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सुखमय और शांत जीवन के लिए घर-परिवार और संसार के झंझटों से ऊपर उठना आवश्यक -- मुनिश्री विश्वसूर्य सागर मुनिराज श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर विराजमान मुनिश्री विश्वसूर्य सागर मुनिराज ने श्रद्धालुओं को आशीष वचन देते हुए कहा आत्म कल्याण, आत्मशांति और सद्बुद्धि के मार्ग का गूढ़ विवेचन किया। हे प्रभु, अल्पज्ञानियों को ज्ञान का दान प्राप्त हो, प्रत्येक आत्मा को सदबुद्धि मिले और सभी जीवों पर प्रभु की कृपा दृष्टि बनी रहे, यही सच्ची साधना और कामना है। पूर्व भव में अर्जित पुण्य ही इस भव में मानव जीवन को दिशा देते हैं। सुखमय और शांत जीवन के लिए घर-परिवार और संसार के झंझटों से ऊपर उठना आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं झंझटों के कारण मनुष्य अशांति और पीड़ा का अनुभव करता है। जब व्यक्ति दूसरों को शांति देने का भाव बनाता है, तब उसे स्वतः ही आत्मशांति की अनुभूति होने लगती है। आज विश्व शांति की बातें तो बहुत की जाती हैं, लेकिन चारों ओर अशांति ही दिखाई देती है। प्रत्येक व्यक्ति शांति चाहता है, किंतु शांति प्राप्त करने के लिए आत्मचिंतन और साधना की गहराई में जाना पड़ता है। आत्मशांति ऊपर या बाहर नहीं है, वह आपके भीतर है, किंतु वहां तक हमारी दृष्टि नहीं पहुंच पा रही है। जिससे सुख और शांति प्राप्त हो सकती है, उसी से आप दूर होते जा रहे हैं।मुनिराज ने दृष्टांत देते हुए कहा जैसे दूध को मथने से मक्खन प्राप्त होता है, पानी को मथने से नहीं, उसी प्रकार आत्मशांति भी केवल आत्मस्वभाव में पुरुषार्थ करने से ही प्राप्त होती है। इंद्रिय सुख क्षणिक होते हैं, उनमें जरा-सा दुख आने पर व्यक्ति व्याकुल हो उठता है। शांति सभी जीवों को सहज रूप से प्राप्त नहीं होती, क्योंकि व्यक्ति अपने स्वभाव में नहीं, बल्कि विभाव और मोह में उलझा रहता है। समस्त प्राणी जगत के प्रति मैत्री, समता और करुणा का भाव रखें। मोह, राग और कषाय में फंसे रहने से आत्मकल्याण संभव नहीं है। जब मोह का क्षय होता है, तभी आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। विवेकवान व्यक्ति कभी भी गलत कार्यों में प्रवृत्त नहीं होता। मन में ग्लानि और आत्ममंथन से ही श्रेष्ठ भावों का उदय होता है और सत्कर्म की प्रेरणा मिलती है। मुनिश्री विश्वसूर्य सागर मुनिराज ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया प्रातःकाल की बेला में मंगल भावना भाएं और जब भी मंदिर जाएं, तो प्रभु के चरणों में समर्पण भाव लेकर जाएं। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश आज मंदिरों में भी प्रभु आराधना से अधिक सांसारिक चर्चाएं होती हैं, जो साधना के मार्ग में बाधक हैं। अंत में मुनिराज ने कहा कि हे ज्ञानियों, सुख की गंगा तुम्हारे भीतर प्रवाहित हो रही है, लेकिन तुम उसे बाहर खोज रहे हो। यदि मनुष्य अपनी दृष्टि अंतर्मुखी कर ले, तो उसे सच्चा सुख, शांति और आत्मकल्याण स्वतः प्राप्त हो सकता है। महामंगलकारी मंत्र ध्यान आज 11 जनवरी रविवार को दोपहर 2 बजे श्री किला मंदिर पर पूज्य गुरूवर द्वय के पावन सानिध्य व निर्देशन में श्री ऋषभदेव भगवान के दिव्य जिनालय में महामंगलकारी सकारात्मक ऊर्जा देने वाले महामंत्रों के साथ लाभ, अमृत योग में जाप्य -अनुष्ठान आयोजित किया है। साधर्मी जन एक घी का दीपक व जाप माला स्वयं साथ लेकर आयें।

1 day ago
user_Rajendra Gangwal
Rajendra Gangwal
Ashta, Sehore•
1 day ago
966df93c-ee35-42ce-af46-61d1cad32f06

सुखमय और शांत जीवन के लिए घर-परिवार और संसार के झंझटों से ऊपर उठना आवश्यक -- मुनिश्री विश्वसूर्य सागर मुनिराज श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन दिव्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र किला मंदिर पर विराजमान मुनिश्री विश्वसूर्य सागर मुनिराज ने श्रद्धालुओं को आशीष वचन देते हुए कहा आत्म कल्याण, आत्मशांति और सद्बुद्धि के मार्ग का गूढ़ विवेचन किया। हे प्रभु, अल्पज्ञानियों को ज्ञान का दान प्राप्त हो, प्रत्येक आत्मा को सदबुद्धि मिले और सभी जीवों पर प्रभु की कृपा दृष्टि बनी रहे, यही सच्ची साधना और कामना है। पूर्व भव में अर्जित पुण्य ही इस भव में मानव जीवन को दिशा देते हैं। सुखमय और शांत जीवन के लिए घर-परिवार और संसार के झंझटों से ऊपर उठना आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं झंझटों के कारण मनुष्य अशांति और पीड़ा का अनुभव करता है। जब व्यक्ति दूसरों को शांति देने का भाव बनाता है, तब उसे स्वतः ही आत्मशांति की अनुभूति होने लगती है। आज विश्व शांति की बातें तो बहुत की जाती हैं, लेकिन चारों ओर अशांति ही दिखाई देती है। प्रत्येक व्यक्ति शांति चाहता है, किंतु शांति प्राप्त करने के लिए आत्मचिंतन और साधना की गहराई में जाना पड़ता है। आत्मशांति ऊपर या बाहर नहीं है, वह आपके भीतर है, किंतु वहां तक हमारी दृष्टि नहीं पहुंच पा रही है। जिससे सुख और शांति प्राप्त हो सकती है, उसी से आप दूर होते जा रहे हैं।मुनिराज ने दृष्टांत देते हुए कहा जैसे दूध को मथने से मक्खन प्राप्त होता है, पानी को मथने से नहीं, उसी प्रकार आत्मशांति भी केवल आत्मस्वभाव में पुरुषार्थ करने से ही प्राप्त होती है। इंद्रिय सुख क्षणिक होते हैं, उनमें जरा-सा दुख आने पर व्यक्ति व्याकुल हो उठता है। शांति सभी जीवों को सहज रूप से प्राप्त नहीं होती, क्योंकि व्यक्ति अपने स्वभाव में नहीं, बल्कि विभाव और मोह में उलझा रहता है। समस्त प्राणी जगत के प्रति मैत्री, समता और करुणा का भाव रखें। मोह, राग और कषाय में फंसे रहने से आत्मकल्याण संभव नहीं है। जब मोह का क्षय होता है, तभी आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। विवेकवान व्यक्ति कभी भी गलत कार्यों में प्रवृत्त नहीं होता। मन में ग्लानि और आत्ममंथन से ही श्रेष्ठ भावों का उदय होता है और सत्कर्म की प्रेरणा मिलती है। मुनिश्री विश्वसूर्य सागर मुनिराज ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया प्रातःकाल की बेला में मंगल भावना भाएं और जब भी मंदिर जाएं, तो प्रभु के चरणों में समर्पण भाव लेकर जाएं। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश आज मंदिरों में भी प्रभु आराधना से अधिक सांसारिक चर्चाएं होती हैं, जो साधना के मार्ग में बाधक हैं। अंत में मुनिराज ने कहा कि हे ज्ञानियों, सुख की गंगा तुम्हारे भीतर प्रवाहित हो रही है, लेकिन तुम उसे बाहर खोज रहे हो। यदि मनुष्य अपनी दृष्टि अंतर्मुखी कर ले, तो उसे सच्चा सुख, शांति और आत्मकल्याण स्वतः प्राप्त हो सकता है। महामंगलकारी मंत्र ध्यान आज 11 जनवरी रविवार को दोपहर 2 बजे श्री किला मंदिर पर पूज्य गुरूवर द्वय के पावन सानिध्य व निर्देशन में श्री ऋषभदेव भगवान के दिव्य जिनालय में महामंगलकारी सकारात्मक ऊर्जा देने वाले महामंत्रों के साथ लाभ, अमृत योग में जाप्य -अनुष्ठान आयोजित किया है। साधर्मी जन एक घी का दीपक व जाप माला स्वयं साथ लेकर आयें।

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    Pradeep sharma
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