उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में क्रांतिभूमि महुआ डाबर में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय "महुआ डाबर महोत्सव-2026" का आयोजन 8, 9 और 10 जून 2026 को किया जाएगा। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित इस महोत्सव की थीम "शौर्य, शहादत और विरासत" निर्धारित की गई है, जिसका उद्घाटन प्रसिद्ध लेखक प्रणव मुखर्जी करेंगे। बस्ती के बहादुरपुर विकासखंड में मनोरमा नदी के तट पर स्थित महुआ डाबर, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। यह स्थल 1857 की क्रांति के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध हुए अभूतपूर्व जनप्रतिरोध और भीषण नरसंहार का साक्षी रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से पहले, महुआ डाबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कपड़ा व्यापार और पीतल उद्योग का एक प्रमुख केंद्र था, जहां मनोरमा नदी के माध्यम से व्यापक व्यापार संचालित होता था। यह क्षेत्र अपने समृद्ध बाजारों, दो मंजिला पक्के मकानों और शिक्षित समाज के कारण एक विकसित एवं आत्मनिर्भर कस्बे के रूप में प्रसिद्ध था। 10 जून 1857 को महुआ डाबर के क्रांतिकारियों ने फैजाबाद से बिहार के दानापुर जा रहे ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों के एक दल को चुनौती दी। क्रांतिकारी जफर अली और उनके साथियों ने नदी पार कर रहे लेफ्टिनेंट लिण्डसे और लेफ्टिनेंट थॉमस सहित छह ब्रिटिश अधिकारियों को घेरकर मार डाला, जबकि सार्जेंट बुशर किसी तरह जान बचाकर भाग निकला, जिसे बाद में बाबू बल्ली सिंह ने दस दिनों तक बंदी बनाकर रखा। इस घटना से क्रुद्ध होकर ब्रिटिश शासन ने 3 जुलाई 1857 को घुड़सवार सेना के साथ महुआ डाबर को चारों ओर से घेर लिया। अंग्रेजी सैनिकों ने अंधाधुंध गोलीबारी कर लगभग पांच हजार निर्दोष ग्रामीणों, कारीगरों और नागरिकों की हत्या कर दी और पूरे कस्बे को आग के हवाले कर दिया, जिससे घर, दुकानें, खेत और फसलें नष्ट हो गईं। इतिहास के इस अध्याय को दबाने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने महुआ डाबर का नाम सरकारी अभिलेखों और नक्शों से मिटा दिया। इसके स्थान पर एक नए गांव को महुआ डाबर नाम दिया गया, जबकि मूल स्थल को राजस्व अभिलेखों में "गैर-चिरागी" घोषित कर दिया गया। महुआ डाबर संग्रहालय, जो वर्ष 1999 में स्थापित हुआ, इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने का कार्य कर रहा है। इसके विकास में महानिदेशक एवं क्रांतिकारी वंशज डॉ. शाह आलम राना का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। संग्रहालय में दुर्लभ दस्तावेज, हथियार, सिक्के और पुरातात्विक अवशेष संरक्षित हैं, जो इस भूले-बिसरे नरसंहार की ऐतिहासिक सच्चाई को सामने लाते हैं। वर्ष 2010 में लखनऊ विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग द्वारा प्रोफेसर अनिल कुमार के निर्देशन में यहां पुरातात्विक उत्खनन कराया गया, जिसमें प्राचीन कुएं, लखौरी ईंटों की दीवारें, जली हुई लकड़ियां, सिक्के, ढाल, भाले और पुराने भवनों के अवशेष मिले, जिन्होंने इस ऐतिहासिक घटना के प्रमाणों को पुष्ट किया। डॉ. राना के सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप महुआ डाबर को उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति-2022 के "स्वतंत्रता संग्राम सर्किट" में शामिल किया गया है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में एक भव्य एवं जीवंत स्मारक विकसित करने की प्रक्रिया जारी है। प्रत्येक वर्ष यहां शहीदों को शस्त्र सलामी देकर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। महोत्सव का कार्यक्रम विवरण इस प्रकार है: प्रथम दिवस (8 जून 2026, सोमवार) को क्रांतिवीरों को श्रद्धांजलि, स्वास्थ्य परीक्षण एवं निःशुल्क दवा वितरण शिविर, स्थानीय विद्यालयों के विद्यार्थियों द्वारा देशभक्ति सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, महुआ डाबर के इतिहास पर परिचर्चा, विरासत यात्रा और स्वतंत्रता संग्राम आधारित फिल्म एवं वृत्तचित्र प्रदर्शन होंगे। द्वितीय दिवस (9 जून 2026, मंगलवार) पर स्वतंत्रता संग्राम साहित्य सम्मेलन, इतिहासकारों, शोधार्थियों एवं लेखकों का संवाद, ओपन माइक (कविता, गीत, वक्तृत्व एवं लोककला), युवाओं हेतु करियर काउंसलिंग सत्र, मशाल सलामी और शहीदों की झांकी एवं नाट्य मंचन का आयोजन होगा। तृतीय दिवस (10 जून 2026, बुधवार) जो शहादत दिवस है, सशस्त्र पुलिस गारद द्वारा शस्त्र सलामी, महुआ डाबर संग्रहालय भ्रमण, विरासत संरक्षण संकल्प सभा, उत्कृष्ट प्रतिभाओं एवं सहयोगियों का सम्मान, सांस्कृतिक संध्या एवं लोक कलाकारों की प्रस्तुति तथा राष्ट्रगान एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ महोत्सव का समापन होगा। यह महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि उन हजारों गुमनाम शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह नई पीढ़ी को अपने इतिहास, विरासत और बलिदान की गौरवशाली परंपरा से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा। इस अवसर पर प्रचार-प्रसार अभियान से जुड़े अतुल कुमार सिंह, नासिर खान, सुनील पंडित और आदिल खान आदि ने महोत्सव की तैयारियों की समीक्षा की।
उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में क्रांतिभूमि महुआ डाबर में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय "महुआ डाबर महोत्सव-2026" का आयोजन 8, 9 और 10 जून 2026 को किया जाएगा। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित इस महोत्सव की थीम "शौर्य, शहादत और विरासत" निर्धारित की गई है, जिसका उद्घाटन प्रसिद्ध लेखक प्रणव मुखर्जी करेंगे। बस्ती के बहादुरपुर विकासखंड में मनोरमा नदी के तट पर स्थित महुआ डाबर, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। यह स्थल 1857 की क्रांति के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध हुए अभूतपूर्व जनप्रतिरोध और भीषण नरसंहार का साक्षी रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से पहले, महुआ डाबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कपड़ा व्यापार और पीतल उद्योग का एक प्रमुख केंद्र था, जहां मनोरमा नदी के माध्यम से व्यापक व्यापार संचालित होता था। यह क्षेत्र अपने समृद्ध बाजारों, दो मंजिला पक्के मकानों और शिक्षित समाज के कारण एक विकसित एवं आत्मनिर्भर कस्बे के रूप में प्रसिद्ध था। 10 जून 1857 को महुआ डाबर के क्रांतिकारियों ने फैजाबाद से बिहार के दानापुर जा रहे ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों के एक दल को चुनौती दी। क्रांतिकारी जफर अली और उनके साथियों ने नदी पार कर रहे लेफ्टिनेंट लिण्डसे और लेफ्टिनेंट थॉमस सहित छह ब्रिटिश अधिकारियों को घेरकर मार डाला, जबकि सार्जेंट बुशर किसी तरह जान बचाकर भाग निकला, जिसे बाद में बाबू बल्ली सिंह ने दस दिनों तक बंदी बनाकर रखा। इस घटना से क्रुद्ध होकर ब्रिटिश शासन ने 3 जुलाई 1857 को घुड़सवार सेना के साथ महुआ डाबर को चारों ओर से घेर लिया। अंग्रेजी सैनिकों ने अंधाधुंध गोलीबारी कर लगभग पांच हजार निर्दोष ग्रामीणों, कारीगरों और नागरिकों की हत्या कर दी और पूरे कस्बे को आग के हवाले कर दिया, जिससे घर, दुकानें, खेत और फसलें नष्ट हो गईं। इतिहास के इस अध्याय को दबाने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने महुआ डाबर का नाम सरकारी अभिलेखों और नक्शों से मिटा दिया। इसके स्थान पर एक नए गांव को महुआ डाबर नाम दिया गया, जबकि मूल स्थल को राजस्व अभिलेखों में "गैर-चिरागी" घोषित कर दिया गया। महुआ डाबर संग्रहालय, जो वर्ष 1999 में स्थापित हुआ, इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने का कार्य कर रहा है। इसके विकास में महानिदेशक एवं क्रांतिकारी वंशज डॉ. शाह आलम राना का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। संग्रहालय में दुर्लभ दस्तावेज, हथियार, सिक्के और पुरातात्विक अवशेष संरक्षित हैं, जो इस भूले-बिसरे नरसंहार की ऐतिहासिक सच्चाई को सामने लाते हैं। वर्ष 2010 में लखनऊ विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग द्वारा प्रोफेसर अनिल कुमार के निर्देशन में यहां पुरातात्विक उत्खनन कराया गया, जिसमें प्राचीन कुएं, लखौरी ईंटों की दीवारें, जली हुई लकड़ियां, सिक्के, ढाल, भाले और पुराने भवनों के अवशेष मिले, जिन्होंने इस ऐतिहासिक घटना के प्रमाणों को पुष्ट किया। डॉ. राना के सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप महुआ डाबर को उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति-2022 के "स्वतंत्रता संग्राम सर्किट" में शामिल किया गया है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में एक भव्य एवं जीवंत स्मारक विकसित करने की प्रक्रिया जारी है। प्रत्येक वर्ष यहां शहीदों को शस्त्र सलामी देकर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। महोत्सव का कार्यक्रम विवरण इस प्रकार है: प्रथम दिवस (8 जून 2026, सोमवार) को क्रांतिवीरों को श्रद्धांजलि, स्वास्थ्य परीक्षण एवं निःशुल्क दवा वितरण शिविर, स्थानीय विद्यालयों के विद्यार्थियों द्वारा देशभक्ति सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, महुआ डाबर के इतिहास पर परिचर्चा, विरासत यात्रा और स्वतंत्रता संग्राम आधारित फिल्म एवं वृत्तचित्र प्रदर्शन होंगे। द्वितीय दिवस (9 जून 2026, मंगलवार) पर स्वतंत्रता संग्राम साहित्य सम्मेलन, इतिहासकारों, शोधार्थियों एवं लेखकों का संवाद, ओपन माइक (कविता, गीत, वक्तृत्व एवं लोककला), युवाओं हेतु करियर काउंसलिंग सत्र, मशाल सलामी और शहीदों की झांकी एवं नाट्य मंचन का आयोजन होगा। तृतीय दिवस (10 जून 2026, बुधवार) जो शहादत दिवस है, सशस्त्र पुलिस गारद द्वारा शस्त्र सलामी, महुआ डाबर संग्रहालय भ्रमण, विरासत संरक्षण संकल्प सभा, उत्कृष्ट प्रतिभाओं एवं सहयोगियों का सम्मान, सांस्कृतिक संध्या एवं लोक कलाकारों की प्रस्तुति तथा राष्ट्रगान एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ महोत्सव का समापन होगा। यह महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि उन हजारों गुमनाम शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह नई पीढ़ी को अपने इतिहास, विरासत और बलिदान की गौरवशाली परंपरा से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा। इस अवसर पर प्रचार-प्रसार अभियान से जुड़े अतुल कुमार सिंह, नासिर खान, सुनील पंडित और आदिल खान आदि ने महोत्सव की तैयारियों की समीक्षा की।
- सरकारी स्कूलों की शिक्षा के क्षेत्र में पंजाब ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। जो राज्य कभी इस मामले में 27वें स्थान पर था, वह अब पहले स्थान पर पहुँच गया है, जिसने केरल जैसे राज्यों को भी पीछे छोड़ दिया है। यह महत्वपूर्ण बदलाव दिल्ली में हुई शिक्षा क्रांति के बाद पंजाब के सरकारी स्कूलों में भी देखे जा रहे हैं।1
- राजधानी दिल्ली में गैंगस्टरों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के तहत बाहरी उत्तरी जिला पुलिस को एक बड़ी सफलता मिली है। बवाना थाना पुलिस ने कुख्यात हिमांशु भाऊ गैंग से जुड़े दो शार्प शूटरों को गिरफ्तार किया है, जबकि एक नाबालिग को भी हिरासत में लिया गया है। पुलिस का दावा है कि इस कार्रवाई से एक बड़ी गैंगवार और हत्या की वारदात को होने से पहले ही रोक दिया गया। पुलिस के अनुसार, बवाना थाना पुलिस की पेट्रोलिंग टीम ने गश्त के दौरान कुछ संदिग्ध गतिविधियां देखीं, जिसके बाद उन्होंने आरोपियों को दबोच लिया। तलाशी के दौरान उनके कब्जे से दो पिस्तौल और 27 जिंदा कारतूस बरामद हुए। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान झज्जर निवासी अजय और पूठ खुर्द निवासी कन्हैया के रूप में हुई है। पूछताछ में खुलासा हुआ कि दोनों किसी व्यक्ति की हत्या करने के इरादे से इलाके में घूम रहे थे और वारदात को अंजाम देने के बाद उनकी योजना जयपुर के रास्ते नेपाल फरार होने की थी। पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि दोनों आरोपी विक्की हडल नामक व्यक्ति के जरिए हिमांशु भाऊ गैंग के संपर्क में आए थे। पुलिस का कहना है कि गैंग के सदस्य एक मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से आपस में संपर्क बनाए हुए थे। फिलहाल पुलिस आरोपियों से पूछताछ कर रही है और उनके नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। पुलिस का मानना है कि समय रहते की गई इस कार्रवाई से इलाके में एक बड़ी आपराधिक वारदात को टाला जा सका है।1
- प्रधान चेत राम शर्मा जी बिलासपुर सेवक सभा पं० दिल्ली के सौजन्य से मिली जानकारी के अनुसार, महा सचिव मोहिन्दर सिंह डोगरा जी ने हाल ही में लेफ्टिनेंट बने एक व्यक्ति को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ प्रेषित की हैं।1
- दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था में कथित पेपर लीक के मामलों को लेकर छात्रों और युवाओं का एक बड़ा प्रदर्शन देखने को मिला। प्रदर्शनकारियों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की पुरजोर मांग करते हुए सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना है कि लगातार हो रही पेपर लीक की घटनाओं ने लाखों युवाओं के भविष्य को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस विरोध प्रदर्शन में सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं ने भी बड़ी संख्या में सड़क पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद की। छात्रों और युवाओं ने जंतर-मंतर पर हुंकार भरते हुए 'धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दो' के नारे लगाए और दावा किया कि उन्होंने मोदी सरकार की नींद उड़ा दी है।1
- दिल्ली में, सपा सांसद राजीव राय ने घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतों में वृद्धि पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने सरकार पर सीधा हमला करते हुए कहा कि यह सरकार अवसर देखकर लोगों को ठगती है। राय ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल में चुनाव चल रहे थे, तभी यह कहा गया था कि चुनाव खत्म होने के बाद LPG के दाम किश्तों में बढ़ने शुरू हो जाएंगे। उन्होंने वर्तमान सरकार को 'दिशा विहीन सरकार' करार दिया, जिसकी न तो कोई अपनी सोच है, न कोई स्पष्ट रणनीति है और न ही कोई सुदृढ़ योजना।1
- उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में क्रांतिभूमि महुआ डाबर में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की अमर गाथा और गुमनाम शहीदों की स्मृति को समर्पित तीन दिवसीय "महुआ डाबर महोत्सव-2026" का आयोजन 8, 9 और 10 जून 2026 को किया जाएगा। महुआ डाबर संग्रहालय द्वारा आयोजित इस महोत्सव की थीम "शौर्य, शहादत और विरासत" निर्धारित की गई है, जिसका उद्घाटन प्रसिद्ध लेखक प्रणव मुखर्जी करेंगे। बस्ती के बहादुरपुर विकासखंड में मनोरमा नदी के तट पर स्थित महुआ डाबर, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। यह स्थल 1857 की क्रांति के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध हुए अभूतपूर्व जनप्रतिरोध और भीषण नरसंहार का साक्षी रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से पहले, महुआ डाबर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कपड़ा व्यापार और पीतल उद्योग का एक प्रमुख केंद्र था, जहां मनोरमा नदी के माध्यम से व्यापक व्यापार संचालित होता था। यह क्षेत्र अपने समृद्ध बाजारों, दो मंजिला पक्के मकानों और शिक्षित समाज के कारण एक विकसित एवं आत्मनिर्भर कस्बे के रूप में प्रसिद्ध था। 10 जून 1857 को महुआ डाबर के क्रांतिकारियों ने फैजाबाद से बिहार के दानापुर जा रहे ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों के एक दल को चुनौती दी। क्रांतिकारी जफर अली और उनके साथियों ने नदी पार कर रहे लेफ्टिनेंट लिण्डसे और लेफ्टिनेंट थॉमस सहित छह ब्रिटिश अधिकारियों को घेरकर मार डाला, जबकि सार्जेंट बुशर किसी तरह जान बचाकर भाग निकला, जिसे बाद में बाबू बल्ली सिंह ने दस दिनों तक बंदी बनाकर रखा। इस घटना से क्रुद्ध होकर ब्रिटिश शासन ने 3 जुलाई 1857 को घुड़सवार सेना के साथ महुआ डाबर को चारों ओर से घेर लिया। अंग्रेजी सैनिकों ने अंधाधुंध गोलीबारी कर लगभग पांच हजार निर्दोष ग्रामीणों, कारीगरों और नागरिकों की हत्या कर दी और पूरे कस्बे को आग के हवाले कर दिया, जिससे घर, दुकानें, खेत और फसलें नष्ट हो गईं। इतिहास के इस अध्याय को दबाने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने महुआ डाबर का नाम सरकारी अभिलेखों और नक्शों से मिटा दिया। इसके स्थान पर एक नए गांव को महुआ डाबर नाम दिया गया, जबकि मूल स्थल को राजस्व अभिलेखों में "गैर-चिरागी" घोषित कर दिया गया। महुआ डाबर संग्रहालय, जो वर्ष 1999 में स्थापित हुआ, इस ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने का कार्य कर रहा है। इसके विकास में महानिदेशक एवं क्रांतिकारी वंशज डॉ. शाह आलम राना का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। संग्रहालय में दुर्लभ दस्तावेज, हथियार, सिक्के और पुरातात्विक अवशेष संरक्षित हैं, जो इस भूले-बिसरे नरसंहार की ऐतिहासिक सच्चाई को सामने लाते हैं। वर्ष 2010 में लखनऊ विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग द्वारा प्रोफेसर अनिल कुमार के निर्देशन में यहां पुरातात्विक उत्खनन कराया गया, जिसमें प्राचीन कुएं, लखौरी ईंटों की दीवारें, जली हुई लकड़ियां, सिक्के, ढाल, भाले और पुराने भवनों के अवशेष मिले, जिन्होंने इस ऐतिहासिक घटना के प्रमाणों को पुष्ट किया। डॉ. राना के सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप महुआ डाबर को उत्तर प्रदेश पर्यटन नीति-2022 के "स्वतंत्रता संग्राम सर्किट" में शामिल किया गया है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग द्वारा लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में एक भव्य एवं जीवंत स्मारक विकसित करने की प्रक्रिया जारी है। प्रत्येक वर्ष यहां शहीदों को शस्त्र सलामी देकर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। महोत्सव का कार्यक्रम विवरण इस प्रकार है: प्रथम दिवस (8 जून 2026, सोमवार) को क्रांतिवीरों को श्रद्धांजलि, स्वास्थ्य परीक्षण एवं निःशुल्क दवा वितरण शिविर, स्थानीय विद्यालयों के विद्यार्थियों द्वारा देशभक्ति सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, महुआ डाबर के इतिहास पर परिचर्चा, विरासत यात्रा और स्वतंत्रता संग्राम आधारित फिल्म एवं वृत्तचित्र प्रदर्शन होंगे। द्वितीय दिवस (9 जून 2026, मंगलवार) पर स्वतंत्रता संग्राम साहित्य सम्मेलन, इतिहासकारों, शोधार्थियों एवं लेखकों का संवाद, ओपन माइक (कविता, गीत, वक्तृत्व एवं लोककला), युवाओं हेतु करियर काउंसलिंग सत्र, मशाल सलामी और शहीदों की झांकी एवं नाट्य मंचन का आयोजन होगा। तृतीय दिवस (10 जून 2026, बुधवार) जो शहादत दिवस है, सशस्त्र पुलिस गारद द्वारा शस्त्र सलामी, महुआ डाबर संग्रहालय भ्रमण, विरासत संरक्षण संकल्प सभा, उत्कृष्ट प्रतिभाओं एवं सहयोगियों का सम्मान, सांस्कृतिक संध्या एवं लोक कलाकारों की प्रस्तुति तथा राष्ट्रगान एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ महोत्सव का समापन होगा। यह महोत्सव केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि उन हजारों गुमनाम शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह नई पीढ़ी को अपने इतिहास, विरासत और बलिदान की गौरवशाली परंपरा से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा। इस अवसर पर प्रचार-प्रसार अभियान से जुड़े अतुल कुमार सिंह, नासिर खान, सुनील पंडित और आदिल खान आदि ने महोत्सव की तैयारियों की समीक्षा की।1
- राजधानी दिल्ली में एक बड़ा मामला सामने आया है जहाँ हिंदू मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीपक मलिक को जान से मारने की धमकी मिली है। उन्हें अपने कार्यालय में खून से लिखा एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें स्पष्ट रूप से लिखा था कि 'काफिर दीपक मलिक तेरा सर तन से जुदा करना पड़ेगा हम आ रहे हैं'। यह धमकी भरा पत्र मिलते ही दीपक मलिक ने तुरंत डायल 112 पर कॉल करके पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आसपास के सीसीटीवी फुटेज की जाँच शुरू कर दी है और संबंधित एजेंसियों को भी इस मामले की जानकारी दी है। संबंधित एजेंसियों ने भी अपनी जाँच शुरू कर दी है। इस घटना के बाद उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई है और राष्ट्रीय अध्यक्ष दीपक मलिक ने पत्रकारों से भी इस विषय पर बात की है।1
- सुरत जिले के पलसाना तालुका में स्थित कडोदरा गांव के आंकड़ा मुखी हनुमान मंदिर ट्रस्ट की जमीन में रेवेन्यू संबंधित भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हुआ है। इस भ्रष्टाचार में एक नोटरी वकील और एक सरकारी पावर दार की संलिप्तता सामने आई है।1