निगम की व्यवस्था पर एक ऐसा आईना रख दिया है, जिसमें अब चेहरों से ज्यादा सवाल दिखाई दे रहे हैं। अब देखना यह है कि जांच उस आईने को साफ करती है या आईना ही तोड़ दिया जाता है।
    1
    *गंगाजल हाथ में, निगम की कमाई 60 हिस्सों में बांटने की शपथ...? शाहजहांपुर के वायरल वीडियो ने खड़े किए बड़े सवाल?*

 राजेन्द्र सिंह जादौन

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर से सामने आया एक वायरल वीडियो इन दिनों नगर निगम की राजनीति और कथित पारदर्शिता पर ऐसे सवाल खड़े कर रहा है, जिनका जवाब अब सोशल मीडिया नहीं बल्कि जांच एजेंसियों और नगर निगम प्रशासन को देना होगा। वीडियो में कुछ लोग हाथ में जल लेकर शपथ लेते दिखाई दे रहे हैं। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि ये शाहजहांपुर नगर निगम के पार्षद हैं और शपथ इस बात की ली जा रही है कि निगम से होने वाली आमदनी सभी 60 पार्षदों में बराबर बांटी जाएगी।

वीडियो इतना विचित्र है कि पहली नजर में भरोसा करना मुश्किल होता है। लेकिन वीडियो सामने आने के बाद मामला सिर्फ सोशल मीडिया की चर्चा तक सीमित नहीं रहा। समाचार एजेंसी PTI ने भी इस वायरल वीडियो को लेकर खबर प्रकाशित की है और बताया है कि शाहजहांपुर नगर निगम ने मामले में जांच के आदेश दिए हैं। नगर आयुक्त सौम्या गुरुरानी के अनुसार वीडियो कथित तौर पर नवंबर 2025 का बताया जा रहा है, जब नगर निगम में कोई दूसरा नगर आयुक्त पदस्थ था। इसके बावजूद वर्तमान प्रशासन ने जांच के आदेश दिए हैं।

अब सवाल यह है कि आखिर उस कमरे में हो क्या रहा था?

वायरल वीडियो में एक व्यक्ति हाथ में पानी लेकर शपथ दिलाता दिखाई देता है और बाकी लोग उसके पीछे कथित तौर पर शपथ दोहराते हैं। वीडियो में निगम की आमदनी को 60 लोगों में बराबर बांटने और किसी एक सदस्य पर संकट आने पर पूरा समूह उसके साथ खड़े रहने जैसी बातें सुनाई देती हैं। वीडियो में गद्दारी करने वाले के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल भी बताया गया है।

सोशल मीडिया ने इस वीडियो को सीधे भ्रष्टाचार की कमाई के बंटवारे की शपथ घोषित कर दिया। कुछ रिपोर्टों में भी इसे इसी अंदाज में पेश किया गया है। लेकिन पत्रकारिता का पहला सिद्धांत यही कहता है कि वीडियो में दिखाई और सुनाई देने वाली बात तथा उसके पीछे की वास्तविक परिस्थिति में अंतर हो सकता है। इसलिए जब तक जांच पूरी नहीं होती, इसे भ्रष्टाचार का प्रमाण मान लेना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर है कि वीडियो ने गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं।

और यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा व्यंग्य है।

अगर कोई व्यक्ति गंगाजल हाथ में लेकर यह कहे कि नगर निगम की आमदनी सभी में बराबर बांटी जाएगी तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि गंगाजल कितना पवित्र था। सवाल यह होना चाहिए कि आखिर किस आमदनी की बात हो रही थी? निगम की वैधानिक आमदनी? विकास कार्यों से जुड़ी रकम? ठेके और भुगतान? या सोशल मीडिया जिस तरह दावा कर रहा है, वैसी कोई कथित अवैध कमाई?

अगर बात नगर निगम की वैधानिक आय की थी तो उसे 60 पार्षदों में बांटने का अधिकार किसके पास है? और अगर बात किसी अवैध रकम की थी तो फिर यह मामला और भी गंभीर हो जाता है। यही वह सवाल है जिसका जवाब जांच में सामने आना चाहिए।

शाहजहांपुर नगर निगम में 60 पार्षद हैं या नहीं, वीडियो में दिखाई देने वाले सभी लोग वास्तव में निर्वाचित पार्षद हैं या नहीं, वीडियो कब और कहां बनाया गया, इसे किसने रिकॉर्ड किया और वीडियो का पूरा संदर्भ क्या है इन तमाम सवालों की स्वतंत्र पुष्टि अभी जरूरी है। हालांकि वीडियो की प्रामाणिकता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

यानी पत्रकारिता की भाषा में फिलहाल सबसे सही शब्द है“कथित”। लेकिन इस कथित वीडियो की गंभीरता कम नहीं हो जाती।

क्योंकि यदि जांच में यह साबित होता है कि नगर निगम के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने वास्तव में निगम की आय या किसी कथित कमीशन को आपस में बांटने जैसी कोई शपथ ली थी, तो यह केवल राजनीतिक नैतिकता का सवाल नहीं रहेगा। फिर यह पूछा जाना चाहिए कि नगर निगम की आर्थिक व्यवस्था किस तरह चल रही थी और जनप्रतिनिधियों की भूमिका उसमें क्या थी।

दूसरी तरफ यदि जांच में यह साबित होता है कि वीडियो को गलत संदर्भ में प्रस्तुत किया गया, उसमें दिखाई देने वाले लोग पार्षद नहीं थे या वीडियो का संबंध निगम की कथित कमाई से नहीं था, तो सोशल मीडिया पर इस दावे को फैलाने वालों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

यही फर्क है वायरल कंटेंट और पत्रकारिता में। वायरल वीडियो कहता है “देखो, भ्रष्टाचार की शपथ हो रही है।”

जांच कहती है “पहले यह साबित करो कि वीडियो में कौन है, कब का है और किस परिस्थिति का है।” और लोकतंत्र कहता है “जनता को दोनों बातें बताओ।”

इस पूरे प्रकरण में सबसे दिलचस्प बात यह भी है कि जिस चीज को सामान्य तौर पर सार्वजनिक धन की निगरानी और जनता के विकास के लिए इस्तेमाल होना चाहिए, वही धन अगर किसी समूह के बीच बांटने की बात के साथ जुड़ जाए तो स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा होंगे।

नगर निगम जनता के टैक्स, शुल्क और सरकारी संसाधनों से चलता है। सड़क, नाली, सफाई, पानी, स्ट्रीट लाइट, कचरा प्रबंधन और शहर के विकास से लेकर तमाम जिम्मेदारियां नगर निगम के पास होती हैं। जनता यह उम्मीद करती है कि उसके पैसे का इस्तेमाल जनता के लिए होगा। जनता यह नहीं चाहती कि उसके पैसे की कोई ऐसी “साझेदारी” बने, जिसका हिसाब जनता को दिखाई ही न दे।

इसलिए इस वीडियो का असली सवाल गंगाजल नहीं है।

असली सवाल हिसाब है।

अगर सब कुछ साफ है तो हिसाब सामने आना चाहिए। अगर वीडियो पुराना है तो उसकी तारीख सामने आनी चाहिए। अगर वीडियो में दिखने वाले लोग पार्षद नहीं हैं तो उनकी पहचान स्पष्ट होनी चाहिए। अगर वे पार्षद हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि वे किस बात की शपथ ले रहे थे। और अगर “निगम की आमदनी” का मतलब कुछ और था तो उसका अर्थ भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

नगर आयुक्त ने जांच के आदेश देकर कम से कम यह संकेत दिया है कि प्रशासन ने वीडियो को नजरअंदाज नहीं किया है। अब जनता की निगाह जांच पर है।

क्योंकि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को जनता ने शपथ इसलिए नहीं दिलाई कि वे एक-दूसरे की मुसीबत में सामूहिक रूप से खड़े रहें; उनसे अपेक्षा यह है कि वे जनता के पैसे, जनता के अधिकार और जनता के भरोसे के साथ खड़े रहें।

और अगर गंगाजल हाथ में लेकर कोई शपथ ली भी गई है तो सबसे बड़ी शपथ जनता के प्रति होनी चाहिए न पैसा छिपेगा, न हिसाब छिपेगा और न जनता से कोई बात छिपाई जाएगी।

शाहजहांपुर का यह वीडियो फिलहाल जांच का विषय है, फैसला नहीं। लेकिन इतना जरूर है कि इसने नगर निगम की व्यवस्था पर एक ऐसा आईना रख दिया है, जिसमें अब चेहरों से ज्यादा सवाल दिखाई दे रहे हैं।

अब देखना यह है कि जांच उस आईने को साफ करती है या आईना ही तोड़ दिया जाता है।
    user_Naved khan
    Naved khan
    हुजूर, भोपाल, मध्य प्रदेश•
    10 min ago
View latest news on Shuru App
Download_Android
  • Terms & Conditions
  • Career
  • Privacy Policy
  • Blogs
Shuru, a product of Close App Private Limited.