“कानून के रक्षक या खौफ के सौदागर?” फरीदाबाद की एक रात जिसने न्याय व्यवस्था को हिला दिया. लेखक krishan lal Gera एडवाइजर mcf editor in chief Tez Tarrar News फरीदाबाद—औद्योगिक शहर, तेज़ी से बढ़ती आबादी, और कानून व्यवस्था को लेकर हमेशा सवालों में रहने वाला नाम। लेकिन सेक्टर-3 पुलिया पर हुई एक घटना ने पूरे शहर को हिला दिया। आरोप सीधे क्राइम ब्रांच पर लगे—दुर्व्यवहार, मारपीट और कानून से ऊपर होने का घमंड। यह सिर्फ एक सड़क की घटना नहीं थी। यह उस सिस्टम का आईना बन गई, जिसमें कानून लागू करने वाले और कानून के रखवालों के बीच ही टकराव हो गया। फरीदाबाद की सर्द शाम थी। दिसंबर की हवा में ठंड कम और बेचैनी ज्यादा थी। शहर की सड़कों पर रोज़ की तरह गाड़ियाँ दौड़ रही थीं, लेकिन उस दिन सेक्टर-3 की पुलिया के पास कुछ ऐसा होने वाला था जो आने वाले कई दिनों तक अदालत, पुलिस और जनता—तीनों को आमने-सामने खड़ा कर देगा। तुषार मलिक अपनी सफेद ब्रेजा कार चला रहा था। उम्र मुश्किल से 26 साल। आंखों में सपने और दिल में पिता की तरह कानून की सेवा करने का जुनून। उसके पिता टीका राम मलिक जिला बार एसोसिएशन के महासचिव थे—एक ऐसा नाम, जिसे अदालत में सम्मान से लिया जाता था। तुषार अपने दोस्त को छोड़कर घर लौट रहा था। घड़ी में शाम के करीब साढ़े सात बजे थे। सड़क पर पुलिस की हल्की-हल्की चेकिंग चल रही थी। उसे लगा—“रूटीन चेकिंग होगी, निकल जाऊँगा।” लेकिन उस दिन की चेकिंग रूटीन नहीं थी। 🚨 अचानक रुकी जिंदगी जैसे ही तुषार की कार सेक्टर-3 पुलिया के पास पहुँची, सादे कपड़ों में खड़े कुछ लोगों ने हाथ देकर कार रोकने का इशारा किया। “रुको… गाड़ी साइड में लगाओ!” तुषार ने ब्रेक लगाया। उसने सोचा—शायद दस्तावेज़ चेक होंगे। एक व्यक्ति तेजी से कार के पास आया और खिड़की पर जोर से थपथपाया। “दरवाज़ा खोलो!” तुषार घबरा गया। उसने पूछा—“क्या बात है सर?” जवाब में गुस्से से भरी आवाज़ आई— “बहुत सवाल करता है? बाहर निकल!” तुषार ने दरवाज़ा खोला। तभी दो लोग उसे पकड़कर बाहर खींचने लगे। “मैं वकील का बेटा हूँ… आप लोग कौन हैं?” — तुषार ने घबराकर कहा। लेकिन जवाब में उसे धक्का मिला। 💥 टूटता शीशा… टूटता भरोसा तभी एक डंडा जोर से कार के आगे वाले शीशे पर पड़ा। धड़ाम!!! शीशा चकनाचूर हो गया। तुषार की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। “सर, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?” — उसकी आवाज कांप रही थी। लेकिन वहां खड़े लोगों की आंखों में कोई कानून नहीं था… सिर्फ गुस्सा था। एक ने कॉलर पकड़ लिया— “भाग क्यों रहा था? अपराधी है क्या?” “मैं भाग नहीं रहा था… आप अचानक…” थप्पड़!!! उसकी बात पूरी होने से पहले चेहरा झनझना उठा। 🩸 एक शहर की चुप्पी सड़क पर लोग खड़े थे। कुछ मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। कुछ डर के मारे दूर हट गए। लेकिन कोई आगे नहीं आया। क्योंकि सब जानते थे—यह मामला आम लोगों का नहीं था… यह वर्दी और सत्ता का मामला था। किसी ने धीरे से कहा— “क्राइम ब्रांच है… उलझना मत…” और यही शब्द उस रात का सबसे डरावना सच बन गए। 🏃 मौत से भागती कार तुषार ने मौका देखकर खुद को छुड़ाया और कार में बैठ गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। हाथ कांप रहे थे। उसने एक्सीलेटर दबाया। कार आगे बढ़ गई। पीछे से आवाजें आईं— “भाग गया… पकड़ो!” कुछ दूरी पर जाकर उसने कार रोकी। हाथ खून से सने थे। उसने तुरंत अपने पिता को फोन लगाया। “पापा… मुझे मार दिया… क्राइम ब्रांच…” फोन के उस पार कुछ सेकंड की खामोशी थी। फिर भारी आवाज आई— “तू वहीं रुक… मैं आ रहा हूँ।” ⚖️ अदालत में तूफान अगली सुबह जिला अदालत का माहौल अलग था। काले कोट पहने सैकड़ों वकील एक साथ खड़े थे। गुस्सा… आक्रोश… और अपमान की आग। “जब वकील का बेटा सुरक्षित नहीं… तो आम आदमी कैसे सुरक्षित होगा?” नारे गूंज उठे। “पुलिस की गुंडागर्दी बंद करो!” अदालत का कामकाज ठप हो गया। हड़ताल की घोषणा कर दी गई। 🔥 शहर दो हिस्सों में बंट गया एक तरफ वकील थे— “यह सत्ता का दुरुपयोग है!” दूसरी तरफ पुलिस— “हम अपराधियों पर कार्रवाई कर रहे थे।” पुलिस का बयान आया— अभियान चल रहा था संदिग्ध कार को रोकने की कोशिश की गई चालक भागने लगा टीम पर कार चढ़ाने की कोशिश की लेकिन सवाल वही रहा— “अगर गलती थी… तो कानून के दायरे में कार्रवाई क्यों नहीं हुई?” 😔 पिता की आंखों का दर्द टीका राम मलिक अपने बेटे को देख रहे थे। चेहरे पर सूजन। हाथों पर पट्टी। आंखों में डर। उन्होंने धीरे से कहा— “मैंने पूरी जिंदगी कानून की रक्षा की… और आज मेरा बेटा कानून से डर रहा है…” तुषार की आंखों से आंसू निकल पड़े। “पापा… अगर मैं मर जाता तो?” उस सवाल का कोई जवाब नहीं था। 🌑 शहर की सड़कों पर खौफ उस घटना के बाद फरीदाबाद बदल गया। लोग रात में बाहर निकलने से डरने लगे। हर चेकिंग देखकर दिल धड़कने लगता। “कहीं कुछ गलत न हो जाए…” कानून के रक्षक अब लोगों के लिए डर का कारण बन गए थे। ⚡ सच्चाई की जंग बार एसोसिएशन ने जांच की मांग की। सीसीटीवी फुटेज की बात उठी। जनता ने सोशल मीडिया पर आवाज उठाई। लेकिन सिस्टम की दीवारें मजबूत थीं। फिर भी एक उम्मीद थी— कि शायद इस बार सच दबेगा नहीं। 🕯️ अंत — जो सवाल छोड़ गया उस रात सिर्फ एक कार का शीशा नहीं टूटा था… टूटा था लोगों का भरोसा। टूटा था न्याय पर विश्वास। और सबसे ज्यादा— टूटी थी उस बेटे की मासूमियत, जो कानून की दुनिया में कदम रखना चाहता था। फरीदाबाद आज भी उस रात को याद करता है। और हर मां अपने बेटे से कहती है— “बेटा… रात को जल्दी घर आ जाना…” क्योंकि अब डर अपराधियों से नहीं… डर उस सिस्टम से है जो कभी-कभी खुद अपराध जैसा लगने लगता है।
“कानून के रक्षक या खौफ के सौदागर?” फरीदाबाद की एक रात जिसने न्याय व्यवस्था को हिला दिया. लेखक krishan lal Gera एडवाइजर mcf editor in chief Tez Tarrar News फरीदाबाद—औद्योगिक शहर, तेज़ी से बढ़ती आबादी, और कानून व्यवस्था को लेकर हमेशा सवालों में रहने वाला नाम। लेकिन सेक्टर-3 पुलिया पर हुई एक घटना ने पूरे शहर को हिला दिया। आरोप सीधे क्राइम ब्रांच पर लगे—दुर्व्यवहार, मारपीट और कानून से ऊपर होने का घमंड। यह सिर्फ एक सड़क की घटना नहीं थी। यह उस सिस्टम का आईना बन गई, जिसमें कानून लागू करने वाले और कानून के रखवालों के बीच ही टकराव हो गया। फरीदाबाद की सर्द शाम थी। दिसंबर की हवा में ठंड कम और बेचैनी ज्यादा थी। शहर की सड़कों पर रोज़ की तरह गाड़ियाँ दौड़ रही थीं, लेकिन उस दिन सेक्टर-3 की पुलिया के पास कुछ ऐसा होने वाला था जो आने वाले कई दिनों तक अदालत, पुलिस और जनता—तीनों को आमने-सामने खड़ा कर देगा। तुषार मलिक अपनी सफेद ब्रेजा कार चला रहा था। उम्र मुश्किल से 26 साल। आंखों में सपने और दिल में पिता की तरह कानून की सेवा करने का जुनून। उसके पिता टीका राम मलिक जिला बार एसोसिएशन के महासचिव थे—एक ऐसा नाम, जिसे अदालत में सम्मान से लिया जाता था। तुषार अपने दोस्त को छोड़कर घर लौट रहा था। घड़ी में शाम के करीब साढ़े सात बजे थे। सड़क पर पुलिस की हल्की-हल्की चेकिंग चल रही थी। उसे लगा—“रूटीन चेकिंग होगी, निकल जाऊँगा।” लेकिन उस दिन की चेकिंग रूटीन नहीं थी। 🚨 अचानक रुकी जिंदगी जैसे ही तुषार की कार सेक्टर-3 पुलिया के पास पहुँची, सादे कपड़ों में खड़े कुछ लोगों ने हाथ देकर कार रोकने का इशारा किया। “रुको… गाड़ी साइड में लगाओ!” तुषार ने ब्रेक लगाया। उसने सोचा—शायद दस्तावेज़ चेक होंगे। एक व्यक्ति तेजी से कार के पास आया और खिड़की पर जोर से थपथपाया। “दरवाज़ा खोलो!” तुषार घबरा गया। उसने पूछा—“क्या बात है सर?” जवाब में गुस्से से भरी आवाज़ आई— “बहुत सवाल करता है? बाहर निकल!” तुषार ने दरवाज़ा खोला। तभी दो लोग उसे पकड़कर बाहर खींचने लगे। “मैं वकील का बेटा हूँ… आप लोग कौन हैं?” — तुषार ने घबराकर कहा। लेकिन जवाब में उसे धक्का मिला। 💥 टूटता शीशा… टूटता भरोसा तभी एक डंडा जोर से कार के आगे वाले शीशे पर पड़ा। धड़ाम!!! शीशा चकनाचूर हो गया। तुषार की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। “सर, आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?” — उसकी आवाज कांप रही थी। लेकिन वहां खड़े लोगों की आंखों में कोई कानून नहीं था… सिर्फ गुस्सा था। एक ने कॉलर पकड़ लिया— “भाग क्यों रहा था? अपराधी है क्या?” “मैं भाग नहीं रहा था… आप अचानक…” थप्पड़!!! उसकी बात पूरी होने से पहले चेहरा झनझना उठा। 🩸 एक शहर की चुप्पी सड़क पर लोग खड़े थे। कुछ मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। कुछ डर के मारे दूर हट गए। लेकिन कोई आगे नहीं आया। क्योंकि सब जानते थे—यह मामला आम लोगों का नहीं था… यह वर्दी और सत्ता का मामला था। किसी ने धीरे से कहा— “क्राइम ब्रांच है… उलझना मत…” और यही शब्द उस रात का सबसे डरावना सच बन गए। 🏃 मौत से भागती कार तुषार ने मौका देखकर खुद को छुड़ाया और कार में बैठ गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। हाथ कांप रहे थे। उसने एक्सीलेटर दबाया। कार आगे बढ़ गई। पीछे से आवाजें आईं— “भाग गया… पकड़ो!” कुछ दूरी पर जाकर उसने कार रोकी। हाथ खून से सने थे। उसने तुरंत अपने पिता को फोन लगाया। “पापा… मुझे मार दिया… क्राइम ब्रांच…” फोन के उस पार कुछ सेकंड की खामोशी थी। फिर भारी आवाज आई— “तू वहीं रुक… मैं आ रहा हूँ।” ⚖️ अदालत में तूफान अगली सुबह जिला अदालत का माहौल अलग था। काले कोट पहने सैकड़ों वकील एक साथ खड़े थे। गुस्सा… आक्रोश… और अपमान की आग। “जब वकील का बेटा सुरक्षित नहीं… तो आम आदमी कैसे सुरक्षित होगा?” नारे गूंज उठे। “पुलिस की गुंडागर्दी बंद करो!” अदालत का कामकाज ठप हो गया। हड़ताल की घोषणा कर दी गई। 🔥 शहर दो हिस्सों में बंट गया एक तरफ वकील थे— “यह सत्ता का दुरुपयोग है!” दूसरी तरफ पुलिस— “हम अपराधियों पर कार्रवाई कर रहे थे।” पुलिस का बयान आया— अभियान चल रहा था संदिग्ध कार को रोकने की कोशिश की गई चालक भागने लगा टीम पर कार चढ़ाने की कोशिश की लेकिन सवाल वही रहा— “अगर गलती थी… तो कानून के दायरे में कार्रवाई क्यों नहीं हुई?” 😔 पिता की आंखों का दर्द टीका राम मलिक अपने बेटे को देख रहे थे। चेहरे पर सूजन। हाथों पर पट्टी। आंखों में डर। उन्होंने धीरे से कहा— “मैंने पूरी जिंदगी कानून की रक्षा की… और आज मेरा बेटा कानून से डर रहा है…” तुषार की आंखों से आंसू निकल पड़े। “पापा… अगर मैं मर जाता तो?” उस सवाल का कोई जवाब नहीं था। 🌑 शहर की सड़कों पर खौफ उस घटना के बाद फरीदाबाद बदल गया। लोग रात में बाहर निकलने से डरने लगे। हर चेकिंग देखकर दिल धड़कने लगता। “कहीं कुछ गलत न हो जाए…” कानून के रक्षक अब लोगों के लिए डर का कारण बन गए थे। ⚡ सच्चाई की जंग बार एसोसिएशन ने जांच की मांग की। सीसीटीवी फुटेज की बात उठी। जनता ने सोशल मीडिया पर आवाज उठाई। लेकिन सिस्टम की दीवारें मजबूत थीं। फिर भी एक उम्मीद थी— कि शायद इस बार सच दबेगा नहीं। 🕯️ अंत — जो सवाल छोड़ गया उस रात सिर्फ एक कार का शीशा नहीं टूटा था… टूटा था लोगों का भरोसा। टूटा था न्याय पर विश्वास। और सबसे ज्यादा— टूटी थी उस बेटे की मासूमियत, जो कानून की दुनिया में कदम रखना चाहता था। फरीदाबाद आज भी उस रात को याद करता है। और हर मां अपने बेटे से कहती है— “बेटा… रात को जल्दी घर आ जाना…” क्योंकि अब डर अपराधियों से नहीं… डर उस सिस्टम से है जो कभी-कभी खुद अपराध जैसा लगने लगता है।
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- बुखार और पेट दर्द... जिस गांव में 20 दिन में गई 15 लोगों की जान, वहां दिखा एक जैसा पैटर्न हरियाणा के पलवल जिले के छांयसा गांव में जनवरी से फरवरी के बीच कई मौतों से गांव में डर का माहौल है. मौत से पहले ज्यादातर लोगों में पेट दर्द, बुखार, उल्टी और लीवर खराब होने जैसे लक्षण सामने आए. कई मरीजों को नल्लड़ मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया. हरियाणा के पलवल जिले के गांव छांयसा में लगातार हो रही मौतों ने पूरे इलाके में चिंता बढ़ा दी है. जनवरी के आखिरी सप्ताह से फरवरी के दूसरे सप्ताह तक गांव में कई लोगों की मौत हुई.1
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- Post by Satish Kumar1
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