कुर्सी-बचाओ सर्कस — जब सुप्रीम कोर्ट की चाबुक से जागी 'अचानक नैतिकता' राजनीति भी कमाल का रंगमंच है! यहाँ जब तक सर्वोच्च अदालत का हंटर हवा में न लहराए, तब तक संविधान के नियम-कायदे केवल 'सुझाव' महसूस होते हैं। लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा कि "भैया, जब न विधानसभा के सदस्य हो, न विधान परिषद के... तो फिर मंत्री पद की मलाई किस हक से खाई जा रही है?"—वैसे ही सत्ता के गलियारों में अचानक 'नैतिकता' का भीषण बवंडर उठ खड़ा हुआ। जब रीचार्ज कूपन की तरह इस्तेमाल हुआ संविधान! नियम तो सीधा है कि बिना चुनाव जीते मंत्री बने तो 6 महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना पड़ेगा। लेकिन दीपक प्रकाश जी के मामले में संविधान के अनुच्छेद 164(4) को शायद 'अनलिमिटेड रीचार्ज कूपन' मान लिया गया था। 15 अप्रैल 2026 को सरकार के साथ उनका मंत्री पद खत्म हुआ। 22 दिनों तक 'बिना कुर्सी' रहने का दर्द सहा और फिर 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी सरकार में दोबारा मंत्री पद की शपथ ले ली—बिना किसी सदन का सदस्य बने! सर्वोच्च अदालत को जब 2001 का 'एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य' वाला ऐतिहासिक फैसला याद दिलाना पड़ा (जिसमें कोर्ट ने साफ कहा था कि 6 महीने की छूट कोई बार-बार इस्तेमाल करने वाला बायपास रास्ता नहीं है), तब जाकर सत्ताधीशों की नींद टूटी। 'अज्ञात कारणों' की रहस्यमयी पटकथा यहाँ सबसे दिलचस्प पहेली यह है कि कुछ ही महीने पहले जब विधान परिषद (MLC) के चुनाव संपन्न हुए थे, तब भाजपा के पास पूरा मौका था। भाजपा चाहती तो अपने प्रिय सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा जी के चिराग को आसानी से विधान परिषद भेजकर संवैधानिक संकट को जन्म लेने से पहले ही दफना सकती थी। लेकिन नहीं! तब शायद कुछ 'अज्ञात कारणों', 'अंतरिक्षीय नक्षत्रों' या 'अंदरूनी गणित' की वजह से ऐसा नहीं किया गया। आराम से इंतजार किया गया कि जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगेगा, तब कोई न कोई नया जुगाड़ बिठाया जाएगा। 'कुर्बानी का बकरा' और गठबंधन का धर्म अब जब सुप्रीम कोर्ट की चाबुक पीठ पर पड़ने ही वाली थी, तो 'कुर्सी बचाओ, गठबंधन चलाओ' योजना के तहत इमरजेंसी प्रोटोकॉल लागू किया गया। आनन-फानन में भाजपा के ही एमएलसी देवेश कुमार जी को बुलाया गया और उनके हाथ में इस्तीफे का कागज थमा दिया गया। देवेश जी भी चुपचाप पिछले दरवाजे से ऐसे निकले मानो कह रहे हों—"सहयोगी के बेटे की मंत्री कुर्सी बच जाए, हमारी विधायकी का क्या है, फिर आ जाएगी!" इसी राजनीतिक तमाशे पर तंज कसते हुए रोहिणी आचार्या ने भी 'X' पर ठीक ही लिखा कि "अदालत की तल्ख टिप्पणी से साख पर बट्टा लगा, तो आनन-फानन में 'कुर्बानी का बकरा' ढूंढ निकाला गया। उपेंद्र कुशवाहा जी के सुपुत्र को मंत्रिमंडल की मलाईदार सीट पर बरकरार रखने के लिए बीजेपी एमएलसी का इस्तीफा लेना 'कुर्सी बचाओ' नीति का नायाब उदाहरण है।" सार यही है: बिहार की राजनीति में कुर्सी बचाने का हुनर हो, तो कानून की बंदिशें भी ताश के पत्तों की तरह फेंट दी जाती हैं। अब देखना यह है कि उपचुनाव में इस 'त्याग' का फल किसे मिलता है!
कुर्सी-बचाओ सर्कस — जब सुप्रीम कोर्ट की चाबुक से जागी 'अचानक नैतिकता' राजनीति भी कमाल का रंगमंच है! यहाँ जब तक सर्वोच्च अदालत का हंटर हवा में न लहराए, तब तक संविधान के नियम-कायदे केवल 'सुझाव' महसूस होते हैं। लेकिन जैसे ही सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा कि "भैया, जब न विधानसभा के सदस्य हो, न विधान परिषद के... तो फिर मंत्री पद की मलाई किस हक से खाई जा रही है?"—वैसे ही सत्ता के गलियारों में अचानक 'नैतिकता' का भीषण बवंडर उठ खड़ा हुआ। जब रीचार्ज कूपन की तरह इस्तेमाल हुआ संविधान! नियम तो सीधा है कि बिना चुनाव जीते मंत्री बने तो 6 महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना पड़ेगा। लेकिन दीपक प्रकाश जी के मामले में संविधान के अनुच्छेद 164(4) को शायद 'अनलिमिटेड रीचार्ज कूपन' मान लिया गया था। 15 अप्रैल 2026 को सरकार के साथ उनका मंत्री पद खत्म हुआ। 22 दिनों तक 'बिना कुर्सी' रहने का दर्द सहा और फिर 7 मई 2026 को सम्राट चौधरी सरकार में दोबारा मंत्री पद की शपथ ले ली—बिना किसी सदन का सदस्य बने! सर्वोच्च अदालत को जब 2001 का 'एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य' वाला ऐतिहासिक फैसला याद दिलाना पड़ा (जिसमें कोर्ट ने साफ कहा था कि 6 महीने की छूट कोई बार-बार इस्तेमाल करने वाला बायपास रास्ता नहीं है), तब जाकर सत्ताधीशों की नींद टूटी। 'अज्ञात कारणों' की रहस्यमयी पटकथा यहाँ सबसे दिलचस्प पहेली यह है कि कुछ ही महीने पहले जब विधान परिषद (MLC) के चुनाव संपन्न हुए थे, तब भाजपा के पास पूरा मौका था। भाजपा चाहती तो अपने प्रिय सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा जी के चिराग को आसानी से विधान परिषद भेजकर संवैधानिक संकट को जन्म लेने से पहले ही दफना सकती थी। लेकिन नहीं! तब शायद कुछ 'अज्ञात कारणों', 'अंतरिक्षीय नक्षत्रों' या 'अंदरूनी गणित' की वजह से ऐसा नहीं किया गया। आराम से इंतजार किया गया कि जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगेगा, तब कोई न कोई नया जुगाड़ बिठाया जाएगा। 'कुर्बानी का बकरा' और गठबंधन का धर्म अब जब सुप्रीम कोर्ट की चाबुक पीठ पर पड़ने ही वाली थी, तो 'कुर्सी बचाओ, गठबंधन चलाओ' योजना के तहत इमरजेंसी प्रोटोकॉल लागू किया गया। आनन-फानन में भाजपा के ही एमएलसी देवेश कुमार जी को बुलाया गया और उनके हाथ में इस्तीफे का कागज थमा दिया गया। देवेश जी भी चुपचाप पिछले दरवाजे से ऐसे निकले मानो कह रहे हों—"सहयोगी के बेटे की मंत्री कुर्सी बच जाए, हमारी विधायकी का क्या है, फिर आ जाएगी!" इसी राजनीतिक तमाशे पर तंज कसते हुए रोहिणी आचार्या ने भी 'X' पर ठीक ही लिखा कि "अदालत की तल्ख टिप्पणी से साख पर बट्टा लगा, तो आनन-फानन में 'कुर्बानी का बकरा' ढूंढ निकाला गया। उपेंद्र कुशवाहा जी के सुपुत्र को मंत्रिमंडल की मलाईदार सीट पर बरकरार रखने के लिए बीजेपी एमएलसी का इस्तीफा लेना 'कुर्सी बचाओ' नीति का नायाब उदाहरण है।" सार यही है: बिहार की राजनीति में कुर्सी बचाने का हुनर हो, तो कानून की बंदिशें भी ताश के पत्तों की तरह फेंट दी जाती हैं। अब देखना यह है कि उपचुनाव में इस 'त्याग' का फल किसे मिलता है!
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