जैविक खेती विषय पर आधारित आयोजित किया गया प्रशिक्षण ----- शहडोल 11 मई 2026- कृषि विज्ञान केन्द्र शहडोल के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह की उपस्थिति में शासकीय पंडित शम्भुनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल में जैविक खेती विषय पर आधारित प्रशिक्षण आयोजित किया गया। प्रषिक्षण में कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. मृगेंद्र सिंह ने विद्यार्थियों को अवगत कराया कि जैविक खेती की विधि रासायनिक खेती की तुलना में मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है। इसके साथ ही कृषको को आय अधिक प्राप्त होती हैै। प्रषिक्षण में वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने विद्यार्थियों को जानकारी दी कि भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थो के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकोलाजी सिस्टम) प्रभावित करता है। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है। साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है, तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। प्राचीन काल में, मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी। जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। उन्होंने बताया कि जैविक खेती को इन समस्याओं के लिए बेहतर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। जैविक खेती के उपयोग से किसान अथवा उत्पादक को दूरगामी लाभ प्राप्त होने के साथ-साथ इसकी उत्पादन लगत भी 20-25 प्रतिशत तक कम हो जाती है। साथ ही यह भूमि की गुणवत्ता एवं उर्वरता बढ़ाकर, भूमि में कार्बन अवशेष की मात्रा को भी बढ़ाता है। इसके द्वारा फसल की उत्पादकता एवं उत्पादन बढ़ने के साथ ही स्वास्थ फसल प्राप्त होती है। कृषक मई-जून के महीने में मिट्टी पलटने वाले हल से खेतों की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करते हैं तो किसानों को इसके अनेक लाभ प्राप्त होंगे। इस प्रकार की जुताई से मृदा का सूर्य की किरणों से सीधा उपचार होता है। इस जुताई से हानिकारक कीट व पौध रोगकारक नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है जिससे कि जड़ो की अच्छी वृद्धि होती है। ग्रीष्मकालीन जुताई के बाद खेती की लागत में कमी आती है। साथ ही उपज में लाभ औसतन 10 प्रतिशत तक बढ जाती है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई रबी मौसम की फसल कटने के बाद शुरू हो जाती है, जो बरसात प्रारंभ होने तक चलती रहती है। गहरी जोताई का मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव पड़ता है। इससे हानिकारक कीटों से बचाव तथा खरपतवार नियंत्रित होता है, साथ ही मृदा में वायु संचार में बढ़ोत्तरी होती है तथा मृदा संरक्षण में सहायक होता है। जैविक खेती विषय पर आधारित आयोजित किया गया प्रशिक्षण ----- शहडोल 11 मई 2026- कृषि विज्ञान केन्द्र शहडोल के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह की उपस्थिति में शासकीय पंडित शम्भुनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल में जैविक खेती विषय पर आधारित प्रशिक्षण आयोजित किया गया। प्रषिक्षण में कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. मृगेंद्र सिंह ने विद्यार्थियों को अवगत कराया कि जैविक खेती की विधि रासायनिक खेती की तुलना में मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है। इसके साथ ही कृषको को आय अधिक प्राप्त होती हैै। प्रषिक्षण में वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने विद्यार्थियों को जानकारी दी कि भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थो के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकोलाजी सिस्टम) प्रभावित करता है। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है। साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है, तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। प्राचीन काल में, मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी। जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। उन्होंने बताया कि जैविक खेती को इन समस्याओं के लिए बेहतर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। जैविक खेती के उपयोग से किसान अथवा उत्पादक को दूरगामी लाभ प्राप्त होने के साथ-साथ इसकी उत्पादन लगत भी 20-25 प्रतिशत तक कम हो जाती है। साथ ही यह भूमि की गुणवत्ता एवं उर्वरता बढ़ाकर, भूमि में कार्बन अवशेष की मात्रा को भी बढ़ाता है। इसके द्वारा फसल की उत्पादकता एवं उत्पादन बढ़ने के साथ ही स्वास्थ फसल प्राप्त होती है। कृषक मई-जून के महीने में मिट्टी पलटने वाले हल से खेतों की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करते हैं तो किसानों को इसके अनेक लाभ प्राप्त होंगे। इस प्रकार की जुताई से मृदा का सूर्य की किरणों से सीधा उपचार होता है। इस जुताई से हानिकारक कीट व पौध रोगकारक नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है जिससे कि जड़ो की अच्छी वृद्धि होती है। ग्रीष्मकालीन जुताई के बाद खेती की लागत में कमी आती है। साथ ही उपज में लाभ औसतन 10 प्रतिशत तक बढ जाती है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई रबी मौसम की फसल कटने के बाद शुरू हो जाती है, जो बरसात प्रारंभ होने तक चलती रहती है। गहरी जोताई का मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव पड़ता है। इससे हानिकारक कीटों से बचाव तथा खरपतवार नियंत्रित होता है, साथ ही मृदा में वायु संचार में बढ़ोत्तरी होती है तथा मृदा संरक्षण में सहायक होता है।
जैविक खेती विषय पर आधारित आयोजित किया गया प्रशिक्षण ----- शहडोल 11 मई 2026- कृषि विज्ञान केन्द्र शहडोल के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह की उपस्थिति में शासकीय पंडित शम्भुनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल में जैविक खेती विषय पर आधारित प्रशिक्षण आयोजित किया गया। प्रषिक्षण में कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. मृगेंद्र सिंह ने विद्यार्थियों को अवगत कराया कि जैविक खेती की विधि रासायनिक खेती की तुलना में मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है। इसके साथ ही कृषको को आय अधिक प्राप्त होती हैै। प्रषिक्षण में वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने विद्यार्थियों को जानकारी दी कि भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थो के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकोलाजी सिस्टम) प्रभावित करता है। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है। साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है, तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। प्राचीन काल में, मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी। जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। उन्होंने बताया कि जैविक खेती को इन समस्याओं के लिए बेहतर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। जैविक खेती के उपयोग से किसान अथवा उत्पादक को दूरगामी लाभ प्राप्त होने के साथ-साथ इसकी उत्पादन लगत भी 20-25 प्रतिशत तक कम हो जाती है। साथ ही यह भूमि की गुणवत्ता एवं उर्वरता बढ़ाकर, भूमि में कार्बन अवशेष की मात्रा को भी बढ़ाता है। इसके द्वारा फसल की उत्पादकता एवं उत्पादन बढ़ने के साथ ही स्वास्थ फसल प्राप्त होती है। कृषक मई-जून के महीने में मिट्टी पलटने वाले हल से खेतों की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करते हैं तो किसानों को इसके अनेक लाभ प्राप्त होंगे। इस प्रकार की जुताई से मृदा का सूर्य की किरणों से सीधा उपचार होता है। इस जुताई से हानिकारक कीट व पौध रोगकारक नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है जिससे कि जड़ो की अच्छी वृद्धि होती है। ग्रीष्मकालीन जुताई के बाद खेती की लागत में कमी आती है। साथ ही उपज में लाभ औसतन 10 प्रतिशत तक बढ जाती है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई रबी मौसम की फसल कटने के बाद शुरू हो जाती है, जो बरसात प्रारंभ होने तक चलती रहती है। गहरी जोताई का मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव पड़ता है। इससे हानिकारक कीटों से बचाव तथा खरपतवार नियंत्रित होता है, साथ ही मृदा में वायु संचार में बढ़ोत्तरी होती है तथा मृदा संरक्षण में सहायक होता है। जैविक खेती विषय पर आधारित आयोजित किया गया प्रशिक्षण ----- शहडोल 11 मई 2026- कृषि विज्ञान केन्द्र शहडोल के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह की उपस्थिति में शासकीय पंडित शम्भुनाथ शुक्ला विश्वविद्यालय, शहडोल में जैविक खेती विषय पर आधारित प्रशिक्षण आयोजित किया गया। प्रषिक्षण में कृषि विज्ञान केंद्र के डॉ. मृगेंद्र सिंह ने विद्यार्थियों को अवगत कराया कि जैविक खेती की विधि रासायनिक खेती की तुलना में मृदा की उर्वरता एवं कृषकों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में जैविक खेती की विधि और भी अधिक लाभदायक है। जैविक विधि द्वारा खेती करने से उत्पादन की लागत तो कम होती ही है। इसके साथ ही कृषको को आय अधिक प्राप्त होती हैै। प्रषिक्षण में वैज्ञानिक डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने विद्यार्थियों को जानकारी दी कि भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद्य उत्पादन की होड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थो के बीच आदान-प्रदान के चक्र को (इकोलाजी सिस्टम) प्रभावित करता है। जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है। साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है, तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। प्राचीन काल में, मानव स्वास्थ्य के अनुकुल तथा प्राकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी। जिससे जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरन्तर चलता रहा था, जिसके फलस्वरूप जल, भूमि, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता था। उन्होंने बताया कि जैविक खेती को इन समस्याओं के लिए बेहतर विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है। जैविक खेती के उपयोग से किसान अथवा उत्पादक को दूरगामी लाभ प्राप्त होने के साथ-साथ इसकी उत्पादन लगत भी 20-25 प्रतिशत तक कम हो जाती है। साथ ही यह भूमि की गुणवत्ता एवं उर्वरता बढ़ाकर, भूमि में कार्बन अवशेष की मात्रा को भी बढ़ाता है। इसके द्वारा फसल की उत्पादकता एवं उत्पादन बढ़ने के साथ ही स्वास्थ फसल प्राप्त होती है। कृषक मई-जून के महीने में मिट्टी पलटने वाले हल से खेतों की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करते हैं तो किसानों को इसके अनेक लाभ प्राप्त होंगे। इस प्रकार की जुताई से मृदा का सूर्य की किरणों से सीधा उपचार होता है। इस जुताई से हानिकारक कीट व पौध रोगकारक नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है जिससे कि जड़ो की अच्छी वृद्धि होती है। ग्रीष्मकालीन जुताई के बाद खेती की लागत में कमी आती है। साथ ही उपज में लाभ औसतन 10 प्रतिशत तक बढ जाती है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई रबी मौसम की फसल कटने के बाद शुरू हो जाती है, जो बरसात प्रारंभ होने तक चलती रहती है। गहरी जोताई का मृदा के भौतिक गुणों पर प्रभाव पड़ता है। इससे हानिकारक कीटों से बचाव तथा खरपतवार नियंत्रित होता है, साथ ही मृदा में वायु संचार में बढ़ोत्तरी होती है तथा मृदा संरक्षण में सहायक होता है।
- बांधवगढ़ में दहाड़ के बाद मौत की खामोशी,ढमढमा कैंप के पास मिला बाघ का शव* 💥 *बांधवगढ़ में दहाड़ के बाद मौत की खामोशी,ढमढमा कैंप के पास मिला बाघ का शव* बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के खितौली परिक्षेत्र में सोमवार सुबह उस वक्त हलचल मच गई,जब जंगल में बाघों के बीच भीषण संघर्ष की आवाजें सुनाई दीं।कुछ ही देर बाद जंगल की खामोशी ने एक दर्दनाक सच उजागर कर दिया।जानकारी के मुताबिक सुबह लगभग 6:30 बजे पश्चिम बगदरी बीट स्थित ढमढमा कैंप के सुरक्षा श्रमिकों ने बाघों के लड़ने की तेज आवाज सुनी।सूचना मिलते ही गश्ती दल ने पूरे क्षेत्र में सघन सर्चिंग शुरू की।छानबीन के दौरान जंगल में एक बाघ मृत अवस्था में मिला,जिससे वन अमले में हड़कंप मच गया।वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा दूर से किए गए प्राथमिक परीक्षण में प्रथम दृष्टया बाघ की मौत आपसी संघर्ष का परिणाम मानी जा रही है।मृत बाघ के शरीर पर हमले के गहरे निशान पाए गए हैं।राहत की बात यह रही कि मौके पर बाघ के सभी अंग सुरक्षित मिले हैं,जिससे शिकार की आशंका फिलहाल कमजोर मानी जा रही है।घटना के बाद पूरे क्षेत्र की घेराबंदी कर दी गई है।मामले की गंभीरता को देखते हुए हाथी गश्ती दल,डॉग स्क्वॉड और मेटल डिटेक्टर टीम को भी मौके पर बुलाया गया है।वन विभाग द्वारा आगे की कार्रवाई एनटीसीए की गाइडलाइन और एसओपी के अनुसार की जा रही है।बांधवगढ़ के जंगलों में बाघों के वर्चस्व की लड़ाई अक्सर खूनी साबित होती रही है,और एक बार फिर जंगल की यही जंग एक बाघ की जान ले गई।3
- उमरिया जिले के मनपुर में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बन रहे घरों का काम रंगदारों द्वारा रोका जा रहा है। उनकी धमकियों के चलते निर्माण कार्य ठप हो गया है, जिससे गरीबों को अपने सपनों का घर मिलने में बाधा आ रही है।4
- अतिक्रमण के चलते ऑटो पलटा,, समाजसेवियों द्वारा सुरक्षित निकाला गया,1
- मिर्जापुर के मां विंध्यवासिनी मंदिर में श्रद्धालुओं के बीच मारपीट की घटना से हड़कंप मच गया। इस घटना के बाद मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा इंतज़ामों पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।1
- मध्य प्रदेश के मनगवां के विधायक खुद को मशहूर गायक सोनू निगम समझते हैं और अक्सर स्टेज पर अजीब हरकतें करते हैं। उनकी इन हरकतों के कारण उन्हें अक्सर बेइज्जती झेलनी पड़ती है और लोग इसका मज़ाक उड़ाते हैं।1
- सतना जिले के मैहर स्थित माँ शारदा शक्तिपीठ में सोमवार को प्रातःकालीन दर्शन और दिव्य श्रृंगार आरती संपन्न हुई। इस दौरान भक्तों ने जय माई की उद्घोष के साथ माँ का आशीर्वाद प्राप्त किया।3
- रीवा के गड़रिया इलाके में चलती फोर्ड फिएस्टा कार में अचानक आग लग गई, जिससे चालक ने कूदकर अपनी जान बचाई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों पर लापरवाही के आरोप लगे क्योंकि उन्होंने ट्रैफिक रोकने के बजाय जलती कार का वीडियो बनाया। इस घटना से स्थानीय लोगों में नाराजगी है और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे हैं।1
- 💥*_रेत माफियाओं का दुस्साहस-दूसरे दिन घिरी फॉरेस्ट टीम,सलैया में तनावपूर्ण हालात_* 💥*_रेत माफियाओं का दुस्साहस-दूसरे दिन घिरी फॉरेस्ट टीम,सलैया में तनावपूर्ण हालात_* _अवैध रेत कारोबारियों के हौसले लगातार बेलगाम होते नजर आ रहे हैं,चंदिया वन परिक्षेत्र में वनरक्षक से जातिसूचक गाली-गलौज,धमकी और शासकीय कार्य में बाधा के मामले के दूसरे ही दिन सोमवार को स्थिति और तनावपूर्ण हो गई।सूत्रों के मुताबिक मामले की कार्रवाई के सिलसिले में जब फॉरेस्ट विभाग की टीम चंदिया थाना अंतर्गत ग्राम सलैया अखडार पहुंची,तब स्थानीय रेत कारोबारियों और उनके समर्थकों ने सोमवार की दोपहर टीम को घेर लिया।अचानक बने इस माहौल से मौके पर अफरा-तफरी की स्थिति निर्मित हो गई।बताया जा रहा है कि टीम को कार्रवाई करने में भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।गौरतलब है कि रविवार को सलैया बीट में गश्ती के दौरान वनरक्षक रामशंकर चर्मकार ने तीन ट्रैक्टरों में अवैध रेत लोड होते पकड़ा था।आरोप है कि कार्रवाई के दौरान आरोपियों ने वनरक्षक को जातिसूचक गालियां दीं,धक्का-मुक्की की और जान से मारने की धमकी देते हुए ट्रैक्टर मौके से फरार हो गए थे।इस मामले में बीएनएस की धाराओं सहित एससी-एसटी एक्ट के तहत माफियाओं पर अपराध दर्ज किया गया है।दूसरे दिन यानी आज सोमवार को जब फॉरेस्ट टीम दोबारा गांव पहुंची और ट्रैक्टर को जपत करने की कोशिश की तो माफियाओं ने फारेस्ट टीम को घेर लिया,हालांकि अभी वर्तमान की स्थिति सामान्य दिख रही है,इस कार्यवाही में रेंजर नीलेश द्विवेदी सहित विभागीय वन टीम मौजूद रही है।खबर ये भी है कि फारेस्ट टीम ने साहसिक परिचय देते हुए माफियाओं का एक ट्रैक्टर जपत कर वापस चंदिया आ रहे है।_ *_ऐसी दुस्साहसिक घटना ने यह साफ कर दिया है कि क्षेत्र में सक्रिय रेत माफिया प्रशासनिक कार्रवाई को खुली चुनौती दे रहे हैं।इलाके में बढ़ते तनाव को देखते हुए पुलिस और वन विभाग की आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।_*1