*बाबा जगन्नाथ जी की तपोभूमि पर आज भी जीवित है गौ वंश की सेवा परंपरा* *संतों की तपस्या और साधना से हो रही है सैकड़ों गौवंश की सहारा बनी नौलखी गौशाला* जन जागरण संदेश संवाददाता - राहुल नामदेव 9424472939 गंजबासौदा - आज जब कई स्थानों पर गौ संरक्षण केवल योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित दिखाई देता है, तब गंज क्षेत्र स्थित नौलखी आश्रम की गौशाला सेवा, समर्पण और गौभक्ति की ऐसी मिसाल बनकर सामने आई है, जहां बिना रुके साधु संतों की तपस्या, साधना के बूते, श्रद्धालुओं की सेवा और भक्ति से ना केवल गौ माता को सम्मानजनक आश्रय मिल रहा है बल्कि सैकड़ों गौवंश की सेवा वर्षों से निरंतर जारी है। करीब 400 वर्ष पुरानी सिद्धों, तपस्वियों और वीतराग संतों की तपोभूमि नौलखी आश्रम आज भी सेवा, साधना और गौ भक्ति की उसी परंपरा को जीवित रखे हुए है, जो यहां रहे संतों ने रखी थी। करीब 100 साल पहले आश्रम पर गौ सेवा की नींव बाबा जगन्नाथ दास जी महाराज ने रखी थी। अब इसी आश्रम परिसर में सिद्ध संत बाबा जगन्नाथदास जी की गौ सेवा को चिरस्थाई कर सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए उनके नाम से ही गंज क्षेत्र स्थित श्री जगन्नाथ दास नौलखी आध्यात्मिक धार्मिक कल्याण समिति बनाकर गौ सेवा की जा रही है। समिति द्वारा संचालित गौशाला वर्षों से नि:स्वार्थ भाव से गौसेवा का उदाहरण प्रस्तुत कर रही है। करीब सौ वर्षों से संचालित यह गौशाला आज भी बाबा जगन्नाथ जी की तपस्या, सेवा और करुणा के संकल्प को जीवंत बनाए हुए है। समिति द्वारा संचालित गौशाला निराश्रित, बूढ़ी, बीमार, विकलांग और बिना दूध देने वाली गायों का सहारा बनी हुई है। गौशाला में आश्रम के अलावा अन्य निराश्रित, विकलांग गौवंश को भी सहारा दिया जाता है। यह गौशाला आज भी वर्षों से तपस्वियों और संतों की मूल भावना सेवा और साधना को जीवित रखे हुए है। मालूम हो कि वेत्रवती घाट स्थित नौलखी आश्रम तपस्वियों की तपस्या और सेवा के कारण क्षेत्र में अगाध श्रद्धा का केंद्र है। कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो केवल ईंट-पत्थरों से नहीं बनते… वहां समय की तपस्या, संतों का त्याग और सेवा की सुगंध भी बसती है। नगर के वेत्रवती घाट स्थित करीब 400 वर्ष पुराना नौलखी आश्रम भी ऐसी ही एक दिव्य तपोभूमि है, जहां आज भी सिद्धों, तपस्वियों और वीतरागी संतों की साधना का भाव महसूस किया जा सकता है। यह वह भूमि है जहां कभी संतों ने संसार से विरक्त होकर लोककल्याण, गौसेवा और मानवता के लिए तप किया था। समय की धूल ने बहुत कुछ बदला, पीढ़ियां बदलीं, व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन इस आश्रम की आत्मा आज भी त्याग, तप, सेवा, संवेदना और समर्पण के की साथ विद्यमान है। साथ ही यहाँ संचालित गौशाला इसी परंपरा की जीवंत तस्वीर है। नगरवासी बताते हैं कि बाबा जगन्नाथ दास जी महाराज का गौमाता के प्रति विशेष अनुराग था। उन्होंने जिस करुणा और भक्ति से गौसेवा की ज्योति प्रज्वलित की थी, वह आज भी उसी श्रद्धा से जल रही है। नौलखी खालसा के वर्तमान श्रीमहंत एवं समिति अध्यक्ष श्री राम मनोहर दास जी महाराज उसी विरासत को सेवा और साधना के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। समय बदला, व्यवस्थाएं बदलीं, जीवन की रफ्तार बदली और गौवंश की संख्या भी बढ़ती गई लेकिन आश्रम में सेवा का भाव नहीं बदला। यहां आज भी गौमाता को केवल पशु नहीं, बल्कि पूज्यनीय मानकर सेवा की जाती है। *श्रद्धा, त्याग और सेवा पर चल रही है नौलखी की गौशाला* गौशाला के अध्यक्ष श्रीमहंत राम मनोहर दास जी महाराज ने बताया कि समय के साथ गौवंश की संख्या बढ़ी, चुनौतियां भी बढ़ीं, लेकिन सेवा का भाव कभी कम नहीं हुआ। आज भी आश्रम और श्रद्धालुओं के सहयोग से गौवंश के लिए चारा, भूसा, पानी, चिकित्सा और देखभाल की व्यवस्था की जा रही है। यह गौशाला श्रद्धा, त्याग और सेवा पर चल रही है जहाँ चार ग्वाले दिन-रात गौ सेवा में लगे रहते हैं। समिति द्वारा सैकड़ों गौवंश के लिए चारा, भूसा, पानी, चिकित्सा और प्राकृतिक वातावरण की व्यवस्था की जाती है। *गायों को चारदिवारी नहीं खुला वातारण मिलता है* गौशाला का वातावरण भी किसी साधना स्थल जैसा प्रतीत होता है। गायों को रखने के लिए पक्की गौशाला तो बनी है साथ ही उन्हें नियमित रूप से खुले मैदान, शांत परिसर, प्राकृतिक विचरण और नदी आज जब कई स्थानों पर लाखों रुपए की लागत से तैयार हुईं करोडों रुपए की सैकड़ो गौशालाएं केवल योजनाओं और कागजों तक सीमित दिखाई देती हैं, तब नौलखी आश्रम की यह गौशाला व्यवस्था और समाज दोनों के लिए एक मौन संदेश बनकर खड़ी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि शासन-प्रशासन इस गौशाला की व्यवस्थाओं को समझे और इसे सरकारी योजनाओं से जोड़े, तो यह क्षेत्र की आदर्श गौशाला बन सकती है।
*बाबा जगन्नाथ जी की तपोभूमि पर आज भी जीवित है गौ वंश की सेवा परंपरा* *संतों की तपस्या और साधना से हो रही है सैकड़ों गौवंश की सहारा बनी नौलखी गौशाला* जन जागरण संदेश संवाददाता - राहुल नामदेव 9424472939 गंजबासौदा - आज जब कई स्थानों पर गौ संरक्षण केवल योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित दिखाई देता है, तब गंज क्षेत्र स्थित नौलखी आश्रम की गौशाला सेवा, समर्पण और गौभक्ति की ऐसी मिसाल बनकर सामने आई है, जहां बिना रुके साधु संतों की तपस्या, साधना के बूते, श्रद्धालुओं की सेवा और भक्ति से ना केवल गौ माता को सम्मानजनक आश्रय मिल रहा है बल्कि सैकड़ों गौवंश की सेवा वर्षों से निरंतर जारी है। करीब 400 वर्ष पुरानी सिद्धों, तपस्वियों और वीतराग संतों की तपोभूमि नौलखी आश्रम आज भी सेवा, साधना और गौ भक्ति की उसी परंपरा को जीवित रखे हुए है, जो यहां रहे संतों ने रखी थी। करीब 100 साल पहले आश्रम पर गौ सेवा की नींव बाबा जगन्नाथ दास जी महाराज ने रखी थी। अब इसी आश्रम परिसर में सिद्ध संत बाबा जगन्नाथदास जी की गौ सेवा को चिरस्थाई कर सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए उनके नाम से ही गंज क्षेत्र स्थित श्री जगन्नाथ दास नौलखी आध्यात्मिक धार्मिक कल्याण समिति बनाकर गौ सेवा की जा रही है। समिति द्वारा संचालित गौशाला वर्षों से नि:स्वार्थ भाव से गौसेवा का उदाहरण प्रस्तुत कर रही है। करीब सौ वर्षों से संचालित यह गौशाला आज भी बाबा जगन्नाथ जी की तपस्या, सेवा और करुणा के संकल्प को जीवंत बनाए हुए है। समिति द्वारा संचालित गौशाला निराश्रित, बूढ़ी, बीमार, विकलांग और बिना दूध देने वाली गायों का सहारा बनी हुई है। गौशाला में आश्रम के अलावा अन्य निराश्रित, विकलांग गौवंश को भी सहारा दिया जाता है। यह गौशाला आज भी वर्षों से तपस्वियों और संतों की मूल भावना सेवा और साधना को जीवित रखे हुए है। मालूम हो कि वेत्रवती घाट स्थित नौलखी आश्रम तपस्वियों की तपस्या और सेवा के कारण क्षेत्र में अगाध श्रद्धा का केंद्र है। कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो केवल ईंट-पत्थरों से नहीं बनते… वहां समय की तपस्या, संतों का त्याग और सेवा की सुगंध भी बसती है। नगर के वेत्रवती घाट स्थित करीब 400 वर्ष पुराना नौलखी आश्रम भी ऐसी ही एक दिव्य तपोभूमि है, जहां आज भी सिद्धों, तपस्वियों और वीतरागी संतों की साधना का भाव महसूस किया जा सकता है। यह वह भूमि है जहां कभी संतों ने संसार से विरक्त होकर लोककल्याण, गौसेवा और मानवता के लिए तप किया था। समय की धूल ने बहुत कुछ बदला, पीढ़ियां बदलीं, व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन इस आश्रम की आत्मा आज भी त्याग, तप, सेवा, संवेदना और समर्पण के की साथ विद्यमान है। साथ ही यहाँ संचालित गौशाला इसी परंपरा की जीवंत तस्वीर है। नगरवासी बताते हैं कि बाबा जगन्नाथ दास जी महाराज का गौमाता के प्रति विशेष अनुराग था। उन्होंने जिस करुणा और भक्ति से गौसेवा की ज्योति प्रज्वलित की थी, वह आज भी उसी श्रद्धा से जल रही है। नौलखी खालसा के वर्तमान श्रीमहंत एवं समिति अध्यक्ष श्री राम मनोहर दास जी महाराज उसी विरासत को सेवा और साधना के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। समय बदला, व्यवस्थाएं बदलीं, जीवन की रफ्तार बदली और गौवंश की संख्या भी बढ़ती गई लेकिन आश्रम में सेवा का भाव नहीं बदला। यहां आज भी गौमाता को केवल पशु नहीं, बल्कि पूज्यनीय मानकर सेवा की जाती है। *श्रद्धा, त्याग और सेवा पर चल रही है नौलखी की गौशाला* गौशाला के अध्यक्ष श्रीमहंत राम मनोहर दास जी महाराज ने बताया कि समय के साथ गौवंश की संख्या बढ़ी, चुनौतियां भी बढ़ीं, लेकिन सेवा का भाव कभी कम नहीं हुआ। आज भी आश्रम और श्रद्धालुओं के सहयोग से गौवंश के लिए चारा, भूसा, पानी, चिकित्सा और देखभाल की व्यवस्था की जा रही है। यह गौशाला श्रद्धा, त्याग और सेवा पर चल रही है जहाँ चार ग्वाले दिन-रात गौ सेवा में लगे रहते हैं। समिति द्वारा सैकड़ों गौवंश के लिए चारा, भूसा, पानी, चिकित्सा और प्राकृतिक वातावरण की व्यवस्था की जाती है। *गायों को चारदिवारी नहीं खुला वातारण मिलता है* गौशाला का वातावरण भी किसी साधना स्थल जैसा प्रतीत होता है। गायों को रखने के लिए पक्की गौशाला तो बनी है साथ ही उन्हें नियमित रूप से खुले मैदान, शांत परिसर, प्राकृतिक विचरण और नदी आज जब कई स्थानों पर लाखों रुपए की लागत से तैयार हुईं करोडों रुपए की सैकड़ो गौशालाएं केवल योजनाओं और कागजों तक सीमित दिखाई देती हैं, तब नौलखी आश्रम की यह गौशाला व्यवस्था और समाज दोनों के लिए एक मौन संदेश बनकर खड़ी है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि शासन-प्रशासन इस गौशाला की व्यवस्थाओं को समझे और इसे सरकारी योजनाओं से जोड़े, तो यह क्षेत्र की आदर्श गौशाला बन सकती है।
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