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इलाज के लिए आए थे यहां तो व्यवस्था ही मरीज निकली दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की गैर हाजिरी से लेकर जांच रिपोर्टर तक सवालों का जाल ऑपरेशन से पहले 25 से 30हजार की बाहर वाली पर्ची का आरोप बांदा।मरीज अस्पताल पहुंचता है बीमारी लेकर… लेकिन यहां पहुंचते ही उसे एक और बीमारी पकड़ लेती है—व्यवस्था की।कहीं डॉक्टर की कुर्सी खाली है, कहीं स्टाफ का पता नहीं, कहीं जांच रिपोर्ट पर जिम्मेदारी के हस्ताक्षर तलाशे जा रहे हैं और कहीं ऑपरेशन से पहले मरीज को दवाओं और सामान की ऐसी सूची थमा दिए जाने के आरोप हैं, जिसे देखकर बीमारी से ज्यादा जेब का दर्द बढ़ जाए।यह तस्वीर किसी निजी अस्पताल की नहीं, बल्कि राजकीय रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज की बताई जा रही है।जिस संस्थान को बुंदेलखंड के गरीब मरीजों के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा दरवाजा होना चाहिए, वहां व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे सवाल अब इतने गंभीर हैं कि उन्हें नजरअंदाज करना मरीजों की पीड़ा को नजरअंदाज करने जैसा होगा।डॉक्टर कहां हैं? मरीज पूछ रहा है… कुर्सी जवाब दे रही है!ईएनटी विभाग के HOD जितेंद्र यादव और सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष कुलदीप के लंबे समय से ड्यूटी से नदारद रहने के आरोप सामने आए हैं।अगर आरोप सही हैं तो फिर सवाल बेहद सीधा है—जब विभागाध्यक्ष ही विभाग में नहीं होंगे तो मरीज की शिकायत कौन सुनेगा? और अगर वे नियमित रूप से ड्यूटी पर हैं तो उनकी उपस्थिति का रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के सामने रखने में परेशानी क्या है? सरकारी अस्पताल में मरीज डॉक्टर को खोजता रहे और डॉक्टर फाइलों में मौजूद मिले—तो फिर इलाज किसका हो रहा है?फार्मेसी में दवा है, लेकिन स्टाफ कहां है?आरोप है कि फार्मेसी में तैनात स्थायी स्टाफ का एक हिस्सा नियमित ड्यूटी पर नहीं पहुंचता।मरीज दवा लेने आता है।काउंटर देखता है। कर्मचारी तलाशता है। फिर व्यवस्था को तलाशता है। दवा मुफ्त हो सकती है, लेकिन अगर उसे देने वाला ही गायब हो तो मरीज के लिए मुफ्त इलाज का अर्थ क्या रह जाता है?जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं… फिर रिपोर्ट किसकी?सबसे गंभीर सवाल पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी की जांच रिपोर्टों को लेकर है। आरोप है कि मरीजों को दी जाने वाली कुछ रिपोर्टों पर स्थायी लैब टेक्नीशियन के हस्ताक्षर तक नहीं होते।जरा सोचिए—एक मरीज अपनी बीमारी का सच जानने के लिए जांच कराता है।रिपोर्ट हाथ में आती है।डॉक्टर उसी रिपोर्ट को देखकर इलाज तय करता है।लेकिन रिपोर्ट पर जिम्मेदारी का हस्ताक्षर ही न हो तो…मरीज भरोसा किस पर करे—मशीन पर, कागज पर या किस्मत पर?यह सवाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, सीधे मरीज की सुरक्षा से जुड़ा है।ऑपरेशन से पहले मरीज की जेब का ‘ऑपरेशन’!सरकारी अस्पताल में गरीब मरीज इस भरोसे आता है कि यहां इलाज उसकी पहुंच में होगा।लेकिन आरोप है कि सर्जरी से पहले मरीजों को 25 से 30 हजार रुपये तक की दवाएं और चिकित्सा सामग्री बाहर से खरीदने के लिए कहा जाता है।यानी—ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले ही मरीज की जेब का ऑपरेशन! दूर गांव से आया मजदूर, किसान या गरीब परिवार इतनी बड़ी रकम कहां से लाए?क्या अस्पताल में जरूरी दवाएं और सर्जिकल सामग्री उपलब्ध नहीं हैं? यदि नहीं हैं तो क्यों नहीं? और यदि उपलब्ध हैं तो मरीजों को बाहर से खरीदारी क्यों करनी पड़ रही है? इन सवालों के जवाब कागज से नहीं, रिकॉर्ड और जांच से मिलने चाहिए।11 साल की तैनाती—कुर्सी से रिश्ता इतना गहरा कि तबादला भी हार गया?डॉ. मुकेश बंसल के करीब 11 वर्षों से इसी मेडिकल कॉलेज में जमे होने का आरोप है।सरकारी सेवा में तबादला सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन यहां आरोपों के मुताबिक एक ही जगह पर 11 साल का पड़ाव है।और सवाल यहीं खत्म नहीं होता।आउटसोर्सिंग, सुरक्षा और सफाई समेत कई महत्वपूर्ण प्रभार भी उन्हीं के पास होने की बात कही जा रही है।एक व्यक्ति, इतने महत्वपूर्ण प्रभार और वर्षों की एक ही जगह तैनाती—क्या यह व्यवस्था पारदर्शिता की कसौटी पर खरी उतरती है? यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो दस्तावेज सामने आने चाहिए।यदि नियमों में कोई अपवाद है तो उसका आधार भी सामने आना चाहिए।क्योंकि सवाल व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था के चरित्र का है।साढ़े तीन साल से ‘प्रभारी’—क्या कुर्सी को स्थायित्व पसंद नहीं?मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य पद पर डॉ. सुनील कौशल करीब साढ़े तीन वर्षों से प्रभारी/कार्यवाहक के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यह भी अपने आप में बड़ा सवाल है।जिस मेडिकल कॉलेज में मरीजों की जिंदगी का इलाज होता है, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था वर्षों तक ‘प्रभारी’ के भरोसे क्यों चले?क्या स्थायी प्राचार्य की जरूरत सिर्फ सरकारी कागजों में है?सबसे बड़ा सवाल—मरीज जाए तो जाए कहां?मेडिकल कॉलेज की सबसे कमजोर कड़ी मरीज है।वह बहस करने नहीं आता।वह व्यवस्था को चुनौती देने नहीं आता।वह सिर्फ इलाज कराने आता है।वह अपनी बीमारी के साथ अपनी बचत भी लेकर आता है।कई बार बचत खत्म होती है तो गहने बिकते हैं।गहने खत्म होते हैं तो कर्ज शुरू होता है।ऐसे मरीज को यदि सरकारी अस्पताल में भी बाहर से दवाएं और सामान खरीदने की मजबूरी झेलनी पड़े, तो फिर गरीब के लिए सरकारी अस्पताल और निजी अस्पताल के बीच अंतर आखिर बचता क्या है?अब जांच जरूरी है—और ऐसी जांच, जिसमें फाइल नहीं, सच खुले इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।डॉक्टरों की उपस्थिति जांची जाए।फार्मेसी स्टाफ की ड्यूटी का रिकॉर्ड देखा जाए।जांच रिपोर्ट जारी करने की पूरी प्रक्रिया की पड़ताल हो।ऑपरेशन के दौरान बाहर से खरीदी गई दवाओं और सामग्री का रिकॉर्ड मिलाया जाए।महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रभारों की समीक्षा हो।लंबी तैनाती के नियमों और उसके औचित्य की जांच हो।क्योंकि अगर आरोप झूठे हैं तो जांच उन्हें झूठ साबित करेगी।और अगर आरोप सही हैं तो…फिर यह सिर्फ अस्पताल की अव्यवस्था नहीं होगी—यह उस भरोसे के साथ धोखा होगा, जिसके सहारे बुंदेलखंड का गरीब मरीज मेडिकल कॉलेज की चौखट तक पहुंचता है।अस्पताल की इमारत कितनी भी भव्य क्यों न हो,मरीज को इलाज चाहिए—कुर्सियां नहीं।रिपोर्ट चाहिए—सवाल नहीं।दवा चाहिए—बाहर की पर्ची नहीं।और सबसे बढ़कर… उसे भरोसा चाहिए।अब देखना यह है कि शासन इन सवालों का इलाज करता है या फिर इन सवालों को ही बीमारी बताकर फाइल में बंद कर देता है।

14 hrs ago
user_Amod Kumar
Amod Kumar
रिपोर्टर बांदा, बांदा, उत्तर प्रदेश•
14 hrs ago

इलाज के लिए आए थे यहां तो व्यवस्था ही मरीज निकली दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की गैर हाजिरी से लेकर जांच रिपोर्टर तक सवालों का जाल ऑपरेशन से पहले 25 से 30हजार की बाहर वाली पर्ची का आरोप बांदा।मरीज अस्पताल पहुंचता है बीमारी लेकर… लेकिन यहां पहुंचते ही उसे एक और बीमारी पकड़ लेती है—व्यवस्था की।कहीं डॉक्टर की कुर्सी खाली है, कहीं स्टाफ का पता नहीं, कहीं जांच रिपोर्ट पर जिम्मेदारी के हस्ताक्षर तलाशे जा रहे हैं और कहीं ऑपरेशन से पहले मरीज को दवाओं और सामान की ऐसी सूची थमा दिए जाने के आरोप हैं, जिसे देखकर बीमारी से ज्यादा जेब का दर्द बढ़ जाए।यह तस्वीर किसी निजी अस्पताल की नहीं, बल्कि राजकीय रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज की बताई जा रही है।जिस संस्थान को बुंदेलखंड के गरीब मरीजों के लिए उम्मीद का सबसे बड़ा दरवाजा होना चाहिए, वहां व्यवस्थाओं को लेकर उठ रहे सवाल अब इतने गंभीर हैं कि उन्हें नजरअंदाज करना मरीजों की पीड़ा को नजरअंदाज करने जैसा होगा।डॉक्टर कहां हैं? मरीज पूछ रहा है… कुर्सी जवाब दे रही है!ईएनटी विभाग के HOD जितेंद्र यादव और सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष कुलदीप के लंबे समय से ड्यूटी से नदारद रहने के आरोप सामने आए हैं।अगर आरोप सही हैं तो फिर सवाल बेहद सीधा है—जब विभागाध्यक्ष ही विभाग में नहीं होंगे तो मरीज की शिकायत कौन सुनेगा? और अगर वे नियमित रूप से ड्यूटी पर हैं तो उनकी उपस्थिति का रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच के सामने रखने में परेशानी क्या है? सरकारी अस्पताल में मरीज डॉक्टर को खोजता रहे और डॉक्टर फाइलों में मौजूद मिले—तो फिर इलाज किसका हो रहा है?फार्मेसी में दवा है, लेकिन स्टाफ कहां है?आरोप है कि फार्मेसी में तैनात स्थायी स्टाफ का एक हिस्सा नियमित ड्यूटी पर नहीं पहुंचता।मरीज दवा लेने आता है।काउंटर देखता है। कर्मचारी तलाशता है। फिर व्यवस्था को तलाशता है। दवा मुफ्त हो सकती है, लेकिन अगर उसे देने वाला ही गायब हो तो मरीज के लिए मुफ्त इलाज का अर्थ क्या रह जाता है?जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं… फिर रिपोर्ट किसकी?सबसे गंभीर सवाल पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी की जांच रिपोर्टों को लेकर है। आरोप है कि मरीजों को दी जाने वाली कुछ रिपोर्टों पर स्थायी लैब टेक्नीशियन के हस्ताक्षर तक नहीं होते।जरा सोचिए—एक मरीज अपनी बीमारी का सच जानने के लिए जांच कराता है।रिपोर्ट हाथ में आती है।डॉक्टर उसी रिपोर्ट को देखकर इलाज तय करता है।लेकिन रिपोर्ट पर जिम्मेदारी का हस्ताक्षर ही न हो तो…मरीज भरोसा किस पर करे—मशीन पर, कागज पर या किस्मत पर?यह सवाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, सीधे मरीज की सुरक्षा से जुड़ा है।ऑपरेशन से पहले मरीज की जेब का ‘ऑपरेशन’!सरकारी अस्पताल में गरीब मरीज इस भरोसे आता है कि यहां इलाज उसकी पहुंच में होगा।लेकिन आरोप है कि सर्जरी से पहले मरीजों को 25 से 30 हजार रुपये तक की दवाएं और चिकित्सा सामग्री बाहर से खरीदने के लिए कहा जाता है।यानी—ऑपरेशन थिएटर में जाने से पहले ही मरीज की जेब का ऑपरेशन! दूर गांव से आया मजदूर, किसान या गरीब परिवार इतनी बड़ी रकम कहां से लाए?क्या अस्पताल में जरूरी दवाएं और सर्जिकल सामग्री उपलब्ध नहीं हैं? यदि नहीं हैं तो क्यों नहीं? और यदि उपलब्ध हैं तो मरीजों को बाहर से खरीदारी क्यों करनी पड़ रही है? इन सवालों के जवाब कागज से नहीं, रिकॉर्ड और जांच से मिलने चाहिए।11 साल की तैनाती—कुर्सी से रिश्ता इतना गहरा कि तबादला भी हार गया?डॉ. मुकेश बंसल के करीब 11 वर्षों से इसी मेडिकल कॉलेज में जमे होने का आरोप है।सरकारी सेवा में तबादला सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन यहां आरोपों के मुताबिक एक ही जगह पर 11 साल का पड़ाव है।और सवाल यहीं खत्म नहीं होता।आउटसोर्सिंग, सुरक्षा और सफाई समेत कई महत्वपूर्ण प्रभार भी उन्हीं के पास होने की बात कही जा रही है।एक व्यक्ति, इतने महत्वपूर्ण प्रभार और वर्षों की एक ही जगह तैनाती—क्या यह व्यवस्था पारदर्शिता की कसौटी पर खरी उतरती है? यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो दस्तावेज सामने आने चाहिए।यदि नियमों में कोई अपवाद है तो उसका आधार भी सामने आना चाहिए।क्योंकि सवाल व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था के चरित्र का है।साढ़े तीन साल से ‘प्रभारी’—क्या कुर्सी को स्थायित्व पसंद नहीं?मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य पद पर डॉ. सुनील कौशल करीब साढ़े तीन वर्षों से प्रभारी/कार्यवाहक के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। यह भी अपने आप में बड़ा सवाल है।जिस मेडिकल कॉलेज में मरीजों की जिंदगी का इलाज होता है, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था वर्षों तक ‘प्रभारी’ के भरोसे क्यों चले?क्या स्थायी प्राचार्य की जरूरत सिर्फ सरकारी कागजों में है?सबसे बड़ा सवाल—मरीज जाए तो जाए कहां?मेडिकल कॉलेज की सबसे कमजोर कड़ी मरीज है।वह बहस करने नहीं आता।वह व्यवस्था को चुनौती देने नहीं आता।वह सिर्फ इलाज कराने आता है।वह अपनी बीमारी के साथ अपनी बचत भी लेकर आता है।कई बार बचत खत्म होती है तो गहने बिकते हैं।गहने खत्म होते हैं तो कर्ज शुरू होता है।ऐसे मरीज को यदि सरकारी अस्पताल में भी बाहर से दवाएं और सामान खरीदने की मजबूरी झेलनी पड़े, तो फिर गरीब के लिए सरकारी अस्पताल और निजी अस्पताल के बीच अंतर आखिर बचता क्या है?अब जांच जरूरी है—और ऐसी जांच, जिसमें फाइल नहीं, सच खुले इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।डॉक्टरों की उपस्थिति जांची जाए।फार्मेसी स्टाफ की ड्यूटी का रिकॉर्ड देखा जाए।जांच रिपोर्ट जारी करने की पूरी प्रक्रिया की पड़ताल हो।ऑपरेशन के दौरान बाहर से खरीदी गई दवाओं और सामग्री का रिकॉर्ड मिलाया जाए।महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रभारों की समीक्षा हो।लंबी तैनाती के नियमों और उसके औचित्य की जांच हो।क्योंकि अगर आरोप झूठे हैं तो जांच उन्हें झूठ साबित करेगी।और अगर आरोप सही हैं तो…फिर यह सिर्फ अस्पताल की अव्यवस्था नहीं होगी—यह उस भरोसे के साथ धोखा होगा, जिसके सहारे बुंदेलखंड का गरीब मरीज मेडिकल कॉलेज की चौखट तक पहुंचता है।अस्पताल की इमारत कितनी भी भव्य क्यों न हो,मरीज को इलाज चाहिए—कुर्सियां नहीं।रिपोर्ट चाहिए—सवाल नहीं।दवा चाहिए—बाहर की पर्ची नहीं।और सबसे बढ़कर… उसे भरोसा चाहिए।अब देखना यह है कि शासन इन सवालों का इलाज करता है या फिर इन सवालों को ही बीमारी बताकर फाइल में बंद कर देता है।

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  • हमीरपुर :पक्की सड़क की मांग को लेकर GEZ अल्फा के छात्रों का कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन, मचा हड़कंप हमीरपुर। कुरारा क्षेत्र के चंदूपुर गांव से हमीरपुर स्थित जिलाधिकारी कार्यालय तक मंगलवार को GEZ अल्फा स्कूल के छात्रों और ग्रामीणों ने पक्की सड़क निर्माण की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। बड़ी संख्या में छात्र हाथों में तिरंगा लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे और जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर अपनी मांग को लेकर आवाज बुलंद की। अचानक बड़ी संख्या में बच्चों के कलेक्ट्रेट पहुंचने से परिसर में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी और हलचल का माहौल बन गया। प्रदर्शनकारी छात्रों और ग्रामीणों का कहना था कि चंदूपुर-हमीरपुर मार्ग से स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क का अभाव विद्यार्थियों के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है। बारिश के दिनों में रास्ते पर कीचड़ और जलभराव हो जाने से बच्चों को स्कूल आने-जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है। कई बार बच्चों के कपड़े और जूते कीचड़ से खराब हो जाते हैं तथा रास्ते में फिसलने का भी खतरा बना रहता है। इसी समस्या को लेकर छात्र और ग्रामीण चंदूपुर से पैदल यात्रा करते हुए जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। हाथों में तिरंगा लेकर पहुंचे बच्चों ने प्रशासन से स्कूल तक पक्की सड़क का निर्माण कराए जाने की मांग की। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने अपनी समस्या को अधिकारियों के सामने रखने का प्रयास किया। बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ छात्र जिलाधिकारी कार्यालय के पर्सनल डोर तक पहुंचने का प्रयास करने लगे। इस पर कलेक्ट्रेट परिसर में तैनात पुलिसकर्मी तत्काल सक्रिय हो गए और छात्रों को रोककर स्थिति को संभाला। पुलिसकर्मियों ने बच्चों को समझाया, जिसके बाद स्थिति शांत हुई। छात्रों और ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि विद्यार्थियों की परेशानी को देखते हुए चंदूपुर-हमीरपुर मार्ग से स्कूल तक पक्की सड़क निर्माण की प्रक्रिया जल्द शुरू कराई जाए। प्रदर्शन के चलते कलेक्ट्रेट परिसर में काफी देर तक हलचल बनी रही। छात्रों का कहना है कि यदि सड़क निर्माण की दिशा में जल्द ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे दोबारा अपनी मांग को लेकर आवाज उठाएंगे।
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    हमीरपुर :पक्की सड़क की मांग को लेकर GEZ अल्फा के छात्रों का कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन, मचा हड़कंप
हमीरपुर। कुरारा क्षेत्र के चंदूपुर गांव से हमीरपुर स्थित जिलाधिकारी कार्यालय तक मंगलवार को GEZ अल्फा स्कूल के छात्रों और ग्रामीणों ने पक्की सड़क निर्माण की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। बड़ी संख्या में छात्र हाथों में तिरंगा लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचे और जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर अपनी मांग को लेकर आवाज बुलंद की। अचानक बड़ी संख्या में बच्चों के कलेक्ट्रेट पहुंचने से परिसर में कुछ देर के लिए अफरा-तफरी और हलचल का माहौल बन गया।
प्रदर्शनकारी छात्रों और ग्रामीणों का कहना था कि चंदूपुर-हमीरपुर मार्ग से स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क का अभाव विद्यार्थियों के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है। बारिश के दिनों में रास्ते पर कीचड़ और जलभराव हो जाने से बच्चों को स्कूल आने-जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है। कई बार बच्चों के कपड़े और जूते कीचड़ से खराब हो जाते हैं तथा रास्ते में फिसलने का भी खतरा बना रहता है।
इसी समस्या को लेकर छात्र और ग्रामीण चंदूपुर से पैदल यात्रा करते हुए जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। हाथों में तिरंगा लेकर पहुंचे बच्चों ने प्रशासन से स्कूल तक पक्की सड़क का निर्माण कराए जाने की मांग की। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने अपनी समस्या को अधिकारियों के सामने रखने का प्रयास किया।
बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान कुछ छात्र जिलाधिकारी कार्यालय के पर्सनल डोर तक पहुंचने का प्रयास करने लगे। इस पर कलेक्ट्रेट परिसर में तैनात पुलिसकर्मी तत्काल सक्रिय हो गए और छात्रों को रोककर स्थिति को संभाला। पुलिसकर्मियों ने बच्चों को समझाया, जिसके बाद स्थिति शांत हुई।
छात्रों और ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि विद्यार्थियों की परेशानी को देखते हुए चंदूपुर-हमीरपुर मार्ग से स्कूल तक पक्की सड़क निर्माण की प्रक्रिया जल्द शुरू कराई जाए। प्रदर्शन के चलते कलेक्ट्रेट परिसर में काफी देर तक हलचल बनी रही। छात्रों का कहना है कि यदि सड़क निर्माण की दिशा में जल्द ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे दोबारा अपनी मांग को लेकर आवाज उठाएंगे।
    user_Raj kumar जिला ब्यूरो चीफ
    Raj kumar जिला ब्यूरो चीफ
    मौदहा, हमीरपुर, उत्तर प्रदेश•
    18 hrs ago
  • न्यायालय के आदेश के बावजूद भूमि पर कब्जा न मिलने का आरोप, डीएम से लगाई गुहार महोबा। महोबकंठ थाना क्षेत्र के धरवार गांव निवासी एक व्यक्ति ने अपनी भूमि पर कथित कब्जे और बाउंड्री निर्माण को लेकर जिलाधिकारी से शिकायत की है। शिकायतकर्ता लक्ष्मण पुत्र श्रीपत ने गाटा संख्या 629, रकबा 0.364 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा दिलाए जाने की मांग की है। जिलाधिकारी को दिए प्रार्थना पत्र में शिकायतकर्ता ने बताया कि उक्त भूमि को लेकर न्यायालय अपर जिलाधिकारी महोबा तथा न्यायालय आयुक्त चित्रकूटधाम मंडल बांदा में मामला चला, जिसमें उसके पक्ष में आदेश होने का दावा किया गया है। इसके बावजूद शिकायतकर्ता के अनुसार उसे अभी तक भूमि पर कब्जा नहीं मिल सका है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संबंधित भूमि पर कुछ लोगों द्वारा बाउंड्री वॉल का निर्माण कराया जा रहा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि जब उसने निर्माण का विरोध किया तो उसके साथ गाली-गलौज करते हुए कथित रूप से मारपीट की गई। शिकायत के मुताबिक मामले की सूचना महोबकंठ थाने में देने पर भी उसे कथित तौर पर मुकदमा दर्ज कर जेल भेजने की धमकी दी गई। शिकायतकर्ता ने जिलाधिकारी से मांग की है कि मामले की जांच कराते हुए बाउंड्री निर्माण पर रोक लगाई जाए और न्यायालय के आदेशों के अनुरूप उसे भूमि पर कब्जा दिलाया जाए। #ikvnews #mahobainsight DM Mahoba
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    न्यायालय के आदेश के बावजूद भूमि पर कब्जा न मिलने का आरोप, डीएम से लगाई गुहार
महोबा। महोबकंठ थाना क्षेत्र के धरवार गांव निवासी एक व्यक्ति ने अपनी भूमि पर कथित कब्जे और बाउंड्री निर्माण को लेकर जिलाधिकारी से शिकायत की है। शिकायतकर्ता लक्ष्मण पुत्र श्रीपत ने गाटा संख्या 629, रकबा 0.364 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा दिलाए जाने की मांग की है।
जिलाधिकारी को दिए प्रार्थना पत्र में शिकायतकर्ता ने बताया कि उक्त भूमि को लेकर न्यायालय अपर जिलाधिकारी महोबा तथा न्यायालय आयुक्त चित्रकूटधाम मंडल बांदा में मामला चला, जिसमें उसके पक्ष में आदेश होने का दावा किया गया है। इसके बावजूद शिकायतकर्ता के अनुसार उसे अभी तक भूमि पर कब्जा नहीं मिल सका है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संबंधित भूमि पर कुछ लोगों द्वारा बाउंड्री वॉल का निर्माण कराया जा रहा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि जब उसने निर्माण का विरोध किया तो उसके साथ गाली-गलौज करते हुए कथित रूप से मारपीट की गई। शिकायत के मुताबिक मामले की सूचना महोबकंठ थाने में देने पर भी उसे कथित तौर पर मुकदमा दर्ज कर जेल भेजने की धमकी दी गई।
शिकायतकर्ता ने जिलाधिकारी से मांग की है कि मामले की जांच कराते हुए बाउंड्री निर्माण पर रोक लगाई जाए और न्यायालय के आदेशों के अनुरूप उसे भूमि पर कब्जा दिलाया जाए।
#ikvnews #mahobainsight 
DM Mahoba
    user_Nitendra Jha
    Nitendra Jha
    Mahoba Insight & Ikvnews Sharafipura, Mahoba•
    10 hrs ago
  • ,बेलाताल 10 करोड़ नशा मुक्ति भारत अभियान के तहत चला नशा मुक्ति महा अभियान ,बेलाताल 10 करोड़ नशा मुक्ति भारत अभियान के तहत चला नशा मुक्ति महा अभियान
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    ,बेलाताल  10 करोड़ नशा मुक्ति भारत अभियान के तहत चला नशा मुक्ति महा अभियान
,बेलाताल  10 करोड़ नशा मुक्ति भारत अभियान के तहत चला नशा मुक्ति महा अभियान
    user_इंडिया न्यूज यूपी एक्सप्रेस
    इंडिया न्यूज यूपी एक्सप्रेस
    महोबा, महोबा, उत्तर प्रदेश•
    12 hrs ago
  • हमीरपुर :घर में घुसकर युवक की पिटाई का वीडियो वायरल, तीन नामजद के खिलाफ मुकदमा हमीरपुर। सदर कोतवाली क्षेत्र के खालेपुरा मोहल्ले में एक युवक की घर में घुसकर लाठी-डंडों से पिटाई किए जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में दो लोग घर के अंदर युवक को बेरहमी से पीटते हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद इलाके में हड़कंप मच गया। बताया जा रहा है कि मारपीट के दौरान युवक को लाठी-डंडों से पीटा गया। घटना के पीछे का कारण फिलहाल स्पष्ट नहीं हो सका है। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने मामले को संज्ञान में लेते हुए कार्रवाई शुरू कर दी। हमीरपुर पुलिस के मीडिया सेल के अनुसार, वादी से प्राप्त तहरीर के आधार पर थाना कोतवाली नगर पुलिस ने तीन नामजद अभियुक्तों के विरुद्ध सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत किया है। पुलिस के मुताबिक प्रकरण में विवेचनात्मक एवं अन्य विधिक कार्रवाई प्रचलित है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
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    हमीरपुर :घर में घुसकर युवक की पिटाई का वीडियो वायरल, तीन नामजद के खिलाफ मुकदमा
हमीरपुर। सदर कोतवाली क्षेत्र के खालेपुरा मोहल्ले में एक युवक की घर में घुसकर लाठी-डंडों से पिटाई किए जाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में दो लोग घर के अंदर युवक को बेरहमी से पीटते हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद इलाके में हड़कंप मच गया।
बताया जा रहा है कि मारपीट के दौरान युवक को लाठी-डंडों से पीटा गया। घटना के पीछे का कारण फिलहाल स्पष्ट नहीं हो सका है। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने मामले को संज्ञान में लेते हुए कार्रवाई शुरू कर दी।
हमीरपुर पुलिस के मीडिया सेल के अनुसार, वादी से प्राप्त तहरीर के आधार पर थाना कोतवाली नगर पुलिस ने तीन नामजद अभियुक्तों के विरुद्ध सुसंगत धाराओं में अभियोग पंजीकृत किया है। पुलिस के मुताबिक प्रकरण में विवेचनात्मक एवं अन्य विधिक कार्रवाई प्रचलित है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
    user_Raj kumar जिला ब्यूरो चीफ
    Raj kumar जिला ब्यूरो चीफ
    मौदहा, हमीरपुर, उत्तर प्रदेश•
    17 hrs ago
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