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आशा संगिनी संघ का जिला अधिवेशन संपन्न, आशा संग हो रही दुर्व्यवहार पर हुई चर्चा आशा संगिनी संघ का जिला अधिवेशन संपन्न, आशा संग हो रही दुर्व्यवहार पर हुई चर्चा

3 hrs ago
user_Anupam Newspaper
Anupam Newspaper
Newspaper publisher मिर्जापुर, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश•
3 hrs ago

आशा संगिनी संघ का जिला अधिवेशन संपन्न, आशा संग हो रही दुर्व्यवहार पर हुई चर्चा आशा संगिनी संघ का जिला अधिवेशन संपन्न, आशा संग हो रही दुर्व्यवहार पर हुई चर्चा

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  • *सेवा संकल्प अभियान के तहत चौबेघाट पर नपाध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी ने लगाया झाड़ू, बोले- जल्द लगेगा इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह* मीरजापुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर चलाए जा रहे सेवा संकल्प अभियान एवं 157 घंटे के महा सफाई अभियान के अंतर्गत नगर पालिका अध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी ने सोमवार को चौबेघाट स्थित अंत्येष्टि स्थल पर स्वच्छता अभियान चलाया।भाजपा कार्यकर्ताओं,स्थानीय लोगों, सभासदों तथा नगर पालिका के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ चौबेघाट पहुंचे और पूरे घाट परिसर में झाड़ू लगाकर साफ-सफाई की।इस दौरान नपाध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से सेवा संकल्प अभियान के तहत चौबेघाट के अंत्येष्टि स्थल पर स्वच्छता अभियान चलाया गया है।स्वच्छता ही जीवन है और स्वच्छता ही स्वास्थ्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार बनने के बाद देशभर में स्वच्छता को लेकर व्यापक अभियान चलाया जा रहा है।प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में स्वच्छता और शौचालय की आवश्यकता पर जोर दिया था।देशभर में लोग स्वच्छता के इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।‘स्वच्छता ही सेवा’ के तहत विभिन्न स्थानों पर साफ-सफाई अभियान चलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके जन्मदिन पर सेवा और स्वच्छता का विशेष उपहार दिया जा रहा है।उनका उद्देश्य है कि देश के प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य की रक्षा करने के साथ ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े गरीब व्यक्ति के सर्वांगीण विकास हो।इस स्वच्छता अभियान में नगर के युवा भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। नगर के तीन युवाओं ने नागकुंड पहुंचकर साफ-सफाई अभियान चलाया है और ऐसे ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण स्थलों पर लगातार स्वच्छता अभियान चलाने की बात कही है।इन युवाओं द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान में मेरे द्वारा पूरा सहयोग किया जाएगा और उन्हें हरसंभव मदद भी की जायेगी।इसके साथ ही चौबेघाट नगर का महत्वपूर्ण अंत्येष्टि स्थल है,जहां बड़ी संख्या में नगर के लोगों का आवागमन होता है। ऐसे में यहां बेहतर साफ-सफाई और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए नगर पालिका द्वारा लगातार प्रयास किया जा रहा है।चौबेघाट पर सुविधाओं के विस्तार को लेकर जल्द ही यहां इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह स्थापित कराया जाएगा।नगर विकास मंत्री ए.के. शर्मा के पिछले मीरजापुर दौरे के दौरान नगर पालिका की ओर से चौबेघाट पर इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह लगवाने की मांग रखी गई थी। इस पर नगर विकास मंत्री ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही चौबेघाट पर इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह स्थापित कराकर जनता को समर्पित किया जाएगा।चौबेघाट पर आने वाले लोगों को स्वच्छ वातावरण के साथ आवश्यक सुविधाएं बेहतर बनाने का कार्य लगातार जारी रहेगा।इस मौके पर नितिन विश्वकर्मा,रामआसरे सरोज,धीरज सोनकर,रतन बिंद,कृष्ण कुमार सिंह,अमित श्रीनेत,विष्णु सोनकर,गिरिजा शंकर निषाद सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
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    *सेवा संकल्प अभियान के तहत चौबेघाट पर नपाध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी ने लगाया झाड़ू, बोले- जल्द लगेगा इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह*

मीरजापुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर चलाए जा रहे सेवा संकल्प अभियान एवं 157 घंटे के महा सफाई अभियान के अंतर्गत नगर पालिका अध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी ने सोमवार को चौबेघाट स्थित अंत्येष्टि स्थल पर स्वच्छता अभियान चलाया।भाजपा कार्यकर्ताओं,स्थानीय लोगों, सभासदों तथा नगर पालिका के अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ चौबेघाट पहुंचे और पूरे घाट परिसर में झाड़ू लगाकर साफ-सफाई की।इस दौरान नपाध्यक्ष श्यामसुंदर केशरी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन से सेवा संकल्प अभियान के तहत चौबेघाट के अंत्येष्टि स्थल पर स्वच्छता अभियान चलाया गया है।स्वच्छता ही जीवन है और स्वच्छता ही स्वास्थ्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार बनने के बाद देशभर में स्वच्छता को लेकर व्यापक अभियान चलाया जा रहा है।प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में स्वच्छता और शौचालय की आवश्यकता पर जोर दिया था।देशभर में लोग स्वच्छता के इस अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं।‘स्वच्छता ही सेवा’ के तहत विभिन्न स्थानों पर साफ-सफाई अभियान चलाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके जन्मदिन पर सेवा और स्वच्छता का विशेष उपहार दिया जा रहा है।उनका उद्देश्य है कि देश के प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य की रक्षा करने के साथ ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े गरीब व्यक्ति के सर्वांगीण विकास हो।इस स्वच्छता अभियान में नगर के युवा भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। नगर के तीन युवाओं ने नागकुंड पहुंचकर साफ-सफाई अभियान चलाया है और ऐसे ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण स्थलों पर लगातार स्वच्छता अभियान चलाने की बात कही है।इन युवाओं  द्वारा चलाए जा रहे इस अभियान में मेरे द्वारा पूरा सहयोग किया जाएगा और उन्हें हरसंभव मदद भी की जायेगी।इसके साथ ही चौबेघाट नगर का महत्वपूर्ण अंत्येष्टि स्थल है,जहां बड़ी संख्या में नगर के लोगों का आवागमन होता है। ऐसे में यहां बेहतर साफ-सफाई और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए नगर पालिका द्वारा लगातार प्रयास किया जा रहा है।चौबेघाट पर सुविधाओं के विस्तार को लेकर जल्द ही यहां इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह स्थापित कराया जाएगा।नगर विकास मंत्री ए.के. शर्मा के पिछले मीरजापुर दौरे के दौरान नगर पालिका की ओर से चौबेघाट पर इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह लगवाने की मांग रखी गई थी। इस पर नगर विकास मंत्री ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही चौबेघाट पर इलेक्ट्रॉनिक शवदाह गृह स्थापित कराकर जनता को समर्पित किया जाएगा।चौबेघाट पर आने वाले लोगों को स्वच्छ वातावरण के साथ आवश्यक सुविधाएं बेहतर बनाने का कार्य लगातार जारी रहेगा।इस मौके पर नितिन विश्वकर्मा,रामआसरे सरोज,धीरज सोनकर,रतन बिंद,कृष्ण कुमार सिंह,अमित श्रीनेत,विष्णु सोनकर,गिरिजा शंकर निषाद सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
    user_Journalist S N Yadav
    Journalist S N Yadav
    Local News Reporter मिर्जापुर, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश•
    24 min ago
  • मिर्ज़ापुर: घमहापुर में सेवा पखवाड़ा के तहत स्वास्थ्य शिविर आयोजित, चश्मों का हुआ वितरण।
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    मिर्ज़ापुर: घमहापुर में सेवा पखवाड़ा के तहत स्वास्थ्य शिविर आयोजित, चश्मों का हुआ वितरण।
    user_मेट्रो संदेश न्यूज़
    मेट्रो संदेश न्यूज़
    Newspaper publisher मिर्जापुर, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश•
    57 min ago
  • आशा संगिनी संघ का जिला अधिवेशन संपन्न, आशा संग हो रही दुर्व्यवहार पर हुई चर्चा आशा संगिनी संघ का जिला अधिवेशन संपन्न, आशा संग हो रही दुर्व्यवहार पर हुई चर्चा
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    आशा संगिनी संघ का जिला अधिवेशन संपन्न, आशा संग हो रही दुर्व्यवहार पर हुई चर्चा
आशा संगिनी संघ का जिला अधिवेशन संपन्न, आशा संग हो रही दुर्व्यवहार पर हुई चर्चा
    user_Anupam Newspaper
    Anupam Newspaper
    Newspaper publisher मिर्जापुर, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश•
    3 hrs ago
  • जिगना थाने के कथित ऑडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल: रकम की बातचीत किस बात की थी, किसके लिए थी और किसके कहने पर?* *जिगना थाने के कथित ऑडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल: रकम की बातचीत किस बात की थी, किसके लिए थी और किसके कहने पर?* *यूट्यूबर, अधिवक्ता और P7 चैनल संचालक के नाम बातचीत में आने का दावा; करीब आठ मिनट की रिकॉर्डिंग की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच की मांग* मिर्जापुर। थाना जिगना से जुड़ा एक कथित ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस व्यवस्था, कथित बिचौलियों की भूमिका और पत्रकारिता के नाम पर होने वाले कथित हस्तक्षेप को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। करीब आठ मिनट की बताई जा रही इस रिकॉर्डिंग में पैसों के लेन-देन, थाने से जुड़े मामले को “मैनेज” कराने तथा रिकॉर्डिंग किए जाने की जानकारी होने जैसी बातें सुनाई देने का दावा किया जा रहा है। सबसे गंभीर प्रश्न यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर ऑडियो वायरल क्यों हुआ, बल्कि प्रश्न यह है कि यदि रिकॉर्डिंग वास्तविक है तो बातचीत में रकम किस उद्देश्य से मांगी या भेजी जा रही थी? पैसा किस व्यक्ति के लिए था? किस मामले के संबंध में था? संबंधित व्यक्ति की थाने में क्या भूमिका थी? और क्या किसी पुलिसकर्मी या पुलिस प्रक्रिया पर इसका प्रभाव डालने का प्रयास किया गया था? इन सवालों का जवाब सोशल मीडिया की बहस से नहीं, बल्कि मूल ऑडियो, मूल मोबाइल/रिकॉर्डिंग डिवाइस, डिजिटल फॉरेंसिक जांच, संबंधित व्यक्तियों के बयान और उस समय के पुलिस अभिलेखों से ही मिल सकता है। ऑडियो में रकम की बातचीत ने बढ़ाई बेचैनी वायरल बताए जा रहे ऑडियो में अलग-अलग रकम का उल्लेख सुनाई देने का दावा है। बातचीत में दो हजार, पच्चीस सौ, आठ हजार और साढ़े दस हजार रुपये जैसी रकमों का जिक्र होने की बात सामने आई है। बताई जा रही बातचीत के अंशों में— “आठ हजार रुपया दिया गया इतना कम?... पैसा हम आपसे ही...” और “दो हजार भेज दो... पच्चीस सौ भेज दो... दस मिनट के अंदर पैसा भेजो...” जैसी बातें होने का दावा किया जा रहा है। यदि ये आवाजें और शब्द स्वतंत्र जांच में वास्तविक पाए जाते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि इन रकमों का वास्तविक उद्देश्य क्या था? क्या यह किसी वैध सेवा या निजी लेन-देन की रकम थी? क्या यह किसी मुकदमे या विवाद से संबंधित खर्च था? क्या किसी पुलिस कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए रकम मांगी गई? क्या किसी व्यक्ति को थाने से संबंधित मामले में राहत दिलाने अथवा मामला “मैनेज” कराने की बात हो रही थी? या फिर पूरी बातचीत को उसके मूल संदर्भ से काटकर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत किया गया? इनमें से किसी भी संभावना की पुष्टि बिना जांच के नहीं की जा सकती। लेकिन यही वे सवाल हैं जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी हो गई है। “रिकॉर्डिंग कर रहा है...” वाली बात ने खड़ा किया दूसरा बड़ा सवाल वायरल ऑडियो के संबंध में यह भी दावा किया जा रहा है कि बातचीत में— “हम जानते हैं तू रिकॉर्डिंग करत है... फोन मत बंद कर...” जैसी बात सुनाई देती है। यदि यह कथन वास्तव में मूल रिकॉर्डिंग का हिस्सा है, तो जांच अधिकारियों के सामने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है— बातचीत करने वाले व्यक्ति को रिकॉर्डिंग किए जाने की जानकारी कैसे हुई? क्या बातचीत के दौरान पहले से विवाद चल रहा था? क्या संबंधित पक्ष एक-दूसरे की बातचीत रिकॉर्ड कर रहे थे? क्या रिकॉर्डिंग किसी विवाद के प्रमाण के रूप में बनाई गई थी? क्या वायरल ऑडियो मूल रिकॉर्डिंग है या उसका संपादित संस्करण? क्या इसमें कोई हिस्सा काटा, जोड़ा या बदला गया? यही कारण है कि केवल वायरल ऑडियो सुनकर निष्कर्ष निकालने के बजाय मूल डिजिटल फाइल की फॉरेंसिक जांच अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। “मामला बाहर मत निकालना, इंस्पेक्टर साहब”—यदि आवाज वास्तविक है तो किस संदर्भ में? वायरल सामग्री में “मामला बाहर मत निकालना, इंस्पेक्टर साहब” जैसी बात होने का दावा किया गया है। यदि यह कथन स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच में प्रमाणित होता है तो यह जांच का अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु हो सकता है। लेकिन यहां भी सवाल यही है— कौन किससे बात कर रहा था? “इंस्पेक्टर साहब” से किस व्यक्ति का आशय था? क्या बातचीत वास्तव में जिगना थाने से जुड़े किसी मामले को लेकर थी? उस समय थाने में कौन-सा मामला विचाराधीन था? क्या उस मामले की कोई GD, NCR, FIR, शिकायत, जांच रिपोर्ट अथवा अन्य पुलिस अभिलेख उपलब्ध है? क्या वायरल बातचीत में उल्लिखित रकम और किसी पुलिस प्रकरण के बीच कोई वास्तविक संबंध था? इन सवालों के उत्तर दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों से ही निकल सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल—आखिर पैसा किस काम के लिए? किसी भी कथित लेन-देन की जांच का पहला सिद्धांत यही होना चाहिए कि— पैसा किसने दिया? किसने लिया? किस माध्यम से दिया? किसके खाते में गया? किस उद्देश्य से दिया गया? किसके कहने पर दिया गया? और उसके बदले क्या काम कराने की बात हुई? यदि बातचीत में बताए गए रकम के दावे के पीछे वास्तव में कोई डिजिटल भुगतान हुआ है, तो बैंकिंग रिकॉर्ड, UPI विवरण, चैट, कॉल डिटेल, मोबाइल डेटा और संबंधित व्यक्तियों के बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं। और यदि कोई भुगतान हुआ ही नहीं, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि ऑडियो में रकम की बातचीत किस संदर्भ में की जा रही थी। प्रकाश सिंह टिकैत प्रकरण से कनेक्शन की भी जांच क्यों जरूरी? स्थानीय स्तर पर यह कथित ऑडियो प्रकाश सिंह टिकैत पर लगाए गए धांधली के आरोपों से जुड़े विवाद से संबंधित बताया जा रहा है। यदि यह संबंध सही है तो जांच एजेंसियों को केवल ऑडियो सुनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें यह देखना चाहिए कि— संबंधित शिकायत कब और किसके द्वारा दी गई? पुलिस ने उस शिकायत पर क्या कार्रवाई की? जांच किस अधिकारी के पास थी? संबंधित व्यक्तियों को थाने में कब-कब बुलाया गया? किस तारीख को कौन व्यक्ति थाने पहुंचा? क्या उस दौरान कोई रकम मांगी या दी गई? क्या कोई UPI या बैंक लेन-देन हुआ? क्या संबंधित मोबाइल नंबरों के बीच लगातार संपर्क हुआ? क्या वायरल बातचीत में जिन रकमों का उल्लेख है, उनका कोई वित्तीय रिकॉर्ड मौजूद है? क्या पुलिस अभिलेख और ऑडियो में बताए गए घटनाक्रम का कोई मेल बैठता है? यदि ऑडियो झूठा है तो जांच उसे भी उजागर करेगी। यदि वास्तविक है तो जांच उसके पीछे की पूरी कड़ी सामने ला सकती है। पत्रकारिता की आड़ में कथित बिचौलियागिरी—सवाल केवल तीन व्यक्तियों का नहीं इस मामले का एक और पहलू सोशल मीडिया पत्रकारिता से जुड़ा है। यूट्यूब, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चैनल चलाना अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल करके पुलिस कार्रवाई, शिकायत, मुकदमे या प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो यह गंभीर सार्वजनिक प्रश्न बन जाता है। इसलिए जांच केवल यह पूछकर खत्म नहीं होनी चाहिए कि ऑडियो में कौन बोल रहा है। यह भी देखा जाना चाहिए कि— क्या संबंधित व्यक्ति वास्तव में पत्रकारिता कर रहे थे या किसी विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे? क्या उन्होंने पुलिस अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल किया? क्या किसी शिकायतकर्ता से पैसे लेने या दिलाने की बात हुई? क्या किसी मामले को पुलिस से “मैनेज” कराने का दावा किया गया? क्या पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल किसी निजी सौदेबाजी में हुआ? क्या सोशल मीडिया चैनल पर प्रकाशित खबरों और वास्तविक पुलिस रिकॉर्ड में अंतर है? क्या किसी पक्ष से पैसे लेकर खबर दबाने, चलाने अथवा पुलिस कार्रवाई प्रभावित करने का प्रयास हुआ? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही मिल सकता है। सिर्फ ऑडियो नहीं—पूरा डिजिटल ट्रेल खंगालने की जरूरत यदि शासन-प्रशासन वास्तव में इस मामले की सच्चाई सामने लाना चाहता है तो जांच का दायरा केवल वायरल ऑडियो तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। जांच में आवश्यकतानुसार यह देखा जा सकता है— 1. मूल ऑडियो फाइल वायरल क्लिप की बजाय मूल रिकॉर्डिंग प्राप्त की जाए। 2. फॉरेंसिक वॉयस परीक्षण आवाजों की पहचान वैज्ञानिक तरीके से की जाए। 3. एडिटिंग की जांच यह देखा जाए कि ऑडियो में कट-पेस्ट, जोड़-तोड़ अथवा आवाज के साथ छेड़छाड़ तो नहीं हुई। 4. मोबाइल/डिजिटल डिवाइस जहां कानूनन और प्रक्रिया के अनुसार संभव हो, मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस की जांच की जाए। 5. भुगतान रिकॉर्ड ऑडियो में उल्लिखित रकमों के संबंध में उपलब्ध बैंक/UPI रिकॉर्ड की जांच की जाए। 6. कॉल डिटेल रिकॉर्ड जांच की कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित कॉलों और संपर्कों का मिलान किया जाए। 7. पुलिस रिकॉर्ड जिस मामले का संदर्भ बताया जा रहा है, उसकी GD, FIR, शिकायत और जांच संबंधी रिकॉर्ड से घटनाक्रम मिलाया जाए। 8. CCTV फुटेज यदि संबंधित अवधि की CCTV फुटेज उपलब्ध है तो उससे थाने में आने-जाने वाले व्यक्तियों का घटनाक्रम मिलाया जा सकता है। सात सवाल, जिनका जवाब जांच से मिलना चाहिए सवाल नंबर 1 यदि ऑडियो फर्जी है तो मूल रिकॉर्डिंग सामने क्यों नहीं लाई जाती? सवाल नंबर 2 यदि ऑडियो असली है तो बातचीत में रकमों का उल्लेख किस संदर्भ में हुआ? सवाल नंबर 3 क्या ऑडियो में सुनाई देने वाली आवाजें वास्तव में उन्हीं व्यक्तियों की हैं जिनसे उन्हें जोड़ा जा रहा है? सवाल नंबर 4 क्या कथित रकमों का कोई बैंक, UPI या अन्य डिजिटल लेन-देन उपलब्ध है? सवाल नंबर 5 जिस पुलिस प्रकरण से ऑडियो को जोड़ा जा रहा है, उसकी सरकारी फाइल और ऑडियो में कही गई बातों के बीच क्या संबंध है? सवाल नंबर 6 क्या किसी व्यक्ति ने पुलिस अधिकारी या थाने के नाम का इस्तेमाल करके किसी पक्ष से पैसा मांगा? सवाल नंबर 7 यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के बाद जिम्मेदारी तय कर झूठे आरोप लगाने वालों के विरुद्ध भी कार्रवाई क्यों न हो? यानी जांच का रास्ता एकतरफा नहीं, दोनों दिशाओं में जाना चाहिए। प्रशासन के सामने अब दो ही रास्ते नहीं, एक ही सही रास्ता है—निष्पक्ष जांच इस मामले में किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया के आधार पर दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा। लेकिन उसी तरह किसी वायरल सामग्री को बिना जांच किए खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा। सच्चाई का सबसे सुरक्षित रास्ता स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच है। यदि ऑडियो फर्जी है—तो फॉरेंसिक जांच से फर्जी साबित किया जाए। यदि ऑडियो एडिटेड है—तो किसने एडिट किया, यह सामने आए। यदि आवाजें गलत तरीके से किसी व्यक्ति से जोड़ी गई हैं—तो यह तथ्य सार्वजनिक हो। और यदि ऑडियो वास्तविक है तथा उसमें कही गई बातें दस्तावेजी और डिजिटल साक्ष्यों से पुष्ट होती हैं—तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो। न जांच से पहले दोष सिद्ध होना चाहिए, न जांच से पहले आरोप दबना चाहिए। जनता का सवाल—पत्रकारिता खबर दिखाने का माध्यम है या मामलों को “मैनेज” कराने का? पत्रकारिता का मूल उद्देश्य किसी पक्ष से सौदेबाजी करना नहीं, बल्कि तथ्य सामने रखना है। यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल करके पुलिस, प्रशासन या किसी मुकदमे में अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास करता है, तो उसकी भूमिका की जांच होना स्वाभाविक है। लेकिन यहां भी आरोप और प्रमाण के बीच अंतर रखना जरूरी है। इसलिए प्रशासन को चाहिए कि व्यक्तियों की पहचान अथवा चैनल के नाम से पहले साक्ष्य की जांच करे। क्योंकि अगर आरोप सही नहीं हैं तो निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित होगी और अगर आरोप सही हैं तो मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहेगा—यह पुलिस व्यवस्था, शिकायत निवारण प्रणाली और सोशल मीडिया पत्रकारिता की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न बन जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण बात—“दूध का दूध, पानी का पानी” सिर्फ नारा नहीं, जांच का परिणाम होना चाहिए जिगना थाने से जुड़े इस कथित ऑडियो ने जो प्रश्न खड़े किए हैं, उनका उत्तर सोशल मीडिया की टिप्पणियों से नहीं मिलेगा। उत्तर मिलेगा—मूल ऑडियो से। उत्तर मिलेगा—फॉरेंसिक जांच से। उत्तर मिलेगा—डिजिटल लेन-देन से। उत्तर मिलेगा—पुलिस रिकॉर्ड से। उत्तर मिलेगा—CCTV और उपलब्ध तकनीकी साक्ष्य से। उत्तर मिलेगा—संबंधित लोगों के बयान से। और यदि जांच में आरोप साबित नहीं होते हैं तो यह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए कि आरोप किस आधार पर लगाए गए थे। सच सामने आना चाहिए—चाहे वह किसी के पक्ष में हो या किसी के खिलाफ। रुद्रा की आवाज न्यूज़ का सीधा सवाल क्या जिगना थाने से जुड़े इस कथित ऑडियो की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच कराकर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी? क्या कथित रकमों के लेन-देन की जांच की जाएगी? क्या संबंधित पुलिस प्रकरण के रिकॉर्ड और वायरल बातचीत का मिलान होगा? क्या संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाएंगे? क्या सोशल मीडिया पर पत्रकारिता के नाम पर कथित बिचौलियागिरी के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होगी? और यदि आरोप गलत निकलते हैं तो जिम्मेदार कौन होगा—और यदि आरोप सही निकलते हैं तो कार्रवाई किस स्तर तक जाएगी? जनता को इन सवालों के जवाब चाहिए। महत्वपूर्ण संपादकीय सूचना इस समाचार में वर्णित ऑडियो की सत्यता, आवाज की पहचान अथवा उसमें लगाए गए आरोपों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं माना गया है। समाचार सोशल मीडिया पर प्रसारित कथित ऑडियो तथा उपलब्ध स्थानीय जानकारी के आधार पर जांच की आवश्यकता को रेखांकित करता है। किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अंतिम अधिकार सक्षम जांच एजेंसी और न्यायिक प्रक्रिया का है। संबंधित सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। अखबार/चैनल का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि कथित सामग्री की निष्पक्ष जांच की मांग और जनहित से जुड़े प्रश्नों को सामने रखना है।
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    जिगना थाने के कथित ऑडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल: रकम की बातचीत किस बात की थी, किसके लिए थी और किसके कहने पर?*
*जिगना थाने के कथित ऑडियो ने खड़े किए गंभीर सवाल: रकम की बातचीत किस बात की थी, किसके लिए थी और किसके कहने पर?*
*यूट्यूबर, अधिवक्ता और P7 चैनल संचालक के नाम बातचीत में आने का दावा; करीब आठ मिनट की रिकॉर्डिंग की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच की मांग*
मिर्जापुर। थाना जिगना से जुड़ा एक कथित ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस व्यवस्था, कथित बिचौलियों की भूमिका और पत्रकारिता के नाम पर होने वाले कथित हस्तक्षेप को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। करीब आठ मिनट की बताई जा रही इस रिकॉर्डिंग में पैसों के लेन-देन, थाने से जुड़े मामले को “मैनेज” कराने तथा रिकॉर्डिंग किए जाने की जानकारी होने जैसी बातें सुनाई देने का दावा किया जा रहा है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर ऑडियो वायरल क्यों हुआ, बल्कि प्रश्न यह है कि यदि रिकॉर्डिंग वास्तविक है तो बातचीत में रकम किस उद्देश्य से मांगी या भेजी जा रही थी? पैसा किस व्यक्ति के लिए था? किस मामले के संबंध में था? संबंधित व्यक्ति की थाने में क्या भूमिका थी? और क्या किसी पुलिसकर्मी या पुलिस प्रक्रिया पर इसका प्रभाव डालने का प्रयास किया गया था?
इन सवालों का जवाब सोशल मीडिया की बहस से नहीं, बल्कि मूल ऑडियो, मूल मोबाइल/रिकॉर्डिंग डिवाइस, डिजिटल फॉरेंसिक जांच, संबंधित व्यक्तियों के बयान और उस समय के पुलिस अभिलेखों से ही मिल सकता है।
ऑडियो में रकम की बातचीत ने बढ़ाई बेचैनी
वायरल बताए जा रहे ऑडियो में अलग-अलग रकम का उल्लेख सुनाई देने का दावा है। बातचीत में दो हजार, पच्चीस सौ, आठ हजार और साढ़े दस हजार रुपये जैसी रकमों का जिक्र होने की बात सामने आई है।
बताई जा रही बातचीत के अंशों में—
“आठ हजार रुपया दिया गया इतना कम?... पैसा हम आपसे ही...”
और
“दो हजार भेज दो... पच्चीस सौ भेज दो... दस मिनट के अंदर पैसा भेजो...”
जैसी बातें होने का दावा किया जा रहा है।
यदि ये आवाजें और शब्द स्वतंत्र जांच में वास्तविक पाए जाते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि इन रकमों का वास्तविक उद्देश्य क्या था?
क्या यह किसी वैध सेवा या निजी लेन-देन की रकम थी?
क्या यह किसी मुकदमे या विवाद से संबंधित खर्च था?
क्या किसी पुलिस कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए रकम मांगी गई?
क्या किसी व्यक्ति को थाने से संबंधित मामले में राहत दिलाने अथवा मामला “मैनेज” कराने की बात हो रही थी?
या फिर पूरी बातचीत को उसके मूल संदर्भ से काटकर सोशल मीडिया पर प्रस्तुत किया गया?
इनमें से किसी भी संभावना की पुष्टि बिना जांच के नहीं की जा सकती। लेकिन यही वे सवाल हैं जिनकी निष्पक्ष जांच जरूरी हो गई है।
“रिकॉर्डिंग कर रहा है...” वाली बात ने खड़ा किया दूसरा बड़ा सवाल
वायरल ऑडियो के संबंध में यह भी दावा किया जा रहा है कि बातचीत में—
“हम जानते हैं तू रिकॉर्डिंग करत है... फोन मत बंद कर...”
जैसी बात सुनाई देती है।
यदि यह कथन वास्तव में मूल रिकॉर्डिंग का हिस्सा है, तो जांच अधिकारियों के सामने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है—
बातचीत करने वाले व्यक्ति को रिकॉर्डिंग किए जाने की जानकारी कैसे हुई?
क्या बातचीत के दौरान पहले से विवाद चल रहा था?
क्या संबंधित पक्ष एक-दूसरे की बातचीत रिकॉर्ड कर रहे थे?
क्या रिकॉर्डिंग किसी विवाद के प्रमाण के रूप में बनाई गई थी?
क्या वायरल ऑडियो मूल रिकॉर्डिंग है या उसका संपादित संस्करण?
क्या इसमें कोई हिस्सा काटा, जोड़ा या बदला गया?
यही कारण है कि केवल वायरल ऑडियो सुनकर निष्कर्ष निकालने के बजाय मूल डिजिटल फाइल की फॉरेंसिक जांच अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
“मामला बाहर मत निकालना, इंस्पेक्टर साहब”—यदि आवाज वास्तविक है तो किस संदर्भ में?
वायरल सामग्री में “मामला बाहर मत निकालना, इंस्पेक्टर साहब” जैसी बात होने का दावा किया गया है।
यदि यह कथन स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच में प्रमाणित होता है तो यह जांच का अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु हो सकता है।
लेकिन यहां भी सवाल यही है—
कौन किससे बात कर रहा था?
“इंस्पेक्टर साहब” से किस व्यक्ति का आशय था?
क्या बातचीत वास्तव में जिगना थाने से जुड़े किसी मामले को लेकर थी?
उस समय थाने में कौन-सा मामला विचाराधीन था?
क्या उस मामले की कोई GD, NCR, FIR, शिकायत, जांच रिपोर्ट अथवा अन्य पुलिस अभिलेख उपलब्ध है?
क्या वायरल बातचीत में उल्लिखित रकम और किसी पुलिस प्रकरण के बीच कोई वास्तविक संबंध था?
इन सवालों के उत्तर दस्तावेजों और डिजिटल साक्ष्यों से ही निकल सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल—आखिर पैसा किस काम के लिए?
किसी भी कथित लेन-देन की जांच का पहला सिद्धांत यही होना चाहिए कि—
पैसा किसने दिया?
किसने लिया?
किस माध्यम से दिया?
किसके खाते में गया?
किस उद्देश्य से दिया गया?
किसके कहने पर दिया गया?
और उसके बदले क्या काम कराने की बात हुई?
यदि बातचीत में बताए गए रकम के दावे के पीछे वास्तव में कोई डिजिटल भुगतान हुआ है, तो बैंकिंग रिकॉर्ड, UPI विवरण, चैट, कॉल डिटेल, मोबाइल डेटा और संबंधित व्यक्तियों के बयान महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं।
और यदि कोई भुगतान हुआ ही नहीं, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि ऑडियो में रकम की बातचीत किस संदर्भ में की जा रही थी।
प्रकाश सिंह टिकैत प्रकरण से कनेक्शन की भी जांच क्यों जरूरी?
स्थानीय स्तर पर यह कथित ऑडियो प्रकाश सिंह टिकैत पर लगाए गए धांधली के आरोपों से जुड़े विवाद से संबंधित बताया जा रहा है।
यदि यह संबंध सही है तो जांच एजेंसियों को केवल ऑडियो सुनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
उन्हें यह देखना चाहिए कि—
संबंधित शिकायत कब और किसके द्वारा दी गई?
पुलिस ने उस शिकायत पर क्या कार्रवाई की?
जांच किस अधिकारी के पास थी?
संबंधित व्यक्तियों को थाने में कब-कब बुलाया गया?
किस तारीख को कौन व्यक्ति थाने पहुंचा?
क्या उस दौरान कोई रकम मांगी या दी गई?
क्या कोई UPI या बैंक लेन-देन हुआ?
क्या संबंधित मोबाइल नंबरों के बीच लगातार संपर्क हुआ?
क्या वायरल बातचीत में जिन रकमों का उल्लेख है, उनका कोई वित्तीय रिकॉर्ड मौजूद है?
क्या पुलिस अभिलेख और ऑडियो में बताए गए घटनाक्रम का कोई मेल बैठता है?
यदि ऑडियो झूठा है तो जांच उसे भी उजागर करेगी। यदि वास्तविक है तो जांच उसके पीछे की पूरी कड़ी सामने ला सकती है।
पत्रकारिता की आड़ में कथित बिचौलियागिरी—सवाल केवल तीन व्यक्तियों का नहीं
इस मामले का एक और पहलू सोशल मीडिया पत्रकारिता से जुड़ा है।
यूट्यूब, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चैनल चलाना अपने आप में अपराध नहीं है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल करके पुलिस कार्रवाई, शिकायत, मुकदमे या प्रशासनिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो यह गंभीर सार्वजनिक प्रश्न बन जाता है।
इसलिए जांच केवल यह पूछकर खत्म नहीं होनी चाहिए कि ऑडियो में कौन बोल रहा है।
यह भी देखा जाना चाहिए कि—
क्या संबंधित व्यक्ति वास्तव में पत्रकारिता कर रहे थे या किसी विवाद में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे थे?
क्या उन्होंने पुलिस अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल किया?
क्या किसी शिकायतकर्ता से पैसे लेने या दिलाने की बात हुई?
क्या किसी मामले को पुलिस से “मैनेज” कराने का दावा किया गया?
क्या पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल किसी निजी सौदेबाजी में हुआ?
क्या सोशल मीडिया चैनल पर प्रकाशित खबरों और वास्तविक पुलिस रिकॉर्ड में अंतर है?
क्या किसी पक्ष से पैसे लेकर खबर दबाने, चलाने अथवा पुलिस कार्रवाई प्रभावित करने का प्रयास हुआ?
इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही मिल सकता है।
सिर्फ ऑडियो नहीं—पूरा डिजिटल ट्रेल खंगालने की जरूरत
यदि शासन-प्रशासन वास्तव में इस मामले की सच्चाई सामने लाना चाहता है तो जांच का दायरा केवल वायरल ऑडियो तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा।
जांच में आवश्यकतानुसार यह देखा जा सकता है—
1. मूल ऑडियो फाइल
वायरल क्लिप की बजाय मूल रिकॉर्डिंग प्राप्त की जाए।
2. फॉरेंसिक वॉयस परीक्षण
आवाजों की पहचान वैज्ञानिक तरीके से की जाए।
3. एडिटिंग की जांच
यह देखा जाए कि ऑडियो में कट-पेस्ट, जोड़-तोड़ अथवा आवाज के साथ छेड़छाड़ तो नहीं हुई।
4. मोबाइल/डिजिटल डिवाइस
जहां कानूनन और प्रक्रिया के अनुसार संभव हो, मूल रिकॉर्डिंग डिवाइस की जांच की जाए।
5. भुगतान रिकॉर्ड
ऑडियो में उल्लिखित रकमों के संबंध में उपलब्ध बैंक/UPI रिकॉर्ड की जांच की जाए।
6. कॉल डिटेल रिकॉर्ड
जांच की कानूनी प्रक्रिया के तहत संबंधित कॉलों और संपर्कों का मिलान किया जाए।
7. पुलिस रिकॉर्ड
जिस मामले का संदर्भ बताया जा रहा है, उसकी GD, FIR, शिकायत और जांच संबंधी रिकॉर्ड से घटनाक्रम मिलाया जाए।
8. CCTV फुटेज
यदि संबंधित अवधि की CCTV फुटेज उपलब्ध है तो उससे थाने में आने-जाने वाले व्यक्तियों का घटनाक्रम मिलाया जा सकता है।
सात सवाल, जिनका जवाब जांच से मिलना चाहिए
सवाल नंबर 1
यदि ऑडियो फर्जी है तो मूल रिकॉर्डिंग सामने क्यों नहीं लाई जाती?
सवाल नंबर 2
यदि ऑडियो असली है तो बातचीत में रकमों का उल्लेख किस संदर्भ में हुआ?
सवाल नंबर 3
क्या ऑडियो में सुनाई देने वाली आवाजें वास्तव में उन्हीं व्यक्तियों की हैं जिनसे उन्हें जोड़ा जा रहा है?
सवाल नंबर 4
क्या कथित रकमों का कोई बैंक, UPI या अन्य डिजिटल लेन-देन उपलब्ध है?
सवाल नंबर 5
जिस पुलिस प्रकरण से ऑडियो को जोड़ा जा रहा है, उसकी सरकारी फाइल और ऑडियो में कही गई बातों के बीच क्या संबंध है?
सवाल नंबर 6
क्या किसी व्यक्ति ने पुलिस अधिकारी या थाने के नाम का इस्तेमाल करके किसी पक्ष से पैसा मांगा?
सवाल नंबर 7
यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के बाद जिम्मेदारी तय कर झूठे आरोप लगाने वालों के विरुद्ध भी कार्रवाई क्यों न हो?
यानी जांच का रास्ता एकतरफा नहीं, दोनों दिशाओं में जाना चाहिए।
प्रशासन के सामने अब दो ही रास्ते नहीं, एक ही सही रास्ता है—निष्पक्ष जांच
इस मामले में किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया के आधार पर दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा।
लेकिन उसी तरह किसी वायरल सामग्री को बिना जांच किए खारिज कर देना भी उचित नहीं होगा।
सच्चाई का सबसे सुरक्षित रास्ता स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच है।
यदि ऑडियो फर्जी है—तो फॉरेंसिक जांच से फर्जी साबित किया जाए।
यदि ऑडियो एडिटेड है—तो किसने एडिट किया, यह सामने आए।
यदि आवाजें गलत तरीके से किसी व्यक्ति से जोड़ी गई हैं—तो यह तथ्य सार्वजनिक हो।
और यदि ऑडियो वास्तविक है तथा उसमें कही गई बातें दस्तावेजी और डिजिटल साक्ष्यों से पुष्ट होती हैं—तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो।
न जांच से पहले दोष सिद्ध होना चाहिए, न जांच से पहले आरोप दबना चाहिए।
जनता का सवाल—पत्रकारिता खबर दिखाने का माध्यम है या मामलों को “मैनेज” कराने का?
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य किसी पक्ष से सौदेबाजी करना नहीं, बल्कि तथ्य सामने रखना है।
यदि कोई व्यक्ति पत्रकारिता की पहचान का इस्तेमाल करके पुलिस, प्रशासन या किसी मुकदमे में अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास करता है, तो उसकी भूमिका की जांच होना स्वाभाविक है।
लेकिन यहां भी आरोप और प्रमाण के बीच अंतर रखना जरूरी है।
इसलिए प्रशासन को चाहिए कि व्यक्तियों की पहचान अथवा चैनल के नाम से पहले साक्ष्य की जांच करे।
क्योंकि अगर आरोप सही नहीं हैं तो निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित होगी और अगर आरोप सही हैं तो मामला केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहेगा—यह पुलिस व्यवस्था, शिकायत निवारण प्रणाली और सोशल मीडिया पत्रकारिता की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न बन जाएगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात—“दूध का दूध, पानी का पानी” सिर्फ नारा नहीं, जांच का परिणाम होना चाहिए
जिगना थाने से जुड़े इस कथित ऑडियो ने जो प्रश्न खड़े किए हैं, उनका उत्तर सोशल मीडिया की टिप्पणियों से नहीं मिलेगा।
उत्तर मिलेगा—मूल ऑडियो से।
उत्तर मिलेगा—फॉरेंसिक जांच से।
उत्तर मिलेगा—डिजिटल लेन-देन से।
उत्तर मिलेगा—पुलिस रिकॉर्ड से।
उत्तर मिलेगा—CCTV और उपलब्ध तकनीकी साक्ष्य से।
उत्तर मिलेगा—संबंधित लोगों के बयान से।
और यदि जांच में आरोप साबित नहीं होते हैं तो यह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए कि आरोप किस आधार पर लगाए गए थे।
सच सामने आना चाहिए—चाहे वह किसी के पक्ष में हो या किसी के खिलाफ।
रुद्रा की आवाज न्यूज़ का सीधा सवाल
क्या जिगना थाने से जुड़े इस कथित ऑडियो की स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच कराकर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
क्या कथित रकमों के लेन-देन की जांच की जाएगी?
क्या संबंधित पुलिस प्रकरण के रिकॉर्ड और वायरल बातचीत का मिलान होगा?
क्या संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज किए जाएंगे?
क्या सोशल मीडिया पर पत्रकारिता के नाम पर कथित बिचौलियागिरी के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होगी?
और यदि आरोप गलत निकलते हैं तो जिम्मेदार कौन होगा—और यदि आरोप सही निकलते हैं तो कार्रवाई किस स्तर तक जाएगी?
जनता को इन सवालों के जवाब चाहिए।
महत्वपूर्ण संपादकीय सूचना
इस समाचार में वर्णित ऑडियो की सत्यता, आवाज की पहचान अथवा उसमें लगाए गए आरोपों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं माना गया है। समाचार सोशल मीडिया पर प्रसारित कथित ऑडियो तथा उपलब्ध स्थानीय जानकारी के आधार पर जांच की आवश्यकता को रेखांकित करता है। किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का अंतिम अधिकार सक्षम जांच एजेंसी और न्यायिक प्रक्रिया का है। संबंधित सभी पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
अखबार/चैनल का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि कथित सामग्री की निष्पक्ष जांच की मांग और जनहित से जुड़े प्रश्नों को सामने रखना है।
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    Newspaper advertising department मिर्जापुर, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश•
    12 hrs ago
  • थाना मंझनपुर क्षेत्र में पानी के गड्ढे में मिला शव, जांच में जुटी पुलिस मंझनपुर, कौशांबी। थाना मंझनपुर क्षेत्रांतर्गत ग्राम बधवा रजभर में पानी के गड्ढे में शव मिलने की सूचना पर हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही थाना स्थानीय पुलिस एवं फील्ड यूनिट ने तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थलीय निरीक्षण किया। परिजनों के अनुसार मृतक को मिर्गी का दौरा आता था और उसका उपचार चल रहा था। प्रथम दृष्टया शव पर चोट के कोई निशान नहीं पाए गए हैं। पुलिस द्वारा शव को कब्जे में लेकर पंचायतनामा व पोस्टमार्टम की कार्यवाही प्रचलित की गई है। इस संबंध में क्षेत्राधिकारी मंझनपुर श्री सौरभ सामंत ने वीडियो बाइट के माध्यम से जानकारी दी है।
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    थाना मंझनपुर क्षेत्र में पानी के गड्ढे में मिला शव, जांच में जुटी पुलिस

मंझनपुर, कौशांबी।
थाना मंझनपुर क्षेत्रांतर्गत ग्राम बधवा रजभर में पानी के गड्ढे में शव मिलने की सूचना पर हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही थाना स्थानीय पुलिस एवं फील्ड यूनिट ने तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थलीय निरीक्षण किया।
परिजनों के अनुसार मृतक को मिर्गी का दौरा आता था और उसका उपचार चल रहा था। प्रथम दृष्टया शव पर चोट के कोई निशान नहीं पाए गए हैं।
पुलिस द्वारा शव को कब्जे में लेकर पंचायतनामा व पोस्टमार्टम की कार्यवाही प्रचलित की गई है। इस संबंध में क्षेत्राधिकारी मंझनपुर श्री सौरभ सामंत ने वीडियो बाइट के माध्यम से जानकारी दी है।
    user_SHURU NEWS
    SHURU NEWS
    Media Consultant मिर्जापुर, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश•
    15 hrs ago
  • भदोही में तीन दिन बाद मौसम में दिखा सुधार, सोमवार को छाए बादल के बीच राहत भदोही। जनपद में पिछले तीन दिनों से आंधी, तेज हवाओं और बारिश के कारण जनजीवन प्रभावित रहा। लगातार बारिश के बाद सोमवार को मौसम में कुछ बदलाव देखने को मिला और कई इलाकों में आसमान अपेक्षाकृत साफ दिखाई दिया। बारिश थमने से लोगों ने राहत की सांस ली। हालांकि मौसम विभाग के अनुसार सोमवार को पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम बारिश की संभावना बनी हुई है, जबकि आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियां कम होने के आसार हैं। � तीन दिनों की बारिश के बाद मौसम साफ होने से किसानों और आम लोगों को भी कुछ राहत मिली है। भदोही में तीन दिन बाद मौसम में दिखा सुधार, सोमवार को छाए बादल के बीच राहत भदोही। जनपद में पिछले तीन दिनों से आंधी, तेज हवाओं और बारिश के कारण जनजीवन प्रभावित रहा। लगातार बारिश के बाद सोमवार को मौसम में कुछ बदलाव देखने को मिला और कई इलाकों में आसमान अपेक्षाकृत साफ दिखाई दिया। बारिश थमने से लोगों ने राहत की सांस ली। हालांकि मौसम विभाग के अनुसार सोमवार को पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम बारिश की संभावना बनी हुई है, जबकि आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियां कम होने के आसार हैं। � तीन दिनों की बारिश के बाद मौसम साफ होने से किसानों और आम लोगों को भी कुछ राहत मिली है। वहीं, जलभराव वाले इलाकों में पानी निकलने का इंतजार है।
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    भदोही में तीन दिन बाद मौसम में दिखा सुधार, सोमवार को छाए बादल के बीच राहत
भदोही। जनपद में पिछले तीन दिनों से आंधी, तेज हवाओं और बारिश के कारण जनजीवन प्रभावित रहा। लगातार बारिश के बाद सोमवार को मौसम में कुछ बदलाव देखने को मिला और कई इलाकों में आसमान अपेक्षाकृत साफ दिखाई दिया।
बारिश थमने से लोगों ने राहत की सांस ली। हालांकि मौसम विभाग के अनुसार सोमवार को पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम बारिश की संभावना बनी हुई है, जबकि आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियां कम होने के आसार हैं। �
तीन दिनों की बारिश के बाद मौसम साफ होने से किसानों और आम लोगों को भी कुछ राहत मिली है।
भदोही में तीन दिन बाद मौसम में दिखा सुधार, सोमवार को छाए बादल के बीच राहत
भदोही। जनपद में पिछले तीन दिनों से आंधी, तेज हवाओं और बारिश के कारण जनजीवन प्रभावित रहा। लगातार बारिश के बाद सोमवार को मौसम में कुछ बदलाव देखने को मिला और कई इलाकों में आसमान अपेक्षाकृत साफ दिखाई दिया।
बारिश थमने से लोगों ने राहत की सांस ली। हालांकि मौसम विभाग के अनुसार सोमवार को पूर्वांचल के कुछ हिस्सों में गरज-चमक के साथ हल्की से मध्यम बारिश की संभावना बनी हुई है, जबकि आने वाले दिनों में बारिश की गतिविधियां कम होने के आसार हैं। �
तीन दिनों की बारिश के बाद मौसम साफ होने से किसानों और आम लोगों को भी कुछ राहत मिली है। वहीं, जलभराव वाले इलाकों में पानी निकलने का इंतजार है।
    user_Ram sajivan pandey
    Ram sajivan pandey
    Local News Reporter ज्ञानपुर, भदोही, उत्तर प्रदेश•
    23 min ago
  • विश्व पर्यटन दिवस पर विंध्य माउंटेन एडवेंचर्स ट्रस्ट का ग्रैंड ओपनिंग समारोह विश्व पर्यटन दिवस पर विंध्य माउंटेन एडवेंचर्स ट्रस्ट का ग्रैंड ओपनिंग समारोह
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    विश्व पर्यटन दिवस पर विंध्य माउंटेन एडवेंचर्स ट्रस्ट का ग्रैंड ओपनिंग समारोह
विश्व पर्यटन दिवस पर विंध्य माउंटेन एडवेंचर्स ट्रस्ट का ग्रैंड ओपनिंग समारोह
    user_BHADOHI REPUBLIC NEWS (BRN BHARAT)
    BHADOHI REPUBLIC NEWS (BRN BHARAT)
    Newspaper publisher ज्ञानपुर, भदोही, उत्तर प्रदेश•
    1 hr ago
  • प्रयागराज: जवाहर नवोदय विद्यालय मेजा रोड में भोजन की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल।
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    प्रयागराज: जवाहर नवोदय विद्यालय मेजा रोड में भोजन की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल।
    user_मेट्रो संदेश न्यूज़
    मेट्रो संदेश न्यूज़
    Newspaper publisher मिर्जापुर, मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश•
    58 min ago
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